फुले भारत की पहली शिक्षिका?

फेमिनिस्टों का पसंदीदा तर्क- ‘सभी धर्म पुरुषों ने बनाए हैं, सारे धर्मग्रंथ पुरुषों ने लिखे हैं।’

ये सच है, सब रिलिजियस-टेक्स्ट पुरुषों ने ही बनाए हैं, पर यहाँ भी अपवाद है- वैदिक टेक्स्ट्स । हिन्दू संस्कृति की स्थापना में स्त्री-पुरुष दोनों का योगदान है, केवल पुरुषों का नहीं।

ऋग्वेद, अष्टम मंडल के सात सूक्त जिनके अंतर्गत अनेक मंत्र हैं उनकी मंत्रद्रष्टा महर्षि अत्रि की पुत्री अपाला हैं ।

और वह एकमात्र नहीं, चारों वेद मिलाकर लगभग 50 महिलाओं का योगदान है ऋचाओं के संकलन में- घोषा, सिकता, लोपामुद्रा, गोधा आदि ऋषिकाएं। सर्वोच्च धार्मिक पद जिसपर पुरुषों का एकाधिकार न होने का एकमात्र उदाहरण।
और उपनिषदों के हिन्दू दर्शन में गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं का भी चिंतन सम्मिलित है।

पूरी दुनिया में सनातन धर्म ही एक ऐसा धर्म है जिसमें में कई विदुषी नारियों ने वेदों, उपनिषदों और वैदिक ज्ञान पर महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इन्हें “ऋषिका” कहा जाता है। इन महिलाओं ने मंत्र रचे, दर्शन दिए और शास्त्रार्थ भी किए। प्रमुख नाम ये हैं:

गार्गी वाचक्नवी:-

इन्होंने ब्रह्मज्ञान और आत्मा पर गहन शास्त्रार्थ किए।
राजा जनक की सभा में ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्न पूछे थे।
इनका उल्लेख बृहदारण्यक उपनिषद में मिलता है।

मैत्रेयी :-

आत्मा, अमरत्व और ज्ञान पर विचार दिए।
याज्ञवल्क्य की पत्नी थीं और वेदांत ज्ञान में निपुण थीं।
इनका संवाद भी बृहदारण्यक उपनिषद में प्रसिद्ध है।

लोपामुद्रा:-

ऋग्वेद के कुछ सूक्तों की रचयिता मानी जाती हैं।
ऋषि अगस्त्य की पत्नी थीं।
ज्ञान और गृहस्थ जीवन दोनों पर इनके विचार प्रसिद्ध हैं।

अपाला:-

इन्होंने ऋग्वेद में मंत्र रचे।
तप और भक्ति के लिए जानी जाती हैं।
घोषा
अश्विनीकुमारों की स्तुति में सूक्त लिखे।
इनके मंत्र ऋग्वेद में मिलते हैं।

विश्ववारा:-

इन्होंने अग्नि देव की स्तुति में मंत्र लिखे।
वैदिक विदुषियों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है।

रोमशा:-

ऋग्वेद में इनके नाम से सूक्त मिलते हैं।
वाक् अम्भृणी
इन्होंने प्रसिद्ध “देवी सूक्त” की रचना की थी।

यह सूक्त शक्ति और स्त्री चेतना का अद्भुत वर्णन करता है।
इनसे यह पता चलता है कि वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा, शास्त्र अध्ययन और आध्यात्मिक ज्ञान में उच्च स्थान प्राप्त था।

ऋग्वेद सूक्त दृष्टा  म​हर्षि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा

प्राचीनकाल में अगस्त्य नाम के महान् ऋषि हुए। वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने उत्तर और दक्षिण के लोगों को मिलाकर नयी संस्कृति की नींव खड़ी की। उन्होंने उत्तर और दक्षिण को जोड़ा। अलग-अलग जातियों में परस्पर मेल करवा कर अगस्त्य ने सच्चे अर्थों में मनुष्यता की सेवा की।

