ज्ञान: श्रीमद्भगवत गीता के अतिरिक्त भी हैं सैंकडों गीता

कुल कितने प्रकार की गीता हैं और उनके नाम क्या-क्या हैं?

जब भी गीता की बात आती है तो हम सभी को भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए दिव्य ज्ञान का ही ध्यान आता है। निःसंदेह भगवद्गीता सर्वाधिक प्रसिद्ध है किन्तु आपको ये जानकर हैरानी होगी कि पुराणों में और भी कई गूढ़ ज्ञान का वर्णन है जिन्हे गीता कहा गया है। वैसे तो लगभग ३०० गीताओं का वर्णन मिलता है किन्तु यहां मुख्य ग्रंथों को जान लेते हैं:

श्रीमद्भगवद्गीता: ये सर्वाधिक प्रसिद्ध गीता है जिसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन का मोह भंग करने के लिए उन्हें गूढ़ ज्ञान की बात बताई थी। ये इतना प्रसिद्ध है कि आज गीता का अर्थ श्रीमद्भगवद्गीता ही माना जाता है। इसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इनमें से 1 श्लोक धृतराष्ट्र ने, 40 श्लोक संजय ने, 84 श्लोक अर्जुन ने और बांकी 575 श्लोक श्रीकृष्ण ने कहे हैं।
अणु गीता: इसमें भी श्रीकृष्ण और अर्जुन का ही संवाद है। ये वास्तव में श्रीमद्भगवद्गीता का ही पुनः उद्धरण है। इसका वर्णन हमें महाभारत में तब मिलता है जब युद्ध के पश्चात अर्जुन श्रीकृष्ण से पुनः वही ज्ञान देने को कहते हैं क्यूंकि उनके मन से उस ज्ञान का कुछ भाग लुप्त हो चुका था। तब श्रीकृष्ण उनसे कहते हैं कि उस ज्ञान को ठीक उसी प्रकार सुनाना असंभव है। फिर श्रीकृष्ण उसी लुप्त हुए ज्ञान को अणु गीता में अर्जुन को बताते हैं।
उत्तर गीता: ये भी श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच का संवाद है। युद्ध के पश्चात पांडवों ने हस्तिनापुर पर 36 वर्ष राज्य किया। इतने समय तक राज्य करने के कारण अर्जुन का मन सांसारिक चीजों में रम गया। तब उन्हें पता चला कि श्रीकृष्ण ने निर्वाण लेने का निर्णय किया है। उनके चले जाने पर ज्ञान का लोप हो जाता इसीलिए अर्जुन ने सांसारिक मोह को छोड़ कर फिर से उस ज्ञान को ऋषियों के साथ सुना। ज्ञान की वही गंगा उत्तर गीता के नाम से प्रसिद्ध हुई।
भिक्षु गीता: इसे श्रीमद्भगवद्गीता का भाग माना जाता है जिसमें श्रीकृष्ण ने उद्धव को एक भिक्षुक के रूप में मन को वश में करने का रहस्य बताया।
गोपी गीता: इसे भी भगवद्गीता का भाग माना जाता है जिसे वृन्दावन की गोपियों ने श्रीकृष्ण से बिछुड़ते समय गीत के रूप में गया। इसमें उनके प्रति असीम भक्ति के विषय में जानने को मिलता है।
उद्धव गीता: इसमें श्रीकृष्ण और उद्धव के बीच का संवाद है जिसमें श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय सखा को ज्ञान की अनेक बातें बताई। इसे श्रीकृष्ण द्वारा दी गयी अंतिम शिक्षाओं के रूप में देखा जाता है क्यूंकि इसके बाद श्रीकृष्ण ने निर्वाण ले लिया था।
नहुष गीता: इसका वर्णन हमें महाभारत में मिलता है जिसमें महाराज नहुष और युधिष्ठिर के बीच का संवाद है। सप्तर्षियों के श्राप के कारण नहुष सर्प योनि में एक अजगर के रूप में जन्में। उन्होंने मुक्ति के लिए एक लम्बी प्रतीक्षा की और जब भीम उनके पास आये तो उन्होंने उसे जकड लिया। तब अपने भाई को छुड़ाने के लिए युधिष्ठिर ने नहुष के कई गूढ़ प्रश्नों का उत्तर दिया जो नहुष गीता के नाम से विख्यात हुआ।
नारद गीता: इसमें देवर्षि नारद और श्रीकृष्ण का वार्तालाप है जिसमें जीवन में गुरु और आध्यात्मिक संरक्षक के महत्त्व को बताया गया है। इसका वर्णन हमें हरिवंश पुराण में मिलता है।
पांडव गीता: इसका एक नाम प्रपन्न गीता भी है जिसमें श्रीहरि के प्रति की गयी कई प्रार्थनाओं का संग्रह है। ये नारायण के प्रति पूर्ण समर्पण हो जाने के बारे में बताती है। इसमें से अधिकांश श्लोक पांडवों द्वारा रचित माने जाते हैं जब उन्होंने युद्ध के पश्चात अपने पापों के नाश के लिए श्रीहरि की स्तुति की थी।
