खण्डहर ही बचे हैं कुमाऊँ के चंद राजा देवीचंद के किले के
ये खंडहर कुमाऊँ के उस राजा के महल के हैं, जिसने एक समय मुग़ल साम्राज्य पर चढ़ाई कर आधे हिंदुस्तान पर अधिकार करने का सपना देख लिया था। इसी महल में बाद में उसके अपने मंत्रियों ने उसकी हत्या कर दी। यह कहानी है कुमाऊँ के चंद राजा देवीचंद की और ये खंडहर कोटाबाग के निकट स्थित देवीमहल के है, राजा देवीचंद के शीतकालीन प्रवास और राजकीय विश्राम का स्थान था, जहाँ आज देवीपुरा नामक गाँव बस चुका है।
लगभग 1724-25 ईस्वी के बीच, स्वयं को तैमूरी शहज़ादा बताने वाला साबर शाह कुमाऊँ पहुँचा। उसने राजा देवीचंद को विश्वास दिलाया कि मुग़ल साम्राज्य अब कमज़ोर हो चुका है और यदि कुमाऊँ उसका साथ दे तो वे मिलकर मैदानों में अपनी सत्ता स्थापित कर सकते हैं। कहा जाता है कि साबर शाह ने देवीचंद को यहाँ तक आश्वासन दिया कि सफलता मिलने पर हिंदुस्तान की सत्ता आपस में बाँट ली जाएगी।
इसी समय एक अफ़ग़ान गुलाम दाऊद ख़ान भी देवीचंद की सेवा में आया। The Later Mughals के अनुसार दाऊद ख़ान मूलतः अफ़ग़ानिस्तान से भागकर कटेहर (रुहेलखंड) आया था। पहले वह राजपूत ज़मींदार मुदार शाह की सेवा में रहा और बाद में अपनी सैनिक प्रतिष्ठा के कारण कुमाऊँ के राजा देवीचंद की सेना में शामिल हो गया। राजा ने उसे अपनी तराई की सेना का प्रमुख सेनापति बना दिया और उसके अधीन सैकड़ों पठान भाड़े के सैनिक रखे गए।
देवीचंद, साबर शाह और दाऊद ख़ान के नेतृत्व में एक संयुक्त शक्ति तैयार हुई जिसने मुग़ल सत्ता को चुनौती देने का प्रयास किया। मुरादाबाद के मुगल फ़ौजदार अज़मतउल्लाह ख़ान से संघर्ष हुआ, । अख़बार-उल-सनादीद के अनुसार दाऊद ख़ान युद्ध से पहले ही अज़मतउल्लाह ख़ान से मिल गया और युद्ध के समय उसने देवीचंद का साथ नहीं दिया। परिणामस्वरूप देवीचंद की योजना ध्वस्त हो गई और उसकी कुमैय्या सेना को पराजय का सामना करना पड़ा।
मौलवी हकीम मोहम्मद नजमुल ग़नी नजमी रामपुरी द्वारा रचित ऐतिहासिक ग्रंथ ‘अख़बार-उस-सनादीद’ के अनुसार, युद्ध के बाद राजा देवीचंद ने दाऊद ख़ान पर तत्काल कोई क्रोध प्रकट नहीं किया। इसके विपरीत, उन्होंने उस पर और अधिक कृपा दिखानी शुरू की ताकि उसे किसी षड्यंत्र का संदेह न हो। बाद में वेतन और इनाम देने के बहाने उसे नगीना (बिजनौर)में बुलवाया गया।
“जब दाऊद ख़ान उपस्थित हुआ, तो उसे अचानक बंदी बना लिया गया। इसके बाद राजा के आदेश पर उसके दोनों पैर कटवा दिए गए। पहले घुटनों के नीचे से उसके पाँव अलग किए गए , आंखे निकाल दी गई और फिर उसकी गर्दन की नसें खिंचवाकर उसका वध कर दिया गया। मृत्यु के पश्चात उसके शव को कोसानुल नदी(कोसी नदी?)के किनारे दफना दिया गया।”
— मौलवी हकीम मोहम्मद नजमुल ग़नी नजमी रामपुरी, अख़बार-उल-सनादीद, भाग-1(p 78)
विडम्बना यह है कि जिस दाऊद ख़ान को कुमाऊँ दरबार ने कभी अपना सेनापति बनाया था, वही व्यक्ति और उसका उत्तराधिकार आगे चलकर उत्तर भारत के इतिहास की दिशा बदलने वाले सिद्ध हुए। दूसरी ओर राजा देवीचंद का शासनकाल चंद वंश के पतन के आरम्भिक चरणों में गिना जाता है।
स्रोत:
The Later Mughals vol 2,p 120(William Irvine),
Akhbar-ul-Sanadeed (मौलवी हकीम मोहम्मद नजमुल ग़नी नजमी रामपुरी(p 78)
कुमाऊँ का इतिहास (बद्रीदत्त पांडे)