महर्षि अगस्त्य समाज में ऊँच-नीच का भेद नहीं मानते थे। वे अपने दल के साथ दुर्गम विन्ध्य पर्वत को पार कर तमिल प्रान्त में आये। एक दिन ब्राह्म मुहूर्त में वे समुद्रतट पर खड़े हुए उषा का आह्वान कर रहे थे। अकस्मात ही उनकी दृष्टि एक तरुणी पर जाकर केन्द्रित हो गई। वह तरुणी समुद्र की उत्ताल तरंगों के साथ थिरक रही थी। वह नर्तकी तो शायद नहीं थी, किन्तु उसकी भाव-तरंगों में प्रार्थना के कई-कई रंगों का चकित करने वाला उछाल था। भोर के रमणीय एकांत में उस तरुणी की आंगिक और भाव मुद्राएँ देखकर अगस्त्य अचम्भित रह गये। तरुणी इस बात से अनजान थी कि कोई उसे नृत्य करते हुए देख रहा है। वह ऊर्ध्वाभिमुख अनवरत थिरक रही थी। उसके मुख पर दिव्य प्रसन्नता झलक रही थी। सचमुच अद्भुत दृश्य था।

वह तरुणी अप्रतिम सुंदरी थी। उसकी सुंदरता केवल दैहिक नहीं थी। वह तपस्या का सौन्दर्य था, भागवत चेतना का सौन्दर्य था, अपरिमित कृपा का सौन्दर्य था। उसके नृत्य में अगस्त्य को अपूर्व ज्योति दिखाई दी। उसके नृत्य में एक भावपूर्ण निवेदन था। अगस्त्य को लगा, जैसे वह उषा की रश्मियों से रची हुई ऐसी उज्ज्वल आकृति है, जो सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैल जाना चाहती है। अगस्त्य ने अनुभव किया कि यह तरुणी असाधारण है,और नृत्य के माध्यम से भगवान् को निवेदित हो रही है। वह समुद्र को साध रही थी। वह समुद्र की विशालता और उसकी धीर गम्भीरता को जी लेना चाहती थी। अगस्त्य बड़ी देर तक उसे देखते रहे, देखते ही रहे। फिर धीरे से बोले-‘शुभे!’ कानों में ये शब्द पड़ते ही तरुणी ठिठक गई। अगस्त्य को देखते ही उसकी सब मुद्राएँ जैसे लुप्त हो गईं। अगस्त्य ने उसके अन्तर्मन को समझ लिया। उन्होंने तरुणी को सम्बोधित किया -‘लोपामुद्रा!’

वह लोपामुद्रा थी। उसे यह नाम ऋषि अगस्त्य ने ही दिया था। लोपामुद्रा ने पहली बार ऋषि का वैभव देखा। ऋषि अगस्त्य में उसे मूर्तिमान समुद्र ही दिखाई दिया। वह उस समुद्र में डूबती चली गई। जैसे कोई पवित्र नदी उद्दाम वेग से बहती हुई अपना नाम-रूप त्याग कर समुद्र में विलीन हो जाती है, वैसे ही लोपामुद्रा ऋषि अगस्त्य के हृदय में उतरती चली गई। लोपामुद्रा ने सूरज की पहली किरण के साथ जो पाया, वह अलौकिक सिद्धि थी।

लोपामुद्रा अत्यंत निम्न जाति की कन्या थी, किंतु उसमें महान् सत्य को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा थी। ऋषि अगस्त्य के आभा-मण्डल में उसे सत्य की विशालता और उसकी गहराई दिखाई दे गई। लोपामुद्रा के सामने एक के बाद एक स्वर्ण द्वार खुलते हुए दिखाई देने लगे। उसे ब्रह्मविद्या प्राप्त करने का अनुकूल अवसर दिखाई दिया। वह विनीत भाव से अर्घ्य लेकर ऋषि के चरणों में समर्पित हो गई।

लोपामुद्रा के समर्पण के आगे ऋषि अगस्त्य ने झुक कर प्रणय निवेदन किया। मनुष्य जाति के इतिहास में यह प्रणय निवेदन उच्चतम आदर्श का अनोखा उदाहरण माना जाता है। अगस्त्य ने वहीं समुद्र तट पर अग्नि प्रज्वलित की, और उसके साक्ष्य में लोपामुद्रा को अपने जीवन में प्रवेश दिया। दोनों ने मंत्रोच्चार के साथ अग्नि की प्रदक्षिणा की। दोनों ने एक साथ सूर्य की वंदना की, समुद्र को प्रणाम किया। लोपामुद्रा के साथ ऋषि अगस्त्य अपने आश्रम में आ गये। अगस्त्य के आश्रम में स्वर्णिम प्रकाश फैल गया।