शौनक गीता: इसमें महर्षि शौनक और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच का संवाद है जिसमें ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और उसकी संरचना के विषय में बताया गया है। इसका वर्णन हमें महाभारत के अरण्य पर्व में मिलता है।
व्याध गीता: ये भी एक प्रसिद्ध गीता है जिसका वर्णन महाभारत के वन पर्व में मिलता है। इसमें एक व्याध, उसकी पत्नी और एक संन्यासी, जो स्वयं को सिद्ध मानने लगा था, उसका वर्णन है। ये कथा महर्षि मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर को सुनाई थी और इसका वर्णन भागवत पुराण में भी है।
युधिष्ठिर गीता: इस गीता का वर्णन महाभारत में है जब धर्मराज एक यक्ष का रूप लेकर युधिष्ठिर की परीक्षा लेने आये। उनकी माया से भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव मृत हो गए और अंततः युधिष्ठिर ने उनके गूढ़ और कठिन प्रश्नों का सही सही उत्तर देकर उन्हें जीवित किया।
पराशर गीता: इस गीता का वर्णन हमें महाभारत के शांतिपर्व में मिलता है जिसमें महर्षि पराशर और मिथिला के सम्राट महाराज जनक के बीच का संवाद है। पराशर उप-पुराण में भी इस गीता का वर्णन है।
पिंगला गीता: महाभारत के शांति पर्व में वर्णित इस गीता में पितामह भीष्म और युधिष्ठिर का संवाद है। पिंगला एक प्रसिद्ध गणिका थी जिसमे मिले ज्ञान को इस गीता में सम्मलित किया गया है।
बोध्य गीता: इसमें महाराज ययाति और ऋषि बोध्य के बीच का संवाद है जिसका वर्णन महाभारत के शांति पर्व में है।
विचक्षु गीता: इसका वर्णन महाभारत के शांति पर्व में है जिसमें पितामह भीष्म और युधिष्ठिर के बीच का संवाद है। इसमें भीष्म युधिष्ठिर को अहिंसा की शिक्षा देते हैं। जीवहत्या से जो पाप मनुष्य को लगता है, उसका वर्णन भी इस गीता में है।
मणकी गीता: महाभारत के शांति पर्व में ही भीष्म युधिष्ठिर को मणकी मुनि की कथा सुनाते हैं। उसी प्रकरण का ज्ञान इस गीता में है।
व्यास गीता: ये गीता महर्षि व्यास द्वारा रचित ब्रह्म पुराण का भाग है। इसमें महर्षि व्यास अनेक ऋषियों को योग एवं अध्यात्म की शिक्षा देते हैं।
वृत्र गीता: इसका वर्णन भी महाभारत के शांतिपर्व में आता है जहाँ दैत्यराज वृत्रासुर और उनके गुरु शुक्राचार्य के बीच का संवाद है।
संपक गीता: इसका वर्णन भी महाभारत के शांतिपर्व में है जहाँ पितामह भीष्म युधिष्ठिर को संपक नाम के एक पवित्र ब्राह्मण के बारे में बताते हैं जिन्होंने ये शिक्षा दी थी कि प्रसन्नता एवं सुख केवल त्याग द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
हरिता गीता: इसका वर्णन भी महाभारत के शांति पर्व में भीष्म-युधिष्ठिर संवाद के दौरान आता है जिसमें भीष्म ऋषि हरिता द्वारा दी गयी संन्यास की शिक्षा के बारे में बताते हैं जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
भीष्म गीता: महाभारत में वर्णित ये गीता पितामह भीष्म द्वारा रचित श्लोकों से भरी है जिसमें वे महादेव और भगवान विष्णु की भांति-भांति से आराधना करते हैं।
ब्राह्मण गीता: महाभारत में वर्णित इस गीता में एक विद्वान ब्राह्मण और उनकी पत्नी के बीच का संवाद है जिसमें वे अपनी पत्नी को बताते हैं कि किस प्रकार माया के बंधन से बचा जा सकता है और मनुष्य के उच्चतम स्वरुप को प्राप्त किया जा सकता है।
सनत्सुजान गीता: महाभारत के उद्योग पर्व में वर्णित इस गीता में महर्षि सनत्सुजान एवं हस्तिनापुर के नरेश महाराज धृतराष्ट्र के बीच का संवाद है। इसमें मन, बुद्धि एवं ब्रह्म को प्राप्त करने के साधन के साधन के विषय में बताया गया है।
विदुर गीता: महाभारत में वर्णित ये भी बहुत प्रसिद्ध है जिसे आम भाषा में विदुर नीति भी कहा जाता है। इसमें हस्तिनापुर के महामंत्री महात्मा विदुर महाराज धृतराष्ट्र को देश, राज्य और राजनीती सम्बन्धी अनेक गूढ़ बातें बताते हैं।
