SC के बाद क्या करेगी सरकार? मासिक धर्म घाटे का नहीं,लाभ का सौदा?
सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2026 में महिलाओं को नौकरी में अनिवार्य मासिक धर्म (पीरियड) अवकाश की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि इसे अनिवार्य करने से नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं, जिससे रोजगार बाजार में उनके अवसर कम हो सकते हैं। हालांकि, यह विषय नीतिगत चर्चा का विषय बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और बहस के मुख्य बिंदु:
अनिवार्य न करने का कारण: कोर्ट का मानना है कि अनिवार्य सवेतन छुट्टी (paid leave) कंपनियों को महिलाओं को काम पर रखने से हतोत्साहित कर सकती है, जो उनके करियर और समान अवसरों के लिए हानिकारक हो सकता है।
नीतिगत फैसला: कोर्ट ने सरकार को इस पर नीतिगत निर्णय लेने का सुझाव दिया है।
वैकल्पिक सुझाव: विशेषज्ञों का मानना है कि अनिवार्य छुट्टी के बजाय, कार्यस्थल पर बेहतर स्वच्छता सुविधाएं, लचीले कामकाजी घंटे या मौजूदा छुट्टी के प्रावधानों का उपयोग करना अधिक व्यवहार्य समाधान हो सकता है।
वैश्विक परिदृश्य: स्पेन जैसे कुछ देशों में पीरियड लीव के कानून हैं, लेकिन वहां भी इसका उपयोग कम ही किया जाता है।
Debate Over Menstrual Leave Grows As Women Share Pain Impact And Studies Show Productivity Concerns
घाटे नहीं, फायदे का सौदा है ‘पीरियड लीव’
पीरियड के दौरान होने वाले तेज दर्द और परेशानी को लेकर महिलाओं के बीच मेंस्ट्रुअल लीव की मांग तेज हो रही है। आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में महिलाएं इस दौरान पूरी क्षमता से काम नहीं कर पातीं, जिसके बावजूद भारत में इसे लेकर अभी भी बहस जारी है।
उपमा सिंह
मैं 12-13 साल की थी, जब पीरियड शुरू हुए। वो मेरे जीवन का सबसे भयावह सप्ताह था। इतना भयंकर दर्द कि शुरुआती दो दिन बिस्तर पर करवट बदलते और कराहते बीते। ब्लड प्रेशर कम, बेहोशी की स्थिति । अंतत: दर्द की दवा ही सहारा बनी। फिर यह भयावह सप्ताह हर महीने आने लगा। यकीन मानिए, तब इससे ज्यादा डरावनी चीज मेरे लिए कुछ नहीं थी।
मेंस्ट्रुअल लीव पर बहस अब भी जारी(फोटोःFreepik)
क्लास में सबसे ज्यादा अटेंडेंस वाली यह लड़की अब हर महीने एक-दो दिन ‘एब्सेंट’ रहने लगी। दस साल बाद जब नौकरी में आई तब भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही थी, मगर यहां हर महीने छुट्टी का ऑप्शन तो नहीं। दर्द की दवा खाकर ऑफिस पहुंच जाती, मगर कई बार ऐसा हुआ कि पेन किलर का असर होने तक डेस्क से उठने तक की हिम्मत नहीं होती। एकाध बार तो बॉस ने खुद हालत देख घर भेज दिया।
क्या कहते आंकड़े
आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में हर महीने पीरियड से गुजरने वाली करीब 1.8 अरब महिलाओं और लड़कियों में से 70–80% मेरी ही तरह इस दौरान ‘डिसमेनोरिया’ यानी असहनीय दर्द से गुजरती हैं। 15% में दर्द इतना तेज होता है कि वे काम नहीं कर पातीं।
पीरियड लीव जनहित याचिका हुई निरस्त
इसके बावजूद, सर्वोच्च न्यायालय ने अनिवार्य मासिक धर्म अवकाश की मांग वाली जनहित याचिका निरस्त कर दी। कोर्ट का तर्क है कि पीरियड लीव अनिवार्य करने से कंपनियां, महिलाओं को नौकरी पर रखना बंद कर देंगी। कई इसे गैर-बराबरी को बढ़ावा देने वाला भी बता रहे हैं।
मैटरनिटी लीव पर भी था यही विवाद
