शुक्ल यजुर्वेद में ऐसा क्या था कि जिसके विशेषज्ञ “शुक्ल” कहलाए ?
भारतीय वैदिक वाङ्मय का एक अत्यंत देदीप्यमान और महत्वपूर्ण ग्रंथ है -शुक्ल यजुर्वेद। महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा सूर्य देव की कृपा से प्राप्त यह वेद अपनी भाषाई शुद्धता, व्यवस्थित क्रम और दार्शनिक उच्चता लिए हुए है जिसका मुख्य संबंध ‘यज्ञ’ के कर्मकांड से है, परंतु इसके भीतर समाहित प्रार्थनाएं केवल बाह्य आहुतियों तक सीमित नहीं हैं; वे मानव चेतना, वैश्विक कल्याण, मानसिक शुचिता और ब्रह्मज्ञान की सर्वोच्च अभिव्यक्ति हैं। शुक्ल यजुर्वेद की प्रार्थनाओं के केंद्रीय भाव, आध्यात्मिक दर्शन और व्यावहारिक जीवन दर्शन अनेक श्लोकों के माध्यम से आज भी हमारे बीच प्रसिद्ध है जैसे
१. शांति शांति शांति
“ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः, पृथ्वी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः, सर्वं शान्तिः, शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेंधि॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥”
द्यौः (आकाश), अंतरिक्ष (यूनिवर्स), पृथ्वी (धरती), औषध ( वन, वृक्ष , पौधे) की शांति कामना करने वाला यह वैदिक शांति सूक्त शुक्ल यजुर्वेद के 36वें अध्याय का 17वां मंत्र हैं जिसमें वैश्विक शांति और ब्रह्मांडीय संतुलन की प्रार्थना मनुष्य कर रहा हैं। मूल सारांश यह है कि ब्रह्मांड का कोई भी कोना अशांत न रहे। द्युलोक और अंतरिक्ष में शांति हो कोई स्पेस वार या ड्रोन/ एरियल वारफेयर न हो, पृथ्वी और समस्त जल स्रोत (नदियाँ, समुद्र) शांत और प्रदूषण मुक्त रहें।
जीवन को आरोग्य देने वाली औषधियाँ और वनस्पतियाँ हमारे लिए कल्याणकारी (शांत) हों।
संसार के समस्त देवगण, स्वयं ब्रह्म और चराचर सृष्टि में केवल शांति का वास हो। आज इस बात को हम एनवायरमेंटल कंजर्वेशन, इकोलॉजी और ग्लोबल पीस से जोड़कर पढ़ते हैं जिसका सूत्र बहुत पहले यजुर्वेद ने दे दिया था और इसका मौजूदा विस्तार आधुनिक विज्ञान ने दिया हैं। यदि प्रकृति का संतुलन बिगड़ेगा, तो मनुष्य कभी सुखी नहीं रह सकता आज भी हम उसी के लिए प्रयत्नशील हैं।
२. हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें।
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥
यह मन को पवित्र बनाने की प्रार्थना है जो यजुर्वेद के 34वें अध्याय के प्रारंभिक 6 मंत्रों की श्रृंखला है इसे ‘शिवसंकल्प सूक्त’ कहा जाता है । यह सूक्त पूरी तरह से मानव मन के मनोविज्ञान और उसकी शुचिता पर आधारित है। ऋषि जानते थे कि मनुष्य के समस्त कर्मों का उद्गम उसका मन ही है।
इस मंत्र का शाब्दिक अर्थ है यज्जाग्रतो दूरमुदैति: इंसान जागता रहता है पर उसका मन दूर-दूर तक भटक जाता है। दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति: इंसान जब नींद में होता है तो वह सपनो में पहुंच जाता है।दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं: जो सब इंद्रियों और प्रकाशों का एकमात्र प्रकाशक और दूर जाने वाला है।तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु: ऐसा वह मेरा मन, हमेशा शुभ और कल्याणकारी संकल्पों वाला हो।
