शिमला: बाल अपहरण,करोडों की फिरौती,हत्या,पिता की सुको में अपील
शिमला के एक रईस कपड़ा कारोबारी का 4 साल का बेटा, युग, अचानक अपने घर के बाहर से गायब हो जाता है। घर वाले और पुलिस तलाश में जुट जाते हैं, लेकिन कोई सुराग नहीं मिलता।
अपहरण के ठीक 13वें दिन, जब युग का जन्मदिन था, उसके घर के बाहर एक लिफाफा मिलता है। जब घर वालों ने उसे खोला तो उसमें युग के कपड़े और एक नोट था। नोट में बच्चे को सही-सलामत छोड़ने के बदले 4 करोड़ रुपये की फिरौती मांगी गई थी और पुलिस को बताने पर जान से मारने की धमकी दी गई थी। इसके बाद किडनैपर्स ने तीन और चिट्ठियां भेजीं और फिरौती की रकम बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये तक कर दी। घर वाले पैसे देने को तैयार थे और बताए गए पते पर भी गए, लेकिन कोई भी पैसे लेने नहीं आया।
युग के गायब होने के कुछ महीनों बाद शिमला के एक खास इलाके में अचानक भयानक तरीके से पीलिया फैल गया। दूषित पानी पीने की वजह से धीरे-धीरे हालत इतनी खराब हो गई कि शहर के लगभग 11 लोगों की मौत हो गई। नगर निगम के अफसरों ने दावा किया कि वे पानी की टंकियों की लगातार सफाई कर रहे हैं
अपहरण के करीब 2 साल बाद, चंडीगढ़ पुलिस चोरी में विक्रांत बख्शी को गिरफ्तार करती है। जब पुलिस विक्रांत का मोबाइल फोन खंगालती है, तो उसमें एक ऐसा वीडियो मिलता है जिसे देखकर पुलिस के होश उड़ जाते हैं। वीडियो में गायब हुआ मासूम युग रोते हुए अपने पिता से बचाने की भीख मांग रहा था। वह कह रहा था कि उसे एक बेड बॉक्स में बंद करके रखा गया है, खाना नहीं देते और पानी मांगने पर जबरन शराब पिलाते हैं।
पुलिस ने विक्रांत से कठोरता की, तो उसने चंद्र शर्मा और तेजिंदर सिंह का नाम लिया। पुलिस ने चंद्र शर्मा को उठाया तो हैरान रह गई। चंद्र शर्मा कोई और नहीं, बल्कि युग का पड़ोसी और पूरे षड्यंत्र का मास्टरमाइंड था। वह खुद को ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट बता हमदर्दी जताता लगातार युग के परिवार और पुलिस के साथ घूम रहा था।उसे पुलिस की हर जांच और हर कदम की खबर रही।
तीसरे आरोपित तेजिंदर सिंह ने माना कि युग अब इस दुनिया में नहीं है। वह पुलिस को शिमला में नगर निगम की एक बहुत बड़ी पानी की टंकी के पास ले गया। उसने बताया कि अपहरण के 13वें दिन ही उन्होंने युग के हाथ-पैर बांधे, उसके शरीर पर एक भारी पत्थर लटकाया और उसे इस पानी की टंकी में जिंदा फेंक दिया था। पुलिस ने जब टंकी की तलाशी ली, तो वहां से एक बच्चे का कंकाल मिला, जिसका डीएनए युग के परिवार से मैच हो गया।
यह वही पानी की टंकी थी जिससे इलाके के 2,200 घरों के 25,000 लोग पानी पीते थे। सबसे दर्दनाक यह कि युग का परिवार भी इसी टंकी का पानी पी रहा था। इसी टंकी में 2 साल शव पड़े रहने से पूरे इलाके में पीलिया फैला और 11 मौतें हुई । नगर निगम के सफाई के दावों की पोल खुल गई कि टंकियां साफ हो रही थीं, तो 2 साल किसी को शव क्यों नहीं दिखा।
निचली अदालत का फैसला: शिमला ट्रायल कोर्ट ने मामला बेहद क्रूर मान तीनों आरोपितों (चंद्र शर्मा, विक्रांत बख्शी और तेजिंदर सिंह) को फांसी की सजा सुनाई। कोर्ट रूम में लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया।
हाई कोर्ट का चौकाऊ फैसला: लेकिन 8 साल बाद हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया जिससे हर कोई हैरान रह गया। तेजिंदर सिंह को निर्दोष छोड दिया गया क्योंकि उसने लाश ढूंढने में पुलिस की मदद की थी। मुख्य आरोपित चंद्र शर्मा और विक्रांत बख्शी की फांसी घटाकर आजीवन कारावास कर दी।
