FCRA
#इतिहास_पूछेगा… कितने आदमी थे..??
जवाब मिलेगा… सरदार सिर्फ दो..!! सोनम वांगचुक ने बिना किसी तिलचट्टे को खबर किए अनशन तोड़ दिया.! पुलिस के लव लेटर अब दंगाइयों के घर पहुंचने शुरू हो गए हैं.! वे अब वीडियो डाल-डाल के माफ़ी मांग रहे हैं.! तो कुल मिला के क्रांति की असली शुरुआत अब हुई है.! अब पता चलेगा कि पुलिस के लव लेटर का क्या मतलब होता है..!!
लेकिन… क्या ये जो कुछ भी हुआ उसकी वजह Paper leak था.? वो तो पहले भी होते रहे हैं.! असल वजह कुछ और थी… जिसका नाम FCRA है..!!
शुरू से समझते हैं….
2004 में जब कॉंग्रेस की सरकार बनी थी, तब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने थे.! लेकिन सब जानते हैं कि वो सिर्फ एक मुखौटा थे.! असली सरकार तो NAC (National Advisory Committee) चला रही थी, जिसकी मुखिया थी उनकी राजमाता.! इस NAC के पीछे अधिकांश NGO थे, जो विदेशों से चंदा लेते थे.! बेहिसाब चंदा देने वाले उनसे अपना मकसद पूरा कर रहे थे..!!
जैसे…
भारत की तरक्की को रोकने का मकसद..!!
भारत को तोड़ने का मकसद..!!
सनातन को खत्म करने का मकसद..!!
2010 के बाद इन विदेशी दानदाताओं को ये समझ मे आ गया कि कॉंग्रेस के प्रति जनता मे बेहद नाराजगी है, और वो सत्ता मे वापस नहीं आने वाली.! उधर गुजरात के साथ-साथ मोदी की लोकप्रियता पूरे देश में चरम पर पहुंच रही है, तब उन्होंने अपने ही कुछ मोहरों को आगे किया..!!
आप याद कीजिए… हैंडसम सिसोदिया और नटवरलाल, NGO वाले हैं.! कबीर और परिवर्तन इनके NGO हैं, और यही क्यूँ… इनकी पूरी पार्टी ही NGO की पार्टी है..!!
तो मकसद ये था कि कॉंग्रेस से नाराज वोटर सीधा मोदी की तरफ ना चले जाए.! इनमें से ज्यादातर वोटर उसके मोहरों की तरफ shift हो जाए, ताकि मोदी अगर आए भी तो कमजोर सरकार के साथ आए.!
जैसे अटल जी आए थे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.! देश की जनता ने एकतरफा फैसला सुनाया और इनके सारे किए धरे पर पानी फिर गया.!
यहां से इनके पतन की शुरुआत होती है, जो 2020 में FCRA के संशोधन तक पहुंचती है..!!
FCRA कानून इंदिरा गांधी की सरकार ने Emergency के दौरान बनाया था, विदेशी फंडिंग को रोकने के लिए..!!
2020 में सरकार ने इसमें संशोधन करके… NGO के प्रशासनिक खर्च, यानि उनका खुद का खर्च 50% से घटाकर 20% कर दिया, और सारी विदेशी फंडिंग अब दिल्ली के एक ही SBI ब्रांच में आएगी और साथ ही आधार जरूरी किया गया..!!
इस संशोधन के बाद लगभग 6000 NGO के लाइसेंस रद्द हुए.! 2019-20 के दौरान भी लगभग 2000 NGO के लाइसेंस रद्द हुए.! अब सरकार के सामने एक नई समस्या खड़ी हुई कि जिनके लाइसेंस रद्द हुए हैं, उनकी संपत्ति का क्या करें.! ये जो पूरे देश में चर्च, सेंट जेवियर, सेंट मार्टिन जैसे स्कूल-कॉलेज खोल रखे हैं, उनका क्या किया जाए..!!
