बाबर कईयों का बाप,उसके देश में निशानी तक नही
बाबर- जिसे उसके वतन में कोई नहीं जानता
कौन भारतवासी होगा जो मुगल वंश के संस्थापक बादशाह जहीरुद्दीन बाबर के नाम को न जानता हो। भारत में बाबर के अनेक स्मारक मौजूद हैं। मगर हैरानी की बात है कि बाबर के अपने वतन में कोई उसके नाम तक को नहीं जानता।
हैदराबाद से प्रकाशित सियासत नामक एक समाचारपत्र में एक पाकिस्तानी जबीउल्लाह का यात्रा वृतांत छप रहा है। अपने लेख में उसने इस बात पर हैरानी व्यक्त की है कि समरकंद में उसने अनेक लोगों से बाबर के बारे में जानना चाहा मगर वहां उन्हें भी आदमी ऐसा नहीं मिला जोकि बाबर के नाम को जानता हो। हालांकि बाबर इसी नगर के पास का रहने वाला था।
बाबर ने भारत पर जबरन कब्जा तो कर लिया मगर उसका दिल हमेशा अपने वतन में ही रमा रहा। अपनी आत्मकथा बाबर नामा में उसने सिर्फ भारत की आलोचना ही की है जबकि अपने वतन की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। उसकी इच्छानुसार उसके बेटे हुमायूं ने उसे अफगानिस्तान के काबुल नगर में ले जाकर एक बाग में दफन किया था। काबुल में बाबर के मजार की क्या हालत है इसका उल्लेख भारत के पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी आत्मकथा में किया है। नटवर सिंह के अनुसार जब श्रीमती इंदिरा गांधी अफगानिस्तान के दौरे पर गईं तो वो बाबर की कब्र पर जाकर उसे श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहती थीं। अफगान सरकार ने उन्हें वहां जाने से रोकने के प्रयास किए मगर जब इंदिरा गांधी न मानीं तो वो एक कार में सवार होकर अफगान सरकार के विरोध के बावजूद बाबर के मकबरे तक जा पहुंची। मकबरा तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं थी और चारों ओर वीरानी-वीरानी थी। झाड़ और जंगली पेड़ों ने इस मकबरे को ढक रखा था। नटवर सिंह के अनुसार बाबर के मकबरे की हालत बेहद खस्ता थी। उसका काफी हिस्सा ध्वस्त हो चुका था। बाबर की कब्र की चारों ओर जंगली पेड़ उग आए थे और काफी वर्षों से उसकी सफाई नहीं की गई थी। कब्र भी काफी टूट चुकी थी। इंदिरा गांधी ने अफगानिस्तान की तत्कालीन सरकार से आग्रह किया कि बाबर के मकबरे की मरम्मत करवाई जाए। मगर अफगानिस्तान सरकार ने इससे साफ इंकार कर दिया। उनका कहना था कि बाबर भले ही भारत का शंहशाह रहा हो मगर अफगान जनता के लिए उसका कोई महत्व नहीं है।
