धर्मांतरण किया तो एससी एसटी आरक्षण समाप्त:सुप्रीम कोर्ट

Explainer: धर्म बदलने पर क्यों छिनेगा एससी का दर्जा? सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिया फैसला, संविधान वाली हर बात

SC Status on Religious Conversion: भारत में हिंदुओं के अलावा और किस धर्म के लोगों में एससी का दर्जा मिलता है. इसके साथ ही मुस्लिम और ईसाई बन गए दलित जाति के लोगों पर धर्मांतरण का कानून क्या कहता है? सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन और आरक्षित श्रेणी पर अहम फैसला दिया है. आइए समझते हैं हर बात.

धर्मांतरण और एससी श्रेणी
जाति और धर्म अपने भारत देश से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मसला है. सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन और आरक्षित श्रेणी को लेकर मंगलवार को एक अहम फैसला दिया. अदालत ने स्पष्ट किया है कि हिंदू, बौद्ध, सिख धर्म के लोगों को ही अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा मिला हुआ है और अगर इस श्रेणी का कोई भी व्यक्ति किसी अन्य धर्म को अपनाता है तो उसका दर्जा समाप्त हो जाएगा. आसान भाषा में समझें तो कोई भी दलित या एससी कैटिगरी से आने वाला व्यक्ति अगर इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाता है तो फिर वह अनुसूचित जाति का अपना दर्जा खुद-ब-खुद खो देगा.
भारत में अनुसूचित जाति और धर्म परिवर्तन से जुड़े नियम काफी चर्चा में रहते हैं. मंगलवार को भी जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने भी हिंदू, सिख, बौद्ध को छोड़कर अन्य धर्म में परिवर्तित होने वालों पर अहम फैसला सुना दिया. बेंच ने आंध्र प्रदेश से जुड़े एक मामले में हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए यह अहम फैसला सुनाया. आइए यहां समझते हैं कि भारत में हिंदुओं के अलावा और किस धर्म के लोगों में एससी का दर्जा मिलता है. इसके साथ ही मुस्लिम और ईसाई बन गए दलित जाति के लोगों पर धर्मांतरण का कानून क्या कहता है? एक-एक कर हर जवाब तलाशते हैं.
भारत में अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा किसे मिलता है?

भारत में SC का दर्जा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 में दिया जाता है. राष्ट्रपति एक सूची जारी करते हैं, जिसको प्रेसिडेंशियल ऑर्डर कहा जाता है. राज्यवार अलग-अलग जातियों को शेड्यूल कास्ट में शामिल किया जाता है. संसद ही इस सूची में बदलाव कर सकती है. वर्तमान में, भारत के संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार, केवल उन्हीं लोगों को अनुसूचित जाति का दर्जा मिल सकता है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म मानते हैं. मूल रूप से यह केवल हिंदुओं के लिए था, लेकिन फिर संशोधन में 1956 में सिखों को और 1990 में बौद्धों को इसमें शामिल कर लिया गया।

 

SC कैटेगरी का मतलब क्या है? किसको इसमें शामिल किया जाता है?
SC उन जातियों को कहा जाता है जो ऐतिहासिक रूप से छुआछूत, सामाजिक भेदभाव, आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार रही हैं. अनुसूचित जाति उन समुदायों का समूह है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से ‘अस्पृश्यता’ (अनटचेबिलिटी) और सामाजिक भेदभाव का सामना किया है.
अनुसूचित जाति कैटिगरी के तहत कौन से लाभ मिल जाते हैं?
इसके फायदे और विशेषाधिकार हैं. आरक्षण की बात करेंगे तो लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों का रिजर्वेशन शामिल है. शिक्षा और नौकरी के मामले में सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आयु सीमा में छूट और सीटों का कोटा निर्धारित है. कानूनी सुरक्षा की बात करें तो SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 में विशेष सुरक्षा मिली हुई है. कल्याणकारी योजनाएं भी हैं, जिनमें विशेष छात्रवृत्ति, कम ब्याज पर ऋण और आवास योजनाएं सम्मिलित हैं।

 

