जयंती:गांधी के “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम” में भी महामना मालवीय की दृष्टि हिंदू सुरक्षा
“महामना का राष्ट्र के नाम अंतिम सन्देश”
सन् १९४६ में क्रिप्स मिशन भारत की स्वाधीनता की चर्चा करने के लिए भारत आया था। जब महामना मदन मोहन मालवीय को पता चला कि देश का विभाजन हो रहा है । तब वे ८५ वर्ष की उम्र में अस्वस्थ होते हुए भी गाँधी से मिलने दिल्ली गए। उन्होंने गाँधी से कहा कि “देश की स्वतंत्रता का सौदा देश विभाजन से न किया जाये।” गाँधी ने उन्हें आश्वासन दिया, लेकिन बाद में सीधी कार्यवाई और नोआखाली जैसे जघन्य नरसंहार हुए। महामना का मन बहुत ही व्यथित मन महामना ने देश के नाम अपना अंतिम सन्देश लिखा। इस सन्देश में उन्होंने हिन्दू समाज का भावी मार्गदर्शन किया। उनके सन्देश की भाषा और शब्द इतने यथार्थ हैं कि आज के बड़े-बड़े सेक्युलर ही नहीं, गैर सेक्युलर लोग भी उसे सुन पढ़कर अन्दर तक कम्पित हो जायेंगे। उसका बहुत छोटा साधारण अंश यहाँ दिया जा रहा है, जो आज के कश्मीर, बंगाल और केरल के विषय में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत के विषय में यथार्थ सत्य है।
“पिछले कुछ महीनों से हिन्दुओं के ऊपर सोच-समझकर जो अगणित अत्याचार किये जा रहे हैं उनमें कुछ ये हैं – जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन, हिन्दू नर-नारी और बच्चों के साथ बर्बरता पूर्ण व्यवहार, स्त्रियों का बलात्कार और शिशुओं की निर्मम हत्या, पवित्र स्थानों, मंदिरों का ध्वंस एवं हिन्दू दुकानों, निवास स्थानों की लूट।
हिन्दुओं को आज अपने आप के संरक्षण की बड़ी आवश्यकता है। बर्बरतापूर्ण आक्रमण, मिथ्या राजनीतिक प्रचार अथवा मेल-मिलाप नीति की मिथ्या कल्पना या निर्जीव बना देने वाले तत्त्वज्ञान के द्वारा हिन्दू अपने धर्म को मरने देना नहीं चाहते, अपनी संस्कृति को मिटने देना नहीं चाहते, और न ही अपनी संख्या को घटने देना चाहते हैं। यदि हिन्दू अपनी रक्षा नहीं करेंगे तो वे मर जायेंगे| यदि वे अपना संगठन नहीं करेंगे तो उनके नष्ट होने में देर न लगेगी। यदि वे पिछड़े रहे तो क्रियारहित निर्जीव बना दिए जायेंगे। उन्हें अकर्मण्य बिलकुल नहीं रहना चाहिए। उनमें आत्मविश्वास होना चाहिए। उनमें अवश्य ही साहस होना चाहिए। —मैं इस प्रकार की प्रेरणा करना अपना कर्तव्य समझता हूँ, क्योंकि इस समय मानवता दांव पर लगी हुई है ।— हिन्दू एक होकर सेवा और सहायता के साधनों को परिपुष्ट करें और अपनी रक्षा और अपने स्वत्व को प्रभावशाली बनायें।”
— महामना मदन मोहन मालवीय
✍🏻 डॉ चंद्र प्रकाश सिंह से साभार
25 दिसम्बर, महामना पुण्य स्मरण दिवस….
महामना मदन मोहन मालवीय का जन्मदिवस. जिन्होंने देश, सनातन, हिंदुत्व हेतु अविस्मरणीय कार्य किये. गंगा स्वच्छता अभियान उनके ही हाथों शुरु हुआ था.
