आआपा राज्यसभा दल भाजपा में विलीन, बाजी पलटने का एक रास्ता-एक सांसद तोडना
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Raghav Chadha Aap Exit Story Behind The Scenes How A Month Of Secret Meetings Scripted The Biggest Split In The Aap
AAP के 7 सांसदों ने छोड़ी पार्टी…राघव चड्ढा ने बताया कारण , संजय सिंह बोले…’पंजाब में शुरू हुआ ऑपरेशन लोटस’
राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात की (ANI)
नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी में हुए एक बड़े राजनीतिक उलटफेर में राज्यसभा के 10 सांसदों में से राघव चड्ढा समेत सात सांसद भाजपा में शामिल हो गए. बता दें कि, आम आदमी पार्टी (AAP) के तीन राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से भाजपा मुख्यालय में मुलाकात की.
इससे पहले राघव चड्ढा ने संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ऐलान किया कि AAP के राज्यसभा के 10 सांसदों में से दो-तिहाई (7) सांसद भाजपा में विलय कर रहे हैं.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में राघव चड्ढा ने कहा, “हमने फैसला किया है कि हम, राज्यसभा में AAP के दो-तिहाई सदस्य, भारत के संविधान के प्रावधानों का प्रयोग करते हुए भाजपा के साथ विलय कर रहे हैं. खबर है कि आज ही से आमआदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पक्ष में वोट मांगने जा रहे थे और इसी से भाजपा में आने के लिए इन सांसदों ने शुक्रवार का दिन चुना.
शुक्रवार का दिन दिल्ली में राजनीतक हलचल का दिन रहा, जहां आम आदमी पार्टी के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 सांसद (राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल) ने भाजपा में विलय सम्बन्धित प्रपत्र राज्यसभा के उपसभापति को सौंपे. 3 सांसदों राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस विलय की जानकारी दी और उसके बाद इन तीनों सांसदों ने भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात भी की.
राघव चड्ढा भाजपा मुख्यालय पहुंचे
राघव चड्ढा ने बताया कि उन्होंने सुबह ही राज्यसभा सभापति को हस्ताक्षरित पत्र और प्रपत्र सौंप दिए हैं. राघव चड्ढा ने AAP से दूरी बनाने का कारण बताते हुए कहा कि, जिस आम आदमी पार्टी को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा है और अपनी जवानी के 15 साल दिए हैं, वह अब पूरी तरह से अपने सिद्धांतों, मूल्यों और नैतिकता से भटक गई है. उन्होंने कहा कि, पार्टी अब देश या राष्ट्रहित को नहीं, बल्कि व्यक्तिगत लाभ को काम कर रही है.
राघव चड्ढा ने कहा, कि “कई सालों से लोग मुझे कहते रहे हैं और मैं खुद भी महसूस करता था कि मैं गलत पार्टी में सही आदमी हूं. आज मैं आम आदमी पार्टी से दूरी बना रहा हूं और जनता के करीब जा रहा हूं.”
उन्होंने आगे कहा, “मैं उनके अपराधों का हिस्सा नहीं बनना चाहता था. मेरी दोस्ती उनके अपराधों का हिस्सा बनने को नहीं थी. हमारे पास सिर्फ दो विकल्प थे, या तो राजनीति छोड़कर 15-16 साल का जन-सेवा का काम छोड़ देना या फिर अपनी ऊर्जा और अनुभव से सकारात्मक राजनीति करना. इसलिए हमने फैसला लिया है… AAP अब भ्रष्टाचार से समझौता कर चुकी है.”
प्रेस कॉन्फ्रेंस के तुरंत बाद तीनों सांसद भाजपा मुख्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से भेंट की. इसे AAP को बड़ा झटका माना जा रहा है. इन सांसदों की भाजपाध्यक्ष से मुलाकात एक घंटे से भी ज्यादा चली. AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रतिक्रिया लिखी, “BJP ने फिर से पंजाबियों से धोखा किया.”
आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “भाजपा ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली AAP सरकार के अच्छे कामों में बाधा डाली है. 7 आप राज्यसभा सांसद भाजपा में जा रहे हैं, पंजाब की जनता ये 7 नाम याद रखेगी. पंजाब की जनता उन्हें कभी नहीं भूलेगी.” उन्होंने इसे भाजपा, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के ‘ऑपरेशन लोटस’ का हिस्सा भी बताया और पंजाब सरकार के कामों को रोकने की साजिश भी करार दिया.
हालांकि ये बदलाव तब हुआ है, जब पश्चिम बंगाल में एक चरण का चुनाव अभी बाकी है और खुद भाजपा के विरोध को अरविंद केजरीवाल वहां चुनाव प्रचार करने पहुंच रहे थे ऐसे में राजनीति में इतनी बड़ी उलटफेर को लेकर कई और कायसबाजियां भी शुरू हो गईं हैं.
परदे के पीछे की कहानी;कैसे महीनेभर गुप्त बैठकों ने आम आदमी पार्टी में सबसे बड़ी टूट की पटकथा लिखी
आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने भाजपा में विलय प्रपत्र राज्यसभा सभापति को सौंपै । यह सिर्फ दल-बदल नहीं,बल्कि एक ऐसी राजनीतिक पटकथा है जिसकी तैयारी लंबे समय से पर्दे के पीछे चल रही थी।
आम आदमी पार्टी (AAP) में एक महीने से जो हलचल दबे सुरों में चल रही थी,वह शुक्रवार सुबह खुलकर सामने आ गई। पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने भाजपा में विलय प्रपत्र राज्यसभा सभापति को सौंप दिए। यह सिर्फ दल-बदल नहीं,बल्कि एक ऐसी राजनीतिक पटकथा है जिसकी तैयारी लंबे समय से पर्दे के पीछे चल रही थी।
राघव चड्ढा ने AAP छोड़ने के फैसले के पीछे के कारणों में गंभीर आरोप लगाया कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से पूरी तरह भटक गई है।(फोटो- ANI)
पूरे घटनाक्रम की कमान राघव चड्ढा के हाथ में थी
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम की कमान राघव चड्ढा के हाथ में थी। बताते हैं कि पिछले एक महीने में अलग-अलग समय पर एक – एक कर सांसद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिले। यें बैठकें बेहद गोपनीय रखी गयी। भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने इनका स्वागत करने की बात बैठकों में कही।
शुक्रवार सुबह ठीक 11 बजे वह क्षण आया, जब राघव चड्ढा,संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने खुद हस्ताक्षरित प्रपत्र राज्यसभा सभापति को सौंपे। यह प्रपत्र सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थे,बल्कि आम आदमी पार्टी की संसदीय राजनीति में सबसे बड़े भूकंप का संकेत थे।
संख्या का गणित: 7 क्यों था इतना महत्वपूर्ण?
एंटी-डिफेक्शन कानून में सदस्यता बचाने को दो-तिहाई संख्या जरूरी थी। AAP के कुल 10 राज्यसभा सांसद हैं, इसलिए कम से कम 7 सांसदों का साथ होना अनिवार्य था। यही वजह थी कि इस पूरी प्रक्रिया में संख्या सबसे बड़ा हथियार भी थी और सबसे बड़ा जोखिम भी।
सूत्र बताते हैं कि यदि इनमें से एक भी सांसद अंतिम समय में पीछे हटता, तो बाकी छह सांसदों की सदस्यता खतरे में पड़ सकती थी। इसी से रणनीतिकारों ने सात पर नहीं, बल्कि आठ सांसदों को साथ रखने की कोशिश की।
बाबा सीचेवाल पर थी विशेष दृष्टि
पंजाब से राज्यसभा सांसद बाबा बलवीर सिंह सीचेवाल को मनाने को कई दौर की कोशिश हुई। उन्हें साथ लाने की कोशिश इसलिए भी की गई ताकि संख्या का खतरा खत्म हो सके। लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद वे पार्टी से बगावत को तैयार नहीं हुए। यही कारण रहा कि आखिरी समय तक बेचैनी रही। सूत्रों के अनुसार, जब तक सातों सांसदों के हस्ताक्षर पक्के नहीं हो गए, तब तक पूरी टीम बेहद सतर्क रही।
संदीप पाठक का नाम भी चौंका गया