हिंदू, सिख, बौद्ध के अलावा दूसरे धर्मों में भी SC होते हैं?
ऐसा संवैधानिक रूप से मान्य नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत जारी राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग धर्म (जैसे इस्लाम या ईसाई धर्म) अपनाता है, वह SC का दर्जा खो देता है. हालांकि वे OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) श्रेणी में शामिल हो सकते हैं यदि उनके समुदाय को उस राज्य की OBC सूची में रखा गया हो.
मुस्लिम और ईसाई धर्म अपनाने वाले कितने लोग SC श्रेणी में आते हैं?
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार यह संख्या जीरो है. अगर कोई व्यक्ति मुस्लिम या ईसाई है, तो उसे केंद्र सरकार की SC सूची में जगह नहीं मिलती है. हालांकि, मुस्लिम और ईसाई समुदायों की कई जातियां OBC या EWS के तहत लाभ लेती रही हैं.
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संविधान के अनुसार धर्म परिवर्तन को लेकर नियम क्या हैं?
भारत का संविधान अनुच्छेद 25 के तहत किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है. धर्म बदलना किसी का भी व्यक्तिगत अधिकार है. लेकिन धर्म बदलते ही आपके सामाजिक और कानूनी अधिकार बदल सकते हैं. जैसे SC का आरक्षण क्योंकि आरक्षण का आधार उस धर्म विशेष में झेली गई ऐतिहासिक प्रताड़ना को माना जाता है.
क्या धर्म परिवर्तन के बाद भी अनुसूचित जाति का दर्जा मिलता रहा है?
नहीं. ऐसा नहीं है कि धर्म परिवर्तन के बाद दशकों से यह नियम स्पष्ट है कि ईसाई या इस्लाम अपनाने पर SC का दर्जा खत्म हो जाता है. हालांकि यदि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति वापस हिंदू धर्म अपनाता है तो उसे दोबारा SC का दर्जा मिल सकता है. बशर्ते उसे उसके समाज ने स्वीकार कर लिया हो.
सुप्रीम कोर्ट के इस नियम में बदलाव की वजह क्या हो सकती है?
वे दलित जो धर्म बदलकर ईसाई और मुस्लिम बनते हैं और उन्हें SC का दर्जा मिलता है, तो इसके बड़े प्रभाव हो सकते हैं. सबसे पहले तो प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी. SC कोटे के अंदर ही नई आबादी जुड़ जाएगी, जिससे मौजूदा लाभार्थियों का हिस्सा प्रभावित हो सकता है. राजनीतिक बदलाव भी देखने को मिल सकता है. आरक्षित सीटों पर मुस्लिम और ईसाई उम्मीदवारों की भागीदारी बढ़ सकती है. एक अहम कारक धार्मिक प्रभाव है. आलोचकों का मानना है कि इससे धर्म परिवर्तन को बढ़ावा मिल सकता है, जबकि समर्थकों का कहना है कि धर्म बदलने से सामाजिक गरीबी दूर नहीं होती, इसलिए उन्हें हक मिलना चाहिए.
संविधान के हवाले से समझिए बात
अदालत ने संविधान के तहत अनुसूचित जाति के आदेश का जिक्र करते हुए यह स्पष्ट किया कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 इस विषय पर पूरी तरह स्पष्ट है. इस आदेश के तहत लगाया गया प्रतिबंध पूर्ण है. अदालत ने कहा कि 1950 के आदेश की धारा 3 में जिन धर्मों का जिक्र नहीं है, उनमें से किसी भी धर्म में धर्म परिवर्तन करने पर व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत समाप्त हो जाता है, चाहे उसका जन्म किसी भी जाति में हुआ हो.
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अदालत ने आगे कहा- संविधान, संसद की तरफ से बनाए गए किसी कानून या राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम के तहत मिलने वाले किसी भी वैधानिक लाभ, सुरक्षा, आरक्षण या अधिकार का दावा कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं कर सकता, जिसे धारा 3 के प्रावधान के अनुसार अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता है. यह प्रतिबंध पूर्ण है और इसमें कोई अपवाद नहीं है. कोई व्यक्ति एक साथ धारा-3 में निर्दिष्ट धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानते और उसका पालन करते हुए, अनुसूचित जाति का सदस्य होने का दावा नहीं कर सकता है.
आंध्र के किस केस के आधार पर सुप्रीम फैसला?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आंध्र प्रदेश में चिंथाडा आनंद नामक एक पादरी की अपील पर सुनाया गया. आनंद ने आरोप लगाया था कि अक्काला रामिरेड्डी और अन्य लोगों ने उनके साथ जातिगत भेदभाव और गाली-गलौज की. उन्होंने SC/ST एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई, जिस पर पुलिस ने FIR दर्ज की. रामिरेड्डी ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में FIR रद्द करने की याचिका दायर की.
हाईकोर्ट के जस्टिस एन हरिनाथ ने FIR रद्द करते हुए कहा कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद से ही आनंद अपना SC दर्जा खो चुके हैं, इसलिए उन्हें SC/ST एक्ट का संरक्षण नहीं मिल सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि आनंद के पास अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं मानी जाती, इसलिए उनका SC का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है. आनंद ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जिसे खारिज कर दिया गया है.