हाई कोर्ट ने तर्क दिया कि जेल में इन अपराधियों का व्यवहार बहुत अच्छा रहा और हर अपराधी को सुधरने का मौका चाहिए। कुछ तकनीकी कमियों जैसे—मोबाइल की एकदम सटीक लोकेशन न होना, फिरौती की चिट्ठी की लिखावट पूरी तरह स्पष्ट न होना और लाश का डाइटम टेस्ट साफ न होने से अदालत ने उन्हें ‘बेनिफिट ऑफ डाउट’ (संदेह का लाभ) दिया। कोर्ट के अनुसार मामला दुर्लभ से दुर्लभतम की श्रेणी में नहीं आता। युग के माता-पिता और लोग बेहद निराश हुए। ये है भारत का कानून शर्म आती है ।। सच में कानून अंधा है ।।
कुमार आशीष फेसबुक पर 
मामला शिमला के प्रसिद्ध युग गुप्ता हत्याकांड (2014) से जुड़ा है, जिसमें एक 4 साल के मासूम बच्चे का अपहरण कर उसकी हत्या कर दी गई थी और शव को पानी की टंकी में छुपाया गया था।
घटनाक्रम और मुख्य बातें
अबोध का अपहरण: 14 जून 2014 को शिमला के व्यस्त राम बाजार इलाके से 4 वर्षीय युग गुप्ता का अपहरण हुआ था।
फिरौती मांगी: अपहरणकर्ताओं ने युग के व्यवसायी पिता विनोद गुप्ता से ₹3.6 करोड़ की फिरौती की मांग को कई पत्र भेजे थे।
अमानवीय यातनाएं: जांच में आया कि आरोपितों ने अबोध को किराये के फ्लैट में बंधक रख उसे बुरी तरह प्रताड़ित किया , भूखा रखा,बेहोश रखने को जबरन शराब पिलाई ।
टंकी में फेंका: अपहरण के हफ्ते बाद 21 जून 2014 को आरोपितों ने बच्चे को भारी पत्थर बांधकर शिमला नगर निगम की केल्स्टन पानी टंकी में जिंदा फेंक दिया ।
2 साल बाद मिला शव : अगस्त 2016 में, मामला सीआईडी (CID) को गया, तब आरोपितों की गिरफ्तारी हुई। उनके बताये पानी की टंकी से बच्चे के कंकाल के अवशेष ढूंढे गए, जिसने पूरा शिमला शहर हिलाकर रख दिया ।
अदालती फैसला और वर्तमान स्थिति
निचली अदालत का फैसला (2018): शिमला की सत्र अदालत ने मामला “दुर्लभ से दुर्लभतम” (Rarest of Rare) मान तीनों मुख्य आरोपियों—चंदर शर्मा, तजेंद्र सिंह और विक्रांत बख्शी को मौत की सजा सुनाई ।
हाईकोर्ट का फैसला (September 2025): हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में इस मामले पर बड़ा फैसला : मुख्य आरोपित चंदर शर्मा और विक्रांत बख्शी की मौत की सजा आजीवन कारावास (उम्रकैद) में बदल गई, अपनी आखिरी सांस तक जेल में ।
तीसरा आरोपित तजेंद्र सिंह सबूतों के अभाव का लाभ दे छोड (Acquit) दिया गया।
युग गुप्ता हत्याकांड में सीआईडी (CID) की वैज्ञानिक जांच और हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के कानूनी फैसले से जुड़े मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
🕵️♂️ सीआईडी (CID) जांच की मुख्य बातें (Key Investigation Points)
अगस्त 2014 में स्थानीय पुलिस से केस वापस लेकर जब राज्य सीआईडी (क्राइम ब्रांच) को सौंपा गया, तो उन्होंने वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर ब्लाइंड मर्डर मिस्ट्री खोली:
अपहरण का षड्यंत्र: मुख्य आरोपित चंदर शर्मा (युग का पड़ोसी) ने बच्चे को चॉकलेट का लालच देकर अगवा किया। उसने अबोध को सह-आरोपित तजेंद्र सिंह के गोदाम और फिर राम चंद्र चौक किराए के फ्लैट में छुपाया।
