मत: तो ऐसी थी ‘त्यागमूर्ति’ गांधी की मंहगी गरीबी
अंग्रेजी में एक शब्द है “एक्सपेंसिव-पावर्टी”
इसका मतलब होता है….
“महंगी- गरीबी” अर्थात… गरीब दिखने के लिए
आपको बहुत खर्चा करना पड़ता है।
गांधीजी की गरीबी ऐसी ही थी।
एक बार सरोजनी नायडू ने उनको मज़ाक में कहा भी था कि
“आप को गरीब रखना हमें बहुत महंगा पड़ता है !!”
ऐसा क्यों ?……
गांधी जी जब भी तीसरे दर्जे में रेल सफर करते थे तो वह सामान्य तीसरा दर्जा नहीं होता था।
अंग्रेज नहीं चाहते थे कि गांधी जी की खराब हालातों में,
भीड़ में यात्रा करती हुई तस्वीरें अखबारों में छपे उनको पीड़ित (विक्टिम) कार्ड का लाभ मिले।
इसलिए जब भी वह रेल यात्रा करते थे तो उनको विशेष ट्रेन दी जाती थी जिसमें कुल 3 डिब्बे होते थे…..
जो केवल गांधी जी और उनके साथियों के लिए होते थे,
क्योंकि हर स्टेशन पर लोग उनसे मिलने आते थे।
इस सब का खर्चा बाद में गांधीजी के ट्रस्ट की ओर से अंग्रेज सरकार को दे दिया जाता था।
इसीलिए एक बार मो•अली जिन्ना ने कहा था कि .. “जितने पैसो में मैं प्रथम श्रेणी यात्रा करता हूँ,
उसे कई गुना में गांधीजी तृतीय श्रेणी की यात्रा करते हैं।”
गांधीजी ने प्रण लिया था कि वे केवल बकरी का दूध पिएंगे।
बकरी का दूध आज भी महंगा मिलता है, तब भी महंगा ही था…
अपने आश्रम में तो बकरी पाल सकते थे,
पर गांधी जी तो बहुत घूमते थे,
ज़रूरी नही कि हर जगह बकरी का दूध आसानी से मिलता ही हो।
इस बात का वर्णन स्वयं गांधीजी की पुस्तकों में है, कैसे लंदन में बकरी का दूध ढूंढा जाता था,महंगे दामों में खरीदा जाता था क्योंकि गांधी जी गरीब थे,
😀 वो सिर्फ बकरी का दूध ही पीते थे… 😂
ये बात अलग है कि खुशवंत सिंह ने अपनी किताब में लिखा है कि…
गांधी जी ने दूध के लिए जो बकरियां पाली थी, उनको नित्य साबुन से नहलाया जाता था,
उनको प्रोटीन खिलाया जाता था।
उनपर 20 रुपये प्रतिदिन।का खर्च होता था।
90 साल पहले 20 रुपये मतलब आज हज़ारों रुपये…
बाकी खर्च का तो ऐसा है कि गांधीजी अपने साथ एक दानपात्र रखते थे,
जिसमें वह सभी से कुछ न कुछ धनराशि डालने का अनुरोध करते थे।
इसके अलावा कई उद्योगपति उनके मित्र उनको चंदा देते थे।
उनका एक न्यास(ट्रस्ट) था जो गांधी के नाम पर चंदा एकत्र करता था।
उनके 75 वें जन्मदिन पर 75 लाख रुपए का चंदा जमा करने का लक्ष्य था,
पर एक करोड़ से ज्यादा जमा हुए।
सोने के भाव के हिसाब से तुलना करें तो आज के 650 करोड़ रुपये हुए।
महात्मा गांधी के पिता करमचन्द उत्तमचन्द गाँधी (१८२२-१६ नवंबर १८८५) थे।
वे पोरबन्दर रियासत में प्रधानमंत्री, राजस्थानिक कोर्ट के सभासद,राजकोट में दीवान और कुछ समय तक वांकानेर के दीवान के उच्च पद पर प्रतिष्ठित थे।
जिस व्यक्ति का पिता अंग्रेजो।का दीवान था जो अपने बेटे को उस समय जब हमारे बाप दादाओ के पास खाने के दाने नही थे।
देश मे हर तरफ बीमारी, भूखमरी, अकाल था अंग्रेज कोड़े मारते थे….
उस समय अपने बेटे गांधी को 15 वर्ष से भी ज्यादा समय दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड मे पढ़ाते थे यदि वो गरीब थे तो खास भगवान।
ऐसा गरीब सबको बनाए…..