इन सात सांसदों में तीन पुराने पार्टी कार्यकर्ता रहे हैं और चार उद्योगपति हैं। पुराने कार्यकर्ताओं में राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल के असंतोष की चर्चा पहले से थी। लेकिन संदीप पाठक का नाम सामने आना पार्टी नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा झटका है। संदीप पाठक दिल्ली चुनाव में संगठन के सबसे महत्वपूर्ण चेहरों में थे। लेकिन चुनाव हारने के बाद उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं मिला। इस बीच उनकी नाराजगी गहराती गई। कुछ दिन पहले उन्हें बंगला आवंटित हुआ और तभी उनकी भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से भेंट भी हुई थी।
अशोक मित्तल और ईडी रेड का मोड़
अशोक मित्तल का नाम भी इस कहानी में महत्वपूर्ण है। लगभग 10 दिन पहले उनके घर और प्रतिष्ठानों पर ईडी की रेड हुई। रोचक यह कि इससे कुछ दिन पहले ही उन्हें राघव चड्ढा की जगह राज्यसभा में पार्टी का उपनेता बनाया गया था। राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को संयोग से ज्यादा संकेत माना जा रहा है। अब वही अशोक मित्तल इस बड़े राजनीतिक बदलाव का हिस्सा बन गए हैं।
राघव चड्ढा की दूरी कब शुरू हुई?
राघव चड्ढा और पार्टी नेतृत्व के बीच दरार की शुरुआत 2024 से मानी जा रही है। जब अरविंद केजरीवाल शराब नीति मामले में गिरफ्तार हुए तब चड्ढा की चुप्पी ने पहली बार सवाल खड़े किए। उन्होंने लंदन में मेडिकल चेकअप की ओट ली, लेकिन पार्टी में इसे अलग नजर से देखा गया। इसके बाद पार्टी के विरोध प्रदर्शनों से उनकी दूरी लगातार चर्चा में रही।
सितंबर 2024 में लंदन से लौटने के बाद उनकी केजरीवाल से मुलाकात ने कुछ समय अटकलें शांत की, लेकिन यह शांति ज्यादा दिन नहीं टिक सकी।
2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी राघव चड्ढा की सक्रियता बेहद सीमित रही। पार्टी की हार और सत्ता से बाहर होने पर उनके और नेतृत्व में दूरी और साफ दिखने लगी।
फिर केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जेल से बाहर आए, तब भी चड्ढा की चुप्पी ने संकेत दे दिया कि अंदर कुछ बड़ा चल रहा है।
आखिरी दरार: पद से हटाया जाना
इस महीने की शुरुआत में पार्टी ने राघव को राज्यसभा उपनेता पद से हटाकर अशोक मित्तल को बना दिया। साथ ही सदन में पार्टी की ओर से बोलने के अवसर भी छीन लिए।
तब राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि साइलेंसड बट नॉट डिफिटिड। इसके बाद उन्होंने पार्टी पर कई आरोप लगाए।
यह घटनाक्रम सिर्फ सात सांसदों का दल-बदल नहीं, बल्कि AAP की राष्ट्रीय राजनीति को सबसे बड़ा झटका है।
जिस पार्टी ने खुद को वैकल्पिक राजनीति का चेहरा बताया था, उसके भीतर की असहमति खुलकर सामने आ गई।
परदे के पीछे महीनों से चल रही नाराजगी, गुप्त बैठकें, कानूनी गणित और सत्ता समीकरण ने मिलकर वह पटकथा लिखी, जिसने शुक्रवार को भारतीय राजनीति में नया मोड़ दे दिया। राघव चड्ढा और AAP नेतृत्व में दूरी 2024 से बढ़नी शुरू हुई, जो उनकी लगातार चुप्पी, चुनावी निष्क्रियता और पार्टी गतिविधियों से दूरी में साफ दिखी। राज्यसभा में उपनेता से हटाए जाने पर यह दरार खुलकर सामने आई और अंततः यही असंतोष बड़े राजनीतिक बदलाव का कारण बना।
क्या AAP अब भी पलट सकती है बाजी? सात में से 3 सांसदों पर सस्पेंस, क्या कहता है दल-बदल कानून
आम आदमी पार्टी को अपने इतिहास का बड़ा झटका लगा है. देश की संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में पार्टी के 10 में से 7 सांसद पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए है. इनमें पार्टी के बड़े चेहरे राघव चड्ढा, हरभजन सिंह जैसे नाम शामिल है. यूं तो ये संख्या संवैधानिक बाध्यता पूरा करती है, लेकिन इन सात में 3 सांसदों का अब तक प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं बोलना कई सवाल खड़े करता है.