चौरी-चौरा कांड में अंग्रेजों का थाना जलाने वाले भारतीयों का मुकदमा मालवीय ने ही लड़ा था. जिसमें उन्होंने करीब 150 निर्दोष भारतीयों को जेल, कालापानी, फांसी जैसी बड़ी सजाओं से बचाया. लेकिन इतिहास में उनके योगदान को भुला दिया गया.
हिन्दुत्व आराधक महामना मदनमोहन मालवीय
आज कुछ कचोट के साथ मैं उस प्रसिद्ध व्यक्ति की स्मृति दिलाना चाहूंगा, जिनका लोगों की स्मृतियों में वह स्थान नहीं है, जिसके वह अधिकारी थे। मैं पंडित मदनमोहन मालवीय की बात कर रहा हूं। उनकी जयंती आज है। एक अच्छे निबंधकार को जरूरी है कि वह अपने लेखन को ऐतिहासिक घटनाओं की डायरी बनने से बचाए, पर मालवीय के मामले में यह जरूरी है। इसके बिना उनके इंद्रधनुषी व्यक्तित्व का अंकन असम्भव है।
गुलाम भारत में इतने विशाल दृष्टि के नेता अंगुलियों के पोरों से भी कम हुए। मालवीय राजनेता थे, शिक्षाविद् थे, बैरिस्टर थे, पर ये उनके बहुरंगी व्यक्तित्व के अलग-अलग रंग हैं। इन सारे रंगों को मिला दें, तो एक ऐसा इंद्रधनुष बनता है, जिसने अपने जीवनकाल में जो आलोक बिखेरा, वह आज भी भारतीयों को आलोकित कर रहा है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय इसका जीता-जागता उदाहरण है।
19वीं शताब्दी के गुलाम भारत में जन्मे महामना ने यह तथ्य जान लिया था कि राजनीतिक आजादी तभी अर्थवान बनेगी, जब हम प्रगतिकामी और संस्कारशील नौजवान गढ़ने में सफल होंगे। इसके लिए विश्व-स्तरीय विश्वविद्यालय जरूरी था, पर वह बने कैसे? वह करोड़पति परिवार से नहीं थे कि अपनी संपत्ति का एक हिस्सा दान कर दानवीर कहलाने का गौरव अर्जित करते। यह बेहद कठिन काम था। अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी राज की शुरुआत के साथ ही हमारी पारंपरिक शिक्षा की भी कमर तोड़ दी थी। ऐसे में, विश्वविद्यालय की स्थापना का विचार भर उनको चौकन्ना करने को काफी था। जिन दानवीरों से दान लेना था, उन्हें भी यकीनन यह संकोच रहा होगा कि कहीं अंग्रेज साहब बहादुर की नजर टेढ़ी न हो जाए। वह राजाओं, महाराजाओं और नगर सेठों का समय था। वे तीर्थों के अलावा किसी और मामले में भारत को समग्र दृष्टि से देखने के अभ्यस्त नहीं थे। कहीं दूर वाराणसी में विश्वविद्यालय को दान देने हेतु उन्हें मनाना इस वजह से भी आसान न था।
उन्होंने इसके लिए कैसे-कैसे पापड़ बेले, इसका अंदाज सिर्फ इस किस्से से हो जाएगा। हैदराबाद के निजाम बेहद कंजूस थे। वह अपने परिजनों तक को जरूरी खर्च नहीं देते थे, ऐसे में उनसे दान ले लेने की सोचना तक दुस्साहस था। दृढ़ निश्चय के धनी मालवीय उन तक से इतनी बड़ी धनराशि ले आए कि विश्वविद्यालय में आज भी ‘निजाम हैदराबाद कॉलोनी’ है, जहां दर्जनों शिक्षक सपरिवार रहते हैं। मेरी दृष्टि में उसकी जगह दिल्ली के हैदराबाद हाउस से कम नहीं।