गांधी उतने गरीब भी नहीं थे,जितना हमको घुट्टी पिला पिलाकर रटाया गया है।
👍🇮🇳
वंदे मातरम् 🙏🏽 जय श्री राम 🚩🚩
फेसबुक पोस्ट से
गांधी का बकरी प्रेम
महात्मा गांधी रोजाना बकरी का दूध पीते थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में महात्मा गांधी जहां भी जाते थे, उनके लिए बकरी के दूध की व्यवस्था जरूर की जाती थी। यहां तक कि साल 1931 में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में शिरकत करने के लिए जब महात्मा गांधी लंदन गए थे तब भी अपने साथ दो बकरियां ले गए थे। ऐसे में महात्मा गांधी का बकरी प्रेम जगजाहिर है। महात्मा गांधी ने जो बकरियां पाल रखी थी, उनकी देखभाल वह स्वयं करते थे। इस बात का उल्लेख गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में भी किया है। परन्तु यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि महात्मा गांधी का बकरी प्रेम कितना महंगा था। यह जानने के लिए इस रोचक स्टोरी को जरूर पढ़ें।
महात्मा गांधी क्यों पीने लगे बकरी का दूध
स्टोरी तब शुरू होती है, जब महात्मा गांधी साल 1919 में बवासीर से पीड़ित थे। बवासीर के कारण वह शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो चुके थे। अत: बवासीर के ऑपरेशन के लिए गांधीजी मुंबई पहुंचे जहां डॉक्टर दलाल ने उनसे स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि दूध का सेवन करेंगे तभी मैं आप को स्वस्थ्य कर पाउंगा। परन्तु महात्मा गांधी ने तो गाय-भैंस का दूध नहीं पीने की कसम खा रखी थी।
ऐसे में कस्तूरबा गाँधी ने महात्मा गांधी को बकरी का दूध पीने की सलाह दी। डॉक्टर दलाल ने भी कस्तूरबा के सुझाव का समर्थन किया। इसके बाद गांधी जी ने बकरी का दूध पीना स्वीकार किया। तत्पश्चात डॉ. दलाल ने गांधी जी के बवासीर का सफल आपरेशन किया और गांधीजी के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार हुआ। फिर क्या था, महात्मा गांधी को बकरी के दूध से इतना प्रेम हो गया कि वह जहां भी जाते उनके लिए बकरी के दूध की व्यवस्था की जाती थी।
महात्मा गांधी का बकरी प्रेम
महात्मा गांधी प्रतिदिन बकरी का दूध पीते थे, इसलिए उनके लिए बकरी पालना जरूरी हो चुका था। अत: महात्मा गांधी के लिए एक बकरी लाई गई। महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘The Story of My Experiments with Truth’ के अनुसार, वह अपनी बकरी की देखभाल बहुत प्यार से करते थे। गांधीजी ने जो बकरी पाल रखी थी, उसका नाम निर्मला था। यह बकरी उनके साथ तकरीबन सात साल तक रही।
महात्मा गांधी जब 1931 ईस्वीं में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन जाने लगे तो अपने साथ दो बकरियां भी ले गए थे। इस दौरान लंदन के एक पत्रकार ने गांधी जी से सवाल पूछा कि द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने आए हैं फिर ये बकरियां क्यों साथ लाए हैं? जवाब में गांधीजी ने हमेशा की तरह स्वदेशी का गुणगान और विदेशी बहिष्कार की बात की। तब उस चालाक पत्रकार ने कहा कि ये तो इटली की बकरियां हैं, इनका यहां क्या काम है।