राज्यसभा सांसद संदीप पाठक, अशोक मित्तल और राघव चड्ढा BJP अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ
आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों का पार्टी से त्यागपत्र का दावा राघव चड्ढा ने किया. लेकिन तस्वीरों में सिर्फ तीन सांसद दिखे. राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक. राघव चड्ढा ने कहा कि संविधान के अनुसार किसी पार्टी के कुल सांसदों में से दो-तिहाई सांसद दूसरी पार्टी में शामिल हो सकते हैं. AAP से इस्तीफा देने के बाद ये तीनों सांसद भाजपा में शामिल हो गए हैं.
चड्ढा ने आगे कहा कि हमने आज (शक्रवार) इस संबंध में राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन को एक पत्र सौंपा है. जिसमें सभी ज़रूरी दस्तावेज़ भी जमा किए गए हैं. चड्ढा ने कहा कि AAP के अन्य राज्यसभा सांसद जो BJP में शामिल हो रहे हैं, वे हैं हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल . राघव चड्ढा ने दावा किया कि सभी सांसदों ने राज्यसभा के सभापति को सौंपे गए पत्र पर पहले ही हस्ताक्षर कर दिए हैं.
उन्होंने कहा, “उन्होंने पहले ही हस्ताक्षर कर दिए हैं, और आज सुबह हमने सभी ज़रूरी दस्तावेज़, जिनमें हस्ताक्षरित पत्र और अन्य औपचारिक कागज़ात शामिल हैं- राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए हैं.”
पार्टी में शामिल होने के बाद BJP ने सांसदों का गर्मजोशी से स्वागत किया और पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन ने उन्हें मिठाइयां खिलाई.
AAP से इस्तीफा देने वाले बाकी 4 सांसदों के बारे में नितिन नवीन ने लिखा, “साथ ही, हरभजन सिंह जी, स्वाति मालीवाल जी, विक्रम साहनी जी और राजिंदर गुप्ता जी को PM नरेंद्र मोदी के गतिशील नेतृत्व में ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की दिशा में काम करने के लिए शुभकामनाएं.”
लेकिन आम आदमी पार्टी ने त्यागपत्र के इस प्रकरण पर सवाल उठा इसे नियमों के विपरीत करार दिया है.
AAP के राज्यसभा व्हिप एनडी गुप्ता ने कहा कि वे राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल के खिलाफ राज्यसभा के सभापति को पत्र सौंपेंगे.
गुप्ता ने कहा है कि अपने पत्र में दलबदल विरोधी कानून में कार्रवाई की मांग करेंगे. इन तीनों नेताओं को सार्वजनिक रूप से BJP में शामिल होते देखा गया था.
बाकी चार नेताओं ने अब तक भाजपा में शामिल होने की घोषणा नहीं की है. हालांकि स्वाति मालीवाल ने पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी है. इसलिए मुख्य व्हिप केवल उन तीन सांसदों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराएंगे जिन्हें BJP कार्यालय में देखा गया था.
AAP सांसद संजय सिंह ने एक्स पर लिखा, “मैं माननीय राज्यसभा सभापति को एक पत्र प्रस्तुत करूंगा, जिसमें राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक को भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के कारण राज्यसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित करने की मांग की जाएगी, क्योंकि यह संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता त्यागने के समान है.”