भ्रमर गीता: श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित इस गीता में एक भ्रमर (मधु मक्खी) के माध्यम से गोपियों एवं श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त उद्धव के बीच का संवाद है।
वेणु गीता: भागवत पुराण में ही वर्णित इस गीता में गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण के वेणु (बांसुरी) के बारे में गूढ़ जानकारी दी गयी है।
बक गीता: इसमें देवराज इंद्र और महर्षि बक के बीच का संवाद है जिसमें महर्षि बक ने संसार के दुखों का वर्णन किया है जो प्राणियों के अपने कर्मों के अनुसार भोगनी पड़ती है। इसका वर्णन भी हमें महाभारत में मिलता है।
अष्टावक्र गीता: ये भी बहुत प्रसिद्ध गीता है जिसमें महर्षि अष्टावक्र और राजा जनक के बीच का संवाद है। ये स्वयं को जानने और अद्वैत वेदांत को समझाता है। ये आत्मा और इस नश्वर शरीर के विषय में भी बताता है। इसका मुख्य वर्णन महाभारत के वन पर्व में है और रामायण के कुछ अन्य संस्करणों में हमें इसके बारे में पता चलता है।
ब्रह्म गीता: इसका वर्णन रामायण में आता है जब ब्रह्मपुत्र वशिष्ठ अपने शिष्य श्रीराम को निर्वाण के प्रकार के बारे में बताते हैं। इसमें ब्रह्म, आत्मा और विश्व का गूढ़ ज्ञान दिया गया है। यही ज्ञान योग वशिष्ठ ग्रन्थ का भी भाग है।
जनक गीता: कुछ लोग अष्टावक्र गीता को ही जनक गीता कहते हैं किन्तु ये अलग है। इसका वर्णन तब आता है जब राजा जनक ने कुछ सिद्धों द्वारा गए गए एक गुप्त गीत को सुना और स्वयं से ही ज्ञान चर्चा की।
सिद्ध गीता: यही वो सिद्धों द्वारा गयी गयी गीता है जिसे महाराज जनक ने अपने राजभवन से सुना था। इसमें स्वज्ञान एवं इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने के विषय में बताया गया है। इसका वर्णन भी हमें योग वशिष्ठ के उपशांति प्रकरण में प्राप्त होता है।
राम गीता: इसमें श्रीराम द्वारा गूढ़ ज्ञान की बातें बताई गयी हैं। पुराणों में हमें दो राम गीता का वर्णन मिलता है। पहली राम गीता में श्रीराम और लक्ष्मण के बीच का संवाद है। इसमें जीव, विद्या, अविद्या, ईश्वर, माया और अद्वैत वेदांत के बारे में बहुत कुछ बताया गया है। इस गीता के बारे में हमें ब्रह्माण्ड पुराण में वर्णित अध्यात्म रामायण में मिलता है। दूसरी राम गीता में श्रीराम और हनुमान जी के बीच का संवाद है जिसमें ज्ञान और इस संसार को ना छोड़ने पर जोर दिया गया है। कहते हैं इसी गीता के बाद श्रीराम ने हनुमान जी को कल्प के अंत तक जीवित रहने का वरदान दिया था। इसका वर्णन हमें ज्ञान वशिष्ठ तत्व सरायण में मिलता है।
विभीषण गीता: इसमें श्रीराम और राक्षस राज विभीषण के बीच का संवाद है जो रामायण के अंतिम खंड – युद्ध कांड में वर्णित है। इसमें श्रीराम विभीषण को जीवन के संघर्ष और पीड़ा के विषय में बताते हैं।
हनुमद गीता: इसमें श्रीराम और माता सीता का हनुमान जी के साथ संवाद है जब वे रावण का वध कर पुनः अयोध्या आ जाते हैं।
अगस्त्य गीता: ये महर्षि अगत्स्य द्वारा रचित है जिसमें मोक्ष और धर्म की व्याख्या की गयी है। गुरु के निर्देश में भक्ति मार्ग से कोई जीव किस प्रकार परमात्मा को प्राप्त कर सकता है, इसमें उसके बारे में विस्तार से बताया गया है। इसका वर्णन हमें वाराह पुराण में मिलता है।
भरत गीता: ये भागवत पुराण का भाग है जिसमें चक्रवर्ती सम्राट भरत के विषय में विस्तार से बताया गया है जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत वर्ष पड़ा।
अवधूत गीता: महर्षि अत्रि के पुत्र भगवान दत्तात्रेय और भगवान कार्तिकेय के बीच के संवाद को इस गीता में बताया गया है। इसमें जीवात्मा और आत्मा के गूढ़ रहस्य को समझाया गया है। इसका वर्णन भी हमें स्कन्द पुराण में मिलता है।
ऋषभ गीता: इस गीता में महर्षि ऋभु और उनके शिष्य निगध के बीच का वार्तालाप है। इसमें अद्वैत वेदांत के विषय में बताया गया है जिसका वर्णन हमें उप पुराणों में से एक – श्री शिवरहस्य पुराण में मिलता है।
