पुलिस इंस्पेक्टर महबूब मुजावर ने बताया- डॉ.मोहन भागवत को भी ‘उठाने’ के थे आदेश
RSS प्रमुख मोहन भागवत को भी पकड़ने का आदेश… मालेगांव पर फैसले के बाद पूर्व ATS अफसर
महबूब मुजावर ने कहा कि मोहन भागवत जैसी बड़ी हस्ती को पकड़ना मेरी क्षमता से परे था. चूंकि मैंने इन आदेशों का पालन नहीं किया इसलिए मेरे खिलाफ झूठा मामला दर्ज किया गया.
समरजीत सिंह
अगस्त 01, 2025 । मालेगांव धमाके के सभी सात आरोपियों को मुंबई की विशेष अदालत ने पर्याप्त सबूतों के अभाव में बरी किया है.महबूब मुजावर ने बताया कि उन्हें RSS प्रमुख मोहन भागवत को गिरफ्तार करने का दबाव और आदेश मिला था.मुजावर ने भगवा आतंकवाद की थ्योरी को पूरी तरह झूठा बताया है. उन्होंने कहा कि ये थ्योरी ही गलत थी.
मालेगांव में हुए धमाके को लेकर मुंबई की एक विशेष अदालत ने गुरुवार को इस मामले के सभी सात आरोपियों को बरी करने का आदेश जारी किया है. मालेगांव धमाके में बीजेपी की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर भी इस मामले में एक मुख्य आरोपी थीं. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इन सभी आरोपियों के खिलाफ जो भी सबूत पेश किए हैं वो इतने काफी नहीं हैं, जिन्हें आधार मानकर आरोपियों को सजा दी जा सके. कोर्ट का यह फैसला 17 साल के लंबे इंतजार के बाद आया है. अब इस मामले की जांच में शामिल रहे पूर्व ATS अधिकारी महबूब मुजावर ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को लेकर एक बड़ा खुलासा किया है. उन्होंने बताया कि उस दौरान उनके ऊपर RSS प्रमुख मोहन भागवत को गिरफ्तार करने का दबाव था. उन्हें ऐसा करने के लिए बड़े अधिकारियों से आदेश भी मिला था.
उन्होंने बताया है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को गिरफ्तार करने का आदेश उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने दिया था. ये आदेश उन्हें मालेगांव ब्लास्ट केस के प्रमुख जांच अधिकारी परमवीर सिंह ने दिया था. मुजावर ने दावा किया भगवा आतंकवाद की जो थ्योरी थी वो पूरी तरह से झूठी थी. उन्होंने बताया कि इस मामले में मेरे ऊपर कई फर्जी केस भी लगाए. लेकिन बाद में कोर्ट से मैं निर्दोष साबित हुआ.
मुजावर ने आगे कहा कि मैं ये नहीं कह सकता कि एटीएस ने उस समय क्या जांच की और क्यों. लेकिन मुझे राम कलसांगरा, संदीप डांगे, दिलीप पाटीदार और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जैसे लोगों के बारे में कुछ गोपनीय आदेश दिए गए थे. ये सभी आदेश ऐसे नहीं थे कि उनका पालन किया जा सके. मोहन भागवत जैसी बड़ी हस्ती को पकड़ना मेरी क्षमता से परे था. चूंकि मैंने इन आदेशों का पाल नहीं किया इसलिए मेरे खिलाफ झूठा मामला दर्ज किया गया. और इसने मेरे 40 साल के करियर को बर्बाद कर दिया. इस मामले में कोई भगवा आतंकवाद नहीं था, सब कुछ फर्जी था.
सिमी पर था पहले शक
आपको बता दें कि 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के उत्तर में स्थित मालेगांव शहर में एक जबरदस्त धमाका हुआ. शुरू में एटीएस को शक था कि इसमें स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) जैसे प्रतिबंधित मुस्लिम संगठनों का हाथ हो सकता है, क्योंकि पहले हुए धमाकों में पाकिस्तान समर्थित और देशी मुस्लिम आतंकी संगठनों की भूमिका सामने आ चुकी थी. लेकिन एटीएस के तत्कालीन प्रमुख, दिवंगत आईपीएस अधिकारी हेमंत करकरे के नेतृत्व में हुई जांच ने देश को चौंका दिया. बाद में जांच में सामने आया कि मालेगांव ब्लास्ट में शामिल सभी आरोपी हिंदू थे और इसे “भगवा आतंकवाद” का मामला बताया गया.
कोर्ट में रो पड़ीं साध्वी तो वकील ने कही ये बात
मालेगांव ब्लास्ट केस में गुरुवार को जब NIA स्पेशल कोर्ट ने फैसला सुनाया, तब कोर्टरूम खचाखच भरा हुआ था. फैसले के लिए 11 बजे का वक्त तय था, लेकिन सभी आरोपी 10 बजे से ही कोर्ट में आना शुरू हो गए थे. केस की मुख्य आरोपी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की बुलाहट हुई. वो विटनेस बॉक्स में पहुंचीं और जिस वक्त जज एके लाहोटी फैसला पढ़ रहे थे, वो वहीं मौजूद रहीं. पूरे ऑर्डर को सुनती रहीं. कोर्ट में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर अपनी बात रखते हुए रो पड़ीं. जब उनके वकील जेपी मिश्रा से पूछा गया कि साध्वी रोईं क्यों? इसके जवाब में उन्होंने जो कहानी सुनाई, वो बहुत दर्दनाक थी.
