बालेन शाह: नेपाल में हिंदुत्व केंद्रित राजनीति, ‘सवर्ण’ हावी, ‘दलित’ घाटे में

बालेन शाह: नेपाल में हिंदुत्व की राजनीति का आगाज, संसद में कहां से कहां पहुंच गए ‘सवर्ण’ और ‘दलित’
काठमांडू 20 मार्च 2026।  बालेन शाह ने शुक्रवार को अभिजित मुहूर्त में वैदिक मंत्रोच्चार और बौद्ध शांति पाठ के बीच नेपाल के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. उनके साथ 15 मंत्रियों ने भी शपथ ली. इसके साथ ही नेपाल ने एक नए युग में प्रवेश किया. अब इस हिमालयी देश को एक स्थिर सरकार मिलती हुई दिख रही है.पांच मार्च को कराए गए चुनाव में जनता ने परिपक्व, निर्णायक और ऐतिहासिक जनादेश दिया.बालेन युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं. पिछले साल सितंबर में हुए जेन जी आंदोलन के बाद वो चर्चा में आए थे.उनकी केवल तीन साल पुरानी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को इस चुनाव में दो तिहाई बहुमत मिला. उसने 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की 165 में से 125 सीटें और समानुपातिक प्रणाली की 57 सीटों के साथ कुल 182 सीटें जीती हैं. आरएसपी को मिला यह जनादेश कई मायनों में ऐतिहासिक है. नेपाल में 1999 के बाद यह पहली बार है जब किसी अकेली पार्टी को अपने दम पर बहुमत मिला है. ऐसा बहुमत तो राजशाही के अंत के बाद 2008 में हुए पहली संविधान सभा के चुनाव में पुष्प कमल दहाल प्रचंड को भी नहीं मिला था. बालेन के शपथ के साथ ही नेपाल में राजनीति अस्थिरता खत्म होने की संभावना प्रबल होती दिख रही है.

बालेन शाह नेपाल के सबसे युवा और पहले मधेशी प्रधानमंत्री हैं. संविधान लागू होने के केवल दस साल में ही किसी मधेशी का इस राजनीतिक धरातल पर पहुंचना नेपाल की राजनीति में दुर्लभ और महत्वपूर्ण क्षण है. देश के 35 साल पुराने बहुदलीय इतिहास में 30 प्रधानमंत्री बने. लेकिन पार्टियों की अंदरूनी लड़ाई और नेताओं की महत्वाकांक्षाओं से कोई भी सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई. अस्थिरता नेपाल की राजनीतिक नियति बन गई थी. सत्ता लोभ में नए-नए गठबंधन बनते-बिगड़ते रहे. सत्ता की कुर्सी ओली,प्रचंड और देउबा के बीच घूमती रही. पांच मार्च के चुनाव में आरएसपी ने कुछ हिमालयी जिले छोड़कर पूरे नेपाल में बेहतर प्रदर्शन किया है.आर एस पी ने मधेश में भी 31 में से 30 सीटें जीत आशातीत  सफलता पाई.यह हाल तब है जब मधेश में आरएसपी को संघवाद विरोधी माना जा रहा था.

नेपाल की संसद में कहा हैं दलित, जनजाति और मधेशी
चुनाव से नेपालियों ने ओली,प्रचंड और देउबा के बंधन से काफी हद तक स्वतंत्रता पा ली. पुरानी पार्टियां ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गईं. नेपाल की वृद्धतंत्रशाही को युवाओं से गंभीर चुनौती मिली. युवाओं का प्रतिनिधित्व भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा. बड़ी संख्या में युवा प्रतिनिधि चुने गए हैं । कुल निर्वाचित सदस्यों में से 33 प्रतिशत से अधिक सदस्य 40 साल से कम आयु के हैं.

कुछ विश्लेषक इसे नेपाल में लोकतंत्र की दूसरी लहर की संज्ञा दे रहे हैं, लेकिन आंकड़े कुछ सवाल भी खड़े कर रहे हैं.इस बार के चुनावी नतीजों में ऊंची जाति के सदस्यों की संख्या पिछली बार से बढ़ी है. जेन जी आंदोलन की भावना यह थी कि इससे नेपाल की राजनीति का लोकतांत्रिकरण होगा, लेकिन सत्ता प्रभुत्वशाली खस-आर्य समूह में और ज्यादा केंद्रित होती नजर आ रही है (टेबल देखें). इसके विपरीत दलित, जनजाति और मधेशी जैसे वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व घटा है.