वशिष्ठ गीता: इसमें ब्रह्मर्षि वशिष्ठ और श्रीराम के बीच का संवाद है जिसमें अंतिम सत्य के विषय में बताया गया है। इसका वर्णन हमें योग वशिष्ठ के निर्वाण प्रकरण में मिलता है।
हंस गीता: ये भगवान विष्णु के २४ अवतारों में से एक हंस अवतार से जुड़ा है जिसमें श्रीहरि ने हंस के रूप में ब्रह्मा के पुत्रों को ज्ञान प्रदान किया था। इसमें संसार को माया और आत्मा को एकमात्र सत्य के रूप में उजागर किया गया है।
जीवन्मुक्त गीता: यह भगवान दत्तात्रेय द्वारा कहा गया है जिसमें जीवन्मुक्त जीव, अर्थात जिसनें अपने आत्मा के रहस्य को जान लिया हो, उसके बारे में बताया गया है। इसमें प्रकृति के गूढ़ रहस्यों के विषय में भी बताया गया है।
कपिल गीता: इसमें प्रजापति कर्दम के पुत्र कपिल मुनि और उनकी पत्नी (कपिल मुनि की माता) देवहुति के बीच का संवाद है। इसमें कपिल मुनि ने अपनी माता को आत्मा के गूढ़ रहस्य से परिचित करवाया है।
ऋषभ गीता: इसमें महर्षि ऋषभ द्वारा उनके पुत्रों को दी गयी शिक्षा है जो सत्य के रहस्य को उजागर करती है और विश्व के कल्याण के लिए स्वयं को भौतिक माया से मुक्त करने का उपाय बताती है। श्रीमद्भागवत में वर्णित इस गीता का उद्देश्य सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर स्वयं को विश्व कल्याण के लिए समर्पित कर देना है।
श्रुति गीता: श्रीमद्भागवत में वर्णित इस गीता में अनेकों ऋषियों और विद्वानों द्वारा भगवान विष्णु की स्तुति से सम्बंधित श्लोक हैं।
युगल गीता: इसका वर्णन भी भागवत में आता है जिसमें गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण की विभिन्न प्रकार से स्तुति की गयी है।
ईश्वर गीता: इसका वर्णन हमें कूर्म पुराण में मिलता है जिसमें भगवान शंकर की शिक्षाएं सम्मलित हैं। इसमें भी भगवत्गीता की भांति ही अनेक गूढ़ रहस्य सम्मलित हैं और भगवान शंकर के प्रति पूर्ण समर्पण के बारे में बताया गया है। शैव संप्रदाय के लिए इस ग्रन्थ का बड़ा महत्त्व है।
गणेश गीता: इसमें श्रीगणेश द्वारा अपने भक्त राजा वरेण्य को दी गयी शिक्षाओं का वर्णन है। इसके बारे में हमें गणेश पुराण में पता चलता है।
देवी गीता: ये देवी भागवत का एक भाग है जिसमें माता आदिशक्ति और पर्वतराज हिमालय के बीच का संवाद है। इसमें माता हिमालय को अपने दिव्य स्वरुप के विषय में बताती है। इसका वर्णन हमें लिंग पुराण में मिलता है।
यम गीता: इसका वर्णन विष्णु पुराण और नृसिंह उप-पुराण में दिया गया है। इसमें भगवान विष्णु के गुणों, आत्मज्ञान, ब्रह्म, जीवन मरण का चक्र और मोक्ष के विषय में बताया गया है।
शिव गीता: पद्म पुराण का भाग इस गीता में भगवान शिव द्वारा श्रीराम को दी गयी शिक्षाओं का सार है।
सुत गीता: इसका वर्णन स्कन्द पुराण के यज्ञ वैभव खंड में दिया गया है। ये अद्वैतवाद का समर्थन और द्वैतवाद का खंडन करता है।
सूर्य गीता: तत्व सरण्य में वर्णित इस गीता को भगवान ब्रह्मा ने भगवान शंकर के दक्षिणमूर्ति स्वरुप से कहा था जिसमें भगवान सूर्यनारायण और उनके सारथि अरुण का संवाद है।
रूद्र गीता: भागवत पुराण में वर्णित इस गीता में भगवान रूद्र द्वारा भगवान विष्णु की प्रशंसा में रचे गए श्लोक हैं। इसमें रूद्र द्वारा ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के स्वरूप का वर्णन भी किया गया है।
विद्या गीता: इस गीता में त्रिपुर रहस्य के बारे में बताया गया है जिसे भगवान दत्तात्रेय भगवान परशुराम से कहते हैं। इसमें दत्तात्रेय ने माता त्रिपुरसुन्दरी की आराधना भी की है जो विद्या की देवी भी मानी गयी है।
गुरु गीता: इस गीता में भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती के बीच का संवाद है। इसमें महादेव ने माता को जीवन में गुरु के महत्त्व के विषय में बताया है। इस गीता का वर्णन स्कन्द पुराण में दिया गया है।
लेख स्रोत:

गीता कुल कितनी है?
how many gitas are there?
https://www.dharmsansar.com/2024/01/gita-kitni-hai.html
गीता के ज्ञानदाता कौन हैं?

पवित्र गीता जी का ज्ञान श्री कृष्ण जी ने नही बल्कि श्री कृष्ण जी ने अंदर काल प्रेतवत प्रवेश करके गीता जी का ज्ञान बोला।श्री कृष्ण जी ने गीता जी का ज्ञान नही बोला।।

जब तक महाभारत का युद्ध समाप्त नहीं हुआ तब तक ज्योति निरंजन (काल – ब्रह्म – क्षर पुरुष) श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रवेश रहा। महाभारत का युद्ध समाप्त होते ही काल भगवान श्री कृष्ण जी के शरीर से निकल गया। श्री कृष्ण जी ने श्री युधिष्ठिर जी को इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) की राजगद्दी पर बैठाकर स्वयं द्वारिका जाने को कहा। तब अर्जुन आदि ने प्रार्थना की कि हे श्री कृष्ण जी! आप हमारे पूज्य गुरुदेव हो, हमें एक सत्संग सुना कर जाना,

उद्धव गीता क्या हैं?
उद्धव गीता, कृष्ण उद्धव संवाद और अनेक शंकाओ का समाधान, श्रीमद्भागवत गीता, इस सृष्टि में प्रत्येक जीव का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर ही संचालित होता है।

बचपन से ही उद्धव सारथी के रूप में श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण से कभी कोई इच्छा नहीं जताई और न कोई वरदान माँगा। वे केवल अपने मन की उन शंकाओं का समाधान चाहते थे जो उनके मन में कृष्ण की शिक्षाओं और उनके कृतित्व को देखकर उठ रही थीं कृष्ण बोले आज जो कुछ तुम जानना चाहोगे और उसका मैं जो उत्तर दूंगा, वह उद्धव गीता के रूप में जानी जायेगी। तुम बेझिझक प्रश्न पूछो।

“हे कृष्ण, सबसे पहले कृपया मुझे यह बताओ कि सच्चा मित्र कौन

क्या आपको मालूम है गीता में कुल कितने अध्याय और कुल कितने श्लोक है?
इस समय सबसे प्रचलित श्रीमदभगवद्गीता में १८ अध्याय हैं, जिनमें कुल मिलाकर ७०० श्लोक हैं।

उनका विवरण निम्न लिखित है —

गीता का पहला अध्याय अर्जुन-विषाद योग है। इसमें 46 श्लोक हैं।
गीता के दूसरे अध्याय “सांख्य-योग” में कुल 72 श्लोक हैं।
गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग है, इसमें 43 श्लोक हैं।
ज्ञान कर्म संन्यास योग गीता का चौथा अध्याय है, जिसमें 42 श्लोक हैं।
कर्म संन्यास योग गीता का पांचवां अध्याय है, जिसमें 29 श्लोक हैं।
आत्मसंयम योग गीता का छठा अध्याय है, जिसमें 47 श्लोक हैं।
ज्ञानविज्ञान योग गीता का सातवां अध्याय है, जिसमें 30 श्लोक हैं।
गीता का आठवां अध्याय अक्षरब्रह्मयोग है, जिसमें 28 श्लोक हैं
राजविद्यार
गीता में सबसे विशेष श्लोक कौनसा है?
केवल यही श्लोक पूरी गीता में दो बार आया है जोकि इसकी महत्वता को बताता है