मुस्लिम ATS अधिकारी का दावा-(दैनिक भास्कर की संध्या द्विवेदी ने लिया मुजावर का साक्षात्कार

RSS को खत्म करने, भगवा आतंकवाद को पूरी दुनिया में स्थापित करने का खतरनाक षड्यंत्र था मालेगांव ब्लास्ट
‘साजिश बहुत गहरी थी, अगर ये कामयाब हो जाते तो RSS खत्म हो जाती। मुझे डिप्यूटेशन में लाए ही इसलिए थे क्योंकि मोहन भागवत को उठाना था, और ये काम उन्हें मुस्लिम अधिकारी से कराना था। मैंने कहा भी कि पूछताछ करनी है तो समन भेज दो, वो आ जाएंगे। लेकिन मेरे अधिकारियों ने कहा-‘अपना काम करो, भागवत को नागपुर से उठाकर लाओ।’
आपसे ये कहा किसने- जवाब मिला- ‘बॉस, परमबीर सिंह मेरे बॉस थे और उनके बॉस हेमंत करकरे।’
महाराष्ट्र में एटीएस अधिकारी रहे महबूब मुजावर ने मालेगांव जांच के उस हिस्से की कहानी हमें सुनाई जिसमें वे शामिल थे। ऑन द रिकॉर्ड जो बोले उससे कहीं ज्यादा ऑफ द रिकॉर्ड, जिसे स्टोरी में लिखना मुमकिन नहीं था। लेकिन एक बात तय है, मालेगांव ब्लास्ट की जांच एक भयंकर ‘षड्यंत्र’ था, जो अगर सफल होता तो भगवा आतंकवाद, पूरी दुनिया की डिक्शनरी में शामिल हो चुका होता।
उससे भी खतरनाक कहानी, RSS प्रचारक संदीप डांगे, कार्यकर्ता रामजी कलसांग्रे के गायब होने की बताई। पुलिस रिकॉर्ड में आज भी वो एब्सकॉन्डिंग हैं। मुजावर कहते हैं,- ‘ये कहां गए? मैं कहता हूं, ये जिंदा नहीं हैं। जांच अभी खुली है, पता लगाना चाहिए कि ये लोग कहां गए।’ मैंने कई बार पूछा उन्हें किसने मारा? मुजावर बस यही कहते रहे, यही तो पता लगाना चाहिए। जांच होनी चाहिए।
कैमरा बंद कर मैंने फिर पूछा किसने मारा, कैसे मारा? जो जवाब मिला, वो खतरनाक था, उससे भी खतरनाक था उन्हें मारने का तरीका। यहां इससे ज्यादा कुछ भी लिखना ठीक नहीं।
अगर ये सच है तो क्रूरता की इंतेहा थी। मुजावर कहते हैं, तीसरा एक और इनके साथ था। जिसने केवल इसलिए इन दोनों के साथ 15 दिन गैरकानूनी हिरासत भोगी और जान गंवा दी, क्योंकि वो रामजी का भाड़ेदार (किरायदार) था। उसका RSS से कोई संबंध नहीं था। एकदम निर्दोष व्यक्ति को मार दिया।
मुजावर की आंखें कई बार भर आईं। उनकी आंखों में दुख के साथ एक अपराध बोध भी था। ये बोध शायद इसलिए क्योंकि सबकुछ उनकी आंखों के सामने हो रहा था और उस वक्त वो मौन थे। वो बार बार इस अपराध बोध को ये कहते हुए कम कर रहे थे कि मैं उस वक्त नौकरी में था। मेरे ऊपर बहुत बड़े अधिकारी थी।
हां, लेकिन मैंने भागवत को नहीं पकड़ा क्योंकि मुझे पता था कि वो निरअपराध हैं. मैंने पूछा निरअपराध तो ये तीनों भी थे। फिर उनकी हत्या पर सवाल उसी वक्त क्यों नहीं खड़ा किया? जवाब धीरे से मिला-‘मैडम मैं तो एक छोटा सा कर्मचारी थी, नौकरी में था।’
उन्होंने कहा-600 किग्रा. RDX के तार RSS से जोड़े जाने थे। ये भी एफिडेविट में लिखा है। मैंने पूछा संदीप डांगे के खिलाफ पूछताछ में कोई तार मिला जो ब्लास्ट से जुड़ता हो? जवाब था-एक भी नहीं।
मैं समझ गया था कि ये एक गहरी साजिश है। मैंने कई बार कहा, मुझे वापस भेज दीजिए सर। मैं ये नहीं कर पाऊंगा। हर बार बस यही जवाब मिला-‘अपना काम करो।’ आखिरकार मैंने भागवत को नहीं उठाया और मेरे ऊपर कई केस डाल दिए गए। नतीजा ये हुआ कि मेरा प्रमोशन रोक दिया गया और पेंशन जो आज 70-80हजार होनी चाहिए थी वो महज 10,000 है।
चलते चलते उन्होंने कहा, ‘ जो मेरे नसीब का था मुझे मिला, लेकिन उस वक्त अल्लाह ने इतनी बुद्धि दी कि मैंने भागवत को नहीं उठाया। अगर वो कर देता तो गुनाह हो जाता।

