जय महाकाली,आयो गोरखाली
Balen Shah Nepal Gorkhas In Indian Army Defeated Pakistan In Kargil War And Big Challenge To China In 1962
Balen Shah Nepal Gorkhas: ‘वो गोरखा है मौत से नहीं डरता’…कारगिल में पाकिस्तान के छुड़ाए पसीने, बालेन शाह के नेपाल के 40,000 बहादुर इंडियन आर्मी में
Gorkha In Indian Army: गोरखाओं ने 200 से ज्यादा साल से निष्ठा, विशिष्टता और बहादुरी के साथ भारतीय सेना में रहकर देश की सेवा की है। उन्होंने चीन और पाकिस्तान के साथ युद्धों के दौरान दुश्मन को छठी का दूध याद दिलाया था।
नई दिल्ली: गोरखाओं के आते ही युद्ध की तस्वीर बदल जाती है। भारत, ब्रिटेन और नेपाल की आर्मी में ये बहादुर गोरखा शामिल हैं। इनके बारे में भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने एक बार कहा था-यदि कोई कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता तो वह या तो झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है। आज भारत की सेना में करीब 32,000 से लेकर 40,000 तक गोरखा हैं। इन्हीं गोरखाओं के बारे में टिम गुरुंग ने एक किताब लिखी है-‘आयो गोरखाली: ए हिस्ट्री ऑफ गुरखाज’। ये गोरखा जिस नेपाल से आते हैं, वहां इन दिनों 35 साल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार है, जो 100 रुपये से ज्यादा भारतीय वस्तुओं पर कस्टम ड्यूटी लगाने पर विरोध प्रदर्शनों का सामना कर रहे हैं।
Gorkhas in Indian Army
भारतीय सेना में गोरखा
कारगिल युद्ध में पाकिस्तान पर टूट पड़े थे गोरखा
गोरखा रेजिमेंट ने 1947-48 का कश्मीर युद्ध हो, 1962 में चीन के खिलाफ जंग हो या 1965, 1971 और 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ हर युद्ध और कठिन अभियानों में अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा की है।
1999 में कारगिल युद्ध के दौरान इन्हीं बहादुर गोरखाओं ने उल्टा चढ़ाई करते हुए पहाड़ों पर मौजूद पाकिस्तानी दुश्मनों को मारा था।
पहले विश्वयुद्ध के दौरान 90 हजार गोरखा लड़े
प्रथम विश्वयुद्ध (1914-19) के दौरान, गोरखा समुदाय के 90,000 से अधिक सैनिकों ने भारत के साथ-साथ फ्लैंडर्स, गैलीपोली, फिलिस्तीन, मिस्र, मेसोपोटामिया और फ्रांस में लड़ाई लड़ी।
गोरखा रेजिमेंट बेहद लड़ाकू और छापामार
भारतीय सेना की पहाड़ों की लड़ाई में माहिर और दुश्मन पर घातक वार करने वाले सबसे बहादुर माने जाने वाली गोरखा रेजिमेंट का गठन ईस्ट इंडिया कंपनी ने 24 अप्रैल 1815 को किया था।
गोरखा रेजीमेंट भारतीय सेना की एक महत्वपूर्ण इन्फैंट्री रेजीमेंट है, जो गोरखा सैनिकों से बनी है। गोरखा रेजीमेंट के सैनिक मुख्य रूप से नेपाल के गोरखा क्षेत्र और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से आते हैं।
दुश्मन के खिलाफ आयो गोरखाली का नारा
भारतीय सेना में गोरखाओं का योगदान अतुलनीय है, जिन्हें उनकी अदम्य बहादुरी,’जय महाकाली,आयो गोरखाली’ के युद्धघोष और कुकरी (Kukri) के इस्तेमाल को जाना जाता है। गोरखाओं की निष्ठा, अनुशासन और बहादुरी ने उन्हें भारतीय सेना की रीढ़ बना दिया है।
एक संधि में इंडियन आर्मी में होती है भर्ती
गोरखा रेजिमेंट का इतिहास एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814-1816) से जुड़ा है, जिसके बाद सुगौली की संधि हुई थी। इसी संधि के तहत गोरखा भारत और ब्रिटेन की सेना में भर्ती होते रहे हैं। ये सैनिक नेपाल और भारत के नेपाली भाषी गोरखा समुदाय से आते हैं।
