कौन थीं कश्मीरी पंडित सरला भट्ट,1990 में टॉर्चर-हत्या,36 वर्ष बाद SIA का 700 पन्नों का आरोपपत्र
Kashmiri Pandit Nurse Sarla Bhatt Who Raped And Murder In 1990, Sia File Charge Sheet After 36 Years Yasin Malik Mastermind
कौन थीं कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट, 1990 में कैसे हुई हत्या? 36 साल बाद SIA ने दाखिल की 700 पन्नों की चार्जशीट
जम्मू कश्मीर की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने 36 साल पुराने कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट के अपहरण और हत्या मामले में आज आरोपपत्र दिया। इसमें प्रतिबंधित संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के प्रमुख यासीन मलिक को मुख्य आरोपित बनाया गया है।
श्रीनगर 29 जून 2026 : जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने 36 वर्ष पुराने कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट के अपहरण और हत्या मामले में बड़ा कदम उठा आज 700 से अधिक पन्नों का आरोप पत्र कोर्ट में जमा किया है । इसमें अप्रैल 1990 में आतंकवादियों के कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट के अपहरण और बर्बर हत्या मामले में प्रतिबंधित संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के प्रमुख यासीन मलिक को मुख्य आरोपित बनाया गया है। एजेंसी ने इसे आतंकवाद पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में मील का पत्थर बताया है। आइए जानते हैं कि कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट कौन थीं और उनके साथ असल में क्या हुआ था?
कौन थीं नर्स सरला भट्ट?
सरला भट्ट कश्मीर के पंडित परिवार से थीं। वह अनंतनाग जिले की थीं और श्रीनगर शहर के सौरा इलाके में शेर-ए-कश्मीर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसकेआईएमएस) में नर्स थीं। जानकारी के अनुसार, कश्मीर घाटी में जब पंडितों पर हमले हो रहे थे और उन्हें भगाया जा रहा था, तब सरला भट्ट अपने काम पर जुटी थीं।
कब और कैसे हुई सरला भट्ट की हत्या?
सरला भट्ट का 18 अप्रैल 1990 को श्रीनगर में उनके हॉस्टल से अपहरण किया गया था और कुछ दिनों बाद श्रीनगर शहर के अपटाउन इलाके में उनका शव मिला था। पुलिस जांच में पता चला कि सरला भट्ट की हत्या से पहले उनके साथ हर तरह की पशुता हुई थी। इस दौरान उन्हें बेरहमी से टॉर्चर किया गया था और ऑटोमैटिक राइफल से गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
क्यों हुई थी सरला भट्ट की हत्या?
आरोप लगाए गए कि यह हत्या उस बड़े षड्यंत्र का हिस्सा थी, जिसका उद्देश्य कश्मीरी पंडित समुदाय को घाटी से बाहर भगाना था। उन्हें भारतीय खुफिया एजेंसियों के एजेंट कहकर निशाना बनाया गया था। भय और प्रशासन की ओर से उनकी जान-माल की रक्षा करने में असमर्थता से घाटी से लगभग पूरा कश्मीरी पंडित समुदाय अपने घर छोड़कर जान बचाने को भागने पर मजबूर हुआ था।
घाटी में कश्मीरी पंडितों की संपत्तियां लूट ली गई थीं
पलायन के बाद कश्मीरी पंडितों ने भीषण गर्मी में टेंटों में शरण ली और अत्यंत दयनीय स्थिति में लगभग नए सिरे से जीवन शुरू किया। इस बीच उनकी ज्यादातर संपत्तियां या तो लूट ली गई थीं या जला दी गईं थीं। कुछ संपत्तियों छीन ली गई थी।
एसआईए ने जमा किया आरोपपत्र
एसआईए ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की अदालत में आरोप पत्र दिया। इसमें तब आतंकवादी संगठन जेकेएलएफ के स्वयंभू कमांडर-इन-चीफ रहे यासीन मलिक के अलावा उसके चार साथियों खुर्शीद अहमद चाल्कू, अब्दुल हामिद शेख, गुलाम मोहम्मद टपलू और मोहम्मद यूसुफ सूफी को भी मामले में आरोपित बनाया गया है। आरोपितों को आतंकवाद एवं विध्वंसक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (टाडा),1987 और भारतीय शस्त्र अधिनियम, 1959 की अलग-अलग धाराओं में आरोपित किया गया है। एसआईए ने एक बयान में कहा कि मामला पुराना हो जाना आतंकवाद की ढाल नहीं बन सकता और अत्याचारों के लिए जिम्मेदार लोग कानून के समक्ष जवाबदेह बने रहेंगे।
737 की चार्जशीट में क्या?