AAP ने चार सांसदों के स्टैंड पर सवाल उठाया है लेकिन सांसद स्वाति मालीवाल ने पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी है. उन्होंने एक्स पर लिखा, “केजरीवाल जी के संरक्षण में आम आदमी पार्टी में बढ़ता बेहिसाब भ्रष्टाचार, महिलाओं के साथ उत्पीड़न और मारपीट की घटनाएं, गुंडा तत्वों को बढ़ावा और पंजाब के साथ हो रही धोखेबाजी और लूट को देखते हुए मैंने आज पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया है.”
लेकिन बाकी के तीन सांसद हरभजन सिंह, विक्रमजीत साहनी और राजिंदर गुप्ता ने कोई बयान नहीं दिया है.
सवाल यह भी है कि क्या पार्टी छोड़ने वाले AAP सांसदों की राज्यसभा सदस्यता जाएगी?
भारत के संविधान की 10वीं अनुसूची में परिभाषित दल-बदल विरोधी कानून कहता है कि कोई भी विधायक/सांसद जो अपनी पार्टी की सदस्यता से त्यागपत्र दे देता है, उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा.
लेकिन 10वीं अनुसूची का खंड 4 जिसका उद्देश्य “पार्टी के भीतर के मतभेदों को संरक्षण देना” था. कुछ ऐसी शर्तें निर्धारित करता है, जो किसी विधायक/सांसद को दल-बदल विरोधी कानून में अयोग्य घोषित होने से बचाता है.
दल-बदल के आधार पर तब कोई सांसद/विधेयक अयोग्य नहीं होगा
1.जब उसकी मूल राजनीतिक पार्टी किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी के साथ विलय कर लेती है और वह यह दावा करता है कि वह और उसकी मूल राजनीतिक पार्टी के कोई अन्य सदस्य:-
(a) उस विलय से बनी किसी नई राजनीतिक पार्टी के सदस्य बन गए हैं; या
(b) उन्होंने विलय को स्वीकार नहीं किया है और एक अलग समूह के रूप में काम करने का विकल्प चुना है
(2) किसी सदन के सदस्य की मूल राजनीतिक पार्टी का विलय तब हुआ माना जाएगा, यदि और केवल यदि, संबंधित विधायी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों ने ऐसे विलय पर सहमति व्यक्त की हो.
वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल जिन्होंने इससे पहले शिवसेना में विभाजन के मामले में महाराष्ट्र के नेता एकनाथ शिंदे का प्रतिनिधित्व किया था,का कहना है कि यह प्रावधान सांसदों को अयोग्य ठहराए जाने और अपनी सीट गंवाने से बचाएगा.
कौल ने कहा, “अनुसूची 10 के खंड 4(2) में कहा गया है कि यदि सदन के दो-तिहाई सदस्य सहमत हों तो यह माना जाता है कि ‘पार्टी’ का विलय हो गया है. ‘मूल राजनीतिक पार्टी’ के विलय की आवश्यकता नहीं है.”
वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े इस विश्लेषण से सहमत नहीं हैं. हेगड़े का कहना है कि जहां पार्टी के स्वामित्व का दावा करने से विलय अलग है वहीं इस बात पर अभी भी विचार किया जाना बाकी है कि “सदन” (House) का अर्थ संसद का कोई एक सदन है, या इसका अर्थ संसद में सदस्यों की कुल संख्या है.
संजय हेगड़े कहते हैं, “एक सदन में विधायी दल के 2/3 सदस्यों ने दावा किया है कि वे विलय कर रहे हैं. यह तर्क दिया जा सकता है कि दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए आपको संसद में कुल सदस्यों की संख्या का 2/3 हिस्सा चाहिए. मेरी राय में, दलबदल विरोधी कानून के प्रावधान लागू होंगे, क्योंकि विधायकों के मामले इतर जहां एकसदनीय विधायिका होती है और विधायक अलग होने या आपस में मिलने का दावा कर सकते हैं. संसद में दो सदन होते हैं.”
हालांकि कौल का कहना है कि चूंकि संवैधानिक भाषा में स्पष्ट रूप से “सदन” (House) शब्द का प्रयोग किया गया है न कि “विधायिका” (legislature) का. कौल कहते हैं, “राज्यसभा और लोकसभा अलग-अलग सदन हैं और उनमें अलग-अलग विधायी दल होते हैं.”
