मुरादाबाद 2011 दंगे: मंजूर से परवेज तक,16 दंगाईयों को आजीवन कारावास
300 तारीखें, 22 गवाह और 12 साल की कानूनी लड़ाई: मुरादाबाद का मैनाठेर कांड, जिसमें दोषियों को मिली उम्रकैद
मुरादाबाद की अदालत ने 2011 के मैनाठेर बलवा प्रकरण में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 16 दोषियों को आजीवन कारावास और 55-55 हजार रुपए अर्थदण्ड की सजा सुनाई है. तत्कालीन डीआईजी पर जानलेवा हमले और पुलिस टीम के साथ हिंसा के इस मामले में 15 साल बाद न्याय मिला. ठोस साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने यह कड़ा निर्णय लिया/
मैनाठेर कांड क दोषी कोर्ट से बाहर निकलते हुए (Photo- ITG)
मुरादाबाद ,30 मार्च 2026,मुरादाबाद के चर्चित मैनाठेर बलवा प्रकरण में करीब 15 साल बाद अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए 16 दोषियों को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा सुनाई है. यह फैसला एडीजे-2 कृष्ण कुमार सिंह की अदालत ने सुनाया. फैसले को लेकर कोर्ट परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे. भारी पुलिस बल और RAF की तैनाती की गई, जबकि एसपी सिटी कुमार रणविजय सिंह खुद मौके पर मौजूद रहकर सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी करते दिखे।
बता दें कि यह मामला 6 जुलाई 2011 का है, जब मैनाठेर थाना क्षेत्र के असालतनगर बघा गांव में छेड़छाड़ के एक आरोपित को पकड़ने गई पुलिस टीम पर ग्रामीणों ने हमला कर दिया था. देखते ही देखते स्थिति बेकाबू हो गई और हिंसक भीड़ ने मुरादाबाद-संभल मार्ग जाम कर दिया. हालात को काबू में करने पहुंचे तत्कालीन डीआईजी अशोक कुमार सिंह को भीड़ ने घेर लिया और लाठी-डंडों से बेरहमी से पीटा. उनकी पिस्टल छीन ली गई और फायरिंग में उन्हें गोली भी लगी. इस हिंसा में 18 पुलिसकर्मी घायल हुए और पुलिस चौकी व सरकारी संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुंचाया गया था.
मामले में शुरुआत में 33 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था, जिनमें से 25 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई. सुनवाई के दौरान 3 आरोपितों की मौत हो चुकी है, जबकि 6 नाबालिगों का मामला किशोर न्यायालय में विचाराधीन है. लंबी सुनवाई के बाद 23 मार्च को अदालत ने 16 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा पर फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सुनाया गया है।
कोर्ट के आदेश पर सभी प्रपत्रों की जांच की गई और इनके मेडिकल भी हुए जिसमें तीन आरोपित मैनाठेर के असदपुर निवासी मौहम्मद मुजीब, उसका भाई तहजीब आलम और मैनाठेर के मिलक नवाब निवासी जाने आलम व्यस्क निकले। इनके कोर्ट में दिये प्रपत्र झूठे हैं। इसके बाद तीनों की फाइल 10 जुलाई 2013 को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में भेजी गई थी।
अदालत ने मंजूर अहमद, मोहम्मद अली, हाशिम, मोहम्मद कमरुल, मोहम्मद मुजीफ, मोहम्मद यूनुस, रिजवान, अम्बरीश, कासिम, मोबीन, मोहम्मद मुजीब, तहजीब आलम, जाने आलम, फिरोज, नाजिम और परवेज आलम को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई. इस केस की सुनवाई करीब 12 साल तक चली, जिसमें 300 से ज्यादा तारीखें पड़ीं.
अभियोजन पक्ष ने 22 गवाह अदालत में पेश किए, जिनकी गवाही से घटना की पूरी सच्चाई सामने आई. इसके अलावा 26 प्रपत्र साक्ष्य और 18 वस्तु साक्ष्य भी कोर्ट में प्रस्तुत किए गए.