यह मामला मार्च 2024 में एसआईए को सौंपा गया था और जांच एजेंसी ने पिछले दो सालों में कई जगहों पर छापे मारे, ताकि पांचों आरोपितों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार किया जा सके। एसआईए के एक प्रवक्ता ने कहा कि 737 पन्नों का यह आरोपपत्र गहन जांच और बहुत मेहनत से तैयार की गया है। दशकों से जमा किए गए मौखिक, दस्तावेजी, फोरेंसिक, बैलिस्टिक, मेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणों का मजबूत संग्रह है।
इसमें जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के तत्कालीन चीफ कमांडर आतंकी मोहम्मद यासीन मलिक का नाम उस व्यक्ति के तौर पर शामिल किया गया, जिसने उनकी हत्या का आदेश दिया था. यह आरोपपत्र इस इलाके में पुराने आतंकी अपराधों की जांच में एक बहुत बड़ी सफलता है. साथ ही यह उन लोगों को एक कड़ा संदेश भी है, जो यह मानते थे कि समय बीतने के साथ वे जवाबदेही से बच जाएंगे.
नर्स जो बिगड़े हालात में भी कश्मीर में रुकी रहीं
सरला भट्ट की हत्या क्यों हुई, यह समझने को 1990 की शुरुआत में कश्मीर में पंडितों के खिलाफ बने हालात समझना जरूरी है. उस साल जनवरी से ही चुन-चुनकर की गई हत्याओं से ज्यादातर कश्मीरी पंडित परिवार, घाटी छोड़कर जा चुके थे. इस समुदाय के जाने-माने लोगों- जैसे वकील टिक्का लाल टपलू, हाई कोर्ट के जज जस्टिस नीलकंठ गंजू, कवि सरवानंद कौल प्रेमी और ब्रॉडकास्टर लासा कौल की एक के बाद एक हत्या हुई थीं. हत्याओं का उद्देश्य पूरे समुदाय को भयभीत कर उन्हें वहां से भागाना था.
धमकियों के बावजूद अपना काम छोड़ने से किया था मना
SKIMS में कार्यरत ज्यादातर कश्मीरी पंडित नर्सें सपरिवार पहले ही जा चुकी थीं, लेकिन सरला भट्ट वहीं रुकी रहीं. जांच सूत्रों ने बताया कि सरला भट्ट को एक ईमानदार और आधुनिक सोच वाली युवा महिला माना जाता था, जिन्होंने लगातार मिलती धमकियों के बावजूद अपना काम छोड़ने से मना कर दिया था. श्रीनगर के बाहरी इलाके में सौरा इलाका, जहां SKIMS है, उस समय जेकेएलएफ और उसके समर्थकों का गढ़ माना जाता था. सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में घायल जेकेएलएफ के आतंकवादियों को अक्सर इलाज को जेकेएलएफ लाया जाता था. अस्पताल में नर्स होने के नाते सरला भट्ट का सामना अक्सर उनसे होता था. जांच सूत्रों के अनुसार, जेकेएलएफ के बड़े आतंकवादियों को यह संदेह था कि SKIMS की कोई कश्मीरी पंडित नर्स घायल आतंकवादियों की पुलिस या खुफिया एजेंसियों को जानकारी दे सकती है. उन्हें कई बार धमकियां दी गईं, लेकिन वह वहां से नहीं गईं.
उनके भाग्य का फैसला करने वाली घटना तब हुई जब जम्मू-कश्मीर पुलिस ने गुप्त जानकारी पर 8 अप्रैल 1990 को नरवारा में जेकेएलएफ के बड़े सदस्यों को पकड़ने को छापा मारा और कई आतंकी पकडे गये. यासीन मलिक ने पुलिस को देख लिया और भाग निकला, लेकिन घायल हो गया. जांच सूत्रों के अनुसार, आरोपपत्र से पता चलता है कि मलिक को लगा कि किसी कश्मीरी पंडित नर्स ने ही पुलिस को बताया होगा यह एक ऐसी जानकारी थी, जिसका कोई प्रमाण नहीं था. SIA आरोपपत्र में साफ कहा गया है कि सरला भट्ट पर भेदिया होने का आरोप ‘पूरी तरह से झूठा’ था. यह एक मनगढ़ंत बहाना था जिसका उद्देश्य असल में पहले से तय हत्या को सही ठहराना था. जांच में पाया गया कि सरला भट की हत्या जेकेएलएफ के उस सुनियोजित अभियान का हिस्सा थी, जिसका उद्देश्य कश्मीरी पंडितों में डर फैला उन्हें घाटी से जबरन भगाने के हालात पैदा करना था.