मंत्र का भावार्थ है कि मन की चंचलता पर नियंत्रण का संदेश देता हैं। हमारा मन बहुत शक्तिशाली और चंचल है जो कभी-कभी गलत रास्ते पर भी भटक सकता है। ऐसे में मंत्र में इंसान प्रार्थना कर रहा कि हमारा मन धर्म और भलाई (शिव) के मार्ग पर अडिग रहे। जब तक हमारे मन में भलाई के विचार (शिव-संकल्प) नहीं होंगे, तब तक कोई भी शुभ कार्य संभव नहीं है।
३. अकाल पुरख या पुरुष
आज से चार हजार साल पहले, आज से चार सौ साल पहले और आज भी लोगों में किसी दैवीय शक्ति, प्रकृति की ताकत यानी ईश्वर की कल्पना थी, जब ईश्वर की कल्पना थी तो उसके साकार रूप की भी कल्पना थी। वह दिखता कैसा होगा शुक्ल यजुर्वेद के 31वें अध्याय में ‘पुरुष सूक्त’ इसी जिज्ञासा का हल ढूंढता दिखता हैं। पुरुष या अकाल पुरख ही वह कल्पना है , अकाल यानी समय के फेर से हटकर, अजन्मा यानी जन्म और मृत्यु के फेर से हटकर वह पुरुष ही ईश्वर हैं। यह सूक्त ईश्वर को विराट पुरुष और सामाजिक समरसता प्रदान करने वाला दिखता हैं। यह सूक्त ईश्वर के विराट रूप (Cosmic Being) की प्रार्थना और स्तुति है। इसमें उस परम पुरुष को हजारों सिर, हजारों आँखें और हजारों पैरों वाला बताया गया है, जो पूरी सृष्टि को घेर कर भी उससे परे स्थित है।
इस सूक्त में समाज के विभिन्न अंगों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र की उत्पत्ति इसी विराट पुरुष के विभिन्न अंगों मुख, बाहु, जंघा, पैर से बताई गई है। प्रार्थना के स्तर पर इसका संदेश यह है कि समाज का हर वर्ग एक ही परमपिता का हिस्सा है, इसलिए उनमें कोई ऊंच-नीच नहीं है। सभी मिलकर उस विराट व्यवस्था को चलाते हैं।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङुलम् ॥१॥
वह सहस्रशीर्षा हजारों सिरो वाले, सहस्राक्षः हजारों आँखो वाले सहस्रपात् हजारों हाथ पैर वाले है, सः भूमि वह सारी धरती के उत्पादक, सर्वाश्रय प्रकृति को ( विश्वतः धृत्वा ) सब ओर से, सब प्रकार से चरण कर, व्याप कर ( देश अंगुलम् अति अतिष्ठत् ) दश अंगुल अतिक्रमण करके विराजता है। अंगुल यह इन्द्रिय,वा देह को उपलक्षण है, अर्थात् वह दश इन्द्रियों के भोग और कर्म के क्षेत्र से बाहर है। वह न कर्म-बन्धन में बद्ध रहता है और न मन का विषय है। समस्त संसार के शिर उसके शिर हैं और समस्त संसार के चक्षु और चरण भी उसी के चक्षु और चरणवत् हैं । सर्वत्र उसी की दर्शन शक्ति और गतिशक्ति कार्य कर रही है।
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥
पुरुष: एव इदं सर्वम्: यह सब कुछ वह पुरुष ही है । यद् भूतं यत् च भव्यम् : ये जो भूत अर्थात् जो पहले उत्पन्न हुए थे और जो भव्य अर्थात् होनेवाले है यानी आगे भविष्य में भी उत्पन्न होने वाले हर बात के कारण हैं।
उत्त अमृतत्वस्य ईशानः और वह अमृतस्वरूप मोक्ष का स्वामी है, यत् अन्नैन अति रोहति जो अन्न से भी बहुत ऊपर है यानी जिन्हें भोजन की जरूरत नहीं वहीं समस्त प्राणियों के अन्न अर्थात् अन्न और कर्मफल का स्वामी होकर उन सब पर वश किये हुए है।
एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥
अस्य महिमा एतावान्: इस जगत् की महिमा विस्तार इतना है पर (पूरुपः ) वह सर्वशक्तिमान् ईश्वर (अतः ज्यायान् ) इससे कहीं बड़ा है । विश्वा भूतानि : इस जगत् में फैला हुआ हैं। प्रभु समस्त उत्पन्न पदार्थं इस के चरणों में हैं। अस्य त्रिपाद: इस के तीन चरण अर्थात दिवि प्रकाशमय स्वरूप मे हैं।
४. मेरा प्रभु की कृपा से, सब काम हो रहा है।
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥”
कण-कण में ईश्वर: इस गतिशील संसार में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। आज लोग कहते हैं कि सब कुछ भगवान की मर्जी से, अल्लाह की मर्जी से होता है इस बात को बहुत पहले इसी शुक्ल यजुर्वेद में कहा गया है। शुक्ल यजुर्वेद का 40वां (अंतिम) अध्याय साक्षात ‘ईशावास्य उपनिषद’ है। संहिता भाग में उपनिषद का होना की सबसे बड़ी विशेषता है जो त्यागपूर्वक भोग और निष्काम कर्म की बात करता हैं।
त्याग का भाव, मनुष्य को इस संसार की वस्तुओं का उपभोग त्याग के भाव से करना चाहिए, उसमें लिप्त नहीं होना चाहिए। किसी दूसरे के धन का लोभ नहीं करना चाहिए। कर्म की महत्ता, इसी अध्याय में प्रार्थना है कि मनुष्य इस संसार में सौ वर्षों तक जीने की इच्छा रखे, लेकिन कैसे?
इसको यह श्लोक बताता है :
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।
इस संसार में सतकर्मों को करते हुए ही सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। तुम्हारे लिए इसके अलावा और कोई मार्ग नहीं है। निष्काम भाव से कर्म करने पर मनुष्य कर्म के बंधनों में नहीं लिप्त होता। कर्म करते हुए उसमें आसक्ति न रखना ही दुखों से मुक्ति का मार्ग है। यही विचार बाद में गीता में कुछ ऐसे कहा गया है
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
बिना कामना – इच्छा यानी निष्काम कर्म कर फल की इच्छा मत रख। यही निष्काम कर्मयोग की आधुनिक विचारधारा की जन्मस्थली हैं।
५. ऐसा देश है मेरा
आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्।
आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्॥
हमारे राष्ट्र में विद्वान और ज्ञानी लोग ज्ञान और तेज (ब्रह्मवर्चस) से युक्त हों। हमारे शासक और सैनिक शूरवीर, अचूक तीरंदाज यानी शस्त्र विद्या में निपुण हो, शत्रुओं को परास्त करने वाले और महारथी हों।
यह ‘राष्ट्र-प्रार्थना’ या ‘स्वस्तिवाचन मंत्र’ यजुर्वेद के 22 वे अध्याय के 22 वे मंत्र से लिया गया है। यह मंत्र किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की समृद्धि, शक्ति और शांति के लिए की गई सामूहिक प्रार्थना है। यह आधुनिक काल में देश की मिलिट्री डॉक्ट्रिन है, इंटरनल पॉलिसी डॉक्ट्रिन हैं।
इसमें आगे कहा गया है
दोग्ध्री धेनुर्वोढाऽनड्वानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्।
निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्॥
राष्ट्र के हर वर्ग और रिसोर्सेज संसाधन के सर्वश्रेष्ठ होने की कामना की गई है।