1947 में एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ, जिसके बाद नेपाली गोरखा सैनिक ब्रिटेन, भारत और नेपाल की सेनाओं में बाकायदा भर्ती होने लगे थे। इस समझौते के बाद ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सेवा देने वाले गोरखा सैनिकों की स्थिति में बदलाव हुआ। साथ ही गोरखा सैनिकों को ब्रिटेन के साथ भारत की सेनाओं में भी सेवा देने का मौका मिला।
2022 में अग्निवीर (अग्निपथ) स्कीम लागू होने के बाद से भारतीय सेना में गोरखा की भर्ती प्रक्रिया थम सी गई है। कहा ये भी जाता है कि जो गोरखा रिटायर हो गए, उनके बाद नए गोरखाओं की भर्ती नहीं की गई है।
परमवीर चक्र से लेकर महावीर चक्र तक वीरता पुरस्कार जीते
गोरखा रेजिमेंट ने अब तक कई परमवीर चक्र जीते हैं। 1962 में मेजर धन सिंह थापा और 1999 में लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को परमवीर चक्र मिला था। इसके अलावा, इसे रेजिमेंट ने महावीर चक्र सहित सैकड़ों वीरता पुरस्कार जीते हैं।
आजादी के बाद 10 में से 6 गोरखा रेजिमेंट (1, 3, 4, 5, 8, और 9 गोरखा राइफल्स) भारत के पास रहीं और बाद में 11वीं गोरखा राइफल्स का गठन किया गया, जो अब भारतीय सेना की सात गोरखा रेजिमेंटें हैं।
गोरखा सैनिकों की 42 हफ्तों की बेहद कठोर ट्रेनिंग होती है। वे पहाड़ों और कठिन इलाकों में युद्ध के लिए माहिर माने जाते हैं। गोरखा सैनिक सियाचिन ग्लेशियर से लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) के शांति मिशनों (लेबनान, सूडान, सिएरालियोन) में भी तैनात रहे हैं।
Britain Raises New Gurkha Regiment Amid Controversy Over Recruitment Of Gorkha Soldiers Into Indian Army
Gurkha Regiment: भारतीय सेना को ढूंढे नहीं मिल रहे नेपाली गोरखा सैनिक, ब्रिटेन ने बनाई नई गोरखा रेजिमेंट, जानें कैसे कर रहा भर्ती
भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती को लेकर चल रहे विवाद के बीच, ब्रिटेन ने नई गोरखा रेजिमेंट बनाई है। इस रेजिमेंट को ब्रिटिश सम्राट किंग चार्ल्स III ने किंग्स गोरखा आर्टिलरी (KGA) नाम दिया है। इस नई यूनिट को दक्षिण-पश्चिमी इंग्लैंड के लार्कहिल कैंप भेजा गया है।
भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती को लेकर गतिरोध जारी है। वहीं, ब्रिटेन ने उन्हीं नेपाली गोरखाओं को अपनी सेना भर्ती कर एक नया रेजिमेंट बनाया है। ब्रिटिश सेना की इस आर्टिलरी रेजिमेंट में नेपाली गोरखा शामिल हैं, जो अपनी मजबूत कद काठी और लड़ाकू स्वभाव के कारण पूरी दुनिया में मशहूर हैं। इस रेजिमेंट को किंग्स गोरखा आर्टिलरी (KGA) के नाम से जाना जाता है। यह नाम वर्तमान ब्रिटिश सम्राट किंग चार्ल्स III ने दिया है। इस यूनिट के पहले बैच के 20 सीधे चुने गए सैनिकों की ओथ टेकिंग सेरेमनी 20 अप्रैल को दक्षिण-पश्चिमी इंग्लैंड के लार्कहिल कैंप में आयोजित की गई।
Gurkha Troops British Army
ब्रिटिश सेना में गोरखा सैनिक
ट्रेनिंग के बाद भेजे जायेंगें अलग मिशनों पर
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटिश सेना में भर्ती हुए नए गोरखा सैनिकों को ट्रेनिंग पूरी होने के बाद अलग-अलग मिशन पर तैनात किया जाएगा। ये सैनिक यूनाइटेड किंगडम और विदेशों में आयोजित होने वाले युद्ध अभ्यासों और सैन्य अभियानों पर तैनात किए जा सकेंगे। ब्रिटिश सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती का इतिहास काफी पुराना है। नेपाली गोरखाओं की यह भर्ती भारत-नेपाल और ब्रिटेन के बीच हुए समझौतों में की जाती है।