कई दशकों का मौन, फिर हिसाब-किताब का समय
जम्मू-कश्मीर DGP के आदेश पर मार्च 2024 में यह केस स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी जम्मू कश्मीर को सौंपा गया. इसके बाद एक ऐसी जांच शुरू हुई, जिसमें साढ़े तीन दशकों की घटनाओं को फिर से जोड़ना था. ऐसे गवाह ढूंढना था जो अब 70 और 80 साल के हैं. उन परिवारों को आगे आने को मनाना था जिनका सिस्टम से भरोसा उठ चुका था और मौखिक बयानों, फोरेंसिक प्रमाणों, बैलिस्टिक एनालिसिस, दस्तावेजी रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणों को एक साथ जोड़ना था.
यह जांच सीनियर IPS अधिकारी नीतीश कुमार की देखरेख हुई, जो अभी जम्मू-कश्मीर में एडीजी CID/SIA हैं. सूत्रों ने बताया कि जांच का महत्वपूर्ण काम 2018 बैच की IPS अधिकारी दिव्या देव ने किया, जो SIA में सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (SP) हैं. उन्हें ही इस षड्यंत्र का पर्दाफाश करने और वह महत्वपूर्ण केस फाइल तैयार करने का श्रेय है, जिसे सरकारी वकील अब कोर्ट में पेश करेंगे. मूल रूप से तमिलनाडु की इस युवा IPS अधिकारी ने महत्वपूर्ण गवाह खोजने और केस मजबूत बनाने को जानकारी इकट्ठा करने घर-घर जा लोगों से संपर्क किया.
आरोपपत्र में अहमद चालकू का भी नाम जिसने चलाई थी गोली
1989 और 1990 में शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में कार्यरत नर्सों का पता लगाकर उनसे पूछताछ की गई. उन सालों में कश्मीर में आतंकवाद पर बारीकी से रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों का इंटरव्यू लिया गया. कई संभावित गवाह, जो अब वृद्ध हो चुके थे, उनसे SIA के सीनियर अधिकारियों ने व्यक्तिगत संपर्क किया. इन अधिकारियों ने पीड़ित परिवारों को समझाने, भरोसा दिला उनका साथ दिया. ऐसे लोग जिन्होंने दशकों तक यह सोचा था कि उन्हें कभी न्याय नहीं मिलेगा और जिनका जांच एजेंसियों और न्यायपालिका से भरोसा उठ चुका था. आरोपपत्र में मलिक के साथ-साथ खुर्शीद अहमद चालकू का नाम भी है. चालकू ने ही गोली चलाई थी. इसके अलावा आरोपपत्र के तीन अन्य नाम अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सूफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है. मलिक अभी टेरर फंडिंग के एक अलग मामले में न्यायिक हिरासत में है, जिसमें उसे आजीवन कारावास की सजा मिली है. माना जाता है कि चालकू पाकिस्तान के कब्जाये जम्मू-कश्मीर भाग गया, उसके खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की गई है.
पुलिस की जांच में क्या आया सामने?
जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘जांच से पता चला कि सरला भट्ट को आखिरी बार 18 अप्रैल 1990 को दोपहर करीब 2:30 बजे SKIMS में देखा गया था और बाद में JKLF आतंकियों ने उनका अपहरण कर लिया था. प्रत्यक्षदर्शी और सुरक्षित गवाहों ने लगातार कहा है कि उन्हें बुचपोरा क्रॉसिंग के पास आरोपित के साथ देखा गया था, जिसके बाद उन्हें इलाहीबाग-लाल बाजार इलाके की ओर ले जाया गया, जहां उन्हे बेरहमी से पीटा गया,घसीटा गया, प्रताड़ित किया गया और 18 अप्रैल 1990 शाम ऑटोमैटिक राइफल से गोली मारकर हत्या की गई.’ मामले में वैज्ञानिक साक्ष्य जोड़ते हुए पुष्टि की कि घटनास्थल से मीले तीनों कारतूस के खोल एक ही 7.62 × 39 mm हथियार से चलाए गए थे, जो राइफल से लगातार गोलीबारी (बर्स्ट फायर) के गवाहों के बयानों की पूरी तरह पुष्टि करते हैं. लगाए गए आरोपों में RPC में अपहरण, गलत तरीके से रोकना, हत्या, आपराधिक षड्यंत्र और प्रमाण नष्ट करना, साथ ही TADA और आर्म्स एक्ट की धाराएं हैं.