वस्तु साक्ष्यों में बॉडी प्रोटेक्टर, जूते, सीटी की डोरी, सोल्डर फ्लैप, कॉलर बैंड, पेन, नेम प्लेट, पुलिस कलर, ईंट-रोड़े से भरी थैली, पिस्टल की डोरी और पुलिसकर्मियों के कपड़े शामिल थे. साथ ही पुलिस की क्षतिग्रस्त गाड़ियों के फोटो भी साक्ष्य के तौर पर पेश किए गए.
मजबूत चार्जशीट, ठोस साक्ष्य, गवाहों की सटीक गवाही और प्रभावी पैरवी के आधार पर अदालत ने 47 पन्नों के विस्तृत फैसले में सभी 16 दोषियों को आजीवन कारावास सुनाया. इस फैसले को कानून व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें लंबे समय बाद पीड़ित पक्ष को न्याय मिला है.
Ruined Their Lives After Being Provoked; 16 to Spend a Lifetime in Jail
उकसावे में आकर बर्बाद कर ली जिंदगी, कोर्ट बोला- कोई नरमी नहींं
मैनाठेर बवाल में 16 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुन परिजनों में खामोशी छा गई। कई ग्रामीणों ने बताया कि उकसावे मेॅ युवा बवाली बन गए थे। अब उन्हें जीवन भर जेल में रहना होगा।
मैनाठेर बवाल में 16 दोषियों को उम्रकैद की सजा की जानकारी ने बेरहम हमले के शिकार आईपीएस अशोक कुमार सिंह, उनके पीआरओ रहे रवि कुमार समेत पीडितों ने राहत की सांस ली है लेकिन गांव असालतपुरा बघा के उन तमाम घरों में मातम है, जिनके परिजनों को सजा सुनाई गई है।
शनिवार शाम से देर रात तक गांव में इसी मामले की चर्चा होती रही। ग्रामीण स्वीकार कर रहे थे कि कुछ लोगों के जरा से उकसावे ने दर्जनों युवाओं को बवाली बना दिया था। सियासी स्वार्थों के लिए सुलगाई गई चिंगारी इतने भयानक शोले में तब्दील हुई कि जिस की आग से कई परिवार आज तक झुलस रहे हैं।
डीआईजी पर हमला करने के आरोपी
ग्रामीणों में इस बात का मलाल भी है कि जिन नेताओं के बहकावे में आकर ग्रामीणों ने आपा खोया, वे बाद में न किसी का हाल जानने पहुंचे, न ही पैराकारी में मददगार बने। बवाल के बाद के मुकदमों के कारण भागदौड़ से लेकर उस पर होने वाले खर्च को भी ग्रामीणों ने अकेले ही झेला। अपनों को बचाने की पैरवी में कई ग्रामीणों को मकान और जमीन और घर तक बेचने पड़ गए थे। मुकदमों की जद में आने वाले रोजगार से दूर हो गए।
डीआईजी पर हमला करने के आरोपित
अदालत से मामले की सजा सुनाई जाते ही कचहरी में मौजूद कई ग्रामीणों की आंखें छलक आईं तो असालतपुरा बघा में रातभर जागते लोग उन परिवारों के हालात पर चिंता जताते रहे, जिनके घर में एक ही कमाने वाला था और वह घर का मददगार बनने की बजाय जेल में आजीवन सजा काटेगा।
डीआईजी पर हमला करने के आरोपित
बहुचर्चित मैनाठेर कांड में अदालत ने कड़ा रुख अपनाया और कहा कि पुलिस चौकी और पीएसी की गाड़ियां जलाना तथा तत्कालीन डीआईजी पर जानलेवा फायरिंग कानून व्यवस्था को खुली चुनौती है। पुलिसकर्मियों से मारपीट को भी अदालत ने गंभीर अपराध माना। फैसले में साफ कहा गया कि ऐसे मामलों में दोषियों के प्रति नरमी की कोई गुंजाइश नहीं है।
डीआईजी पर हमला करने के आरोपित