कहते हैं, महात्मा गांधी की बकरी को काजू-बादाम खिलाया जाता था ताकि गांधीजी को पौष्टिक दूध मिल सके। यहां तक उसे महंगे सोप से नहलाया भी जाता था। गांधीजी की बकरी के खाने का रोजाना खर्च 10 से 20 रुपए तक था, जो उस जमाने में एक स्कूल टीचर की महीनेभर की तनख्वाह हुआ करती थी। जाहिर जितने खर्चे में भारत का कोई पढ़ा-लिखा आदमी महीनेभर अपने परिवार का गुजारा करता था, उतने रुपए तो गांधीजी की बकरी रोज खा जाती थी। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि गांधीजी की बकरी को आखिर में किस प्रकार से रखा जाता था कि उसका रोजाना खर्च इतना महंगा था।
बकरियों को खिलाए गए हफ्तेभर सूखे मेवे
साल 1933 में महात्मा गांधी का खंडवा दौरा था, यहां घंटाघर चौक पर आमसभा होनी थी। लिहाजा कई स्वतंत्रता सेनानी भी आए हुए थे। चूंकि वहां इंतजार कर रहे स्वतंत्रता सेनानियों को पहले से पता था कि गांधीजी बकरी का दूध पीना पसन्द करते हैं, अत: उनके लिए खास व्यवस्था की गई। स्थानीय लोगों के माध्यम से बकरियों का इंतजाम किया गया और इन बकरियों को तकरीबन हफ्तेभर पहले से सूखे मेवे खिलाए गए ताकि गांधीजी को बेहद पौष्टिक दूध मिल सके।
जब सुभाषचन्द्र बोस के भाई ने मंगवाई 15 बकरियां
साल 1932 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक कोलकाता में सुभाष चन्द्र बोस के बड़े भाई श्री शरत चन्द्र बोस के घर में आयोजित करने का निर्णय लिया गया। बता दें कि उन दिनों शरतचन्द्र बोस कोलकाता में कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार किए जाते थे। कांग्रेस कार्यसमिति की यह बैठक इसलिए खास बन चुकी थी क्योंकि इसमें महात्मा गांधी शामिल होने के लिए बड़ी मुश्किल से राजी हुए थे।
परन्तु एक बड़ी समस्या यह थी कि वह प्रतिदिन बकरी का ताजा दूध पीते थे। गांधीजी के लिए बकरी की दूध की व्यवस्था उनके निजी सचिव महादेव देसाई किया करते थे। इसके लिए शरतचन्द्र बोस ने गांधीजी के लिए 15 बकरियां मंगवाई ताकि महादेव देसाई इनमें से किसी एक उत्तम बकरी का चयन कर सकें।
उद्योगपति घनश्याम दास बिरला ने खरीदी 50 बकरियां
राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र में स्थित पिलानी शहर मशहूर उद्योगपति श्री घनश्यामदास बिड़ला का पैतृक स्थल है। पिलानी अपने बेहतरीन मौसम के लिए भी विख्यात है। चूंकि गांधीजी और उद्योगपति घनश्यामदास बिड़ला की दोस्ती जगजाहिर थी, इसी घनिष्ठता के चलते वह कुछ दिन पिलानी में रहना चाहते थे।
ऐसे में गांधीजी के पिलानी आगमन से पूर्व बिरला परिवार ने उनके लिए पिलानी स्थित विद्याविहार कैम्पस में एक बड़े आकार का झूंपा बनवाया। इतना ही नहीं, गांधीजी के लिए बकरी के दूध की व्यवस्था हेतु 50 बकरियां भी खरीदी गईं। परन्तु इन्हीं दिनों भारत छोड़ो आन्दोलन की शुरूआत हो गई और महात्मा गांधी पिलानी नहीं आ पाए।
सरोजिनी नायडू का चर्चित बयान
हर पल अहिंसा की बात करने वाले महात्मा गांधी का गुस्सा जगजाहिर है। इस बारे में मीराबेन और सरोजिनी नायडू तो गांधीजी को आग का गोला कहती थीं, कि कब वो फट पड़ें किसी को पता नहीं। गांधीजी का झोपड़ी में रहना, बकरियों का दूध पीना और ट्रेन के थर्ड क्लास डिब्बे में यात्रा करना, देश की आम की जनता को खूब रास आया।
देश के गरीब लोगों ने सोचा कि हमारे देश का यह महानायक एक गरीब आदमी की तरह रहता है, परन्तु शायद उन्हें यह नहीं पता था कि गांधीजी की गरीबी कितनी महंगी थी। भारतीय मुक्ति संग्राम के बड़े नेताओं में शुमार सरोजिनी नायडू ने एक बार मजाकिए लहजे में कहा था कि “महात्मा गांधी को गरीब रखने के लिए, हमें खजाने को लुटाते रहना होगा। उनकी गरीबी बहुत महंगी है।”