पुलिस ने इलेक्ट्रॉनिक प्रमाण भी जुटाए
पुलिस ने इलेक्ट्रॉनिक प्रमाण भी एकत्र किए हैं, जिसमें फारूक अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे का टीवी पर एक प्रमाणित इंटरव्यू है. इंटरव्यू इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 65-B में सर्टिफिकेट के साथ सुरक्षित रखा गया है. इसमें उसने JKLF के सीनियर नेताओं के कहने पर टारगेटेड हत्याओं की बात मानी है, जिससे ऐसे अपराधों के पीछे एक संगठित कमांड स्ट्रक्चर होने की बात प्रमाणित होती है. जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक सीनियर अधिकारी ने बताया, ‘SIA की जांच से यह पक्का सिद्ध होता है कि 18 अप्रैल 1990 को JKLF के आतंकवादियों ने संगठन के कमांड स्ट्रक्चर में रची गई आपराधिक षड्यंत्र में सरला भट्ट का अपहरण किया, उन्हें प्रताड़ित किया और उनकी हत्या कर दी. प्रत्यक्षदर्शी के बयान, मेडिकल और जांच के नतीजे, आतंकी हमले की जिम्मेदारी लेने वाला नोट, इलेक्ट्रॉनिक सबूत, गवाहों के बयान और आसपास की परिस्थितियां मिलकर प्रमाणों की एक ठोस और मजबूत कड़ी बनाती हैं. ये सिद्ध करते हैं कि यह हत्या कोई अलग-थलग घटना नहीं थी, बल्कि कश्मीरी पंडित समुदाय के खिलाफ JKLF के टारगेटेड हिंसा के सुनियोजित अभियान का हिस्सा थी. इस अभियान का उद्देश्य भय फैलाना और उन्हें कश्मीर घाटी से जबरन पलायन को मजबूर करना था.’
कई और हत्याओं के रहस्य भी खुले
सरला भट्ट की हत्या कोई अकेली घटना नहीं थी. कश्मीरी पंडित संगठनों का अनुमान है कि 1989 से अब तक समुदाय के 1,500 से 2,000 लोग मारे जा चुके हैं. हालांकि जम्मू-कश्मीर में अलग-अलग सरकारों के ढुलमुल रवैये से इन सभी हत्याओं का कोई आधिकारिक सरकारी रिकॉर्ड नहीं है. इस पलायन में पांच लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडित विस्थापित हुए थे. समुदाय के समूह लंबे समय से जबरन विस्थापन और हत्याओं की जांच को आयोग बनाने की मांग कर रहे हैं. कई लोगों ने इन घटनाओं को नरसंहार और जातीय सफाए (एथनिक क्लींजिंग) का नाम दिया है. जम्मू-कश्मीर पुलिस के सूत्रों ने बताया कि सरला भट्ट मामले की जांच से कई अन्य पुराने अनसुलझे मामलों में नई जानकारी और गवाह मिले हैं. इनमें जस्टिस नीलकंठ गंजू, वकील टिक्का लाल टपलू और कवि सरवानंद कौल प्रेमी की हत्या के षड्यंत्र भी हैं. जस्टिस नीलकंठ गंजू हत्या मामले में शुरुआत करते हुए, इन मामलों में आगे की जांच और आरोपपत्र दाखिल किये जा सकते हैं.
फिलहाल, सरला भट्ट मामले में आरोपपत्र वह भावना दिखाता है, जिसकी प्रतीक्षा उनका परिवार और हजारों कश्मीरी पंडित परिवार दशकों से कर रहे थे. जम्मू-कश्मीर में आखिरकार कानून अपना काम कर रहा है।
पीड़िता को न्याय दिलाने की दिशा में मील का पत्थर
लगभग 36 साल बाद चार्जशीट दाखिल करना आतंकवाद पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में मील का पत्थर है और जम्मू कश्मीर में पुराने आतंकी अपराधों की जांच में यह एक सबसे महत्वपूर्ण सफलता है। एसआईए के प्रवक्ता ने कहा कि जांच से पता चला है कि इस अपहरण और बर्बर हत्या का षड्यंत्र रचने और उसके कार्यान्वयन में जेकेएलएफ के तत्कालीन मुख्य कमांडर मोहम्मद यासीन मलिक के साथ-साथ खुर्शीद अहमद चाल्कू, अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सूफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू भी थे। उन्होंने बताया कि अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सूफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है। मोहम्मद यासीन मलिक फिलहाल एक अन्य मामले में न्यायिक हिरासत में है। (इनपुट एजेंसी)