डिलीट किए गए क्रूरता के वीडियो: सीआईडी ने आरोपितों के मोबाइल फोन ढूंढ फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स से डिलीट किए गए वीडियो क्लिप्स रीस्टोर (Restore) कराये। वीडियो में अबोध युग के हाथ बंधे थे और मुंह बंद था, जो उसकी प्रताड़ना का सबसे बड़ा सबूत बने।
फिरौती के 4 पत्र: आरोपितों ने युग के पिता विनोद गुप्ता से ₹3.6 करोड़ की फिरौती को 4 पत्र भेजे थे। सीआईडी ने इन पत्रों की हैंडराइटिंग का मिलान आरोपितों के हस्तलेख से करवाया।
हड्डियों और कपड़ों की बरामदगी: आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद उनकी निशानदेही पर केल्स्टन स्थित पानी की टंकी से और उसके आसपास सीढ़ी के नीचे से खोपड़ी के टुकड़े, हड्डियां और भारी कंक्रीट स्लैब (जिससे बच्चे को बांधा गया था) बरामद किए गए।
डीएनए (DNA) और फोरेंसिक रिपोर्ट: स्टेट फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (SFSL), जुन्गा डीएनए रिपोर्ट ने पुष्टि की कि बरामद कंकाल के अवशेष युग गुप्ता के ही थे।
⚖️ हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले की मुख्य बातें (September 2025)
न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की विशेष खंडपीठ ने Indian Kanoon के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार सत्र न्यायालय (Trial Court) द्वारा दी गई फांसी की सजा को बदल दिया:
धाराओं में बदलाव: हाईकोर्ट ने अपने आदेश में आरोपितों को आईपीसी की धारा 347 (उगाही को बंधक बनाना) और 364A (फिरौती को अपहरण) के कुछ आरोपों से तकनीकी रूप से छोड मुख्यत: हत्या (धारा 302) और आपराधिक षड्यंत्र (120B) में सजा यथावत रखी।
🔄 वर्तमान अपडेट
फैसले से असंतुष्ट पीड़ित परिवार और हिमाचल प्रदेश सरकार ने दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की । याचिका स्वीकार हो गई है और जल्द ही अंतिम सुनवाई की उम्मीद है।
मामले के कुछ और महत्वपूर्ण पक्ष हैं जो युग गुप्ता को न्याय दिलाने की कानूनी लड़ाई आगे बढ़ा रहे हैं:
🏛️ सुप्रीम कोर्ट में अपील का मौजूदा स्टेटस
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक आरोपित मुक्त कर दो मुख्य आरोपितों की फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदलने से पूरा शिमला और पीड़ित परिवार स्तब्ध था।
विशेष अनुमति याचिका (SLP): पीड़ित पिता विनोद गुप्ता और हिमाचल प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
मुख्य तर्क: सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि 4 वर्षीय अबोध को जिंदा पानी की टंकी में पत्थर बांधकर फेंकना अत्यंत क्रूर, बर्बर और अमानवीय कृत्य है। इसलिए आरोपितों को निचली अदालत की फांसी की सजा ही यथावत की जानी चाहिए।
🚰 शिमला नगर निगम की लापरवाही पर कार्रवाई
मामले ने शिमला शहर के प्रशासन और नगर निगम (MC Shimla) पर भी बड़े सवाल खड़े किए थे:
2 साल तक दूषित पानी: सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि जिस केल्स्टन पानी की टंकी में बच्चे का शव फेंका गया था, उसी टंकी से करीब दो साल तक शिमला के आधे से ज्यादा हिस्से (विशेषकर संजौली और छोटा शिमला) को पीने के पानी की आपूर्त हो रही थी।
सुरक्षा में चूक: नगर निगम के नियमों के अनुसार पीने के पानी की टंकियों को नियमित अंतराल पर साफ करना और उन्हें हमेशा लॉक रखना अनिवार्य होता है। लेकिन इस टंकी का ताला टूटा हुआ था जिसकी सफाई नहीं की गई थी।