और अधिक गोरखाओं की भर्ती करेगा ब्रिटेन
‘द गोरखा ब्रिगेड एसोसिएशन’ वेबसाइट के अनुसार, 400 सैनिकों वाली KGA के गठन की घोषणा 2025 में हुई थी और यह अगले चार वर्षों में पूरा हो जाएगा। मौजूदा गोरखा सैनिकों का पहला स्थानांतरण इस वसंत में होगा। इस नई यूनिट को शुरुआत में लार्कहिल में स्थित रॉयल आर्टिलरी के मुख्यालय में तैनात किया गया है। हालांकि, अगले तीन-चार साल में इसकी कई और बैटरियां बनाकर पूरे देश में तैनात किया जाएगा। वेबसाइट पर बताया गया है कि किंग्स गोरखा आर्टिलरी रॉयल आर्टिलरी के हिस्से के रूप में नजदीकी आर्टिलरी सहायता प्रदान करेगा। इससे ब्रिटिश सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती का रास्ता भी साफ होगा।
ब्रिटिश सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती का इतिहास
1815 में एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद अंग्रेजों ने गोरखाओं की वीरता से प्रभावित होकर उन्हें अपनी सेना में भर्ती करना शुरू किया। वे 200 से अधिक वर्षों से ब्रिटिश सेना में सेवा दे रहे हैं।
सबसे पहले ये गोरखा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में शामिल हुए। इसके बाद इन गोरखाओं ने ब्रिटिश सेना की ओर से दुनिया भर के कई सैन्य अभियानों और ऑपरेशनों में शानदार सेवा दी है।
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में 200000 से ज्यादा गोरखा सैनिकों ने ब्रिटिश भारतीय सेना में काम किया था। इस दौरान इनकी वीरता और साहस का लोहा पूरी दुनिया ने माना।
वर्तमान में, लगभग 3,400 गोरखा सैनिक ब्रिटिश सेना में सेवा दे रहे हैं। ये रॉयल गोरखा राइफल्स और ब्रिगेड ऑफ गोरखा के हिस्सा हैं।
भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती क्यों रुकी
भारतीय सेना में नेपाली गोरखा सैनिकों की भर्ती में विवाद का मुख्य कारण 2022 में लागू की गई अग्निपथ योजना है। नेपाल सरकार ने इस योजना के तहत 4 साल भर्ती पर आपत्ति जताई थी।
नेपाल ने इसे 1947 के त्रिपक्षीय समझौते (भारत-नेपाल-ब्रिटेन) का उल्लंघन करार दिया था। इस वजह से 2020 के बाद से नेपाल से गोरखा सैनिकों की भारतीय सेना में भर्ती रुकी हुई है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले 4 वर्षों में लगभग 14,000 गोरखा सैनिक सेवानिवृत्त (Retire) हो चुके हैं, लेकिन नई भर्ती न होने से रेजिमेंटों में सैनिकों की कमी हो गई है।
भारत अब भारतीय मूल के गोरखा सैनिकों की भर्ती बढ़ा रहा है। ऐसे में नेपाल के गोरखा अब ब्रिटिश सेना की ओर रुख कर रहे हैं।
नेपाली गोरखाओं की भर्ती कैसे कर रहा ब्रिटेन
गोरखा ब्रिगेड एसोसिएशन के अनुसार, ब्रिटिश सेना नेपाल में एक बेहद कठोर, पारदर्शी और स्वतंत्र प्रक्रिया के माध्यम से प्रतिवर्ष लगभग 200 सर्वश्रेष्ठ नेपाली युवाओं को ‘ब्रिगेड ऑफ गोरखास’ के लिए चुनती है। यह चयन प्रक्रिया पोखरा और धरान स्थित ब्रिटिश गोरखा शिविरों में आयोजित की जाती है, जिसमें शारीरिक दक्षता, शैक्षणिक योग्यता और मेडिकल टेस्ट के कड़े चरण शामिल हैं। इच्छुक उम्मीदवार ऑनलाइन आवेदन करते हैं, जिसके बाद योग्य उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया जाता है। इसके बाद प्रारंभिक स्क्रीनिंग (दौड़, शारीरिक परीक्षा) नेपाल में एरिया वेलफेयर सेंटर्स (AWC) में होती है। चयनित रंगरूटों को यूनाइटेड किंगडम में इन्फैंट्री ट्रेनिंग सेंटर, कैटरिक में 36 सप्ताह के कठोर सैन्य प्रशिक्षण के लिए भेजा जाता है।
