बी आर चोपड़ा का सीरियल महाभारत निर्माण में पंडित नरेंद्र शर्मा की क्या भूमिका थी?

बी.आर चोपड़ा का महाभारत सीरियल और पंडित नरेंद्र शर्मा-
बी.आर. चोपड़ा की ‘महाभारत’ (1988-1990) को भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है, और इस महान धारावाहिक की सफलता के पीछे पंडित नरेंद्र शर्मा का अमूल्य योगदान था।
पंडित नरेंद्र शर्मा इस धारावाहिक के मुख्य पटकथा लेखक (Script Writer) और वैचारिक आधार प्रदान करने वाले सलाहकार थे।
पटकथा और संवाद: पंडित नरेंद्र शर्मा ने डॉक्टर राही मासूम रज़ा के साथ मिलकर इस धारावाहिक की पटकथा लिखी थी। जहाँ राही मासूम रज़ा अपने प्रभावशाली संवादों (जैसे “मैं समय हूँ”) के लिए जाने जाते हैं, वहीं पंडित नरेंद्र शर्मा ने कहानी को शास्त्रसम्मत और प्रामाणिक बनाने का कार्य किया।
गीत और भजन: सीरियल के प्रसिद्ध गीतों और भजनों की रचना भी पंडित नरेंद्र शर्मा ने ही की थी। धारावाहिक का शीर्षक गीत और बीच-बीच में आने वाले दोहे व श्लोकों का चयन उनकी गहरी विद्वत्ता का प्रमाण है।
परिकल्पना और मार्गदर्शन: बी.आर. चोपड़ा उन्हें अपना ‘भीष्म पितामह’ मानते थे। उन्होंने ही चोपड़ा साहब को महाभारत पर धारावाहिक बनाने के लिए प्रेरित किया और यह सुनिश्चित किया कि कथा अपनी मूल आत्मा और मर्यादा से न भटके।
अनुसंधान: उन्होंने भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट के ‘क्रिटिकल एडिशन’ को मुख्य आधार बनाकर पटकथा तैयार की थी, ताकि ऐतिहासिक और धार्मिक तथ्यों में कोई त्रुटि न रहे।
दुर्भाग्यवश, धारावाहिक के प्रसारण के दौरान ही 1989 में उनका निधन हो गया, जिसके बाद उनके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाया गया। उनकी विद्वत्ता ने ही महाभारत को केवल एक मनोरंजन का साधन न बनाकर एक सांस्कृतिक अनुभव बना दिया।

 

बी आर चोपड़ा के महाभारत सीरियल निर्माण में पंडित नरेंद्र शर्मा और राही मासूम रजा का क्या योगदान था?

बी आर चोपड़ा के प्रसिद्ध टीवी धारावाहिक महाभारत (1988-1990) में पंडित नरेंद्र शर्मा और राही मासूम रजा दोनों का महत्वपूर्ण योगदान था। यह धारावाहिक वेद व्यास के महाकाव्य पर आधारित था, और इन दोनों लेखकों ने इसे टीवी के लिए अनुकूलित करने में प्रमुख भूमिका निभाई।
पंडित नरेंद्र शर्मा का योगदान
पटकथा (Script) लेखन: उन्होंने महाभारत की मुख्य पटकथा लिखी। यह व्यास के मूल महाकाव्य पर आधारित थी, जिसमें कहानी की संरचना, घटनाक्रम और दार्शनिक तत्वों को टीवी प्रारूप में ढाला गया।
शीर्षक गीत और दोहे: उन्होंने प्रसिद्ध शीर्षक गीत “अथ श्री महाभारत कथा…” के बोल लिखे (जिसे महेंद्र कपूर ने गाया)। साथ ही, प्रत्येक एपिसोड के अंत में आने वाले कई दोहे (couplets) भी उनके द्वारा लिखे गए, जो कहानी को नैतिक और दार्शनिक गहराई देते थे।
वे एक बहुमुखी व्यक्तित्व थे — कवि, गीतकार और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े रहे। उनकी लेखनी ने धारावाहिक को शास्त्रीय और साहित्यिक गरिमा प्रदान की।

