मेरठ के हासिमपुरा और मलियाना दंगे, किया किसी ने,भुगता किसी और ने
1987 का मेरठ का हाशिमपुरा-मलियाना नरसंहार (Hasimpur-Maliana Massacre) सांप्रदायिक हिंसा का वह अध्याय है, जहाँ पीएसी (PAC) पर निर्दोषों की हत्या का आरोप लगा। मलियाना में 72 से अधिक लोग मारे गए, वहीं हाशिमपुरा में 40 से अधिक लोग गायब हुए/मारे गए। यह केस न्याय में देरी और पीड़ितों की लंबी कानूनी लड़ाई के लिए याद किया जाता है।
मुख्य विवरण (1987 मेरठ दंगे):
घटनास्थल: मेरठ के हाशिमपुरा और मलियाना गांव (उत्तर प्रदेश)।
समय: मई 1987।
मुख्य आरोप: स्थानीय पुलिस और पीएसी (Provincial Armed Constabulary) पर एक समुदाय को निशाना बनाकर गोलीबारी और हत्या का आरोप लगा।
मलियाना नरसंहार: 23 मई 1987 को हुए इस हमले में 72 से अधिक लोगों के मारे जाने का दावा है, जिसमें स्थानीय निवासी और पीएसी शामिल थी।
हाशिमपुरा घटना: पीएसी ने मुस्लिम युवकों को हिरासत में लिया और उन्हें नहर के किनारे गोली मारकर लाशें फेंक दीं।
न्यायिक स्थिति: लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, मलियाना मामले में सबूतों की कमी के कारण अप्रैल 2023 में 40 आरोपियों को बरी कर दिया गया। वहीं, हाशिमपुरा मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने 2018 में पीएसी के 16 पूर्व जवानों को दोषी ठहराया था।
हांफ गई थी सरकार फिर पीएसी ने रोका दंगा.
42 मुसलमानों को मारकर नदी -नहर में बहा दिया
72 मुसलमानों को घर से निकालकर मारी गोली
मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह को देना पड़ा था त्यागपत्र
देश में हजारों दंगे हुए और उनमें लाखों की जान गई..
अधिकांश दंगे शुरू करने वाले मुसलमान और खत्म करने वाले हिन्दू होते थे..मुस्लिम दंगाई तांडव मचाते थे और कांग्रेस की सरकारें पुलिस के हाथ बाँध देती थी.. लेकिन एक बार ऐसा भी हुआ ज़ब पुलिस ने किसी की नहीं मानी दंगाईयों को ऐसा सबक सिखाया कि न केवल दंगा रोका बल्कि दंगाई ही जान की भीख मांगने लगे…
हम बात कर रहे है 40 साल पहले हुए मेरठ के दंगों की.. जिन्हें रोकने को 45 मुसलमानों को घर से उठाने के बाद गोली मारने, 72 मुसलमानों को घरों में घुसकर मार डालने के आरोप लगे और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा…इसे आजाद भारत का सबसे बड़ा सरकारी नरसंहार माना गया था।
.ऐसे शुरू हुआ दंगा
1987 में मौलानाओं के दबाव पर शाहबानो केस में संसद से सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की छवि ‘मौलाना राजीव’ की बन गई थी..इस छवि से उबरने को उन्होंने बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा दिया …इससे वातावरण बिगड़ा और देशभर में दंगे शुरू हो गए.. 14 अप्रैल, 1987 से मेरठ में धार्मिक उन्माद शुरू हुआ.. हिन्दुओं की .सैकड़ों दुकानें और घर आग के हवाले कर दिये गये..हत्या, आगजनी और लूट होने लगीं.. कई हत्याओं के बाद मई के महीने में मेरठ शहर में कर्फ्यू लगा.. हालात तब भी न सुधरे तो सेना उतारनी पड़ी….लेकिन हालात ये हो गए कि हिन्दुओं के साथ पुलिस और सुरक्षा बल के जवान भी दंगाइयों के शिकार होने लगे..उन पर पेट्रोल बम और तेजाब भरी बोतलें फेंकी जाने लगीं..
21 मई को पीएसी के जवानों पर जानलेवा हमला हुआ और उनकी रायफलें लूट ली गईं। उसी दिन मेरठ के हाशिमपुरा से सटे सूरज कुंड में एक भाजपा नेता के भांजे प्रभात कुमार कौशिक की हत्या कर दी गई..प्रभात के बड़े भाई सेना में कर्नल थे..अपने अफसर के भाई की हत्या से सेना के जवानों का गुस्सा भड़क उठा.. भाजपा ने भी सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया…हिन्दुओं की हालत ठीक वैसी ही हो गई थी जैसे बाद में कश्मीर में हुई.. पुलिस, पीएसी और सेना के जवान उनकी जान बचाने में असमर्थ थे.. खुद उनकी जान को खतरा था . उनके हाथ बंधे थे. गोली चलाने की मनाही थी.. पुलिस इलाके में घुस नहीं पा रही थी.. पीएसी के जवानों की रायफलें छीनी जा रही थी….