बहुत जल्दी लोपामुद्रा ने अगस्त्य के आश्रम का सम्पूर्ण भार अपने ऊपर ले लिया। ओह! दाम्पत्य जीवन का अनमोल इतिहास लिखा है लोपामुद्रा और अगस्त्य ने। अगस्त्य की साधना को उच्चतम शिखर पर पहुँचाने का महान् उद्योग किया लोपामुद्रा ने। वेदकालीन आश्रमों में अगस्त्य के आश्रम को जो सम्मान मिला, वह लोपामुद्रा के कारण था। दूसरे आश्रमों के ऋषिकुल अगस्त्य के आश्रम में आते, कई-कई दिनों तक ब्रह्म-चर्चाएँ होतीं, सोम-सवन होता, वेदपाठ होते, लोपामुद्रा बिना थके आश्रम के प्रबंधन में लगी रहतीं। अगस्त्य जब एकान्त साधना में होते, लोपामुद्रा ही उनका ध्यान रखती। कई बार ऐसा भी होता, कि लोपामुद्रा अगस्त्य के समकक्ष बैठ कर साधना में लीन हो जाती थी।

अगस्त्य की तरह लोपामुद्रा भी ऋषियों की पंक्ति में आती हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के १७९वें सूक्त की आर्ष गायिका लोपामुद्रा है। इस सूक्त में अगस्त्य के साथ लोपामुद्रा का संवाद बहुत लोकप्रिय और चर्चित है। हमारे यहाँ पति-पत्नी के बीच का संवाद प्रायः गोपन होता है, किन्तु अगस्त्य-लोपामुद्रा का यह संवाद ऋग्वेद को एक अलग ऊँचाई देता है। ऋग्वेद का यह सूक्त अनुपम है। इस सूक्त में लोपामुद्रा और अगस्त्य के बीच संक्षिप्त सा संवाद है, किन्तु अनूठा। शुरू की दो ऋचाओं में लोपामुद्रा अगस्त्य के सामने दाम्पत्य जीवन के समुचित निर्वाह को लेकर गम्भीर प्रश्न खड़े करती है, और बाद की चार ऋचाओं में ऋषि अगस्त्य लोपामुद्रा का मान रखते हुए भी दाम्पत्य जीवन के उच्चतम लक्ष्य की ओर ध्यान आकृष्ट करने में सफल होते हैं। इस सूक्त में दाम्पत्य के प्रचलित अर्थ का उन्नयन है।यह उन्नयन ही वेद है। पति-पत्नी का यह आपसी वार्तालाप भारतीय साहित्य में अप्रतिम माना जाता है। अगस्त्य ने दाम्पत्य जीवन का जो उच्चतम लक्ष्य सामने रखा है, वह सूक्त की अंतिम ऋचा में द्रष्टव्य है-

अगस्त्य: खनमान: खनित्रै: प्रजामपत्यं बलमिच्छमान:। उभौ वर्णावृषिरुग्र:पुपोष सत्या देवेष्वाशिषो जगाम।। ऋग्वेद:१:१७९:६:

‘मैं खोद रहा हूँ कुदाल से
देवपुत्रों की चेतन ऊर्जा को।
सत्य की किरणों से हम बनाएंगे घर,
जहाँ हम दोनों होंगे,लोपामुद्रा!
और जीवन को अर्थ देंगे।’
✍🏻
🍁मुरलीधर

अतः जब नारीवादियाँ अगली बार यह डायलाॅग कहें तो थोड़ा एडिट कर के इस तरह- ‘वेदों के अलावा अन्य सभी के धर्मग्रंथ केवल पुरुषों ने लिखे हैं।’