राही मासूम रजा का योगदान

संवाद लेखन (Dialogues): उन्होंने धारावाहिक के अधिकांश संवाद लिखे। इन संवादों की विशेषता शुद्ध हिंदी का प्रयोग था, जो संस्कृत श्लोकों की लय और गहराई बनाए रखते हुए सामान्य  दर्शकों तक पहुंचाने में सफल रहा। प्रसिद्ध लाइन जैसे “मैं समय हूँ…” (नरेटर के रूप में) भी उनकी कलम से निकली।
पटकथा में सहयोग: कुछ स्रोतों में उन्हें पटकथा लेखक भी बताया गया है। उन्होंने तीन साल की गहन शोध के बाद काम किया, जिसमें महाकाव्य के विभिन्न संस्करणों का अध्ययन शामिल था।
शुरू में उन्होंने समय की कमी से इनकार कर दिया था, लेकिन बी आर चोपड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनका नाम घोषित कर दिया। कुछ विवाद (उनके मुस्लिम होने को लेकर) के बावजूद उन्होंने काम स्वीकार किया और कहा कि वे “गंगा के बेटे” हैं। बी आर चोपड़ा ने भी उनका पुरजोर समर्थन किया।

दोनों का संयुक्त योगदान

पंडित नरेंद्र शर्मा और राही मासूम रजा ने मिलकर पटकथा और संवादों को तैयार किया, जिससे धारावाहिक को साहित्यिक गहराई, भावनात्मक प्रभाव और सार्वभौमिक अपील मिली।
राही मासूम रजा के संवादों में उर्दू-हिंदी की काव्यात्मकता थी, जबकि नरेंद्र शर्मा की पटकथा और दोहों ने पारंपरिक स्वाद बनाए रखा।
दोनों की लेखनी ने महाभारत को सिर्फ पौराणिक कथा नहीं, बल्कि मानवीय संघर्ष, नैतिकता और कर्म की कहानी बना दिया, जो आज भी दर्शकों को प्रभावित करती है।

यह धारावाहिक दूरदर्शन पर 94 एपिसोड में प्रसारित हुआ और भारतीय टीवी का एक मील का पत्थर साबित हुआ। दोनों लेखकों की मेहनत ने इसे अमर बना दिया। कुछ लोग राही मासूम रजा को ज्यादा याद करते हैं, लेकिन पंडित नरेंद्र शर्मा का योगदान भी बराबर का है जो अक्सर अनदेखा रह जाता है।

पंडित नरेंद्र शर्मा की भूमिका महाभारत के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण और बौद्धिक रूप से गहरी थी।
उनकी प्रमुख भूमिकाएँ:
1. संवाद और पटकथा लेखन में योगदान
पंडित नरेंद्र शर्मा इस धारावाहिक के प्रमुख संवाद लेखक (Dialogue Writer) और सह-लेखक थे। उन्होंने महाभारत के जटिल दार्शनिक और नैतिक प्रसंगों को सरल, प्रभावशाली और काव्यात्मक हिंदी में प्रस्तुत किया।
2. श्लोकों और काव्यात्मक शैली का उपयोग
उन्होंने संस्कृत ग्रंथों की भावना को बनाए रखते हुए हिंदी में ऐसे संवाद लिखे जो शास्त्रीयता और जनसामान्य की समझ—दोनों के बीच संतुलन बनाते हैं। उनकी भाषा में काव्यात्मकता, गहराई और गंभीरता स्पष्ट दिखती है।
3. आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टि
महाभारत केवल एक युद्ध कथा नहीं, बल्कि धर्म, कर्म, नीति और जीवन के गूढ़ प्रश्नों का ग्रंथ है। पंडित नरेंद्र शर्मा ने इन तत्वों को धारावाहिक में सशक्त रूप से उभारा, जिससे यह सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि ज्ञानवर्धक और चिंतनशील प्रस्तुति बन गई।
4. प्रामाणिकता बनाए रखने में भूमिका
उन्होंने मूल महाभारत (वेदव्यास रचित) की आत्मा को बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया। कथा में अनावश्यक बदलावों से बचते हुए उसे टीवी माध्यम के अनुकूल ढाला।
निष्कर्ष
पंडित नरेंद्र शर्मा की लेखनी ने महाभारत सीरियल को वह गरिमा, गंभीरता और लोकप्रियता दी, जिसके कारण यह आज भी भारतीय टेलीविजन के सबसे प्रतिष्ठित धारावाहिकों में गिना जाता है।