लेकिन क्या वाकई मर्द और औरत इस मामले में बराबर हैं? अगर हां, तो उनके हिस्से भी तो आना चाहिए पीरियड का यह भयावह दर्द । वो हैवी ब्लीडिंग, ज़िंदगी के करीब 40 सालों तक हर महीने। फिर कीजिए बराबरी की बात। बिल्कुल यही तर्क कुछ वक्त पहले मैटरनिटी लीव छह महीने करने को लेकर दिया जा रहा है कि औरतों का करियर खत्म हो जाएगा, कंपनियां उन्हें जॉब देने से डरेंगी, भेदभाव बढ़ेगा, लेकिन लागू हुआ न यह नियम और अब सब खुली बाहों से उसे एक्सेप्ट कर चुके हैं।
यह ह्यूमन नेचर है
कौन सी कंपनी ने औरतों को न रखने का ऐलान किया? असल में यह ह्यूमन नेचर है। हम इंसान किसी भी नए बदलाव को R.A.M.A. यानी Resistance, annoyance, manage, acceptance की प्रॉसेस में ही अपनाते हैं। मतलब, जब भी नया बदलाव होता है, लोग पहले प्रतिरोध करते हैं, फिर उन्हें चिढ़ मचती है, धीरे-धीरे वे मैनेज करना सीख जाते है और आखिर में उसे अपना लेते हैं।
मेंस्ट्रुअल लीव महिला रिटेंशन 10–15% बढ़ा
6 महीने की मैटरनिटी लीव के मामले में हम यह देख चुके हैं। पीरियड लीव को लेकर भी ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां इसे लागू करने से प्रोडक्टिविटी घटी नहीं, बल्कि बढ़ी ही है। Nike, Vodafone जैसे कंपनियों में वॉलंटरी 1–2 दिन के मेंस्ट्रुअल लीव की व्यवस्था के बाद महिला रिटेंशन 10–15% ज्यादा दिखा।
लीव न मिलने क्या है असर
खुद सोचिए न, लड़कियां/महिलाएं इस तकलीफ में ऑफिस आ भी जाएं तो क्या पूरी कार्यक्षमता से काम कर पाएंगी? तो भला महज प्रेजेंटिज्म (प्रेजेंट होना पर काम न कर पाना) से क्या फायदा? डेटा भी यही इशारा करते हैं। जैसे, नीदरलैंड की 32,748 महिलाओं पर 2019 में हुए BMJ Open अध्ययन में मिला कि 80.7% महिलाएं प्रेजेंटिज्म का शिकार होती हैं। इससे प्रति महिला 8.9 दिन उत्पादकता हानि होती है यानी महिलाएं पीरियड के बावजूद काम पर जाती तो हैं, पर आउटपुट घट जाता है।
क्या कह रही स्टडी
एक स्टडी के अनुसार, भारत में 54% महिलायें पीरियड में छुट्टी लेती हैं। ऐसे में, बेहतर नहीं है कि ऑफिशली ही महीने में एक दिन छुट्टी का विकल्प दे दिया जाए। वैसे बता दें कि जिन देशों में यह लागू हैं, वहां भी औरतें स्टिग्मा, प्रिविलेज्ड कहे जाने के ताने आदि के चलते न के बराबर ही पीरियड लीव लेती हैं।
इन देशों में पीरियड लीव का 1–10% उपयोग
मसलन, जापान में यह 1947 से लागू है, मगर उपयोग 1–10% ही होता है। दक्षिण कोरिया में भी 2001 से हर महीने 1 दिन पीरियड लीव मिलती है, मगर इस्तेमाल 10% से भी कम होता है। इसीलिए, इंडोनेशिया, स्पेन, जाम्बिया, ताइवान, केन्या जैसे देश भी अपनी महिलाओं को सपोर्ट करने को हर महीने 1 से 2 दिन का पीरियड लीव देते हैं।
लीव से पड़ा सकारात्मक असर
स्पेन और इंडोनेशिया में पेड पीरियड लीव मिलती है, लेकिन कहीं भी इसका नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा, उल्टे लीव/वर्क फ्रॉम होम की सुविधा से महिलाओं का काम बेहतर हुआ। काम के प्रति उनकी लॉयल्टी बढ़ी। नतीजा बेहतर उत्पादकता में आया। इसी से भारत में जोमैटो, स्विगी जैसी चर्चित कंपनियों ने भी अपने वर्क कल्चर को विमन फ्रेंडली बनाते हुए मेंस्ट्रुअल लीव व्यवस्था लागू की।
सरकार क्या लेगी आखिरी फैसला
खैर, सुप्रीम कोर्ट ने तो अब इस मामले में गेंद सरकार के पाले में डाल दी है। अब सरकार कोर्ट की सोच के साथ जाती है या अपने ही बिहार (जहां सरकारी नौकरी में 2 दिन/महीना की पेड पीरियड लीव 1992 से ही लागू है) और कर्नाटक (1 दिन/महीना की छुट्टी) जैसे राज्यों के पदचिन्ह पर चलती है, यह भविष्य बताएगा।