ऐसे ही मनाते, झगड़ते, जूझते, उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नींव रखी। इसके लिए जरूरी था कि शीर्षस्थ विषय-विशेषज्ञ वहां रखे जाए। तब शिक्षा का इतना प्रसार नहीं था। गिने-चुने भारतीय विद्वान थे और वे भी अपनी भूमि छोड़ने को तैयार नहीं थे। मालवीय ने देश-विदेश के विद्वानों को दानदाताओं की तरह काफी परिश्रम से मनाया। उन्होंने प्राच्य विद्याओं से लेकर खनन जैसे विभागों की स्थापना की और सभी तरह के संकाय बनाए। यह ऐसा अनूठा विश्वविद्यालय था, जहां टाई पहनकर विदेशी प्रोफेसर इंजीनिर्यंरग अथवा साइंस पढ़ाते, तो प्राच्य विद्या संस्थान में भारतीय वेशभूषा के प्राचार्य सुशोभित होते। हिंदू विश्वविद्यालय सच्चे अर्थों में ‘सर्वविद्या की राजधानी’ बना।
बहुत कम लोग जानते हैं कि 4 फरवरी, 1922 को हुए चौरी-चौरा कांड में 172 लोगों को फांसी की सजा हुई थी। मालवीय समाजसेवा और राजनीति के कारण वकालत छोड़ चुके थे, पर उन्हें लगा कि इन गरीब-गुरबों पर उनके रहते अंग्रेजों का अंधा इंसाफ मौत बनकर झपट पडे़गा, यह उचित नहीं। इन वंचितों के पक्ष में वह वकील बने और 153 लोग मुक्त करा लाए। भगत सिंह की फांसी रुकवाने को भी उन्होंने वायसराय से अपील की थी। अगर उनकी बात मान ली गई होती, तो शायद प्रचलित राजनीति की धारा बदल गई होती।
प्रसंगवश बता दूं कि दिल्ली से हिन्दुस्तान टाइम्स,इलाहाबाद से लीडर के साथ अभ्युदय के प्रकाशन से भी वह जुड़े थे। अगर कुछ पल ठहर उनके बारे में सोचें, तो पाएंगे कि जन-जागृति को जरूरी शिक्षा, लैंगिक समानता, भेद-भाव रहित समाज, मीडिया और न्याय हर क्षेत्र पर उनकी नजर थी, हरेक में उनका योगदान था। रवींद्रनाथ ठाकुर ने उन्हें यूं ही उन्हें ‘महामना’ नहीं कहा…
✍🏻साभार
असहयोग आंदोलन वापस लेने के साथ ही गाँधीजी ने 200 लोगों को अंग्रेजों के हाथों क्रूर मौत के लिए छोड़ दिया था। फिर उन्हें बचाने के लिए एक ऐसा व्यक्ति सामने आया, जिसने वकालत कब की छोड़ दी थी। चौरी चौरा कांड के बारे में सभी को पढ़ाया जाता है। ये जगह गोरखपुर में देवरिया हाइवे की तरफ स्थित है। फरवरी 1922 में यहाँ थाने में 22 पुलिसकर्मियों को जिंदा जला दिया गया था, जिसके बाद बिना कुछ देखे-सुने गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया और कहा कि भारत के लोग अभी स्वतंत्रता को तैयार ही नहीं हैं। लेकिन, क्या सब कुछ वैसा ही था जैसा बताया गया?