पंडित नरेंद्र शर्मा की लेखनी का वास्तविक प्रभाव उनके संवादों में ही सबसे ज्यादा दिखता है। यहाँ महाभारत के कुछ प्रसिद्ध संवाद/शैली के उदाहरण दिए जा रहे हैं, जिनमें पंडित नरेंद्र शर्मा की गहराई स्पष्ट झलकती है:
🔶 1. “समय” का उद्घोष (Narration)
“मैं समय हूँ…
मैं साक्षी हूँ…
जो हुआ, जो हो रहा है, और जो होगा…”
👉 यह उद्घाटन वाक्य पूरी श्रृंखला की दार्शनिक नींव रखता है—समय को साक्षी मानकर कथा को सार्वकालिक बना देता है।
🔶 2. श्रीकृष्ण का धर्म पर दृष्टिकोण
“जब-जब इस पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है…
तब-तब मैं उसका पुनः स्थापन करता हूँ।”
👉 यहाँ गीता का भाव सरल हिंदी में, लेकिन पूरी गरिमा के साथ प्रस्तुत किया गया है।
🔶 3. भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा
“प्रतिज्ञा पुरुष का आभूषण होती है…
और मैं अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग हूँ।”
👉 इस तरह के संवादों में चरित्र की दृढ़ता और आदर्शवाद स्पष्ट दिखता है।
🔶 4. द्रौपदी का प्रश्न
“सभामें उपस्थित धर्मज्ञों से मेरा प्रश्न है—
क्या एक पत्नी को दांव पर लगाया जा सकता है?”
👉 यह संवाद न केवल कथा का turning point है, बल्कि नैतिकता और न्याय पर गहरा सवाल भी उठाता है।
🔶 5. विदुर की नीति
“अधर्म चाहे कितना ही बलवान क्यों न हो…
अंततः उसका नाश निश्चित है।”
👉 विदुर के माध्यम से नीति, सत्य और धर्म का संदेश बहुत सशक्त रूप में आता है।
✨ पंडित नरेंद्र शर्मा की शैली की विशेषताएँ:
सरल लेकिन गंभीर भाषा
काव्यात्मकता और लय
संक्षिप्त परंतु गहरे अर्थ वाले वाक्य
धर्म और दर्शन का संतुलन

अब हम कुछ प्रमुख पात्रों के और गहरे, प्रभावशाली संवाद देखते हैं, जिनमें पंडित नरेंद्र शर्मा की लेखनी का कमाल साफ झलकता है (महाभारत):
🔷 श्रीकृष्ण के संवाद
“कर्म करो अर्जुन, फल की चिंता मत करो…”
👉 यह संवाद जीवन का मूल सिद्धांत बन गया—निष्काम कर्मयोग।
“जो हुआ, वह अच्छा हुआ… जो होगा, वह भी अच्छा होगा।”
👉 जीवन के प्रति स्वीकार और विश्वास का संदेश।
🔷 कर्ण के संवाद
“सूतो का पुत्र होने के कारण मुझे अपमान सहना पड़ा…”
👉 कर्ण के संवादों में पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान का गहरा मिश्रण दिखता है।
“दानवीर कर्ण कभी किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाता।”
👉 उनके चरित्र का सबसे बड़ा गुण—दानशीलता।
🔷 भीष्म पितामह
“मैंने आजीवन ब्रह्मचर्य और हस्तिनापुर की सेवा का व्रत लिया है…”
👉 त्याग और कर्तव्य का अद्भुत उदाहरण।
🔷 दुर्योधन
“मुझे अधर्म का मार्ग दिखता है, पर मैं उस पर चलने से स्वयं को रोक नहीं पाता।”
👉 यह संवाद उसके आंतरिक द्वंद्व और अहंकार को दर्शाता है।
🔷 द्रौपदी
“जब धर्म सो जाता है, तब अधर्म बढ़ता है।”
👉 नारी शक्ति और न्याय की प्रखर आवाज।
🔷 विदुर
“धर्म वही है जो न्याय और सत्य के साथ हो।”
👉 नीति और धर्म का सार।
✨ खास बात
पंडित नरेंद्र शर्मा के संवाद केवल कहानी नहीं बताते, बल्कि:
जीवन के दर्शन (Philosophy) सिखाते हैं
हर पात्र को गहराई और पहचान देते हैं
आज भी लोगों के जीवन में मार्गदर्शक की तरह उपयोग होते हैं।