एक से ज्यादा बार कोई भी चीज अगर बोली जाए तो वह बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है और स्वयं भगवान द्वारा गीता में यह श्लोक दो बार बोला गया है तो आप समझ सकते हैं कि यह कितना महत्वपूर्ण श्लोक होगा हमारे लिए ।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।।9.34।।
भावार्थ : तू मेरा भक्त हो जा। मेरेमें मनवाला हो जा। मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। इस प्रकार मेरे साथ अपनेआपको लगाकर। मेरे परायण हुआ तू मेरेको ही प्राप्त होगा।

2. मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
मामेवैष्यसि सत्यं त

गीता के 18 अध्यायों के नाम क्या हैं?
प्रथम अध्याय – अर्जुन-विषाद योग

इस अध्याय में कुल 47 श्लोकों द्वारा श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन की मन: स्थिति का वर्णन किया गया है, कि किस तरह अर्जुन अपने सगे-संबंधियों से युद्ध करने से डरते हैं,वे अपनों से द्वंद नही करना चाहते है, वह चाहते हैं कि किसी तरह से आपसी सन्धि हो सके,लेकिन भगवान कृष्ण उन्हें बार-बार समझाते हैं, यह कर्म भूमि है, मनुष्य का वास्तविक घर तो परम धाम है,यह संसार तो उसके लिए पल भर का खेल है, सब अपने यहीं छूट जाते है,लेकिन जो धर्म के अनुसार कर्म करता है वही उस मानव के साथ जाता है।लेकिन श्रीकृष्ण कहते है कि क्षेत्रीय का पर धर्म युद्ध ही है,छूप कर बैठना या अपनों के लिए शोक मनाना नही

किस श्लोक को गौकर्ण गीता कहा जाता है?

गोकर्ण-गीता पद्मपुराण के उत्तर खण्ड के चतुर्थ अध्याय में श्रीमद्भागवत महापुराण के महात्म्य वर्णन के अन्तर्गत विप्रमोक्ष नाम से वर्णित है।
इसमें आत्मदेव ब्राह्मण के पुत्र धुन्धकारी के पतित -जीवन से संकटग्रस्त आत्मदेव को उनके दूसरे वैराग्यवान पुत्र गोकर्ण ने मानव जीवन की क्षणभंगुरता एवं भगवद्भक्ति का अमृत उपदेश देकर गृहत्याग एवं भगवद्भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया जिससे उन्होंने भगवान् श्री कृष्ण को प्राप्त किया।गोकर्ण गीता इस प्रकार है—
गोकर्ण उवाच- देहेऽस्थिमांसऽभिमतिं त्यजत्वं जाया सुतादिषु सदा ममतां विमुञ्च।पश्यानिशं जगदिदं क्षणभंगनिष्ठं, वैराग्य राग रसिको भव भक्ति निष्ठः।।७९।। धर्मं भजस्व सततं त
उद्धव गीता क्या हैं?

हाल ही में चिन्मय विद्यालय जाने का मौक़ा मिला तो मैंने पहली बार उद्धव गीता के बारे में विस्तार से जाना। मन में उत्सुकता हुई तो लौटकर गूगल खंगालने लगी। हाथ लगी ऐसी नायाब चीज़ जिसने मेरे मन को छू लिया। एक साधारण व्यक्ति के नज़रिए से जो मैने समझा वो साझा कर रही हूँ।

उद्धव जी को जब पता चला कि श्री कृष्ण के साथ ही उनका वंश समाप्त हो जाएगा तो उनका मन भारी हो गया तब उन्होंने भगवान से अपनी शंकाओं का समाधान पूछा। सबकी तरह उन्हें भी समझ नहीं आ रहा था कि कृष्ण के होते हुए भी युधिष्ठिर कैसे द्यूतक्रीड़ा में हार गए। ‘ पर पांडवों ने मुझे बुलाया कब था। यदि वे विवेक से खेलते और शकुनि की तरह मुझे अपनी ओर से खेल

गीता में सबसे विशेष श्लोक कौनसा है?
भगवद्गीता एक रसगुल्ले की तरह है, जैसे रसगुल्ले को कही से भी खाया जाए वो मीठा ही लगता है उसी तरह गीता को कही से भी पढ़ा जाए तो वो मधुर ही लगेगी, वैसे गीता का सर्वाधिक शक्तिशाली श्लोक भगवद्गीता के आखिरी अध्याय का अंतिम श्लोक 18.78

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥

भावार्थ : हे राजन! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है॥18.78॥

श्री- का मतलब लक्ष्मी मतलब धन दौलत

र्विजियो भूति- का मतलब गीता पढ़ने वाला व्यक्ति जो भी कार्य करेगा उसमे निश्चित रूप से सफल होगा, मिट

गीता के अनुसार चार प्रकार के भक्त कौन-कौन से होते हैं?
आर्थाथी, जिसे धन सम्पत्ति की आस हो केवल कृष्ण से.ध्रुव.