असल मे चौरी चौरा की पुलिस जालियाँवाला बाग की राह पर निकल पड़ी थी और वहाँ अहिंसक आंदोलनकारियों से क्रूरता की थी। पुलिस ने उन पर गोलीबारी की और पिटाई की। बच्चों और महिलाओं तक को नहीं छोड़ा था। परिणाम ये कि लोगों ने जवाब दिया और पुलिस स्टेशन को ही आग के हवाले कर दिया। बाजार में धड़ल्ले से शराब बिक रही थी और खाने-पीने की चीजें महँगी हो गई थी, इसीलिए ये आंदोलन हुआ था। लेकिन, पुलिस ने आंदोलनकारियों को थाने के लॉकअप में बंद कर दिया। भगवान अहीर उनका नेतृत्व कर रहे थे।
पुलिस ने अहिंसक आंदोलनकारियों पर गोलीबारी की,जो गाँधीजी के आह्वान पर सड़कों पर निकल आए थे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि जब उन पर विपत्ति आएगी तो उनका नेता ही उन्हें छोड़ कर न सिर्फ भाग निकलेगा,बल्कि उनकी निंदा भी करेगा। क्रिया- प्रतिक्रिया में थाना जलाया गया था। करीब 200 लोगों की धर-पकड़ हुई। अंग्रेजों ने 172 को फाँसी की सजा सुनाई। उन सबकी मौत निश्चित थी, जैसा अगले 9 वर्षों बाद भगत सिंह सहित 3 क्रांतिकारियों के साथ हुआ था। लेकिन, ऐसे समय बाबा विश्वनाथ के एक महान भक्त ने उन्हें बचा लिया।
पंडित मदन मोहन मालवीय ने वकालत छोड़ दी थी। लेकिन, गाँधीजी का ये अन्याय उनसे देखा नहीं गया। अपने न्यायिक करियर में उन्होंने न तो कभी गलत का पक्ष लिया था, न ही सच्चाई का साथ देना हो तो घुटने टेके थे। वकालत से संन्यास के बावजूद उन्होंने अपनी काली कोट को एक बार फिर से पहना और चौरी चौरा कांड में फँसे भारतीयों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने की ठानी। देश में अधिवक्ता और भी थे, लेकिन कोई गाँधीजी के विरुद्ध जाने की हिमाकत नहीं कर सकता था। नेहरू और पटेल तक भी इस मामले में गाँधीजी के साथ ही थे।
महामना ने जब अदालत में इस मामले में भारतीयों की पैरवी शुरू की तो ये सुनवाई ब्रिटिश इंडिया के सबसे रोचक मामलों में आ गई। उन्होंने अपनी दलीलों से अंग्रेजों को चित किया और 150 से भी अधिक लोगों को मौत के फंदे से बचाया। यहाँ तक कि फैसला सुनाने वाला जज भी अंत में बोल उठा कि अगर कोई और वकील होता तो न सिर्फ इस केस को डिफेंड करना मुश्किल था, बल्कि लोग इसके कई पहलुओं से अनजान ही रह जाते। इसी तरह भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के समय भी बाकी वकीलों को साँप सूँघ गया था। तब भी महामना ही आगे आए।
देश मे तमाम बड़े वकीलों के बीच 70 वर्ष की अवस्था पर कर चुके महामना ने वायसराय के पास अपील की। उनकी अपील स्वीकृत ही नहीं की गई, वरना इतिहास में एक अलग ही मोड़ आ जाता। 4 बार कांग्रेस अध्यक्ष बनने, बड़े-बड़े केस जीतने और BHU जैसे विशाल शैक्षिक संस्थान की स्थापना के बावजूद मोदी सरकार के आने से पहले तक उन्हें ‘भारत रत्न’ नहीं दिया गया। इसका कारण सिर्फ ये था कि वो हिंदुत्व में विश्वास रखते थे, हिंदुओं को एक करने के लिए दलितों को साथ लिया और उन्होंने आधुनिकता के नाम पर आने वाले सुधार कानूनों का विरोध किया था।