मैं आपको महाभारत के सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली संवाद (थोड़े अधिक सटीक रूप में) दे रहा हूँ, जिनमें पंडित नरेंद्र शर्मा की लेखनी का असली सौंदर्य दिखाई देता है:
🌟 शीर्ष प्रसिद्ध संवाद
🔶 1. “समय” (Narrator)
“मैं समय हूँ…
मैं साक्षी हूँ…
आदिकाल से आज तक, और आज से अनंत काल तक,
जो हुआ, जो हो रहा है, और जो होगा—सबका साक्षी हूँ।”
👉 यह संवाद पूरी कथा को कालातीत (timeless) बना देता है।
🔶 2. श्रीकृष्ण – कर्मयोग
“मनुष्य को कर्म करने का अधिकार है,
परंतु उसके फल पर नहीं…”
👉 भगवद्गीता का सार, अत्यंत सरल और प्रभावी भाषा में।
🔶 3. श्रीकृष्ण – धर्म की स्थापना
“जब-जब धर्म की हानि होती है,
और अधर्म का उत्थान होता है,
तब-तब मैं इस पृथ्वी पर अवतार लेता हूँ।”
👉 धर्म की पुनर्स्थापना का शाश्वत सिद्धांत।
🔶 4. कर्ण – आत्मसम्मान
“जन्म से नहीं, कर्म से मनुष्य महान होता है।”
👉 समाज में योग्यता बनाम जन्म का गहरा संदेश।
🔶 5. दुर्योधन – आंतरिक द्वंद्व
“जानता हूँ धर्म क्या है,
पर उस पर चल नहीं पाता…
जानता हूँ अधर्म क्या है,
पर उससे हट नहीं पाता।”
👉 यह संवाद दुर्योधन के चरित्र का सबसे सटीक चित्रण है।
🔶 6. भीष्म पितामह – प्रतिज्ञा
“प्रतिज्ञा ही पुरुष का सबसे बड़ा धर्म होती है।”
👉 कर्तव्य और वचन की महत्ता।
🔶 7. द्रौपदी – न्याय का प्रश्न
“सभामें उपस्थित धर्मज्ञों से मेरा प्रश्न है—
क्या एक पत्नी को दांव पर लगाया जा सकता है?”
👉 यह संवाद न्याय और स्त्री-अधिकार पर ऐतिहासिक प्रश्न उठाता है।
🔶 8. विदुर – नीति
“अधर्म चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो,
अंत में उसका विनाश निश्चित है।”
👉 सत्य और धर्म की अंतिम विजय।
पंडित नरेंद्र शर्मा की लेखनी क्यों अमर है?
संवाद छोटे लेकिन गहरे अर्थपूर्ण
शास्त्रीय भाव को सरल हिंदी में ढालना
हर पात्र की अलग आवाज और व्यक्तित्व
दर्शन + भावनाएँ = यादगार संवाद