ऐतिहासिक रूप से भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति क्या थी? इस सवाल के जवाब में जो सुनने को मिलता है वो पूरी तरह सच नहीं ये समझना कोई मुश्किल काम नहीं होता। कमजोर तर्कों के साथ गढ़ी हुई व्याख्या में कई झूठ हैं, ये आसानी से समझ में आता है। फिर सवाल उठता है कि ज्यादा सच कहाँ गया? ऐसी किताबें जिन्हें दूसरे पक्ष के इतिहासकारों ने लिखा, उन्हें आमतौर पर दबा दिया जाता है। उनकी प्रशंसा तो क्या उनकी बुराई में भी एक शब्द नहीं कहा जाता। नतीजा ये होता है कि लोग थोड़े समय में उस किताब का नाम भूल जाते हैं।

पटना के पास कुम्हरार में 80 खम्भों वाला एक मौर्य कालीन सभागार निकला था। इसकी खुदाई में के.पी.जायसवाल रिसर्च इंस्टिट्यूट का काफी योगदान था। एक दौर में ए.एस.अत्रेकर इस संस्थान के प्रमुख थे। उन्होंने शिलालेखों और पुराने साहित्य के आधार पर किताबें लिखी तो थीं मगर वो उपनिवेशवादियों की चमचागिरी नहीं कर रहे होते थे। नतीजा ये हुआ कि उनकी लिखी किताबों पर आज चर्चा नहीं होती। किस्मत से उनकी कुछ किताबें मोतीलाल बनारसीदास ने प्रकाशित की थीं, इसलिए आज भी उन्हें ढूँढने में दिक्कत नहीं होती।

उनकी किताब“पोजीशन ऑफ़ वीमेन इन हिन्दू सिविलाइज़ेशन” करीब चार सौ पन्ने की है। इसमें बौद्ध काल के जातक, विनय-पीटक और थेरीगाथा जैसे ग्रंथों से भी सन्दर्भ लिया गया है। “थेरीगाथा” नाम का ग्रन्थ इसलिय महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि नारीवाद पढ़ने वाले बता देंगे कि पूरी तरह स्त्रियों की लिखी ये पहली किताब थी। सिर्फ अभिजात्य स्त्रियाँ पढ़ पाती थीं जैसे जुमले उछालने वालों को भी थेरीगाथा नाम सुनते ही दिक्कत इसलिए हो जाती है क्योंकि इसकी लेखिकाओं में एक तो वेश्या भी थी! माना जाता है कि इसकी लेखिकाओं में से एक बुद्ध की सौतेली माँ भी थी।

जो विषय इस किताब में चर्चा के लिए चुने गए हैं, उनमें स्त्रियों के पहनावे और जेवरों जैसे विषय भी हैं। विवाह और सम्बन्ध-विच्छेद / तलाक पर भी चर्चा है, और एक अध्याय विधवा स्त्री की सामाजिक स्थिति पर भी है। ऐसे विषयों पर अध्याय हैं तो जाहिर है कि स्त्रियों के संपत्ति में अधिकार पर भी कुछ बातें हैं। जिन्हें लगता हो कि भारतीय न्याय व्यवस्था में स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार नहीं होता उन्हें याद दिला दें कि “मिताक्षरा” और “दायभाग” दोनों नियमों में स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार होता है।

संभावना है कि मुगलिया दौर की भक्ति वाली कुछ भावनाएं इस किताब की “पर्दा प्रथा” भारतीय नहीं होती जैसी बातों से आहत हो जाएँ। इतिहास में रूचि हो, करीब-करीब 4000 वर्षों में बदलती हुई महिलाओं की स्थिति पर किसी वजह से पढ़ रहे हों तो इसे भी पढ़ें।

भारतीय रेल में कई जगह आपको “रेल आपकी अपनी संपत्ति है” लिखा दिख जायेगा। इसके पीछे उद्देश्य ये होता है कि जिस चीज़ को आप अपना मानेंगे उसे सहेजने सँभालने का प्रयास भी करेंगे। जो अपना है ही नहीं भला उसका ख़याल क्या रखना ? भारतीय किताबों की बात करते ही यही समस्या होती है। रामायण-महाभारत के काल से कूद कर जब हम और आप रामचरितमानस पर आ जाते हैं तो बीच के ढाई हज़ार साल के लगभग का समय गायब हो जाता है।

