भारत ने यूं रोका ईंधन में बवंडर,आगे तेल की बढ़ती कीमतें लेंगी परीक्षा,हर पक्ष समझिए
Crude Oil Price Surge How India Managed What Is The Test Ahead
Crude Oil Price
कच्चे तेल (क्रूड) की कीमतों में तेजी से इजाफा हुआ है। यह और बात है कि केंद्र सरकार ने उपभोक्ताओं पर इसकी आंच आने से अब तक रोका है। इसके लिए उसने कई कदम उठाए हैं। हालांकि, क्रूड की बढ़ती कीमतें उसका आगे कड़ा इम्तिहान ले सकती है।
नई दिल्ली 23 अप्रैल 2026 : अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल (क्रूड)की कीमतों में तेज उछाल आया है। लेकिन, केंद्र सरकार ने काफी हद तक इसकी आंच उपभोक्ताओं तक नहीं आने दी है। ग्लोबल क्रूड की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्टेबल हैं। केंद्र सरकार ने उपभोक्ताओं को बचाने के लिए कई कदम उठाए हैं। लेकिन, क्रूड की कीमतों में आगे मजबूती आई तो ये जरूर इम्तिहान लेंगी। आइए, यहां इससे जुड़े पहलुओं को समझते हैं।
कच्चे तेल की कीमतों का क्या हुआ?
22 अप्रैल को दो हफ्तों से ज्यादा समय में पहली बार ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गईं।
इसकी वजह मजबूत मांग के संकेत और बढ़ती भू-राजनीतिक तनाव का कॉम्बिनेशन था।
कारण है कि तनाव कम होने की उम्मीदें अभी भी अनिश्चित बनी हुई हैं।
तेल की कीमतों में अब लगातार चौथे सत्र में बढ़ोतरी हुई है। इसे अमेरिका में गैसोलीन (पेट्रोल) और डिस्टिलेट इन्वेंट्री में भारी कमी से और भी बल मिला है। बाजार मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव पर रिएक्शन दे रहे हैं। खासकर होर्मुज स्ट्रेट के आसपास, जहां से दुनिया के लगभग 20% तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) का प्रवाह होता है।
नई चिंताएं
ईरान के खाड़ी से बाहर निकलने की कोशिश करते दो कंटेनर जहाज छीनने की घटना ने आपूर्ति बाधाओं को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। इससे क्रूड कीमतों में उछाल आया है। ईरान और अमेरिका में शांति वार्ता के दूसरे दौर की संभावना की खबरें हैं। लेकिन, लगातार बने गतिरोध से तेल बाजारों में रिस्क प्रीमियम ऊंचे बने हुए हैं।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच भारतीय कच्चे तेल की कीमतें दोगुनी हुई है। जनवरी में यह 63 डॉलर प्रति बैरल थी। अप्रैल में यह बढ़कर औसतन 116 डॉलर प्रति बैरल हो गई। इस संकट के बावजूद देश में खुदरा तेल की कीमतें स्थिर बनी हैं। कई पड़ोसी देशों में ईंधन की कीमतें बढ़ाई गई हैं।
कीमतें कम रखने को सरकार ने क्या कदम उठाए?
पश्चिम एशिया में बनी मुश्किलों के बीच स्थिर सप्लाई सुनिश्चित करने को भारत रूस से कच्चे तेल और एलपीजी के आयात में विविधता ला रहा है। मार्च में भारत ने रूस से रिकॉर्ड 22.5 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया। यह फरवरी के मुकाबले दोगुना था। इसके साथ ही रूसी तेल भारत के कुल आयात का 50% हो गया।
वेनेजुएला से भी तेल आयात बढ़ रहा है। मार्च मध्य में वॉशिंगटन ने 30 दिनों की छूट जारी की। इससे देशों को रूस पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद उससे तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने की अनुमति मिल गई। इसका उद्देश्य ईरान के साथ युद्ध से प्रभावित ग्लोबल एनर्जी मार्केट्स को स्थिर करने में मदद करना था। इस छूट को पिछले हफ्ते से बढ़ाया गया। भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल कार्गो के लिए डेटेड ब्रेंट के मुकाबले 7 डॉलर से 9 डॉलर प्रति बैरल का प्रीमियम दिया।
डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग के अनुसार, भारत ने रूसी बीमा कंपनियों की संख्या भी बढ़ाई है। ये उसके बंदरगाहों पर आने वाले जहाजों को समुद्री बीमा कवर देने को पात्र हैं। इस संख्या आठ से बढ़ाकर 11 कर दी गयी है।
सरकार के अनुसार, भारत में रणनीतिक तेल भंडार में कच्चे तेल की उपलब्धता तीन-चौथाई है।
क्या पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढने वाली है?