प्रशासन की बैठक,अगले दिन जनसंहार
मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में हिंदू त्राहिमाम कर रहे थे..अपने अफसर के भाई की हत्या से सैन्य जवान क्रोधित थे.. स्वयं पर हमलों से पीएसी के जवानों में नाराजगी थी..पुलिस-प्रशासन पहले से परेशान था..22 मई को पुलिस -प्रशासन के अधिकारियों की बड़ी बैठक हुई…. बैठक बाद हाशिमपुरा में अवैध हथियारों की तलाशी अभियान चलाया गया..पीएसी से छीने गए हथियार भी ढूंढने थे…
पुलिस, पीएसी और सैन्य टुकड़ियां हाशिमपुरा में घुसीं तो पैट्रोल, कैरोसीन,लाठी,बरछेभालों, तलवारों, बंदूकों,तमंचों ,चाकू,चापडों से लैस दंगाई फिर हमला करने लगे लेकिन अब जवानों ने पहले ही तय कर रखा था कि करना क्या है…. दनादन डंडे बरसाए..इतनी गोलियां चलाई कि इलाका धुआँ -धुआँ….दंगाई घरों में घुसे तो पुलिस -पीएसी सेना दरवाजे तोड़ अंदर गई…घर-घर तलाशी ली…644 लोग पकड़े..सड़कों पर परेड कराई ..पुलिस,पीएसी,सेना के ट्रकों से इन्हें पुलिस स्टेशन भेजने की व्यवस्था हुई..
बाकी गाड़ियां तो थाने गईं लेकिन एक गाड़ी कहीं और निकल गई……
हाशिमपुरा से पकडे 50 लोगों को पीएसी की 41वीं बटालियन के ट्रक नंबर URU1493 में बिठाया गया..इन्हें शहर से बाहर मुराद नगर अपर गंगा नहर ले गये. आरोप हैं कि यहां पीएसी जवानों ने पकड़े लोगों पर गोलीबारी की… कुछ को ट्रक से उतारकर गोली मारी, बाकी को ट्रक में ही गोली मार दी गई..
50 को मारा 8 जिंदा बच गए..
एक-एक करके लोगों को गोली मारने के बाद, उन्हें मृत समझकर गंगा नहर में फेंका जाने लगा. तभी दूध लेकर आ रहे ट्रक आने पर पीएसी का ट्रक हिंडन नदी की ओर मोड़ दिया…बाकी लोगों को हिंडन नदी में फेंक दिया ..पीएसी जवानों ने माना कि इनमें सभी मर गए हैं. लेकिन हिंडन नदी में फेंके लोगों में से बाबुद्दीन बच गया.. साथ ही अपर गंगा नहर में फेंके गए लोगों में से मुजीबुर रहमान, उस्मान, जुल्फिकार,नईम आरिफ और कमरुद्दीन भी बच गए..इनकी गवाही पर केस शुरू हुआ ..31 साल लंबी कानूनी ल़ड़ाई के बाद 1918 में 42 लोगों की हत्या के आरोप में पीएसी के 16 जवानों को उम्रकैद सुनाई गई..
अब बात मलियाना नरसंहार की…
14 अप्रैल 1987 को मेरठ में नौचंदी मेला पूरे रंग में था.. ड्यूटी पर पुलिस सब-इंस्पेक्टर को पटाखे से चोट लगी और उसने बम के हमले की आशंका पर गोली चला दी जिसमें दो मुसलमान मारे गये.. उसी दिन मलियाना के हाशिमपुरा चौराहे के पास हिंदू परिवार के बच्चों का मुंडन हो रहा था..पास ही मुसलमानों की तकरीर चल रही थी..लाउडस्पीकर बजाने पर विवाद शुरू हो गया. पहले गोली चली और फिर आगजनी….हिंदू – मुसलमान 12 लोग मरे.. कर्फ्यू लगा ..कर्फ्यू हटा तो फिर दंगे हो गए.. ..इसके बाद रुक-रुक कर दंगे होते रहे.इसमें साढ़े तीन सौ लोग मरे जिनमें अधिकांश हिंदू थे….हिन्दुओं की स्थिति कसाईबाड़े में कैद गाय जैसी थी..
फिर मुस्लिम बस्तियों में घुसी फोर्स…
दंगे न रुकने, हिंदुओं की लगातार हत्याओं पर 19 मई को फिर कर्फ्यू लगा.. 60 हजार पुलिसकर्मियों के साथ पीएसी की 11 कंपनियां लगी.. इसके बाद भी दंगे न रुकने पर 23 मई 1987 को दोपहर 12 बजे पुलिस और पीएसी ने अचानक मलियाना की मुस्लिम आबादी चारों ओर से घेरनी शुरु की. घेराबंदी ढाई बजे ख़त्म हुई… पूरा इलाक़ा घेर पुलिस और पीएसी ने सर्चिंग शुरू की ,,गोली –बम चलने लगे… पुलिस और पीएसी ढाई घंटे फायरिंग करती रही. इस फायरिंग में 73 लोग मारे गए,..ये सभी मुस्लिम थे. सौ से ज़्यादा घर जलाए गए..मलियाना मामला भी अदालत पहुंचा.. 36 साल बाद 2023 में मलियाना नरसंहार का भी फैसला आया जिसमें 93 आरोपितों में से 39 छोड दिये गये..बाकी आरोपितों की सुनवाई में ही मौत हो गई थी..।
चिदम्बरम् पर आरोप, वीर बहादुर की कुर्सी गई..
वीर बहादुर सिंह और राजीव गांधी
हाशिमपुरा और मलियाना के दंगे राजीव गांधी के बाबरी मस्जिद का ताला खोलने के फैसले के बाद हुए.. आरोप लगे कि ज़ब मुसलमानों ने अति कर दी तो उन्हें सबक सिखाने को तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री पी चिदंबरम ने कहा लेकिन गाज गिरी मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह पर.. उनका त्यागपत्र ले लिया गया…..हालांकि ये माना जाता है कि दंगाइयों को सबक सिखाने का फैसला न चिदंबरम ने लिया न वीर बहादुर सिंह ने . ये फैसला पीएसी के जवानों का था।