अदालती फटकार: जांच में कोर्ट ने नगर निगम अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई थी, तब शहर की सभी पानी की टंकियों की सुरक्षा बढ़ा उन पर कड़े पहरे (Locks & सील) लगाने के कठोर आदेश हुए थे।
मामला शिमला के प्रसिद्ध युग गुप्ता हत्याकांड (2014) से जुड़ा है, जिसमें एक 4 वर्षीय अबोध बच्चे का अपहरण कर उसकी हत्या कर दी गई थी और शव पानी की टंकी में छुपाया गया था।
अबोध का अपहरण: 14 जून 2014 को शिमला के व्यस्त राम बाजार से 4 वर्षीय युग गुप्ता का अपहरण कर लिया गया था।
फिरौती मांगी: अपहरणकर्ताओं ने युग के व्यवसायी पिता विनोद गुप्ता से ₹3.6 करोड़ फिरौती की मांग को कई पत्र भेजे थे।
अमानवीय यातनाएं: जांच में आया कि आरोपितों ने मासूम को एक किराये के फ्लैट में बंधक बना रखा था। उसे बुरी तरह प्रताड़ित किया, भूखा रखा और बेहोश रखने को जबरन शराब पिलाई गई।
टंकी में फेंकना: अपहरण एक हफ्ते बाद (21 जून 2014 को), आरोपित ने बच्चे को भारी पत्थर से बांधकर शिमला नगर निगम की केल्स्टन पानी की टंकी में जिंदा फेंक दिया ।
2 साल बाद मिला शव : अगस्त 2016, जब मामला सीआईडी (CID) को सौंपा गया, तब आरोपित पकड़।गए। उनके बताये पानी की टंकी से बच्चे के कंकाल के अवशेष मिले, जिसने पूरा शिमला शहर हिलाकर रख दिया था।
निचली अदालत का फैसला (2018): शिमला की सत्र अदालत ने मामला “दुर्लभ से दुर्लभतम” (Rarest of Rare) मान तीनों मुख्य आरोपितों —चंदर शर्मा, तजेंद्र सिंह और विक्रांत बख्शी को मौत की सजा सुनाई ।
हाईकोर्ट का फैसला (September 2025): हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में मामले में चौकाऊ फैसला सुनाया:
मुख्य आरोपित चंदर शर्मा और विक्रांत बख्शी की मौत की सजा आजीवन कारावास कर दी गयी, वे अपनी आखिरी सांस तक जेल में रहेंगे।
तीसरे आरोपित तजेंद्र सिंह को सबूतों के अभाव का लाभ देते हुए छोड (Acquit) दिया गया।
जन आक्रोश: हाईकोर्ट के सजा घटाने और एक आरोपित को छोडने के बाद शिमला में लोगों ने आंखों पर काली पट्टी बांधकर कड़ा विरोध प्रदर्शन किया। पीड़ित परिवार ने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
शिमला के 4 वर्षीय बच्चे की हत्या के तीनों आरोपियों को दोषी पाया गया।
अनुवाद किया गया — शिमला के 4 वर्षीय बच्चे की हत्या के तीनों आरोपियों को दोषी पाया गया। बच्चे को यातनाएं दी गईं, भूखा रखा गया और जबरन शराब पिलाई गई।
कानूनी फैसलों की विस्तृत कॉपी या सीआईडी (CID) जांच की मुख्य बातें
शिमला के बहुचर्चित युग गुप्ता हत्याकांड में सीआईडी (CID) की वैज्ञानिक जांच और हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के कानूनी फैसले से जुड़े मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
🕵️♂️ सीआईडी (CID) जांच की मुख्य बातें (Key Investigation Points)
अगस्त 2014 में स्थानीय पुलिस से केस वापस लेकर जब राज्य सीआईडी (क्राइम ब्रांच) को सौंपा गया, तो उन्होंने वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर इस ब्लाइंड मर्डर मिस्ट्री का खुलासा किया:
अपहरण का षड्यंत्र: मुख्य आरोपित चंदर शर्मा (युग का पड़ोसी) ने बच्चे को चॉकलेट का लालच देकर अगवा किया। उसने मासूम को सह-आरोपित तजेंद्र सिंह के गोदाम और फिर राम चंद्र चौक स्थित एक किराए के फ्लैट में छुपाया।
डिलीट किए क्रूर वीडियो: सीआईडी ने आरोपियों के मोबाइल फोन बरामद किए। फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स की मदद से डिलीट किए गए वीडियो क्लिप्स को रीस्टोर (Restore) किया गया। इन वीडियो में मासूम युग के हाथ बंधे हुए थे और मुंह बंद था, जो उसकी प्रताड़ना का सबसे बड़ा सबूत बने।
