मत:ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट;सोनिया-राहुल की चिंतायें और चीन के समानांतर हित
बंगाल में चुनाव है,राहुल ने वहां एफर्ट एक बूंद नही डाला,पर राहुल गांधी अंडमान की तीन दिनो की यात्रा पर निकल रहे हैं…
पुरी बात आपको समझाते है कि कब ,कहां और कैसे राहुल गांधी और उसका पुरा परिवार जल्दी एक्टिव हो जाता है और क्यों…
सोनिया गांधी ने सितंबर 2025 में अंडमान निकोबार पर एक बहुत बड़ा लेख लिखा था। जिसमें निकोबार द्वीप के लिए बटाला हाउस जैसे आंसू बहाएं गए थे। सोनिया गांधी ऐसा सामान्यतः नही करती…
उनका वो लेख केवल पर्यावरण की चिंता का मामला भर नहीं है। वह बहुत कम लिखती हैं, और जब भी लिखती हैं तो उसके पीछे कोई गहरी रणनीति या राजनीतिक वजह होती है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट एक ऐसी विकास योजना है जिसमें ₹75,000 करोड़ का निवेश है… जिसमें गालथेया बे में कंटेनर पोर्ट, ग्रीनफिल्ड एयरपोर्ट, पॉवर प्लांट्स, टाउनशिप, इंडस्ट्रियल ज़ोन और लग्जरी टूरिज्म शामिल है।
लेकिन असल मायनों में यह बस बाहरी दुनिया के लिए है ,भारत के लिए ये अपनी समुद्री रणनीति का अगला चरण है जिसका केंद्र है मालक्का जलडमरूमध्य….इस स्ट्रेट से सटे अंडमान निकोबार द्वीप भारत को वो स्ट्रेटजिक बढ़त देने वाले हैं, जो चीन कभी भी भारत को नहीं देना चाहेगा…तो ये गांधी परिवार आखिर क्यों इसके लिए चिंतित है,जो दरअसल चीन की चिंता होनी चाहिए…
भारत सरकार ने जब से वहाँ ट्राई सर्विस कमांड Andaman & Nicobar Command को मज़बूत करना शुरू किया है,तबसे ये हलचल है। INS Baaz और Kohassa जैसे नेवी के एयरबेस को फाइटर जेट और निगरानी विमानों के लिए गजब तेजी से अपग्रेड किया जा रहा है…यहां तक वहां नेवी और मर्चेंट शिप्स के लिए नए जेट्टी और लॉजिस्टिक हब बन रहे हैं। यह सब सिर्फ टूरिज्म या व्यापार के लिए नहीं है, बल्कि Indo-Pacific में भारत की सैन्य जियो पालिटिकल मौजूदगी को मजबूत करने के लिए है।
अब आप खुद आंखों से देखिएगा कि इसका विरोध करने वाले कौन हैं…
चीन और पाकिस्तान के साथ भारत में मौजूद कुछ पालिटिकल पावर रखने वाले लोग क्योंकि यह प्रोजेक्ट भारत को स्ट्रेट ऑफ मालक्का पर पकड़ देता है, जहाँ से चीन का तेल और व्यापारिक जहाज गुजरते हैं।
गांधी परिवार इस खेल में आ चुका है और पोषित एनजीओ भी विरोध में सामने आएंगे… पर्यावरण, जनजातीय अधिकार और स्थानीय इकोलॉजी की चिंता दिखाकर घरेलू राजनीति में विरोध का चेहरा किसी ना किसी को जल्दी बनाया जाने वाला है…लद्दाख मेंसोनम वांगचुक अभी हाल का उदाहरण है…
मणिपुर में 14 साल की बच्ची को चेहरा बनाने कि कोशिश है…ऐसे चेहरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी आसानी से बिकती है। खुब फंडिंग भी होती है। NGOs और तथाकथित पर्यावरण कार्यकर्ता इनके ज़रिए विदेशी दबाव बनाते जैसा स्टरलाइट नर्मदा विरोध में हुआ था।
वहीं भारतीय सेना और नौसेना के इस समुद्र में दबदबे के लिए ये प्रोजेक्ट एक वरदान जैसा है।
वही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आलरेडी इसे पर्यावरण क्लीयरेंस दी है, यानी इकोलॉजी सिर्फ एक बहाना है।
नरेंद्र मोदी सरकार इस प्रोजेक्ट को अपनी हिंद-प्रशांत रणनीति और आर्थिक एजेंडे का अहम हिस्सा मानती है,हर हाल में इसे पूरा करना चाहती है।
सच यही है कि यह लड़ाई पेड़ों और कछुओं के नाम पर लड़ी जाएगी, लेकिन असल में यह भारत की सामरिक स्वतंत्रता बनाम चीन की समुद्री सुरक्षा की जंग है। आने वाले समय में आपको देश विदेश में पर्यावरण बचाओ के नाम पर खूब विरोध और रिपोर्ट्स देखने को मिलेंगी…लेकिन असली टकराव हिंद प्रशांत की भूराजनीति है और चाइना अपना खेल बखूबी खेलता है..