Supreme Court Says No Scheduled Caste Status On Conversion To Religions Other Than Hinduism Sikhism Or Buddhism
ईसाईयत अपनाने पर कोई एससी/एसटी नही रह जाता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य पंथ में जाता है, उसे अनुसूचित या अनुसूचित जनजाति नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोई ईसाई पंथ अपनाता है और उसका सक्रिय पालन और प्रचार करता है तो उसे अनुसूचित जाति का नही माना जा सकता। अदालत ने इस मामले में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का आदेश यथावत रखा। शीर्ष अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का पालन करता है, उसे अनुसूचित जाति का नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी जोड़ा कि किसी अन्य पंथ में परिवर्तन से अनुसूचित जाति तुरंत और पूर्ण रूप से समाप्त हो जाती है।
अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत समाप्त
अदालत ने उल्लेख किया कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में यह स्पष्ट है और इस आदेश से लगा प्रतिबंध पूर्ण (absolute) है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 1950 के आदेश की धारा 3 में निर्दिष्ट धर्मों के अलावा किसी अन्य पंथ में परिवर्तन पर, जन्मना विचार बिना, अनुसूचित जाति तुरंत समाप्त हो जाती है।
कोई भी व्यक्ति जो धारा 3 में अनुसूचित जाति का नहीं माना जाता, उसे संविधान या संसद अथवा राज्य विधानमंडल के बनाए किसी कानून में कोई भी वैधानिक लाभ, संरक्षण, आरक्षण या अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता और न ही उसे दिया जा सकता है। यह प्रतिबंध पूर्ण है और इसमें कोई अपवाद नहीं है। कोई व्यक्ति एक साथ धारा 3 में निर्दिष्ट धर्मों के अलावा किसी अन्य पंथ का पालन और प्रचार करते हुए अनुसूचित जाति का दावा नहीं कर सकता।

ईसाईयों को एससी/एसटी एक्ट लागू नहीं
यह आदेश ईसाई बने पादरी (पास्तर) कार्य करते व्यक्ति के संबंध में आया जिसने कुछ व्यक्तियों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में मुकदमा किया था कि उन्होने उस पर हमला किया था। उसने इस अधिनियम में संरक्षण मांगा, जिसे विपक्षी ने इस आधार पर चुनौती दी कि वह पादरी पंथ परिवर्तित है और सक्रिय ईसाई  है।

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला जिसे SC ने यथावत रखा
30 अप्रैल 2025 के आदेश में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा था कि जाति व्यवस्था ईसाईयत में नहीं होती, इसलिए इस अधिनियम प्रावधानों का सहारा लेने पर रोक है। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति हरिनाथ एन ने उस शिकायतकर्ता के लगाए आरोप निरस्त कर दिये थे, जिसने ईसाईयत अपना ली और फिर भी एससी/एसटी अधिनियम का सहारा लिया था।

पादरी की विशेष अनुमति याचिका पर सुप्रीम कोर्ट
इसके खिलाफ पादरी ने विशेष अनुमति याचिका डाली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने यह नहीं कहा कि उसने ईसाईयत छोड़कर अपने मूल धर्म में पुनः प्रवेश किया है। इसके विपरीत, साक्ष्य से स्पष्ट है कि अपीलकर्ता लगातार ईसाईयत का पालनकर्ता और दशकाधिक वर्ष से पादरी है। गांव में नियमित रविवासरीय प्रार्थनाओं का आयोजक है। उसने यह भी माना कि कथित घटना के समय वह घर पर प्रार्थना सभा कर रहा था। ये सभी तथ्य स्पष्ट दर्शाते हैं कि घटना के दिन भी वह ईसाई ही था।”

क्या है मामला जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया फैसला
निर्णय आपराधिक याचिका संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ता पर एससी/एसटी अधिनियम की धाराएं 3(1)(r), 3(1)(s), 3(2)(va) और भारतीय दंड संहिता की धाराएं 341, 506, 323 सहपठित धारा 34 में अपराधिक आरोप था। शिकायतकर्ता पिट्टलावनिपालेम गांव में रविवारीय प्रार्थनाकर्ता पादरी, ने अपनी प्रारंभिक शिकायत में आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने उस पर कई बार हमला किया, उसे और उसके परिवार को बार-बार जान से मारने की धमकी दी और जाति आधार पर अपमानित किया।

इसके आधार पर उसने याचिकाकर्ता पर मुकदमा कराया। जांच पूरी होकर आरोप पत्र भी दाखिल हो चुका था। इससे आहत याचिकाकर्ता अपने खिलाफ आरोप निरस्तीकरण को उच्च न्यायालय पहुंचा। याचिकाकर्ता का कहना था कि एससी/एसटी अधिनियम में एफआईआर कानूनन गलत था, क्योंकि शिकायतकर्ता ईसाई पादरी था, इसलिए वह स्वयं को अनुसूचित जाति का दावा नहीं कर सकता।

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