फिरौती के 4 पत्र: आरोपियों ने युग के पिता विनोद गुप्ता से ₹3.6 करोड़ की फिरौती के लिए कुल 4 पत्र भेजे थे। सीआईडी ने इन पत्रों की हैंडराइटिंग का मिलान आरोपियों के हस्तलेख से करवाया।
हड्डियों और कपड़ों की बरामदगी: आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद उनकी निशानदेही पर केल्स्टन स्थित पानी की टंकी से और उसके आसपास सीढ़ी के नीचे से खोपड़ी के टुकड़े, हड्डियां और भारी कंक्रीट स्लैब (जिससे बच्चे को बांधा गया था) बरामद किए गए।
डीएनए (DNA) और फोरेंसिक रिपोर्ट: स्टेट फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (SFSL), जुन्गा से आई डीएनए रिपोर्ट ने पुष्टि की कि बरामद कंकाल के अवशेष मासूम युग गुप्ता के ही थे।
⚖️ हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले की मुख्य बातें (September 2025)
न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की विशेष खंडपीठ ने Indian Kanoon के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार सत्र न्यायालय (Trial Court) द्वारा दी गई फांसी की सजा को बदल दिया:

धाराओं में बदलाव: हाईकोर्ट ने अपने आदेश में आरोपितों को आईपीसी की धारा 347 (उगाही के लिए बंधक बनाना) और 364A (फिरौती के लिए अपहरण) के कुछ आरोपों से तकनीकी रूप से छोडते हुए मुख्य रूप से हत्या (धारा 302) और आपराधिक षड्यंत्र (120B) में सजा यथावत रखी।
🔄 वर्तमान अपडेट
इस फैसले से असंतुष्ट होकर पीड़ित परिवार और हिमाचल प्रदेश सरकार ने दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है। सर्वोच्च अदालत ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया है और जल्द ही इस पर अंतिम सुनवाई होने की उम्मीद है।
🏛️ सुप्रीम कोर्ट में अपील का मौजूदा स्टेटस
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा एक आरोपी को बरी करने और दो मुख्य आरोपियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने के फैसले से पूरा शिमला और पीड़ित परिवार स्तब्ध था।
विशेष अनुमति याचिका (SLP): पीड़ित पिता विनोद गुप्ता और हिमाचल प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
मुख्य दलील: सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में दलील दी गई है कि 4 साल के मासूम को जिंदा पानी की टंकी में पत्थर बांधकर फेंकना अत्यंत क्रूर, बर्बर और अमानवीय कृत्य है। इसलिए आरोपियों को निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा को ही बहाल किया जाना चाहिए।
🚰 शिमला नगर निगम की लापरवाही पर कार्रवाई
इस मामले ने शिमला शहर के प्रशासनिक महकमे और नगर निगम (MC Shimla) पर भी बड़े सवाल खड़े किए थे:
2 साल तक दूषित पानी: सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि जिस केल्स्टन पानी की टंकी में बच्चे का शव फेंका गया था, उसी टंकी से करीब दो साल तक शिमला के आधे से ज्यादा हिस्से (विशेषकर संजौली और छोटा शिमला) को पीने के पानी की सप्लाई की जा रही थी।
सुरक्षा में चूक: नगर निगम के नियमों के अनुसार पीने के पानी की टंकियों को नियमित अंतराल पर साफ करना और उन्हें हमेशा लॉक रखना अनिवार्य होता है। लेकिन इस टंकी का ताला टूटा हुआ था और इसकी सफाई नहीं की गई थी।