(सोशल मीडिया से)
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को NGT की मंजूरी, ये है भारत के भविष्य का ‘सिंगापुर’ और चीन को जवाब भी
भारत के लिए बेहद महत्वाकांक्षी और उतने ही विवादित ग्रेट निकोबार आईलैंड प्रोजेक्ट को आखिरकार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की मंजूरी मिल गई है. इस प्रोजेक्ट को लेकर कहा जा रहा है कि यदि ये कामयाब रहा तो भारत को ग्रेट निकोबार द्वीप पर एक ‘सिंगापुर’ मिल जाएगी. इतना ही नहीं, ये हिंद महासागर में चीन के खिलाफ भारत को सामरिक बढ़त भी देगा.
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखाकर NGT ने भारत के अब तक के सबसे बड़े इन्फ्रा प्रोजेक्ट का रास्ता साफ कर दिया है.
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखाकर NGT ने भारत के अब तक के सबसे बड़े इन्फ्रा प्रोजेक्ट का रास्ता साफ कर दिया है.
अंडमान निकोबार द्वीप समूह के सबसे निचले द्वीप ग्रेट निकोबार पर बनने जा रहे देश के सबसे बड़े इन्फ्रा प्रोजेक्ट को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की हरी झंडी मिल गई है. सोमवार को ट्रिब्यूनल ने करीब 90,000 करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट को मंजूरी देकर भारत को एक बहुत बड़े कारोबारी ही नहीं, सैन्य लिहाज से रणनीतिक प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने का मौका दिया है. इस प्रोजेक्ट का कांग्रेस पार्टी सोनिया गांधी के नेतृत्व में विरोध कर रही थी. खासतौर पर पर्यावरण, जीव जंतुओं और स्थानीय जनजातियों के भविष्य के हवाले से.
हिंद महासागर के बीचोंबीच एक ऐसा द्वीप है, जिसके नाम पर इन दिनों दिल्ली से लेकर पोर्ट ब्लेयर तक चर्चा है. नाम है ग्रेट निकोबार आईलैंड (Great Nicobar Island). भारत सरकार यहां एक मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू करने जा रही है, जिसे अक्सर गेमचेंजर कहा जा रहा है. लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि वहां क्या बनेगा. असली बहस इस पर है कि क्यों बनेगा, किसके लिए बनेगा, और इसकी कीमत कौन चुकाएगा? यह पूरा मामला समझने के लिए इसे हिस्सों में देखना जरूरी है.
कहां है ग्रेट निकोबार और क्यों खास है?
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर कांग्रेस ने उठाए सवाल, बताया ‘विनाशकारी’
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी द्वीप है ग्रेट निकोबार. यह मलक्का स्ट्रेट के बेहद करीब है. मलक्का स्ट्रेट वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के 30-40 फीसदी हिस्से का शिपिंग और कंटेनर ट्रैफिक गुजरता है. यह दुनिया में इंग्लिश चैनल के बाद दूसरा सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग है. चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया से यूरोप और पश्चिम एशिया जाने वाला समुद्री व्यापार इसी रास्ते से होता है. यही वजह है कि इस इलाके को हिंद महासागर की ‘चोक पॉइंट पॉलिटिक्स’ का केंद्र माना जाता है. जो यहां मजबूत है, उसकी समुद्री पकड़ मजबूत है.