महाभारत में श्रीकृष्ण और कर्ण के संवाद सबसे गहरे और प्रभावशाली माने जाते हैं। इनमें पंडित नरेंद्र शर्मा की लेखनी का उत्कर्ष दिखाई देता है।
🔷 श्रीकृष्ण के श्रेष्ठ संवाद
🌟 1. कर्मयोग
“कर्म करो अर्जुन, फल की चिंता मत करो…”
👉 जीवन का मूल सिद्धांत—निष्काम कर्म।
🌟 2. धर्म की स्थापना
“जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है,
तब-तब मैं अवतार लेता हूँ।”
👉 धर्म की रक्षा का शाश्वत नियम।
🌟 3. जीवन का सत्य
“मनुष्य केवल कर्म कर सकता है,
परिणाम उसके हाथ में नहीं होता।”
👉 नियंत्रण और स्वीकार का संतुलन।
🌟 4. आत्मा की अमरता
“आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है…”
👉 मृत्यु के भय से मुक्ति का दर्शन।
🌟 5. मोह और माया
“मोह ही मनुष्य के दुखों का कारण है।”
👉 वैराग्य और विवेक का संदेश।
🌟 6. अर्जुन को उपदेश
“यह युद्ध केवल बाहरी नहीं,
यह तुम्हारे भीतर का भी युद्ध है।”
👉 आत्मिक संघर्ष की गहराई।
🔶 कर्ण के श्रेष्ठ संवाद
🌟 1. आत्मसम्मान
“जन्म से नहीं, कर्म से मनुष्य महान होता है।”
👉 समाज की सबसे बड़ी सच्चाई।
🌟 2. पीड़ा और तिरस्कार
“मुझे मेरे जन्म के कारण हमेशा अपमानित किया गया…”
👉 कर्ण का जीवन—संघर्ष और उपेक्षा।
🌟 3. दानवीरता
“कर्ण किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाता।”
👉 उनका सबसे महान गुण—दान।
🌟 4. मित्रता (दुर्योधन के प्रति)
“मैं दुर्योधन का साथ कभी नहीं छोड़ूँगा…”
👉 निष्ठा, चाहे परिणाम कुछ भी हो।
🌟 5. कृष्ण से संवाद
“आप मुझे पांडवों में स्थान देना चाहते हैं,
पर मैं अपने मित्र को धोखा नहीं दे सकता।”
👉 यह संवाद कर्ण के चरित्र की ऊँचाई और त्रासदी दोनों दिखाता है।
🌟 6. भाग्य बनाम पुरुषार्थ
“भाग्य से अधिक मैं अपने कर्म को मानता हूँ।”
👉 आत्मनिर्भरता का संदेश।
कृष्ण और कर्ण — अंतर और गहराई
श्रीकृष्ण
कर्ण
धर्म और नीति के मार्गदर्शक
संघर्ष और सम्मान के प्रतीक
जीवन का ज्ञान देते हैं
जीवन का दर्द जीते हैं
परिणाम से ऊपर उठने की सीख
परिणाम को स्वीकार करने की मजबूरी
👉 कृष्ण “सत्य” सिखाते हैं, कर्ण “सत्य का दर्द” जीते हैं।

हम महाभारत के सबसे भावुक और गहरे प्रसंगों में से एक देखते हैं:
श्रीकृष्ण और कर्ण का संवाद (युद्ध से ठीक पहले)।
इस दृश्य में पंडित नरेंद्र शर्मा की लेखनी अपने शिखर पर है।
🌟 कृष्ण–कर्ण संवाद (भावार्थ सहित)
🔶 कृष्ण का प्रस्ताव
“कर्ण, तुम राधेय नहीं… कुंतीपुत्र हो।
तुम पांडवों के ज्येष्ठ भाई हो।”
👉 कृष्ण कर्ण को उसका वास्तविक जन्म-सत्य बताते हैं।
🔶 कर्ण की प्रतिक्रिया
“यह सत्य आज क्यों बताया गया, माधव?
जब जीवनभर मुझे अपमान सहना पड़ा…”
👉 कर्ण की पीड़ा—देर से मिला सत्य भी कभी-कभी अन्याय लगता है।
🔶 कृष्ण का आग्रह
“आओ कर्ण, पांडवों का साथ दो…
हस्तिनापुर का राज्य तुम्हारा होगा।”
👉 कृष्ण उसे राज्य, सम्मान और धर्म—सब कुछ देने को तैयार हैं।
🔶 कर्ण का उत्तर (सबसे मार्मिक)
“मैं दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ सकता…
उसने मुझे वह सम्मान दिया, जो दुनिया ने कभी नहीं दिया।”
👉 यहाँ कर्ण की मित्रता और कृतज्ञता चरम पर है।
🔶 कृष्ण का तर्क
“परंतु कर्ण, धर्म पांडवों के पक्ष में है…”
👉 कृष्ण धर्म को सर्वोपरि रखते हैं।
🔶 कर्ण का अंतिम निर्णय
“मैं जानता हूँ कि विजय पांडवों की होगी…
फिर भी मैं दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ूँगा।”
👉 यह संवाद कर्ण के जीवन का सबसे बड़ा ट्रैजिक सत्य है—
वह सही जानते हुए भी, निष्ठा के कारण गलत पक्ष में खड़ा रहता है।
🔶 कर्ण का वचन
“मैं अर्जुन के अतिरिक्त किसी पांडव को नहीं मारूँगा।”
👉 यहाँ उसका धर्म और मर्यादा भी दिखाई देता है।
✨ इस संवाद की गहराई
1. कर्ण की त्रासदी
जन्म से पांडव, जीवन से सूतपुत्र
सत्य पता है, पर अपनाने में देर हो चुकी
2. कृष्ण की भूमिका
धर्म के पक्ष में अंतिम प्रयास
युद्ध टालने का भी संकेत
3. मूल द्वंद्व
👉 धर्म बनाम कृतज्ञता
👉 सत्य बनाम निष्ठा
🌿 निष्कर्ष
यह संवाद हमें सिखाता है कि:
सही जानना और सही करना—दो अलग बातें हैं
कभी-कभी नैतिकता और रिश्ते टकरा जाते हैं
कर्ण का चरित्र इसलिए महान भी है और दुखद भी