अदालती फटकार: जांच के दौरान कोर्ट ने नगर निगम के अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई थी, जिसके बाद शहर की सभी पानी की टंकियों की सुरक्षा बढ़ाने और उन पर कड़े पहरे (Locks & सील) लगाने के सख्त आदेश जारी किए गए थे।
⚠️ जनता का आक्रोश और ‘कैंडल मार्च’
शिमला बंद और प्रदर्शन: अगस्त 2016 में जब पानी की टंकी से मासूम युग का कंकाल मिला, तो पूरा शिमला शहर उबल पड़ा था। स्थानीय निवासियों, स्कूली बच्चों और व्यापारियों ने स्वतःस्फूर्त होकर शिमला बंद का आह्वान किया था।
क्रूरता के खिलाफ गुस्सा: शहर के माल रोड और रिज मैदान पर ऐतिहासिक कैंडल मार्च निकाले गए थे। लोग इतने गुस्से में थे कि जब आरोपितों को कोर्ट में पेशी के लिए लाया जाता था, तो जनता उन्हें खुद सजा देने को पुलिस वैन पर पथराव कर देती थी।
🏛️ निचली अदालत की कठोर टिप्पणियां (2018)
शिमला के जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह ने The Hindu के अनुसार फैसला सुनाते समय कुछ बेहद कठोर टिप्पणियां की थीं:
मानवता पर कलंक: कोर्ट ने इस कृत्य को समाज और मानवता पर एक बदनुमा कलंक माना था।
विश्वासघात: मुख्य आरोपित चंदर शर्मा युग के परिवार का परिचित और पड़ोसी था। कोर्ट ने कहा कि आरोपित ने अबोध के बाल भरोसे का फायदा उठाकर जो किया, उसके लिए समाज में कोई जगह नहीं है।
क्रूरता की सीमा: कोर्ट ने माना कि बच्चे को फिरौती मांगने से पहले ही मार देना और उसे जिंदा पानी में डुबाना सिद्ध करता है कि आरोपियों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं थी, इसीलिए उन्हें फांसी (Capital Punishment) दी गई।
📝 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का अलग दृष्टिकोण (2025)
हालांकि, सितंबर 2025 में जब यह मामला जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस राकेश कैंथला के पास पहुंचा, तो कानूनी कसौटी पर कोर्ट का नजरिया बदल गया:
तथ्यों और साक्ष्यों का अंतर: हाईकोर्ट ने पाया कि यद्यपि मामला बेहद दुखद था, लेकिन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) के आधार पर तीसरे आरोपित तजेंद्र पाल सिंह की हत्या में सीधी संलिप्तता पूरी तरह सिद्ध नहीं हो सकी। इसी से उसे संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देकर छोड दिया गया।
फांसी बनाम आजीवन कारावास: दो मुख्य आरोपियों की फांसी की सजा घटाते हुए कोर्ट ने कहा कि कानूनन “आखिरी सांस तक जेल” (Life imprisonment till last breath) भी उतनी ही कठोर सजा है, जो समाज को एक कड़ा संदेश देती है।
🔄 वर्तमान में पीड़ित परिवार की मांग
युग के पिता विनोद गुप्ता आज भी न्याय को संघर्ष कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में उनका मुख्य तर्क यही है कि यदि इतने जघन्य और बर्बर अपराध को भी “दुर्लभ से दुर्लभतम” नहीं माना जाएगा, तो फिर समाज में बच्चों की सुरक्षा को लेकर अपराधियों के मन से डर पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
युग गुप्ता हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) और उससे पहले हाईकोर्ट में दोनों पक्षों (अभियोजन/पीड़ित परिवार और बचाव पक्ष) के दिये मुख्य विधिक तर्क निम्नलिखित हैं:
⚖️ अभियोजन (State) और पीड़ित परिवार के मुख्य तर्क(फांसी की मांग हेतु)
विनोद गुप्ता (युग के पिता) और राज्य सरकार के वकीलों ने इसे “दुर्लभ से दुर्लभतम” (Rarest of Rare) मामला सिद्ध करने को तर्क रखे :-