Great Nicobar project- Malakka strait traffic
दुनिया के दूसरे सबसे बिजी समुद्री रूट के लिए चोक पाइंट की तरह है ग्रेट निकोबार आईलैंड की लोकेशन. (फोटो – Maritime Vessel Traffic)
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में क्या-क्या बनेगा?
सरकार की योजना के कई डायमेंशन है. कुल 166 वर्ग किमी के इस प्रोजेक्ट में 130 वर्ग किमी का एरिया जंगली इलाके में है. जिसका डायर्शन होगा. प्रोजेक्ट में चार बड़े फोकस एरिया हैं-
1. इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल- एक गहरा समुद्री पोर्ट, जहां बड़े-बड़े कंटेनर जहाज रुक सकें.
2. ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट- सैन्य और सिविल इस्तेमाल, दोनों के लिए.
3. 450 मेगा वॉट का पावर प्लांट- ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए.
4. नई टाउनशिप- लाखों की आबादी बसाने की क्षमता वाला शहर.
सरकार का तर्क है कि इससे भारत की सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी पोर्ट्स पर निर्भरता कम होगी. आज भारत का बड़ा कंटेनर ट्रांसशिपमेंट सिंगापुर, कोलंबो और दुबई जैसे बंदरगाहों से होकर गुजरता है.
Great Nicobar Map
आर्थिक फायदा क्या होगा?
भारत लंबे समय से एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड हब बनने की कोशिश कर रहा है. लेकिन लॉजिस्टिक्स कॉस्ट अभी भी ज्यादा है. अगर ग्रेट निकोबार में एक आधुनिक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनता है, तो कंटेनर सीधे यहां शिफ्ट हो सकते हैं. समय और लागत दोनों कम होंगे. भारत को समुद्री व्यापार में बड़ी हिस्सेदारी मिल सकती है, और हजारों रोजगार पैदा हो सकते हैं. सरकार का दावा है कि यह प्रोजेक्ट आने वाले दशकों में अरबों डॉलर के आर्थिक अवसर पैदा कर सकेगा.
स्ट्रैटेजिक एंगल: सिर्फ कारोबार नहीं, सिक्योरिटी भी
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट सिर्फ व्यापार की कहानी नहीं है. यह रणनीति की भी कहानी है. हिंद महासागर में चीन की मौजूदगी पिछले दशक में तेजी से बढ़ी है. चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा, पाकिस्तान के ग्वादर और म्यांमार के क्यौकफ्यू जैसे पोर्ट्स में निवेश किया है. भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अपने समुद्री हितों की रक्षा करे. ग्रेट निकोबार की लोकेशन भारत को मलक्का स्ट्रेट के सामने एक मजबूत रणनीतिक आधार देती है. जरूरत पड़ने पर यहां से निगरानी और सैनिक एक्शन दोनों संभव हैं. इसे इंडो-पैसिफिक रणनीति के बड़े फ्रेमवर्क में भी देखा जा रहा है.
पर्यावरण की चिंता: क्या दांव पर है?
अब कहानी का दूसरा पक्ष. ग्रेट निकोबार कोई खाली जमीन नहीं है. यह घने जंगलों, मैंग्रूव, कोरल रीफ और दुर्लभ जीवों का घर है. यह इलाका बायोस्फीयर रिजर्व घोषित है. यहीं पर दुर्लभ लेदरबैक कछुए प्रजनन करते हैं. पर्यावरणविदों का कहना है कि बड़े पैमाने पर जंगल कटेंगे, कोस्टल इकोसिस्टम प्रभावित होगा और समुद्री जीवन को खतरा होगा. क्लाइमेट चेंज के दौर में जब समुद्री जलस्तर बढ़ रहा है, तब इतने बड़े तटीय इंफ्रास्ट्रक्चर का जोखिम भी बड़ा है. इन्हीं सब चिंताओं को समेट सोनिया गांधी ने एक विस्तृत लेख भी लिखा था. जिसमें पर्यावरण, जीव जंतुओं और स्थानीय जनजाति के भविष्य की अनदेखी करने का आरोप लगाया गया. सरकार का कहना है कि सभी पर्यावरणीय मंजूरियां ले ली गई हैं और ‘मिटिगेशन प्लान’ तैयार है. जिसमें किसी भी तरह के नुकसान से बचाव का खाका तैयार किया गया है. लेकिन बहस अभी खत्म नहीं हुई है.