शनिवार को सजा सुनाए जाने से पहले अभियुक्तों के वकीलों ने अदालत से कम सजा देने की अपील की कि कई आरोपित बेहद गरीब हैं उनके छोटे-छोटे बच्चे हैं और घर में कमाने वाला कोई दूसरा नहीं है। कमरुल और जाने आलम के वकील ने बताया कि जाने आलम पांच बच्चों का पिता है और उसके माता-पिता भी नहीं हैं। जबकि कमरुल के परिवार की आर्थिक स्थिति भी कमजोर है। दो सगे भाईयों की दो बहनों की 10 दिन बाद शादी है।
मैनाठेर कांड में सजा का एलान होते ही रो पड़े परिजन
कुछ अन्य आरोपियों के वकीलों ने यह भी कहा कि कुछ आरोपत बीमार हैं, कुछ पहले ही जेल में समय काट चुके हैं और उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। वहीं सरकार की ओर से एडीजीसी ब्रजराज सिंह ने अदालत को बताया कि आरोपितों ने मिलकर गंभीर हिंसा की थी। इसी में तत्कालीन डीआईजी अशोक कुमार सिंह और उनके पीआरओ रवि कुमार गंभीर घायल हुए।
मैनाठेर कांड के दोषियों को सुनाई गई सजा
पुलिस चौकी और पीएसी की गाड़ियों में आग लगा दी गई, डीआईजी की पिस्टल और पीआरओ का मोबाइल लूट लिया गया । जिलाधिकारी की गाड़ी भी तोड़ी गई। दोनों पक्षों की तर्क सुनने और प्रमाण देखने के बाद अदालत ने कहा कि आरोपितों के कृत्य से पूरे क्षेत्र में डर का वातावरण बन गया था। अदालत ने साफ कहा कि अपराध की गंभीरता देख यह मामला नरमी का नहीं, बल्कि कड़ी सजा देने का है।
कोर्ट परिसर में रो पड़े परिजन
इसके बाद अदालत ने सभी 16 दोषियों को दंगा, हत्या के प्रयास, आगजनी, डकैती, सरकारी कर्मचारियों पर हमला और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे मामलों में दोषी ठहराते हुए अलग-अलग अवधि की सजा और अर्थदण्ड लगाया। आगजनी और डकैती जैसे गंभीर मामलों में सभी दोषियों को आजीवन कारावास सुनाया गया।
कोर्ट परिसर में खड़े परिजन –
डींगरपुर के तत्कालीन प्रधान ने कराया था डीआईजी पर हमला
तत्कालीन डीआईजी अशोक कुमार सिंह पर हमलावर भीड़ का नेतृत्व डींगरपुर का तत्कालीन प्रधान कामिल कर रहा था। उसने ही पहले पीएसी वाहन में आग लगवाई और फिर तत्कालीन डीआईजी पर हमला किया। पुलिस ने जिन 25 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी उसमें प्रधान को मुख्य आरोपित बनाया था लेकिन सुनवाई में ही वह दिवंगत हो चुका।
शनिवार को अदालत ने इस चर्चित मामले में 47 पेज का फैसला सुनाया। डीआईजी के पीआरओ के बयानों में बताया गया कि छह जुलाई 2011 की दोपहर मैनाठेर क्षेत्र में जाम लगाकर प्रदर्शन किए जाने की सूचना पर डीआईजी ने फोर्स भेजी थी। इसके बाद डीआईजी डीएम के साथ वहीं जा रहे थे। अभी डींगर पुर चौराहे पर ही पहुंचे थे कि भीड़ इकट्ठा हो गई।
मैनाठेर कांड में सजा सुनाए जाने से पहले कोर्ट परिसर की सुरक्षा कड़ी की गई
भीड का नेता डींगरपुर का प्रधान कामिल था। उसने पीएसी वाहन में आग लगवा दी। डीआईजी गाड़ी से उतरकर समझाने गये तो भीड़ ने हमला कर दिया। वह अपनी जान बचाने पेट्रोल पंप भागे तो भीड़ पीछा करते पेट्रोल पंप तक पहुंच गई थी।
कोर्ट परिसर में खड़े परिजन –
डीआईजी ने अपनी और पीआरओ की जान बचाने को अपनी सर्विस पिस्टल से फायर किये लेकिन भीड़ ने ईंट-पत्थर मारकर उनकी पिस्टल हाथ से गिरा दी। तब पीआरओ ने पिस्टल उठा फायर किए। काफी देर तक हमला होता रहा। आस-पास के जिलों से फोर्स आई तो कामिल समेत 25 लोग दबोच गये, आठ लोग भाग गए थे।
—TOPICS:
उत्तर प्रदेश पुलिस
क्राइम