अत्यधिक क्रूरता और बर्बरता: 4 साल के मासूम बच्चे को भूखा रख, जबरन शराब पिलाना और फिर भारी पत्थर (Concrete Slab) से बांधकर जिंदा पानी की टंकी में फेंक देना क्रूरता की चरम सीमा है। यह कृत्य समाज की अंतरात्मा झकझोरने वाला है।
पूर्व-नियोजित और सुनियोजित अपराध: यह अचानक आवेश में की गई हत्या नहीं थी। आरोपितों ने अपहरण, फिरौती के 4 पत्र भेजने और शव को ठिकाने लगाने का पूरा षड्यंत्र (Criminal Conspiracy) पहले से रचा था।
विश्वासघात (Breach of Trust) : मुख्य आरोपित चंदर शर्मा पीड़ित परिवार का पड़ोसी और जानकार था। उसने अबोध बच्चे के निर्दोष भरोसे का फायदा उठाकर चॉकलेट का लालच दिया, जो सामाजिक ताने-बाने को बेहद घातक है।
सह-आरोपित तजेंद्र की संलिप्तता: पीड़ित परिवार का तर्क है कि तजेंद्र पाल सिंह को छोडना गलत है, क्योंकि बच्चे को बंधक बना रखने को उसी का गोदाम और गाड़ी प्रयोग की गई थी। इसलिए उसे संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) नहीं मिलना चाहिए।
🛡️ बचाव पक्ष (Defence Lawyers) की मुख्य तर्क(सजा कम करने/बरी करने हेतु)
आरोपितों की तरफ से वरिष्ठ वकीलों (जैसे एडवोकेट सरताज सिंह नरूला) ने सजा निरस्त करने या कम करवाने को ये कानूनी तर्क दिए:
परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence): बचाव पक्ष का मुख्य तर्क यह है कि इस केस में कोई भी प्रत्यक्षदर्शी गवाह (Eye Witness) नहीं है। पूरा मामला केवल कड़ियों (Chain of Circumstances) पर आधारित है, और कानूनन केवल परिस्थितियों के आधार पर किसी को फांसी नहीं दी जानी चाहिए।
सुधार की गुंजाइश (Possibility of Reformation): सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के संदर्भ में तर्क दिया गया कि जेल में बंद रहते चंदर और विक्रांत का व्यवहार संतोषजनक रहा है। जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि अपराधी समाज को हमेशा खतरा बने रहेंगे और उनमें सुधार बिल्कुल असंभव है, तब तक मौत की सजा नहीं दी जा सकती।
साक्ष्यों की प्रामाणिकता पर सवाल:पानी की टंकी को नगर निगम साल में दो बार साफ करता था, तो 2 साल तक कंकाल क्यों नहीं दिखा? यह बरामदगी संदिग्ध है।
आरोपितों के मोबाइल से मिले वीडियो और फिरौती पत्रों पर हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट विरोधाभासी और अविश्वसनीय है।
आयु आधार: अपराध के समय आरोपियों की उम्र काफी कम थी (विक्रांत 22 वर्ष और चंदर 26 वर्ष के थे)। कम उम्र के अपराधियों को सुधरने का एक मौका दिया जाना चाहिए, जिसके लिए “आखिरी सांस तक उम्रकैद” की सजा ही पर्याप्त रूप से कठोर है।
सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) अब इन्हीं दोनों पक्षों की विपरीत दलीलों, साक्ष्यों की कानूनी वैधता और पूर्व में दिए गए न्यायिक सिद्धांतों के आधार पर अपना अंतिम फैसला सुनाएगी।
पिता बोले, सरकार के भरोसे रहता तो न चूक जाता
युग के पिता ने इन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, सुप्रीमकोर्ट में मामले में सुनवाई हुई। युग के पिता ने मामले को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि अपने बेटे को न्याय दिलाने को आखिरी सांस लड़ूंगा। यदि मैं समय पर नहीं जाता और सरकार के भरोसे रहता तो मेरा फैसले को चुनौती देने का अधिकार के साथ बेटे की न्याय की लड़ाई ही खत्म हो जाती।