ऐसे में लड़कियां-स्त्रियाँ कभी भी पूछ सकती हैं कि इनमें मेरा क्या है ? ये तो किसी मर्यादा पुरुषोत्तम की कहानियां हैं, युद्धों की कथाएँ हैं, इनमें स्त्रियों की तरफ से क्या लिखा गया जो मेरा होगा ? ये स्थिति तब है जब सिर्फ महिलाओं का लिखा गया पहला ग्रन्थ “थेरीगाथा” भारत का है। इसे करीब करीब गौतम बुद्ध के समय लिखा गया था (600 BCE)। इस काव्य संकलन में एक कविता किसी गणिका की है, एक धन-दौलत छोड़कर बौद्ध भिक्षुणी बन गई महिला की भी है। एक कविता तो गौतम बुद्ध की सौतेली माता की भी है।

संस्कृत के महाकाव्यों के अलावा जिन महाकाव्यों की बात की जा सकती है, उनमें तमिल महाकाव्य भी आयेंगे। इनमें पांच सबसे महत्वपूर्ण गिने जाते हैं। शिल्पपत्तिकराकम्, मणिमेखलई, जीवक चिंतामणि और वलायापथी में से शिल्पपत्तिकराकम् और मणिमेखलई को भारत में थोड़ा बहुत इसलिए भी जाना जाता है क्योंकि इनपर आधारित एक टीवी सीरियल दूरदर्शन के शुरुआत के समय में प्रसारित होता था। कन्नगी नाम की नायिका की कहानी पर शिल्पपत्तिकराकम् आधारित है, और फिर उनकी बेटी की कहानी को मणिमेखलई में आगे बढ़ाया गया है। ये कहानी कोवलन नाम के कवेरिपत्तिनम के एक धनी व्यापारी की थी।

उसकी शादी एक दूसरे व्यापारी की बेटी कन्नगी से हुई थी। दोनो खुशहाल तरीके से जीवन व्यतीत कर रहे थे लेकिन एक शाही उत्सव में कोवलन एक नर्तकी माधवी से मिला। वो माधवी की दीवानगी में अपने घर और कन्नगी को भूल गया। कोवलन माधवी पर पैसे खर्च करता बिल्कुल कंगाल हो गया। गरीब हो जाने पर जब उसे माधवी के पास से भगा दिया गया तो उसका नशा उतरा और वो वापस कन्नगी के पास आया। कंगाल हो चुके पति के पास दोबारा व्यापार शुरू करने के लिए धन भी नहीं था, लेकिन प्राचीन काल से ही हिन्दुओं में स्वर्ण में धन का कुछ हिस्सा निवेश करने की परंपरा रही है।

कन्नगी के पास पायल थे, उसने कोवलन को अपने बहुमूल्य पायल दे दिए और इन पायलों के साथ वो दोनों मदुराई गए। मदुराई में उनको आश्रय मिल गया और कोवलन बाजार निकल गया एक पायल को बेचने। उन्हीं दिनों पांड्या के राजा के महल से रानी का भी पायल चोरी हुआ था। जैसे ही कोवलन ने वो पायल एक व्यापारी को दिखाई, वो भड़क उठा और सीधे उसे राजा के पास ले गया। वहाँ के राजा के आदेश पर पहरेदार ने कोवलन को मार डाला। कन्नगी को यह बात पता लगी, तो वो राजमहल की तरफ रोती-धोती दौड़ी।

राज दरबार में पहुंची कन्नगी के हाथ में, अपने पति के निर्दोष होने के प्रमाण स्वरुप, दूसरा पायल था। विलाप सुनकर, उसके पीछे नगर के लोग भी जुट आये थे | कन्नगी ने दरबार को दूसरी पायल दिखाई और कहा कि राजा ने ये अन्याय किया है। पायल को तोड़ने पर उसके अंदर भरे माणिकों से पता चला कि ये तो सचमुच दूसरी पायल है ! राजा को कोवलन के निर्दोष होने का पता चला तो वो अफ़सोस करता वहीँ जमीन पर मरकर गिर गया। कन्नगी का गुस्सा इतने पर शांत नहीं हुआ था।

