कैसे बनी FRI बिल्डिंग? क्या है विशेषता?

1906 में जब देहरादून में इंपीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट IFRI की स्थापना हुई, तो इसके प्रशासनिक और अनुसंधान कार्य किसी एक विशाल परिसर से नहीं, बल्कि शहर के अलग-अलग हिस्सों से संचालित हो रहे थे। उस दौर में संस्थान का मुख्य और आधिकारिक केंद्र मॉल रोड पर स्थित चाँदबाग परिसर था, जहाँ आज का प्रसिद्ध दून स्कूल स्थापित है। इसके साथ ही, शोध और प्रयोगशालाओं की तत्कालीन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दर्शनलाल चौक और पलटन बाजार के समीप स्थित इंपीरियल फॉरेस्ट रेंजर्स कॉलेज की कुछ पुरानी इमारतों और प्रयोगशालाओं का भी अस्थाई रूप से उपयोग किया गया था। शुरुआती दौर में वैज्ञानिक प्रयोग और व्यावहारिक अनुसंधान थानो और मालकोट जैसे ऐतिहासिक वन क्षेत्रों के इर्द-गिर्द चलते रहे। लेकिन जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर वानिकी अनुसंधान का महत्व बढ़ा, यह साफ होने लगा कि शहर के इन व्यस्त और सीमित हिस्सों में बिखरी व्यवस्थाएं एक अंतरराष्ट्रीय साख वाले संस्थान की दीर्घकालिक जरूरतों के अनुकूल नहीं हैं। संस्थान को एक ऐसे एकीकृत और शांत परिसर की आवश्यकता थी जहाँ प्रकृति के बीच वैज्ञानिक शोध को विस्तार मिल सके। इस बड़े बदलाव की दूरदर्शी परिकल्पना तत्कालीन वन महानिरीक्षक सर अलेक्जेंडर रॉजर ने की। उन्होंने दून घाटी के मशहूर और घने साल के जंगलों के बीच स्थित कौलागढ़ की सरकारी आरक्षित वन भूमि को इस भव्य उद्देश्य के लिए चुना।
इस नए संस्थान के लिए कौलागढ़ में करीब 450 हेक्टेयर यानि लगभग 1111 एकड़ की विशाल भूमि आवंटित की गई, जो कभी चाय के बागानों और समृद्ध प्राकृतिक वन संपदा से घिरी हुई थी। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को धरातल पर उतारने का जिम्मा जाने-माने ब्रिटिश वास्तुकार सी.जी. ब्लॉमफ़ील्ड को सौंपा गया। ब्लॉमफ़ील्ड ने भारतीय परिवेश और औपनिवेशिक भव्यता का अनूठा सामंजस्य बिठाते हुए मुख्य इमारत का खाका शास्त्रीय ग्रीको-रोमन वास्तुकला शैली में तैयार किया, जिसमें ऊंचे मेहराब, विशाल स्तंभ और भव्य गलियारे शामिल थे। इस ऐतिहासिक भवन का निर्माण कार्य साल 1923 में शुरू हुआ और इसे पूरा होने में छह साल का लंबा समय लगा। जब 1929 में यह भव्य ढांचा बनकर तैयार हुआ, तो इसका जमीनी क्षेत्रफल ही लगभग ढाई से पौने तीन हेक्टेयर में फैला हुआ था, जिसने इसे दुनिया की सबसे विशाल सिंगल ब्रिक संरचनाओं में शुमार कर दिया।
इस इमारत की भव्यता जितनी बेजोड़ है, इसकी मजबूती और टिकाऊपन का इतिहास उतना ही वैज्ञानिक है। पूरी तरह से लाल ईंटों से बनी इस ऐतिहासिक इमारत को जोड़ने के लिए आधुनिक सीमेंट का नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय निर्माण विज्ञान के पारंपरिक चूने के मोर्टार गारे का इस्तेमाल किया गया। स्थानीय कारीगरों के पारंपरिक ज्ञान की मदद से इस गारे में उड़द की दाल, गुड़ और बेलपत्र जैसी जैविक सामग्रियां मिलाई गईं। गुड़ और बेलपत्र के रसों ने इस मिश्रण में प्राकृतिक फर्मेंटेशन की प्रक्रिया को सक्रिय किया, जिससे मोर्टार की बंधन क्षमता, लचीलापन और जलरोधकता समय के साथ सीमेंट से भी कई गुना अधिक मजबूत होती चली गई। इसी विशिष्ट निर्माण कला का परिणाम है कि उत्तराखंड के तीव्र भूकंपीय क्षेत्र (ज़ोन-4 और 5) में होने के बावजूद यह विशाल भवन आज भी पूरी मजबूती के साथ सुरक्षित खड़ा है।
साल 1929 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा इस नए परिसर का बेहद भव्य स्तर पर औपचारिक उद्घाटन किया गया। इसके बाद संस्थान चाँदबाग और शहर के अन्य अस्थाई ठिकानों को छोड़कर पूरी तरह से कौलागढ़ के इस नए पते पर स्थानांतरित हो गया। देश की आजादी के बाद इस गौरवशाली संस्थान को ‘फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट’ FRI के नाम से जाना गया और बाद में इसे डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा भी मिला। आज यह संस्थान न केवल वानिकी और पर्यावरण अनुसंधान का एक प्रमुख वैश्विक केंद्र है, बल्कि ब्रिटिश औपनिवेशिक इंजीनियरिंग और भारत के पारंपरिक निर्माण विज्ञान के बेजोड़ मेल की एक अमूल्य जीवंत विरासत भी है। अपनी इसी अप्रतिम वास्तुकला और चारों ओर फैले जैव-विविधता से समृद्ध वातावरण के कारण यह परिसर देश-विदेश के शोधकर्ताओं, पर्यटकों और फिल्मकारों के लिए देहरादून का सबसे मुख्य ऐतिहासिक आकर्षण बना हुआ है।