उनका मत था कि भारतीय परम्परा में छेड़छाड़ करने से पहले लोगों को आश्वस्त करना और उनकी राय लेना आवश्यक है। जब BHU में इंजीनियरिंग कॉलेज का प्रिंसिपल 1 लाख रुपए माँग रहा था तो उन्होंने बाबा विश्वनाथ से कहा कि वो ही अब कुछ करें। थोड़ी ही देर बाद एक राजा के यहाँ से 5 लाख रुपए का दान आ गया। एक ऐसा भी समय आया जब BHU पर 16 लाख का कर्ज हो गया था और 30,000 तत्काल अंग्रेज सरकार को देने थे। हर जगह अपील की लेकिन हिन्दू नाम वाले संस्थानों को शक की दृष्टि से देखने वाले ब्रिटिश ने उनकी बात न सुनी।
अंत में वो फिर वही पहुँचे – बाबा विश्वनाथ के दरबार में। संस्कृत श्लोकों का उच्चारण करते हुए तब मंदिर के ही एक कोने में तब तक आँसू बहाते रहे, तब तक कपाट बंद होने का समय नहीं आ गया। घर लौटते ही फोन आया कि उन्होंने कर्ज चुकाने के लिए 3 साल के समय की जो अपील की थी, वो मंजूर कर ली गई है। ये सब उन्होंने असहाय होकर नहीं किया, बल्कि ईश्वर में उनकी अटूट श्रद्धा ही ऐसी थी। ‘अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे न दैन्यं न पलायनम्।’ – उनका ध्येवाक्य था। अर्थात, अर्जुन की दो ही प्रतिज्ञा थी – पहली, ना तो दीनता दिखाऊँगा और न ही पलायन करूँगा।
एक और सुखद संयोग देखिए कि महामना के जन्म के 63 वर्षों बाद इसी तारीख को जन्मे एक और युगपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी से जब पूछा गया था कि क्या उनका मन नहीं करता कि अब राजनीति छोड़ कर कहीं दूर चले जाएँ, तो उन्होंने भी इसी श्लोक के माध्यम से जवाब दिया था। इसी से प्रेरित होकर उन्होंने ये पंक्तियाँ भी लिखीं:
हार नहीं मानूँगा,
रार नई ठानूँगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ
महामना ने हिंदी और अंग्रेजी, दोनों ही भाषाओं के समाचारपत्रों में संपादक का दायित्व संभाला, लेकिन बाद में पूर्णतया हिंदी भाषा पर ही उनका जोर रहा क्योंकि मातृभूमि से उनका प्रेम ही वैसा था। मैंने कहीं ये भी पढ़ा था कि वो उच्चारण को लेकर वो इतने कड़े थे कि ‘Student’ को ‘सटूडेंट’ और ‘Literature’ को ‘लिटरेटयोर’ कहा करते थे – एकदम विशुद्ध उच्चारण। राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में अंग्रेज मानने को तैयार ही नहीं थे कि वो ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से नहीं पढ़े हैं। कांग्रेस के सारे अंग्रेजी ड्राफ्ट उनकी प्रूफरीडिंग के बिना नहीं भेजे जाते थे। लेकिन, उन्होंने सब छोड़ कर सेवा हिंदी की ही की।
✍🏻Anupam K. Singh की पोस्ट:
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का नाम आते ही हिन्दुत्व के आराधक पंडित मदनमोहन मालवीय की तेजस्वी मूर्ति आँखों के सम्मुख आ जाती है। 25 दिसम्बर, 1861 को इनका जन्म हुआ था। इनके पिता पंडित ब्रजनाथ कथा, प्रवचन और पूजाकर्म से ही अपने परिवार का पालन करते थे।
प्राथमिक शिक्षा पूर्ण कर मालवीय ने संस्कृत तथा अंग्रेजी पढ़ी। निर्धनता में इनकी माताजी ने अपने कंगन गिरवी रखकर इन्हें पढ़ाया। इन्हें यह बात बहुत कष्ट देती थी कि मुसलमान और ईसाई विद्यार्थी तो अपने धर्म के बारे में खूब जानते हैं; पर हिन्दू इस दिशा में कोरे रहते हैं।