आर्त, जो संकट में होऔर केवल कृष्ण से ही दूर कराना चाहे.गज.

जिज्ञासु जो ज्ञान चाहता हो केवल कृष्ण से.

ज्ञानी जो हर जगह कृष्ण को ही देखता हो.

सभी को कृष्ण उदार कहते हैं परंतु ज्ञानी भक्त को अपना स्वरूप ही मानते हैं.

सम्पूर्ण गीता का अर्थ क्या है?
सम्पूर्ण गीता का अर्थ अपने प्रिय भगवान् जी के साथ पुनः समबन्ध स्थापित करना है।

भगवद्गीता है क्या? भगवद्गीता का प्रयोजन मनुष्य को भौतिक संसार के अज्ञान से उबारना है । प्रत्येक व्यक्ति अनेक प्रकार की कठिनाइयों में फँसा रहता है, जिस प्रकार अर्जुन भी कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के लिए कठिनाई में था । अर्जुन ने श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण कर ली, फलस्वरूप इस भगवद्गीता का प्रवचन हुआ । न केवल अर्जुन वरन हम में से प्रत्येक व्यक्ति इस भौतिक अस्तित्व के कारण चिन्ताओं से पूर्ण है । हमारा अस्तित्व ही अनस्तित्व के परिवेश में है । वस्तुतः हमें अनस्तित्व से भयभीत नहीं होना चाहिए । हमारा अस्तित्व सनातन है । लेकिन हम

स्वर कितने प्रकार का होता है? और उनके नाम क्या हैं?
स्वर कहने से दो ओर ध्यान जाता है । एक वर्णमाला के स्वर और दूसरे संगीत के स्वर । यदि आप वर्णमाला के स्वरों की जानकारी चाहते हैं तो हिन्दी वर्णमाला में ग्यारह स्वर होते हैं । यथा — अ,आ,इ,ई,उ,ऊं,ऋ,ए,ऐ,ओ,औ । संस्कृत में दीर्घ ऋ तथा लृ भी स्वर हैं अतः वहां तेरह स्वर हुए।

और यदि आप संगीत के स्वर जानना चाहते हैं तो संगीत में सात स्वर होते हैं । उनके नाम हैं — १-षड्ज ,२- ऋषभ, ३_गांधार ,४- पंचम, ५- धैवत,६- मध्यम ,७- निषाद । गायन के समय कोमलता , तीव्रता ,उतार,चढाव आदि के कारण ये भेद हैं ।

भारतीय दर्शन में कितनी गीता हैं?
गीता प्रेस गोरखपुर ने अपने ‘गीता संग्रह’ में जिन पचीस गीताओं का समावेश किया है उनकी सूची इस प्रकार है –

1. गणेश गीता, 2. भिक्षु गीता, 3. परमहंस गीता, 4. षडज गीता, 5. पिंगला गीता, 6. शंपाक गीता, 7. मंकि गीता, 8. आजगर गीता, 9. हारीत गीता, 10. वृत्र गीता, 11. पुत्र गीता, 12. काम गीता, 13. यम गीता (1), 14. यम गीता (2), 15. हंस गीता (1), 16. हंस गीता (2), 17. नारद गीता, 18. उत्तर गीता, 19. राम गीता (1), 20. राम गीता (2), 21. भगवती गीता, 22. अष्ट्रा वक्र गीता, 23. अवधूत गीता (1), 24. अवधूत गीता (2) और जीवन मुक्त गीता

इस प्रसंग में अपनी पुस्तक ‘उद्धव गीता’ की भूमिका के निम्न अंश को भी सर्वथा सुसंगत मान

गीता में कितने अध्याय हैं?

भगवद गीता में पांच विशेषताएं हैं:

1. **कर्मयोग**: अध्याय 2 में, जो कर्म का योग और निष्काम कर्म की महत्वपूर्णता पर ध्यान करता है।

2. **भक्तियोग**: अध्याय 12 में, जो ईश्वर में भक्ति की महत्वपूर्णता पर विचार करता है।

3. **ज्ञानयोग**: अध्याय 13-18 में, जो ज्ञान और विचार के माध्यम से आत्मा की स्वरूप और परमात्मा के साथ एकता की बात करता है।

4. **सांख्ययोग**: अध्याय 2 में, जो आत्मा, प्रकृति, और ब्रह्म के तत्व पर विचार करता है।

5. **क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग**: अध्याय 13 में, जो शरीर और आत्मा के अंतर के भिन्नता को समझाता है।

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कुल कितनी गीता है?
गीता कितने प्रकार की होती है?
गोत्र कितने प्रकार के होते हैं? उनके नाम क्या हैं?
गीता में सबसे विशेष श्लोक कौनसा है?
गीता के 18 अध्यायों के नाम क्या हैं?
गीता और कुरान में क्या समानताएं हैं?
भगवद् गीता को किस नाम से जाना जाता है?
वेद कितने हैं? और उनके क्या नाम हैं?
कुल कितने प्रकार के वेद हैं?
गीता और कुरान किस प्रकार भिन्न हैं?