23 अप्रैल को पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने उन रिपोर्टों का खंडन किया जिनमें कहा गया था कि राज्य चुनावों के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी हो सकती है। मंत्रालय ने कहा कि सरकार ऐसे किसी भी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है।
भारत अब तक उपभोक्ताओं को ग्लोबल उतार-चढ़ाव से बचाने में कामयाब रहा है। लेकिन, 100 डॉलर से ऊपर कच्चे तेल के लेवल इस स्थिरता की परीक्षा ले सकते हैं।
धीरे-धीरे बढ़ सकते हैं दाम
उद्योग के जानकारों के अनुसार, तेल की कीमतों में बढ़ोतरी समय के साथ धीरे-धीरे हो सकती है, न कि एक ही बार में एक समान दर पर।
मूडीज रेटिंग्स की हालिया रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (ओएमसी) अभी घाटा उठा रही हैं।
यह नुकसान रोजाना 1,500-2,000 करोड़ रुपये (160-215 डॉलर मिलियन) का है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है,कि ‘हम इतनी बड़ी मात्रा में होने वाले नुकसान को टिकाऊ नहीं मानते हैं। अगर एनर्जी की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो सरकार ओएमसी पर वित्तीय दबाव कम करने के लिए और उपाय कर सकती है। मसलन, मुआवजा देना या खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी करना।’
सूत्रों ने यह भी बताया कि राज्यों और केंद्र को खुदरा ईंधन की कीमतों में कटौती के मामले में मिलकर काम करना होगा। साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि अगर केंद्र कीमतें कम करता है तो राज्य अपनी ड्यूटी (टैक्स) न बढ़ाएं।
सरकार ने चतुराई से किया है काम
अब तक घरेलू और कमर्शियल दोनों तरह के एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में बढ़ोतरी की गई है। सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों ने औद्योगिक डीजल के साथ प्रीमियम ईंधन वेरिएंट की कीमतें भी बढ़ा दी हैं। लेकिन, केंद्र ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की है।
इससे डीजल पर शुल्क घटकर शून्य और पेट्रोल पर 3 रुपये प्रति लीटर हो गया है। इस कदम का उद्देश्य तेल कंपनियों को बचाना था, न कि उपभोक्ताओं के लिए कीमतें कम करना।
केंद्र ने डीजल के निर्यात पर ‘विंडफॉल टैक्स’ भी बढ़ा दिया है। यह 21.5 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 55.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इसी तरह एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) पर यह टैक्स 29.5 रुपये से बढ़ाकर 42 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।
पेट्रोल के निर्यात पर शुल्क अभी भी शून्य बना हुआ है। पहले भी सूत्रों ने इस बात पर जोर दिया है कि इसका मकसद सरकार का रेवेन्यू बढ़ाना नहीं है। इसके बजाय यह पक्का करना है कि निर्यातक कीमतों में अंतर का गलत फायदा न उठा सकें।
इस कदम का क्या असर होगा?
यह एक दोधारी तलवार है। पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में किसी भी बढ़ोतरी से महंगाई बढ़ेगी। आम आदमी का बजट बिगड़ जाएगा। यही एक मुख्य वजह है कि केंद्र सरकार ने बढ़ी हुई कीमतों का बोझ खुद उठाने का फैसला किया है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता है। उसकी तेल आयात पर बहुत ज्यादा निर्भरता है।
लेकिन, एलपीजी की कीमतों में वृद्धि और आपूर्ति में बाधा से महंगाई पहले ही बढ़ चुकी है। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स आधारित महंगाई मार्च 2026 में मामूली रूप से बढ़कर 3.4% हो गई, जो फरवरी में 3.21% थी।
साथ ही, ईंधन की महंगाई पर भी दबाव बढ़ता दिखा है। बिजली, गैस और अन्य फ्यूल बास्केट फरवरी के 0.14% से बढ़कर मार्च में 1.65% हो गई। यह एलपीजी की कीमतों में वृद्धि दिखाता है।
मार्च के लिए होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) पर आधारित महंगाई भी बढ़कर 21 महीने के सबसे ऊंचे स्तर 3.88% पर पहुंच गई। इसका मुख्य कारण फ्यूल, बिजली और मैन्युफैक्चर्ड सामानों की कीमतों में तेजी थी। रुपया कमजोर होने के साथ तेल की बढ़ती कीमतें विकास की संभावनायें भी प्रभावित करेंगीं। महंगाई और बढ़ाएंगी। वहीं, इससे सरकारी खजाने और करंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) पर भी दबाव पड़ेगा।