मालवीय संस्कृत में एम.ए. करना चाहते थे; पर आर्थिक विपन्नता के कारण उन्हें अध्यापन करना पड़ा। उत्तर प्रदेश में कालाकांकर रियासत के नरेश इनसे बहुत प्रभावित थे। वे ‘हिन्दुस्थान’ नामक समाचार पत्र निकालते थे। उन्होंने मालवीय को बुलाकर इसका सम्पादक बना दिया। मालवीय इस शर्त पर तैयार हुए कि राजा साहब कभी शराब पीकर उनसे बात नहीं करेंगे। मालवीय के सम्पादन में पत्र की सारे भारत में ख्याति हो गयी।
पर एक दिन राजासाहब ने अपनी शर्त तोड़ दी। अतः सिद्धान्तनिष्ठ मालवीय ने त्यागपत्र दे दिया। राजासाहब ने उनसे क्षमा माँगी; पर मालवीय अडिग रहे। विदा के समय राजासाहब ने यह आग्रह किया कि वे कानून की पढ़ाई करें और इसका खर्च वे उठायेंगे। मालवीय ने यह मान लिया।
दैनिक हिन्दुस्थान छोड़ने के बाद भी उनकी पत्रकारिता में रुचि बनी रही। वे स्वतन्त्र रूप से कई पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे। इंडियन यूनियन, भारत, अभ्युदय, सनातन धर्म, लीडर, हिन्दुस्तान टाइम्स….आदि हिन्दी व अंग्रेजी के कई समाचार पत्रों का सम्पादन भी उन्होंने किया।
उन्होंने कई समाचार पत्रों की स्थापना भी की। कानून की पढ़ाई पूरी कर वे वकालत करने लगे। इससे उन्होंने प्रचुर धन अर्जित किया। वे झूठे मुकदमे नहीं लेते थे तथा निर्धनों के मुकदमे निःशुल्क लड़ते थे। इससे थोड़े ही समय में ही उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गयी। वे कांग्रेस में भी बहुत सक्रिय थे।
हिन्दू धर्म पर जब भी कोई संकट आता, मालवीय तुरन्त वहाँ पहुँचते थे। हरिद्वार में जब अंग्रेजों ने हर की पौड़ी पर मुख्य धारा के बदले बाँध का जल छोड़ने का षड्यन्त्र रचा, तो मालवीय ने भारी आन्दोलन कर अंग्रेजों को झुका दिया। हर हिन्दू के प्रति प्रेम होने के कारण उन्होंने हजारों हरिजन बन्धुओं को ॐ नमः शिवाय और गायत्री मन्त्र की दीक्षा दी। हिन्दी की सेवा और गोरक्षा में उनके प्राण बसते थे। उन्होंने लाला लाजपतराय और स्वामी श्रद्धानन्द के साथ मिलकर ‘अखिल भारतीय हिन्दू महासभा’ की स्थापना भी की।
मालवीय के मन में लम्बे समय से एक हिन्दू विश्वविद्यालय बनाने की इच्छा थी। काशी नरेश से भूमि मिलते ही वे पूरे देश में घूमकर धन संग्रह करने लगे। उन्होंने हैदराबाद और रामपुर जैसी मुस्लिम रियासतों के नवाबों को भी नहीं छोड़ा। इसी से लोग उन्हें विश्व का अनुपम भिखारी कहते थेे।
अगस्त 1946 में जब मुस्लिम लीग ने सीधी कार्यवाही के नाम पर पूर्वोत्तर भारत में कत्लेआम किया, तो मालवीय रोग शय्या पर पड़े थे। वहाँ हिन्दू नारियों पर हुए अत्याचारों की बात सुनकर वे रो उठे। इसी अवस्था में 12 नवम्बर, 1946 को उनका देहान्त हुआ। शरीर छोड़ने से पूर्व उन्होंने अन्तिम संदेश के रूप में हिन्दुओं के नाम बहुत मार्मिक वक्तव्य दिया था।
1906 की बात है।