दोग्ध्री धेनुः – हमारी गाएं भरपूर दूध देने वाली हों आधुनिक काल में हमारी इंडस्ट्री ज्यादा प्रोडक्टिव हो। वोढाऽनड्वान् : हमारे बैल और पशु भारी बोझ उठाने में सक्षम हों ; आशुः सप्तिः: हमारे घोड़े तेज दौड़ने वाले (यातायात और रक्षा के लिए कुशल) हों। यानी आज के समय में एक्सपोर्ट के लिए हमारा ट्रांसपोर्ट सस्ता सुलभ और ज्यादा लोड डिलिवर करने वाला हो बेटर ट्रांसपोर्टेशन मैट्रिक्स को एक्सीकयूट करता हो। पुरन्धिर्योषा: हमारे देश की स्त्रियां सुंदर, विदुषी और सुसंस्कृत हों। जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवा: हमारे युवा विजयी, समाज का नेतृत्व करने वाले और सभ्य स्वभाव के हों। यजमानस्य वीरो जायताम्: समाज के हर परिवार में वीर और पराक्रमी संतानें जन्म लें। निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु: हमारी आवश्यकता के अनुसार समय पर वर्षा हो।फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्तां: हमारी फसलें, वनस्पतियां और औषधियां फल-फूल से लद जाएं।
योगक्षेमो नः कल्पताम्: हमारा ‘योग’ यानी टैक्टिक्स ऐसी हो जिससे जो हमारे पास नहीं है उसे भी प्राप्त किया जा सके और ‘क्षेम’ जो हमारे पास है उसकी रक्षा कर पाये आज के नॉलेज मैनेजमेंट , इंटेलक्चुएल प्रॉपर्टी प्रोटेक्शन आदि की बात हैं। एक आदर्श राष्ट्र तभी बन सकता है जब वहां शिक्षा (ज्ञान), रक्षा (शौर्य), कृषि, पशुधन, नारी शक्ति, योग्य युवा और अनुकूल पर्यावरण का बेहतरीन संतुलन हो। वेदों में एक समृद्ध, सुरक्षित और शक्तिशाली राष्ट्र की परिकल्पना की गई थी जो आज के नेशन स्टेट जैसा है आश्चर्य है कुछ ज्यादा पढ़े लोग, कुपढ लोग राष्ट्र की अवधारणा को यूरोपीय रेनेसॉ (जन जागरण) के बाद की उत्पति बताते हैं।
६. ज्ञान, प्रज्ञा और ज्योति की ओर बढ़ने की प्रार्थनाएं
बृहदारण्यक उपनिषद जो शुक्ल यजुर्वेद का ही हिस्सा है उस की यह अमर प्रार्थना पूरे वेद का निचोड़ है।
“असतो मा सद्गमय,
तमसो मा ज्योतिर्गमय,
मृत्योर्माऽमृतं गमय।”
मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो।
मुझे अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले चलो।
मुझे मृत्यु (विनाशशीलता) से अमरता (शाश्वत आनंद) की ओर ले चलो।
ले चलो अरे कौन ले जायेगा ?
तो उत्तर है बुद्धि , मेधा यानी मनुष्य ईश्वर से कह रहा है कि भगवान हमें ऐसी बुद्धि दो जिससे हम सत्य और असत्य का भेद कर सकें, अर्थ अनर्थ को समझ सके ।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥
यह श्लोक भी बृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया है, जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी पूरी पृथ्वी एक परिवार है के दर्शन को मजबूत करता है। श्लोक का शाब्दिक अर्थ है सर्वे भवन्तु सुखिनः: सभी प्राणी सुखी और प्रसन्न रहें।सर्वे सन्तु निरामयाः: सभी लोग निरोगी (स्वस्थ) रहें। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु: सभी का मंगल हो और सब अच्छी बातें ही देखें। मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्: किसी को भी किसी प्रकार का दुःख न भोगना पड़े।
यजुर्वेद की इस समेत अनेकों प्रार्थनाओं में अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने की तीव्र उत्कंठा दिखाई देती है जिसके कारण गर्वोन्नत भाव से कह सकता हूं कि हमारे पूर्वज जो ज्ञान का अंकुरण कर गए वह आधुनिक काल में मानवीय कल्याण हेतु पूरी की पूरी ज्ञान की विधाएं बन चुकी हैं।