वरिष्ठ अधिवक्ता निज़ाम पाशा ने भी यह सवाल उठाया है कि क्या इस विलय के लिए “मूल पार्टी” की सहमति जरूरी है. पाशा कहते हैं, “कानून के बारे में मेरी समझ यह है कि उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा, क्योंकि इस मामले में मूल पार्टी का कोई विलय नहीं हुआ है. केवल राज्यसभा के 2/3 सांसदों ने ही आपस में विलय किया है. उन्होंने खुद को ‘मूल राजनीतिक पार्टी’ होने का दावा नहीं किया है.”
क्या इसका मतलब यह है कि पार्टी में फूट पड़ गई है और अब विधायकों को किसी एक पक्ष को चुनना होगा?
जानकारों का कहना है कि कानूनी तौर पर यह एक अलग विषय है. एन.के. कौल के अनुसार किसी दूसरी पार्टी में विलय करना और अपनी मूल पार्टी से त्यागपत्र देना कानूनी तौर पर पार्टी के “स्वामित्व” का दावा करने से अलग बात है.
सीनियर एडवोकेट देवदत्त कामत ने कहा कि लेजिस्लेचर पार्टी (विधायी दल) अनुसूची 10 के तहत आवश्यक परिभाषा के दायरे में ‘मूल राजनीतिक दल’ नहीं है. मेरी राय में राजनीतिक दल का विलय हुए बिना, विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों का विलय होना, 10वीं अनुसूची में एक वैध विलय नहीं कहा जा सकता. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और इस पर अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है.
राज्यसभा के सभापति का फैसला महत्वपूर्ण
आम आदमी पार्टी को तोड़कर अपने गुट का भाजपा में विलय करने वाले राज्यसभा के सात सांसदों का भविष्य अभी तो सभापति के विवेकाधिकार पर निर्भर है. सभापति इनके विलय को अपने विशिष्ट अधिकार में मान्यता दे सकते हैं.हालांकि इनको मान्यता मिलने के बाद सभापति के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.
सुप्रीम कोर्ट में वकील और विधि व संविधान के जानकार ज्ञानंत सिंह के मुताबिक भी इन सातों बागी सांसदों की सदस्यता पर फिलहाल कोई संकट नहीं दिख रहा. क्योंकि संविधान के दसवें शेड्यूल में किए गए संशोधन और दल बदल कानून में स्पष्ट लिखा है कि मर्जर इज एक्सेप्शन यानी संसदीय दल के सदस्यों के दूसरी पार्टी के संसदीय दल में विलय करने पर ही इस कानून के दायरे से बाहर रहते हुए सुरक्षा कवच में रह सकते हैं. यानी वो मूल पार्टी से टूट कर अलग अस्तित्व नहीं बनाए रख सकते हैं लेकिन दो तिहाई सदस्य चाहें तो किसी दूसरी पार्टी में विलय जरूर कर सकते हैं.
नंबर गेम महत्वपूर्ण
मतलब ये कि इन सांसदों के आगे यही वो रास्ता है जिस पर चलते हुए वो अपनी सांसदी और मूल पार्टी के साथ रह गए सांसदों की कुर्सी भी बचा सकते हैं. हां, इस पूरी प्रक्रिया में आम आदमी पार्टी एक ही सूरत में बाधा डाल सकती है. अगर इन सात में से दो एक को भी पार्टी वापस लाने में कामयाब हो जाए तो बागियों का सपना टूट सकता है. अगर इनका नंबर गेम अपसेट हुआ तो फिर सभापति भी इनको कानूनी संरक्षण नहीं दे सकेंगे.
राजनीतिक तौर पर राघव चड्ढा और अन्य लोगों का इस्तीफा संकट में फंसी AAP के लिए एक बड़ा झटका है. विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अगर AAP अपने बागी सांसदों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं दायर करने का फैसला करती है, तो अंतिम फैसला राज्यसभा के सभापति लेंगे.