चुनाव में मधेशी दलित समुदायों मुसहर, सदा, पासवान (दुसाध) आदि को सबसे अधिक घाटा हुआ है. संवैधानिक बाध्यता से 40 प्रतिशत सीटें (110) का बंटवारा विभिन्न समुदायों में उनकी जनसंख्या के आधार पर होता है. दलितों के लिए 13 % (14) सीटें आरक्षित हैं. इसमें से कुल 82 % अकेले विश्वकर्मा समुदाय (दलित) ने कब्जा ली है. बाकी बची सीटें पहाड़ी दलितों को मिली हैं. इससे मधेशी दलितों की संख्या संसद में शून्य हो गई है. दलितों में विश्वकर्मा समुदाय अपेक्षाकृत संपन्न हैं, ऐसे में राजनीतिक प्रतिनिधित्व शून्यता मधेशी दलितों की स्थिति को और बिगाड सकता है. इसलिए इस बदलाव को नए युग का नाम देने पर सवाल है कि यह किस तरह का नयापन है जो पुराने जातीय वर्चस्व को और मजबूत ही बनता नजर आ रहा है.नेपाल के नवगठित 15 सदस्यीय मंत्रीपरिषद में भी खस-आर्य और पहाड़ी का प्रभुत्व है.

शुक्रवार को राजधानी काठमांडू में आयोजित बालेन शाह के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने आए बौद्ध संत
आरएसपी की जीत से काठमांडू में सत्ता और अधिक केंद्रीकृत होने की संभावना नजर आ रही है. संघीय व्यवस्था के लिए आरएसपी का नजरिया अभी तक पूरी तरह साफ नहीं हो पाया है. इस बार मधेश की राजनीति करने वाली पार्टियों की संसद में अनुपस्थित और उनकी अनुपस्थिति में संघीय ढांचे में क्या बदलाव होंगे, यह निश्चित नहीं है. इस बात की आशंका अधिक है कि इससे संघीय व्यवस्था कमजोर की जा सकती है. इसका परिणाम यह होगा कि सत्ता काठमांडू में बैठे उच्च वर्गीय समूहों के हाथों में केंद्रित हो सकती है. इस स्थिति में मधेश और जनजातीय क्षेत्र, जहां संघीय व्यवस्था के प्रति समर्थन अधिक है और जिसे वे अपने प्रशासनिक और राजनीतिक अधिकारों को पाने का एक जरिया समझते हैं, उनकी स्थिति भी नकारात्मक रूप से निचले स्तर पर जा सकती है. इसलिए इस चुनाव और उसके परिणामों का विश्लेषण एक व्यापक दृष्टिकोण से करने की जरूरत है. हमें यह देखना होगा कि जहां एक ओर इन परिणामों ने पारंपरिक सत्ता संरचनाओं को चुनौती दी है, वहीं दूसरी ओर इसने कुछ ऐसी परिस्थितियों भी उत्पन्न की हैं जिससे नए प्रकार के जातीय और क्षेत्रीय वर्चस्व के उभरने की आशंका है.

हिंदुत्व का उभार, क्या फिर हिंदू राष्ट्र बनेगा नेपाल
साल 2006 तक नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र  माना जाता था. राजशाही के अंत के बाद 2008 में नेपाल आधिकारिक धर्मनिरपेक्ष राज्य बना. हालांकि नेपाल की धर्मनिरपेक्ष पहचान हमेशा से सवालों में रही है. इस संदर्भ में नेपाल का संविधान भी असमंजस की स्थिति पैदा करता है, इसने धर्मनिरपेक्षता को ‘धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सनातन संस्कृति संरक्षक और संवर्धक परिभाषित किया है’. यह परिभाषा नेपाल में नेताओं को राजनीति के साथ धर्म को आमंत्रित करती है. ऐसा परिदृश्य हाल के चुनाव में भी नजर आया, जब पहली बार मुख्य तौर पर बालेन शाह ने न सिर्फ जनकपुर में जानकी मंदिर में दर्शन के साथ अपने चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत की. बाद में भी वो कई मंदिरों का दौरा करते दिखे. बालेन शाह,का जन्म मधेशी हिंदू परिवार में हुआ है.  उनकी पत्नी नेवारी हिंदू-बौद्ध परंपरा मानती हैं. इस सांस्कृतिक संगम का उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक सोच पर प्रभाव साफ दिखता है.