वनवासी समुदाय का क्या होगा?
ग्रेट निकोबार सिर्फ जैव विविधता का केंद्र नहीं है, बल्कि यहां शोंपेन और निकोबारी जैसी जनजातियां भी रहती हैं. ये समुदाय सदियों से यहां की प्रकृति के साथ संतुलन में जीते आए हैं. बड़े पैमाने पर विकास का मतलब है बाहरी आबादी का आना. और नए सोशल स्ट्रक्चर का मतलब है पारंपरिक जीवनशैली पर असर. सरकार के अनुसार आदिवासी अधिकारों की रक्षा होगी. लेकिन विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या इतना बड़ा प्रोजेक्ट बिना कल्चर पर असर डाले संभव है?
पर्यावरणविदों की सबसे बड़ी चिंता ग्रेट निकोबार द्वीप पर रहने वाले शोंपेन आदिवासियों को लेकर है, जिनकी संख्या 200 से 300 के बीच ही है. आशंका जताई जा रही है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा खतरा विलुप्ति की कगार पर खड़ी इस जनजाति पर ही मंडरा रहा है. (फोटो – Anthropological Survey of India)
विकास बनाम संरक्षण: असली टकराव
यह बहस नई नहीं है. एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास का तर्क है. दूसरी तरफ पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की चिंता. क्या भारत अपने रणनीतिक हितों के लिए पर्यावरण के जोखिम उठा सकता है? क्या विकास और संरक्षण के बीच संतुलन संभव है? यह वही क्लासिक बहस है जो बड़े बांधों, हाईवे और इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट में पहले भी देखी गई है.
बजट और प्रोजेक्ट की टाइमलाइन
इस परियोजना की अनुमानित लागत कई अरब डॉलर बताई जा रही है. इस पूरे प्रोजेक्ट की इंचार्ज ANIIDCO (Andaman and Nicobar Islands Integrated Development Corporation) के मुताबिक पूरे प्रोजेक्ट पर लगभग 90 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे. ये प्रोजेक्ट कई चरणों में पूरा होगा. पहले चरण में पोर्ट और एयरपोर्ट पर फोकस रहेगा. उसके बाद टाउनशिप और अन्य सुविधाएं विकसित की जाएंगी. सरकार इसे 2040 तक एक पूर्ण विकसित समुद्री और लॉजिस्टिक हब के रूप में देख रही है.
क्या यह भारत का सिंगापुर बनेगा?
इस प्रोजेक्ट के समर्थक कहते हैं कि अगर सिंगापुर एक छोटे द्वीप से वैश्विक व्यापार केंद्र बन सकता है, तो भारत क्यों नहीं? लेकिन आलोचक कहते हैं कि हर द्वीप सिंगापुर नहीं बन सकता. वहां दशकों की स्थिर नीति, निवेश और भौगोलिक स्थिति का कॉम्बिनेशन था. ग्रेट निकोबार को भी उसी स्तर के लांग टर्म प्लान, पारदर्शिता और पर्यावरण संतुलन की जरूरत होगी. फिलहाल परियोजना को मंजूरी मिल चुकी है. प्रारंभिक काम शुरू हो चुका है. लेकिन अदालतों, पर्यावरण समूहों और रणनीतिक विशेषज्ञों की नजर इस पर बनी हुई है.
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान नहीं है. यह भारत की समुद्री सोच, उसकी आर्थिक महत्वाकांक्षा और पर्यावरणीय प्रतिबद्धता की परीक्षा भी है. आने वाले दशक में यह तय होगा कि यह परियोजना भारत को हिंद महासागर का मजबूत स्तंभ बनाती है या पर्यावरण और सामाजिक सवालों में उलझा देती है. फिलहाल इतना तय है कि ग्रेट निकोबार अब सिर्फ एक दूरस्थ द्वीप नहीं रहा. जहां भारत की सबसे दक्षिणी जमीन इंदिरा पाइंट मौजूद है. जिसका नजारा लेने कभी भारत के प्रधानमंत्री ओर कुछ पर्यटक जाया करते रहे हैं. यह भारत की समुद्री राजनीति का केंद्र बन रहा है. (धीरेंद्र राय )