तो अब सरकार एक संशोधन लाना चाहती है कि यदि किसी NGO का लाइसेंस रद्द हो जाए, तो विदेशी फंड से बनी सारी संपत्ती सरकार द्वारा बनाए गए ट्रस्ट के पास चली जाएंगी..!!
सारा फसाद इसी बात का है.! अब ना तो अनैतिक तरीके से पैसा आ पाएगा, और ना यहां जो एम्पायर खड़ा कर रखा है वो बचेगा.! ये तो सड़क पर आ जाएंगे.! आ जाएंगे क्या… आ गए.! सबसे बड़ा नेता मोदी के घर के सामने जमीन पर लोट रहा है.! चमचे बीच चौराहे नाच रहे हैं, पागलों जैसी हरकते कर रहे हैं.! क्या बोल रहे हैं, उन्हें खुद नहीं पता..!!
इतिहास पूछेगा… कितने आदमी थे..??
राजनीति में जीत केवल चुनावों से नहीं होती, बल्कि रणनीति, धैर्य और समय पर लिए गए फैसलों से भी तय होती है.! आज भारतीय राजनीति का परिदृश्य देखते हुए समर्थकों का एक वर्ग मानता है, कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने अपने राजनीतिक विरोधियों को लगातार रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया..!!
हाल के घटनाक्रमों ने एक बार फिर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.! आंदोलनों की तीव्रता अचानक क्यों कम हुई.? कुछ प्रमुख चेहरे अचानक शांत क्यों पड़ गए.? और जिन लोगों की आवाज कुछ दिन पहले तक सबसे बुलंद थी, वे अब सफाई देने और कानूनी नोटिसों का सामना करने में क्यों व्यस्त दिखाई दे रहे हैं..??
बहुत से लोग इन घटनाओं को केवल पेपर लीक जैसे मुद्दों से जोड़कर देखते हैं, लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तस्वीर इससे कहीं बड़ी है.! उनके अनुसार असली वजह विदेशी फंडिंग… Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) से जुड़े प्रावधानों को लेकर है..!!
उनका तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में FCRA के नियमों को पहले की तुलना में अधिक सख्त बनाया गया.! विदेशी चंदे की निगरानी बढ़ाई गई, प्रशासनिक खर्च की सीमा घटाई गई, बैंकिंग व्यवस्था केंद्रीकृत की गई, और हजारों संस्थाओं के लाइसेंस रद्द किए गए.! समर्थकों का दावा है कि इन कदमों का उद्देश्य विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना था..!!
इसी संदर्भ में यह चर्चा भी तेज है कि यदि भविष्य में ऐसा कोई कानूनी प्रावधान आता है, जिसके तहत विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन या स्वामित्व को लेकर नए नियम लागू हों, तो उसका प्रभाव अनेक संस्थाओं पर पड़ सकता है.! यही कारण है कि इस विषय पर राजनीतिक और वैचारिक टकराव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है..!!
समर्थकों का कहना है कि आज जो विरोध, आंदोलन और राजनीतिक आक्रामकता दिखाई दे रही है, उसके पीछे केवल तात्कालिक मुद्दे नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही आर्थिक और वैचारिक लड़ाई भी है..!!
राजनीति में हर दौर का अपना एक निर्णायक क्षण होता है.! कुछ लोग मानते हैं कि वर्तमान समय भी ऐसा ही एक दौर है, जहाँ केवल सड़क पर दिखाई देने वाली तस्वीर ही पूरी कहानी नहीं बताती, बल्कि उसके पीछे कई परतें छिपी हुई हैं..!!
इसलिए आने वाले वर्षों में इतिहास जब इस दौर का मूल्यांकन करेगा, तब एक सवाल फिर गूंजेगा…
कितने आदमी थे..??
और राष्ट्रप्रेमी समर्थकों की नजर में जवाब होगा…
सरदार सिर्फ दो..!! 🤔
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