शपथ ग्रहण समारोह में 108 वैदिक बटुकों के स्वस्तिवाचन और 108 बौद्ध भिक्षुओं के शांति-मंगलगान और शंख वादन से नेपाल में राजनीति और धर्म का एक नया समीकरण उभरता दिख रहा है. एक अवसर पर बालेंद्र शाह ने हिंदू राष्ट्र बनाम धर्मनिरपेक्षता के प्रश्न पर अपनी दृष्टि बताई थी कि कागज पर क्या लिखा है इस पर ध्यान देने के बजाय अपने आचरण में उसे उतारना अधिक महत्वपूर्ण है. वे यह विचार व्यवहार में लागू करते दिखते हैं. इससे नेपाल में धर्मनिरपेक्षता बनाम हिंदू राष्ट्र की बहस नए मोड़ पर पहुंच गई है. हिंदुत्व विरोधी चिंतित है कि इससे नेपाल की धर्मनिरपेक्ष पहचान धुंधलायेगी. फिर भी, समग्र रूपेण देखें तो धर्म अब नेपाली राजनीति में नए और महत्वपूर्ण ढंग से उभर रहा है, जी नेपाली हिंदुत्व का नया अवतार है.

राजधानी काठमांडू में शुक्रवार को शपथ लेते बालेन शाह सरकार के मंत्री

आरएसपी को जितनी बड़ी जीत मिली है, उतनी ही बड़ी अपेक्षाएं भी नेपोलियों ने उसके कंधे डाली हैं. बालेन शाह सरकार को पहले दिन से ही आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण खाड़ी देशों में काम करते नेपाली प्रवासियों की सुरक्षा इस सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी। ये प्रवासी नेपाली अर्थव्यवस्था में एक बड़ा योगदान देते हैं. खाड़ी संकट के चलते नेपाल को संभावित ईंधन संकट का भी सामना करना पड़ सकता है, जिसका त्वरित समाधान निकालना जरूरी होगा. इसके साथ ही, पिछले साल के ‘जेन जी आंदोलन’ के पीड़ितों को न्याय दिलाना भी उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, खासकर तब जब जांच आयोग ने रिपोर्ट सौंप दी है. इस जांच रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली समेत कई बड़े पदाधिकारियों पर मुकदमा चलाने की सिफारिश है.भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, भाई भतीजावाद, नौकरी को पलायन रोकना और सुशासन ऐसे विषय हैं जिन पर नई सरकार को काम करना होगा.

बालेन शाह के सामने आंतरिक चुनौतियों के साथ-साथ विदेश नीति की चुनौतियां भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं. कम्युनिस्ट दलों की चुनावी हार के बाद भले ही उनका प्रभाव कम हुआ हो, लेकिन नेपाल को भारत-चीन के बीच बेहतर तालमेल बनाना होगा. इसके अलावा हाल के सालों में विकास अनुदान, एनजीओ, छात्रवृत्तियों आदि के माध्यम से अमेरिका ने भी नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाया है. नई सरकार के कई सांसद भी इन कार्यक्रमों के लाभार्थी रहे हैं, इसलिए सरकार पर अमेरिकी प्रभाव भी नजर आ सकता है. कुल मिलाकर नेपाल की विदेश में नीति में इन तीनों शक्तियों भारत , चीन और अमेरिका के बीच संतुलन की रणनीति अपनाते हुए अपने राष्ट्रीय हितों और विकास लक्ष्य को हासिल करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा.

डिस्क्लेमर: लेखक मोहन कुमार मिश्र वाराणसी के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में शोधार्थी हैं। नेपाल के सपतरी (मधेश) निवकसी रसना यादव भी उसी विभाग में शोधार्थी हैं.

 

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