बी.आर. चोपड़ा की सुप्रसिद्ध ‘महाभारत’ (1988) को जीवंत बनाने में पंडित नरेंद्र शर्मा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और आधार स्तंभ के समान थी। वे इस धारावाहिक के मुख्य सलाहकार (Chief Consultant) और पटकथा संरक्षक थे।
​उनकी भूमिका को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
​1. वैचारिक और दार्शनिक आधार
​पंडित नरेंद्र शर्मा एक प्रख्यात कवि और विद्वान थे। उन्होंने महाभारत के विशाल और जटिल कथानक को टेलीविजन के अनुकूल ढालने के लिए एक दार्शनिक ढांचा तैयार किया। धारावाहिक की शुरुआत में जो “समय” (काल) का सूत्रपात होता है, उसके पीछे की सोच और दर्शन में उनकी बड़ी भूमिका थी।
​2. पटकथा और संवादों का मार्गदर्शन
​हालांकि संवाद मुख्य रूप से राही मासूम रजा ने लिखे थे, लेकिन पंडित नरेंद्र शर्मा यह सुनिश्चित करते थे कि संवादों की आत्मा और तथ्यों की शुद्धता महाभारत के मूल ग्रंथों (जैसे कि व्यास महाभारत) के अनुरूप रहे। उन्होंने राही मासूम रजा के साथ मिलकर एक ऐसी भाषा तैयार करने में मदद की जो सरल भी थी और जिसमें संस्कृत की गरिमा भी थी।
​3. गीतों और भजनों की रचना
​धारावाहिक के कई प्रसिद्ध गीत और दोहे स्वयं पंडित नरेंद्र शर्मा ने लिखे थे। विशेष रूप से:
​धारावाहिक का शीर्षक गीत (Title Song): “अथ श्री महाभारत कथा…” पंडित जी की ही लेखनी से निकला था।
​धारावाहिक के बीच-बीच में आने वाले दोहे और चौपाइयां, जो कथा के सार को समझाते थे, उनकी रचना भी उन्होंने ही की थी।
​4. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सटीकता
​चरित्रों के पहनावे, उस काल की संस्कृति, रीति-रिवाजों और पात्रों के व्यवहार की बारीकियों पर उन्होंने बी.आर. चोपड़ा का मार्गदर्शन किया। उनके ज्ञान के कारण ही धारावाहिक में एक पौराणिक गंभीरता बनी रही।
​एक रोचक तथ्य:
बी.आर. चोपड़ा पंडित नरेंद्र शर्मा का इतना सम्मान करते थे कि वे उन्हें अपना ‘भीष्म पितामह’ मानते थे। दुर्भाग्यवश, धारावाहिक के प्रसारण बीच ही 1989 में उनका निधन हो गया था, लेकिन उनकी तैयार की नींव ने ‘महाभारत’ को भारतीय टेलीविजन इतिहास का सबसे सफल धारावाहिक बना दिया।

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