त्रिवेणी संगम पर कुंभ मेला लगा था। पंडित मालवीय पर धुन सवार थी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। मेले में मालवीय घूम-घूमकर लोगों को यही एक ही बात बता रहे थे। कैसे बीएचयू की स्थापना का उन्होंने पुनीत संकल्प लिया है। लोग उनकी बात सुनते जरूर मगर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते। कुछ लोग अनसुनी कर चले जाते। मगर मालवीय की बातों का एक वृद्ध माता पर जादुई असर हुआ। माताजी नजदीक आईं और पोटली खोलकर एक पैसा मालवीय जी के हाथ में रख दिया। बोलीं-बेटा खर्च में से यही बचा है, ये लेकर रख लो। उस एक पैसे को हाथ में लेकर मालवीय बड़ी देर तक निहारते रहे, फिर उस एक पैसे के चंदे से उन्हें प्रेरणा मिली। यह प्रेरणा थी कि क्यों न चंदा जुटाकर वे विश्वविद्यालय की संकल्पना को धरातल पर उतारें। इसी विचार के दम पर 1300 एकड़ में एक ऐसे संस्थान की स्थापना की, जिसकी कीर्ति पताका आज भी फहरा रही है।
फिर मालवीय जी ने देशभर में चंदे के लिए तूफानी दौरा शुरू किया। पेशावर से लेकर कन्याकुमारी तक अथक दौड़-भाग कर महामना ने उस जमाने में एक करोड़ 64 लाख रुपये का चंदा जुटाया।
धनराशि की व्यवस्था हो गई। अब चिंता थी जमीन की। सोचा कि काशी नरेश से मदद लेते हैं। पहुंच गए घाट पर। गंगा स्नान का वक्त था। काशी नरेश डुबकियां लगाकर बाहर आए तो मालवीय ने जमीन मांग ली। हंसते हुए काशी नरेश बोले-जमीन तो दूंगा, मगर शर्त के साथ। शर्त है कि सूरज अस्त होने तक जितनी जमीन पैदल चलकर नाप लोगो, उतनी मिलेगी। मालवीय जी जिद्दी तो थे ही। मालवीय ने जमीन नापनी शुरू कर दी। तब जाकर पंडित मालवीय चार फरवरी 1916 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नींव रखने में सफल हुए।
एक और दिलचस्प बात है कि जब मालवीय बीएचयू का सपना आंखों में लिए थे, उन दिनों एनी बेसेंट भी एक विश्विद्यालय की योजना पर काम कर रहीं थीं, उधर दरभंगा के महाराज रामेश्वर सिंह भी काशी में शारदा विद्यापीठ की स्थापना में जुटे थे। इन तीन विश्वविद्यालयों की योजना परस्पर विरोधी थी। आखिरकार मालवीय ने दोनों लोगों से बातचीत कर बीएचयू की स्थापना में सहयोग के लिए राजी कर लिया।
नतीजतन बीएचयू सोसाइटी की 15 दिसम्बर 1911 को स्थापना हुई, जिसके महाराज दरभंगा अध्यक्ष, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रमुख बैरिस्टर सुंदरलाल सचिव, महाराज प्रभुनारायण सिंह, मालवीय और ऐनी बेसेंट सम्मानित सदस्य रहीं। तत्कालीन शिक्षामंत्री सर हारकोर्ट बटलर की पहल पर 1915 में केंद्रीय विधानसभा से हिंदू यूनिवर्सिटी ऐक्ट पारित हुआ, जिसे तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिंज ने फौरन मंजूरी दी।
वसंत पंचमी के मौके पर 14 जनवरी 1916 को गंगातट के पश्चिम, रामनगर के समानांतर काशी नरेश से मिली जमीन पर बीएचयू का शिलान्यास हुआ। देश भर के आमो-खास और राजे-रजवाडों की मौजूदगी में हुए उस समारोह में गांधी जी भी विशेष आमंत्रण पर पधारे थे।
आज यह एशिया का सबसे बड़ा रिहायशी विश्वविद्यालय है। इसके दो परिसर हैं। काशी नरेश की दान की हुई 1300 एकड़ जमीन में मुख्य परिसर है। वहीं दूसरा परिसर मिर्जापुर जिले के बरकछा में है। पूरे 2700 एकड़ में फैला हुआ। 75 से अधिक छात्रावासों में 35 हजार से अधिक विद्यार्थी ज्ञानार्जन करते हैं। तीन दर्जन से अधिक देशों के छात्र भी यहां पढ़ते हैं।✍🏻शरद सिंह काशी वाले