मोहनदास गांधी को खिलाने की लागत: शरत चंद्र बोस से पूछें
1932 में, मोहनदास गांधी कई हफ़्तों कलकत्ता में शरत चंद्र बोस के घर उनके सम्मानित अतिथि रहे। इस निबंध में उस घटना के प्रत्यक्षदर्शी अनुभव से प्राप्त कुछ महत्वपूर्ण विवरण शामिल हैं।
Sandeep Balakrishna
प्रकाशित तिथि:21 फ़रवरी 2022,
यह कहना कि भारतीय स्कूली छात्रों की तीन पीढ़ियाँ गांधी की सादगी के घिसे-पिटे आहार पर पली-बढ़ी हैं, एक स्पष्ट बात है। यह सादगी वास्तविक थी, लेकिन जिस तड़क-भड़क ने इसे वैश्विक स्तर तक पहुँचाया, वह गांधीवादी मिथक-निर्माण का एक ऑर्केस्ट्रा था। “असली” गांधी अपने जीवनकाल में ही एक मिथकीय व्यक्ति बन गए, और जिस शहादत की उन्हें इतनी बेसब्री से तलाश थी, क्योंकि भारतीय स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर उनकी अपनी पार्टी ने उन्हें इतनी क्रूरता से नपुंसक बना दिया था, वह अंततः उन्हें मिल ही गई। उसी पार्टी ने, जिसका नेतृत्व अब नवाब नेहरू कर रहे थे, इस शहादत को एक ऐसे आभूषण के रूप में इस्तेमाल करने में ज़रा भी देर नहीं लगाई जिसने पहले से मौजूद मिथक को निर्विवादिता प्रदान कर दी।
मोहनदास गांधी ने कुख्यात प्रस्ताव संख्या 3 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को मोपला जिहादियों के आगे झुकने का आदेश दिया।
इस प्रकार, लंबे समय तक, राष्ट्र एक प्रकार की स्मृतिलोप की स्थिति में रहा, जिसका अर्थ था कि हमें सरोजिनी नायडू के इस प्रसिद्ध कथन से अनभिज्ञ रखा गया कि गांधी को गरीब और साधारण बनाए रखने की राष्ट्र को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। उन्होंने हमें इस कीमत के बारे में बहुत कम जानकारी दी।
ये विवरण अन्यत्र भी उपलब्ध हैं, अनेक कालक्रमों, भौगोलिक क्षेत्रों और व्यक्तियों में फैले हुए। ऐसा ही एक विवरण नीरद सी. चौधरी लिखित एक अत्यंत मनोरंजक और तीक्ष्ण, प्रथम-पुरुष कथा में उपलब्ध है। यह…उम्म… महात्मा के साथ उनकी पहली आमने-सामने की मुलाकात का प्रत्यक्षदर्शी विवरण है । नीरद चौधरी के अवलोकन तीक्ष्ण हैं और मानव स्वभाव के कई मूलभूत पहलुओं पर उनकी पकड़ दर्शाते हैं और हमें उस काल के राजनीतिक और सामाजिक परिवेश और स्वयं गांधी के बारे में कई अंतर्दृष्टि देते हैं। उनके वृत्तांत का एक-शब्द वर्णन: आँखें खोल देने वाला।
विवरण स्वयं ही सब कुछ बयां कर देते हैं।
पृष्ठभूमि
1932 में, कांग्रेस पार्टी ने अपनी कार्यसमिति की बैठक श्री शरत चंद्र बोस, जो कि अधिक प्रसिद्ध नेता सुभाष चंद्र बोस के भाई थे, के समृद्ध कलकत्ता स्थित घर में आयोजित करने का निर्णय लिया।
शरत बाबू के स्पष्ट आदेश पर नीरद चौधरी तुरन्त इस कार्यसमिति की बैठक में शामिल हो गये। यह कोई साधारण बैठक नहीं थी। महात्मा जी स्वयं इसमें शामिल होने को तैयार हुए थे।
स्वाभाविक रूप से, उनके स्वागत और प्रवास की तैयारियाँ बेदाग और दोषरहित होनी थीं, और ये तैयारियाँ महान संत के आगमन से कई दिन पहले ही शुरू हो जानी थीं। गाँधीवादी होना आसान नहीं था, खासकर जब गाँधीवादी स्वयं गाँधी हों। नीरद पूर्व-व्यवस्थाओं का वर्णन इस प्रकार करते हैं:
गांधीजी के लिए पहली मंजिल पर एक मुख्य शयनकक्ष होना था, जिसे गांधीवादी शैली में, यानी यथासंभव खाली बनाया गया था। कार्यसमिति की बैठकें उसी मंजिल पर बने ड्राइंग रूम में आयोजित होनी थीं ताकि गांधीजी को सीढ़ियाँ चढ़ने की परेशानी से बचाया जा सके।
दुर्जेय गांधीवादी आहार
शरत बोस की समस्याओं में आवास सबसे छोटी थी। गाँधीवादी भोजन तो बिल्कुल अलग ही समस्या थी। जो भी मेज़बान इस मामले में ज़रा सी भी चूक करता, उसे धिक्कार था। बेशक, शरत बोस इस गाँधीवादी हठधर्मिता से पूरी तरह वाकिफ़ थे और लगभग डर के मारे अपना काम करते थे। यह कुछ ऐसा ही दिखता था।
गांधी के आहार संबंधी नुस्खे न केवल कठोर और असंख्य थे, बल्कि विचित्र भी थे। चूँकि वे सुप्रसिद्ध हिंदू आहार नियमों से मेल नहीं खाते थे, बल्कि कुछ हद तक गूढ़ थे, इसलिए शरत बाबू ने कलकत्ता में गांधी के एक कट्टर अनुयायी से गांधी की पसंद वाली सब्ज़ियों की एक सूची माँगी। मैंने जो सूची देखी, वह बहुत लंबी थी… बेशक, गांधी एक ही भोजन में या एक ही दिन में पूरी सब्ज़ियाँ नहीं खाते थे, लेकिन वे या उनके प्रभारी सचिव अपने मेज़बान के संसाधनों और वफ़ादारी की परीक्षा लेने को किसी ख़ास दिन या किसी ख़ास भोजन के लिए उनमें से एक या दूसरी सब्ज़ी माँग सकते थे।
कम से कम कहें तो ये बड़े अक्षर अपने आप में स्पष्ट हैं, और गांधी के भीतर के असली भूतों को दर्शाते हैं जिन्होंने उन्हें महात्मा जैसा व्यवहार करने को प्रेरित किया। बिना ज़्यादा तीखे शब्दों के, इतना तो कहा ही जा सकता है: अपने मेज़बानों के प्रति गांधी का व्यवहार, अतिथि देवो भव: के प्राचीन महान सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत था।
लेकिन इस निष्ठा परीक्षण की निर्मम प्रकृति इससे भी आगे बढ़ गई।
सचिव सुबह दस बजे से पहले उस दिन के लिए जड़ी-बूटी या सब्ज़ी नहीं बताते थे, और महात्मा गांधी अपना भोजन लगभग दोपहर के समय चाहते थे। इसलिए, माँगने पर भी कोई विशेष सब्ज़ी खरीदने का समय नहीं मिलता था, और रसोई में सब कुछ तैयार रखना पड़ता था, ताकि माँगी गई विशेष सब्ज़ी हाथ में आ जाए।
ओह! और जिस सचिव की बात हो रही है, वह थे प्रसिद्ध महादेव देसाई।
नोबेल पुरस्कार विजेता बकरी
लेकिन सबसे बुरा तो अभी बाकी था। शायद गांधीजी के प्रबल आहार का सबसे केंद्रीय तत्व दूध ही था। मानव सभ्यता के आरंभ से लेकर अब तक के सभी महान विश्व-नेताओं के इतिहास में, केवल गांधीजी ने ही बकरी के दूध को नोबेल पुरस्कार विजेता का दर्जा दिलाया। उनके निधन के बाद से, बेचारी बकरी को इंसान की थाली में एक व्यंजन बनकर रह जाने की अपनी सदियों पुरानी नियति से समझौता करना पड़ा है। लेकिन बकरी के दूध के प्रति गांधीजी के कट्टर प्रेम का एक सीधा, कामुक संबंध था। उनके भीतर का सदैव सतर्क ” ब्रह्मचारी” गाय का दूध पीने के निरंतर भय में रहता था, कहीं ऐसा न हो कि वह उनकी यौन इच्छायें उत्तेजित कर दे। और इसलिए, वे जहाँ भी जाते, दूसरों को उनकी बकरी के दूध की तपस्या पूरा करने को व्यापक व्यवस्था करनी पड़ती थी।
नीरद चौधरी हमें शरत बोस को झेलनी पड़ी गांधीवादी यातनाओं का विस्तृत चित्रण प्रस्तुत करते हैं।
