UK राज्यांदोलन के फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट दिवंगत, 26 को 11 बजे हरिद्वार में अंतिम संस्कार
देहरादून/हरिद्वार 25 नवंबर 2025। उत्तराखंड के पूर्व कैबिनेट मंत्री और राज्य आंदोलन में फील्ड मार्शल नाम से लोकप्रिय दिवाकर भट्ट का निधन हो गया है। आज शाम 4 बजकर 20 मिनट पर उन्होंने अपने हरिद्वार स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। पिछले 10 दिनों से वह देहरादून के महंत इंदिरेश चरणदास अस्पताल में भर्ती थे।
उत्तराखंडे क्रांति दल के पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी के अनुसार दिवाकर भट्ट को न्यूरो की समस्या थी और उनके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था। आगे स्वास्थ्य जटिलताएं बढ़ीं और एक दुर्घटना भी हुई, जिससे उनकी हालत और कमजोर हो गई।
इंदिरेश हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने उनकी हालत में सुधार लाने की काफी कोशिश की लेकिन जब कोई सुधार नहीं दिखा तो बीते कल उन्होंने परिवार से भट्ट को घर ले जाने की सलाह दी, जिसके बाद बाद उनके परिजन उन्हें घर ले गए थे। परिजनों के अनुसार कल यानी 26 नवंबर को पूर्वान्ह 11 बजे उनका अंतिम संस्कार हरिद्वार के खड़खड़ी गंगा घाट पर होगा।
भट्ट के निधन पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी शोक जताया है, उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट शेयर करते हुए लिखा-
” राज्य निर्माण आंदोलन से लेकर जनसेवा के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए कार्य सदैव अविस्मरणीय हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि पुण्यात्मा को श्रीचरणों में स्थान दे।
पिछले 10 दिनों से दिवाकर को पाइप से लिक्विड फूड दिया जा रहा था।
भाजपा की सरकार में भट्ट को मिला था मंत्री पद
दिवाकर भट्ट का चुनावी सफर बेहद सक्रिय और उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने 2002 में देवप्रयाग विधानसभा से UKD के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं पाए। इसके बाद 2007 में उन्होंने UKD के टिकट पर फिर से चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से जीत हासिल की, जिससे उनका क्षेत्रीय राजनीतिक दबदबा मजबूत हुआ।
2012 में उन्होंने भाजपा के सिंबल पर चुनाव लड़ा लेकिन हार गए, और 2017 में भाजपा से टिकट नहीं मिला तो वो निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे लेकिन फिर उन्हें हार मिली। 2022 में उन्होंने फिर से UKD का दामन थामा लेकिन विनोद कंडारी (BJP) से मात्र 2,588 वोट से हार गए।
हरिद्वार स्थित उनके घर पर रिश्तेदार पहुंचने शुरू हो गए हैं।
पूर्व विधायक त्रिपाठी ने जताया भट्ट के निधन पर दुख
यूकेडी के पूर्व अध्यक्ष और द्वाराहाट के पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी ने दिवाकर भट्ट के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि दिवाकर भट्ट का योगदान उत्तराखंड आंदोलन और क्षेत्रीय राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
त्रिपाठी ने बताया कि उत्तराखंड क्रांति दल के टिकट पर जीतने के बाद दिवाकर भट्ट को मंत्री बनने का मौका मिला। उस समय भाजपा के पास 32 सीटें थीं, जिसके कारण उन्हें राजस्व ,खाद्य और शहरी विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। बाद में जनरल खंडूरी सरकार में भी उन्हें यही विभाग मिला था।
उन्होंने दावा किया कि 2012 में दिवाकर भट्ट ने भाजपा की सदस्यता नहीं ली थी, बल्कि केवल भाजपा के सिंबल पर चुनाव लड़ा था। संभवत: इस राजनीतिक एरेंजमेंट में ही चुनाव में उन्हे भाजपा कार्यकर्ताओं का अपेक्षित सहयोग नही मिला और वे चुनाव हार गए.
दिवाकर भट्ट निर्भीक और निडर नेता थे, वो जनता की बात बिना डरे सामने रखते थे। पहाड़ के लोगों के शोषण के खिलाफ और उत्तराखंड को केंद्र में रखकर राजनीति करते थे. गैरसैंण को स्थायी राजधानी के मुद्दे पर उन्होंने आमरण अनशन किया था। उत्तराखंड आंदोलन में तो वे दुर्गम खैट पर्वत और श्रीयंत्र टापू पर दुस्साहसिक अनशन पर बैठ गये थे.तब तत्कालीन गढ़वाल मंडलायुक्त सुभाष कुमार ने वही चढ़कर उनको अनशन समाप्त करने को मनाया था.
वर्ष 2006 में नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में मूल निवास, स्थायी निवास और गैरसैंण को स्थायी राजधानी के मुद्दे पर उन्होंने आमरण अनशन किया था।
पत्नी ने 2002 में मिली हार के बाद खाया जहर
दिवाकर भट्ट की पत्नी के निधन का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि राज्य गठन के बाद पहले चुनाव में उत्तराखंड क्रांति दल को चार सीटें और लगभग छह से सात प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन दिवाकर भट्ट, ओम गोपाल रावत और नवीन मुरारी समेत कई आंदोलनकारी चुनाव हार गए। इस बात से उनकी पत्नी को गहरा मनो आघात लगा कि शराब और पैसा जीत गया और आंदोलन हार गया, जिसके बाद उन्होंने आत्मघाती कदम उठा जहर खा लिया था ।