​वन अनुसंधान संस्थान (FRI) भवन
​वन अनुसंधान संस्थान (FRI) भवन का निर्माण ब्रिटिश काल के दौरान हुआ था और यह 1929 में बनकर तैयार हुआ था। ब्रिटिश वास्तुकार सी. जी. ब्लोमफील्ड द्वारा डिजाइन की गई यह इमारत ग्रीको-रोमन वास्तुकला शैली में बनाई गई है और इसे भारत के सबसे बेहतरीन संस्थागत भवनों में से एक माना जाता है।
​मुख्य विशेषताएँ:
​विशाल परिसर: लगभग 450 हेक्टेयर में फैला यह परिसर देश के सबसे बड़े वन अनुसंधान परिसरों में से एक है।
​शानदार वास्तुकला: यह इमारत अपनी भव्य लाल-ईंटों की संरचना, लंबे स्तंभों (कॉलोनेड्स) और सममित (symmetrical) डिजाइन के लिए प्रसिद्ध है।
​संग्रहालय और प्रयोगशालाएँ: इसमें कई वानिकी संग्रहालय (forestry museums), अनुसंधान प्रयोगशालाएँ और शैक्षिक सुविधाएं मौजूद हैं।
​प्राकृतिक सौंदर्य: यह परिसर चारों ओर से हरी-भरी हरियाली और वृक्षों की विभिन्न प्रजातियों से घिरा हुआ है, जो इसे आगंतुकों और शोधकर्ताओं दोनों के लिए एक प्रमुख आकर्षण केंद्र बनाता है।
​फिल्मों की शूटिंग: अपनी स्थापत्य कला की सुंदरता के कारण, इसने कई फिल्मों और टेलीविजन प्रस्तुतियों के लिए एक शूटिंग स्थल के रूप में काम किया है।
​भारत में वन अनुसंधान संस्थान (FRI) भवन को वास्तुकला की उत्कृष्टता और वानिकी अनुसंधान दोनों के एक मील के पत्थर के रूप में देखा जाता है।

 

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