महात्मा गांधी के लिए दूध की आपूर्ति कोई कम कठिन समस्या नहीं थी, क्योंकि वह केवल बकरी का दूध लेते थे… लेकिन, गांधी की सेवा करने की अनुमति देने से पहले, बकरियों को उनके प्रधान निजी सचिव महादेव देसाई से जांचा जाना था, और इसलिए बकरी का दूध पहले से खरीदा या संग्रहीत नहीं किया जा सकता था। इस प्रकार बकरी को शरत बाबू के घर लाया जाना था और वहां उसका दूध निकाला जाना था… दूसरे दिन सुबह, जब मैं लगभग सात बजे पहुंचा, तो मैंने बाहरी आंगन में 15 बकरियों की एक पंक्ति को पत्ते चबाते और जी भर कर मिमियाते पाया। उनके पीछे, बकरी चराने वाले सावधान की मुद्रा में खड़े थे, मानो परेड कर रहे हों… बकरियों का एक धर्मनिरपेक्ष और स्वास्थ्यकर निरीक्षण हुआ, लेकिन इसके अलावा उनका नैतिक निरीक्षण भी हो सकता था। मुझे बताया गया कि महादेव देसाई स्वयं बकरियों की जांच करने आएंगे और उनमें से एक को चुनेंगे जिसे गांधीजी की पालक-माता के रूप में सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त होगा… मैंने हर किसी को यह बताने की कोशिश की कि वह यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनमें से कौन सी बकरी सबसे पवित्र है।
मोहनदास गांधी लगभग चार हफ़्ते शरत बोस के घर पर रहे और अपनी सादगी के अनुरूप, उपर्युक्त आतिथ्य की माँग की और उन्हें वह आतिथ्य मिला भी। लगभग एक महीने प्रवास के बाद, नीरद चौधरी शरत बोस के लेखा लिपिक के पास गए और उनसे इस गांधीवादी सादगी के लिए धन की लागत के बारे में पूछा। जवाब यह था:
यह सर्वविदित था कि गांधीजी अपनी गरीबी की शपथ के कारण अपने भोजन पर प्रतिदिन केवल तीन आने ही खर्च करने देते थे। लेकिन शरत बोस के क्लर्क ने मुझे चार हफ्ते बाद बताया कि लगभग तीन हज़ार रुपये खर्च हो चुके थे, जो गांधीजी की अनुमति से छह सौ गुना ज़्यादा था।
पीछे मुड़कर देखने पर, सामान्य बुद्धि, शालीनता और मर्यादा से संपन्न लोगों को यह सब अविश्वसनीय लगता है। कुछ अपवाद छोड़कर, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी खाने-पीने के मामले में इस पैमाने पर और इस स्तर पर नखरे नहीं दिखाते। और यहाँ, मोहनदास गांधी अपने पूरे राजनीतिक जीवन में इस तरह के मनमौजी, तुच्छ और दखलअंदाज़ी भरे व्यवहार से पूरी तरह बच निकले… किस हैसियत से? वे न तो राष्ट्रपति थे, न ही प्रधानमंत्री… वे उस कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी नहीं थे जिस पर उन्होंने अपनी अहिंसा और बचकाने उपवास से अत्याचार किया था।
उपसंहार
शरत बोस के घर में गांधीजी के प्रवास का एक दिलचस्प पहलू यह था कि बंगाल कांग्रेस इकाई में एक भयंकर गुटीय युद्ध छिड़ गया, जिसकी शुरुआत उसके प्रमुख डॉक्टर बिधान चंद्र रॉय ने की, जो शरत और सुभाष चंद्र बोस से गहरी नफ़रत करते थे। लेकिन यह कहानी किसी और दिन के लिए है।
हालाँकि, शरत बोस के गांधी को दिए गए नेकदिल आतिथ्य का सबसे भद्दा उपसंहार छह साल बाद आया। बोस परिवार ने गांधी को खुश रखने को अपने घर और दिल खोल दिए थे और असाधारण हद तक चले गए थे। बदले में, सत्य और अहिंसा के इस पुजारी ने सुभाष चंद्र बोस—जो 1938 में भारी बहुमत से कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए थे—की पीठ में छुरा घोंपा, ऐसी चालें चलीं जिन्हें केवल बेईमानी ही कहा जा सकता है। वास्तव में, बोस का कांग्रेस से जबरन निष्कासन उस पेटेंटेड गांधीवादी परिघटना का एक और उत्कृष्ट उदाहरण है: गांधी के आध्यात्मिक स्तर पर की गई हिंसा का पैमाना और क्रूरता, भौतिक स्तर पर अहिंसा अपनाकर हासिल की गई संदिग्ध जीतों के सामने फीकी पड़ जाती है।