श्रीमद्भगवद्गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। यह महाभारत के भीष्मपर्व का एक भाग है, जहाँ भगवान कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं। गीता को हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक माना जाता है।
इसके अलावा, महाभारत और अन्य ग्रंथों में कुल मिलाकर लगभग 60 गीताएँ हैं। कुछ प्रसिद्ध गीताएँ हैं:
अष्टावक्र गीता, गायत्री गीता, पिंगला गीता, अनु गीता, अवधूत गीता, भिक्षु गीता.
ये सभी गीताएँ ज्ञान और दर्शन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती हैं।

विभिन्न प्रकार की गीता – – – –

गीता का अर्थ है भगवान् ने गाया हुआ गीत। .
भगवद गीता भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कही थी। यह 18 अध्याय , 700 श्लोकों से बनी है।
– गीता को कई लोग गीत गोविन्दम या भागवत समझ बैठते है।
– गीता महाभारत के छटवे अध्याय भीष्म पर्व में है।
गीत गोविन्दम 13 शताब्दी ने जयदेव द्वारा लिखित राधा कृष्ण पर काव्य है। भागवत पुराण विष्णु के अवतारों की कथा है। गीता इन दोनों से पुरानी है।
– अणु गीता- जब युद्ध समाप्त हो गया और पांडवों का राज्य स्थापित हो गया और युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो गया तब अर्जुन ने श्रीकॄष्ण से कहा कि कुछ समझ नही आया! ज़रा संक्षेप में फिर से बताना। अर्जुन को फिर से समझाने के लिए अब जो गीता कही गई वह 36 अध्याय की थी। इसे अणु गीता कहा जाता है। यह महाभारत के 36 वे अध्याय अश्वमेध पर्व में कही गई है।
– उद्धव गीता – इसे हंस गीता भी कहा जाता है। भागवत पुराण में जब श्रीकृष्ण अपनी लीला समाप्त कर वैकुंठ जा रहे थे तो अपने जीवन का ज्ञान मित्र उद्धव से कहा था।
– व्याध गीता- एक शिकारी जो ऋषि को ज्ञान देता है कि गृहस्थाश्रम में आजीविका और दूसरों की सेवा के लिए पशुओं का वध भी जब कर्म समझ कर किया जाता है तो वह किसी भी सन्यासी द्वारा केवल स्वयं के लिए किये गए तप से बढ़ कर है जिसमे वह दुनिया को छोड़ देता है।
– गुरु गीता- स्कन्द पुराण में वर्णित भगवान् शिव द्वारा दिए गए उत्तर जो माँ शक्ति की जिज्ञासा को शांत करने के लिए दिए गए थे।
– गणेश गीता- गणेश पुराण में गजानन राजा वरेण्य को सत्य से अवगत कराते है। .

– अवधूत गीता- भगवान् दत्तात्रेय द्वारा परम सत्य का दर्शन कराती गीता।
– अष्टावक्र गीता- जिसमे अष्टावक्र राजा जनक से आत्म तत्व बताते है।
– राम गीता- सीता को वन में छोड़ कर आने के बाद जब लक्ष्मण दुखी होते है तो उनके दुःख को हरने के लिए भगवान् राम जो उपदेश देते है वह राम गीता है।
– महाभारत में ही और भी कई गीता है जैसे पाराशर गीता , पांडव गीता , पिंगला गीता।
और भी कई है गीता है जैसे देवी पुराण से देवीगीता, स्कन्दपुराण से ब्रम्हगीता, यमगीता, सूर्यगीता, बुद्ध गीता , जैन महावीर गीता आदी।
पर भारत के लिए वर्तमान परिपेक्ष में भगवद गीता अर्थात जो सोलह कला अवतार श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्त , सखा अर्जुन का द्वंद्व हरने को कही वह सबसे अधिक पूज्य और अनुकरणीय है। इसके पाठ से और अर्थ समझने से हर एक के जीवन के प्रश्नों के उत्तर साधक को प्राप्त होते है। प्रत्येक श्लोक को पढ़ने पर हर बार अलग अलग अर्थ प्रकट होते है।
.कई अंधविश्वासों का हरण होता है और मोक्ष पाने का हर मार्ग सांख्य योग , ज्ञान योग , भक्तियोग और राज योग के रूप में प्राप्त होता है।

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