कन्नगी ने तीन बार मदुराई का चक्कर काटा और नगर को ही शापित कर दिया। पूरा शहर ही जलकर भस्म हो गया। इस कहानी को दो काव्यों में लिखा गया है, पहले शिल्पादिकारम् में और फिर मणिमेखलई में। मणिमेखलई के रचयिता सत्तनार हैं। इन दोनों ग्रंथों की कहानी में थोड़ा अंतर है। शिल्पादिकारम् मुख्यतः कन्नगी की कहानी सुनाती है जबकि मणिमेखलई कहानी को आगे बढ़ाते हुए माधवी की बेटी मणिमेखलई की कहानी सुनाती है जो हिन्दुओं के दर्शन के छह अंगों के अध्ययन के बाद बौध “अरिहंत” हो जाती है।

इन कहानियों को ना जानने और कभी ना सुनने का सबसे पहला नुकसान तो ये होता है कि हमें मणिमेखलई का नाम नहीं पता होता। इस वजह से हमें ये भी नहीं पता चलता कि पिता (माधवी-और शायद कोवलन) की मृत्यु हो जाने पर भी एक अनाथ बच्ची, मणिमेखलई के शिक्षा की व्यवस्था समाज में रही होगी। अगर ऐसा नहीं होता तो फिर वो दर्शन के छह के छह अंग पढ़ती कैसे ? इतना पढ़ने में कोई एक दो साल ही तो लगे नहीं होंगे इसलिए बाल विवाह हो गया हो कहीं बारह साल की उम्र में ये भी संभव नहीं।

शिल्पपत्तिकराकम् और मणिमेखलई जैसी स्त्री प्रधान, उनके नजरिये से लिखा साहित्य भी है | जैसा कि आम तौर पर प्रचारित किया जाता है, वैसे इतिहास के सभी नायक कोई राजा-रानी नहीं, आम व्यापारी भी हैं। पूरी पूरी कहानियाँ स्त्रियों के दृष्टिकोण से लिखी गई हों ऐसा भी है, और स्त्रियों ने लिखी हो ऐसा भी है। यहाँ लड़कियों के गुरुकुल जाने की बात हजम करने में असुविधा हो रही हो तो आठवीं शताब्दी के आस पास का “उत्तररामचरित” जिसे भवभूति लिखा था उसे देखिये।

ये आम जनता के लिए मंचित किये जाने वाले प्रसिद्ध नाटकों में से एक था। ऐत्रेयी उत्तर भारत के एक नामी गिरामी कवि की छात्रा है, लेकिन उसके गुरु को आजकल एक महाकाव्य लिखने का शौक लगा है। ऐसे में वो ऐत्रेयी को ज्यादा कुछ सिखा नहीं पाते। मजबूरन ऐत्रेयी को अकेले ही घने जंगलों को पार कर के अपने गुरु (शायद वाल्मीकि) के आश्रम से दक्षिण में कहीं स्थित ऋषि अगस्त्य के आश्रम में जाना पड़ जाता है। ऐत्रेयी सफ़र के मुश्किल रास्तों की बात सोच रही है, और उसकी सहेली वसंती उसे अगस्त्य मुनि के आश्रम की तारीफें सुना रही है।

अभी की भारतीय यूनिवर्सिटी में एक साल ग्रेजुएशन कर के शायद दुसरे किसी विश्वविद्यालय में सीधे दुसरे साल में प्रवेश लेना नामुमकिन होगा। मगर इस “उत्तररामचरित” से लगता है एक विश्विद्यालय से दुसरे में ट्रान्सफर उस दौर में संभव था। रूप-सौन्दर्य के लिए चर्चित क्लियोपेट्रा जैसी नायिकाएँ भारतीय साहित्य में जरा कम होती हैं तो शायद इन कहानियों की नायिका के नायिका होने की एक वजह उनका ज्ञान भी रहा होगा। इन्होंने भारतीय दर्शन पढ़ने-सिखने में रूचि ली थी (जिसका एक हिस्सा वेदान्त भी है)।

बाकी जबरन किसी से कुछ करवाने को मेरा कोई ख़ास समर्थन नहीं रहता | किसी ब्यूटी कांटेस्ट में हर साल बदलने वाला मुकुट चाहिए या स्थायी परिचय, वो फैसला तो आपको ही लेना है ना ?

✍🏻
🍁मुरलीधर

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