भारत में वनों की सुरक्षा कैसे होती है?

भारत में वनों के संरक्षण, प्रबंधन और वहां रहने वाले समुदायों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए कई महत्वपूर्ण कानून बनाए गए हैं। इन कानूनों का विकास औपनिवेशिक काल से लेकर वर्तमान पर्यावरणीय आवश्यकताओं तक हुआ है। ​मुख्य कानूनों का विवरण नीचे दिया गया है: ​1. भारतीय वन अधिनियम, 1927 (Indian Forest Act, 1927) ​यह अंग्रेजों के समय का कानून है जो आज भी वनों के प्रशासनिक ढांचे का आधार है। ​यह वनों को तीन श्रेणियों में बांटता है: आरक्षित वन (Reserved Forests), संरक्षित वन (Protected Forests) और ग्राम वन (Village Forests)। ​यह वन उपज की आवाजाही को नियंत्रित करने और उन पर शुल्क लगाने का अधिकार सरकार को देता है। ​2. वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (Forest Conservation Act, 1980) ​वनों की कटाई को रोकने के लिए यह सबसे शक्तिशाली कानून माना जाता है। ​इसका मुख्य उद्देश्य गैर-वानिकी कार्यों (जैसे सड़क, बांध या खनन) के लिए वन भूमि के उपयोग को नियंत्रित करना है। ​इसके तहत किसी भी वन भूमि को अन्य कार्य के लिए उपयोग करने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति अनिवार्य है। ​2023 का संशोधन: हाल ही में इसमें बदलाव किए गए हैं ताकि रणनीतिक सीमाओं और सुरक्षा परियोजनाओं के लिए कुछ छूट दी जा सके। ​3. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) ​यह कानून सीधे तौर पर जंगली जानवरों और पौधों की सुरक्षा से संबंधित है। ​इसी के तहत राष्ट्रीय उद्यान (National Parks) और वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries) घोषित किए जाते हैं। ​यह लुप्तप्राय प्रजातियों के शिकार और उनके व्यापार पर सख्त प्रतिबंध लगाता है। ​4. वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act – FRA) ​इसका आधिकारिक नाम ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम’ है। ​यह कानून उन समुदायों के अधिकारों को मान्यता देता है जो पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे हैं। ​यह उन्हें खेती के लिए जमीन का अधिकार और लघु वन उपज (जैसे शहद, महुआ, तेंदू पत्ता) को इकट्ठा करने और बेचने का अधिकार देता है। ​तुलनात्मक तालिका: प्रमुख कानूनों का उद्देश्य अन्य महत्वपूर्ण नीतियां और निकाय ​राष्ट्रीय वन नीति, 1988: इसका लक्ष्य भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 33% हिस्से को वन या वृक्षों से ढंकना है। ​CAMPA (कैम्पा): जब वन भूमि का उपयोग किया जाता है, तो उसके बदले जो मुआवजा मिलता है, उसे ‘प्रतिपूरक वनीकरण’ (Compensatory Afforestation) के लिए इस कोष में रखा जाता है। ​Nodal Agency: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) इन सभी कानूनों के कार्यान्वयन की निगरानी करता है। ​ वन संरक्षण अधिनियम (FCA), 1980 में 2023 के संशोधन (Forest Conservation Amendment Act) के बाद अब इसके स्वरूप और कार्यक्षेत्र में व्यापक बदलाव आए हैं। इन संशोधनों का मुख्य उद्देश्य भारत के जलवायु लक्ष्यों (Net Zero 2070) को प्राप्त करना और रणनीतिक बुनियादी ढांचों को गति देना है। ​यहाँ इस अधिनियम के वर्तमान स्वरूप की मुख्य विशेषताएं दी गई हैं: ​1. नाम में परिवर्तन ​अधिनियम का नाम बदलकर अब ‘वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम’ कर दिया गया है। यह केवल “संरक्षण” तक सीमित न रहकर वनों के “संवर्धन” (Augmentation) पर भी जोर देता है। ​2. अधिनियम के दायरे का स्पष्टीकरण (Land Applicability) ​वर्तमान स्वरूप में यह कानून केवल दो प्रकार की भूमि पर लागू होता है: ​वह भूमि जो 25 अक्टूबर 1980 के बाद से सरकारी रिकॉर्ड में ‘वन’ के रूप में दर्ज है। ​वह भूमि जिसे 1927 के अधिनियम के तहत ‘आरक्षित’ या ‘संरक्षित’ वन के रूप में अधिसूचित किया गया है। ​महत्वपूर्ण: यदि किसी निजी भूमि पर वन जैसा वातावरण है लेकिन वह सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है, तो अब उस पर यह कानून लागू नहीं होगा। यह 1996 के ‘गोदावर्मन केस’ के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रभाव को कम करता है। ​3. रणनीतिक और सुरक्षा परियोजनाओं के लिए छूट ​राष्ट्रीय सुरक्षा और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के लिए सरकार ने कुछ क्षेत्रों को इस कानून की मंजूरी से मुक्त कर दिया है: ​अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) या नियंत्रण रेखा (LoC) के 100 किमी के भीतर राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित परियोजनाओं के लिए केंद्र की अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी। ​सुरक्षा संबंधी बुनियादी ढांचा: वामपंथी उग्रवाद (LWE) प्रभावित क्षेत्रों में 5 हेक्टेयर तक की सार्वजनिक उपयोगिता वाली परियोजनाओं को छूट दी गई है। ​सड़क/रेलवे के किनारे: रेल लाइनों या सड़कों के किनारे मौजूद वन भूमि (0.10 हेक्टेयर तक) जो आवासों तक पहुंच प्रदान करती है, उन्हें छूट है। ​4. अनुमत गतिविधियों का विस्तार ​अधिनियम के वर्तमान स्वरूप में वनों के भीतर कुछ गतिविधियों को ‘गैर-वानिकी’ (Non-forest) नहीं माना जाएगा, यानी इनके लिए अनुमति आसान होगी: ​पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन (Eco-tourism) सुविधाएं। ​सफारी और चिड़ियाघर (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत)। ​वन संरक्षण से संबंधित सर्वेक्षण और जांच कार्य। ​सिल्विकल्चर (Silviculture) के तहत किए जाने वाले कार्य। ​5. केंद्र सरकार की शक्तियां ​संशोधित अधिनियम केंद्र सरकार को किसी भी राज्य या संस्था को निर्देश जारी करने के लिए अधिक शक्तियां प्रदान करता है ताकि कानून का समान क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके। ​वर्तमान स्वरूप के मुख्य उद्देश्य: एक नज़र में चुनौतियां और चिंताएं ​जहाँ सरकार इसे ‘विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन’ मान रही है, वहीं पर्यावरणविदों का तर्क है कि 100 किमी की छूट वाले दायरे में हिमालय और उत्तर-पूर्व के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystems) प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही, सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज न होने वाले वनों के कटने का खतरा भी बढ़ सकता है। वन संरक्षण अधिनियम में प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) की प्रक्रिया अब काफी व्यवस्थित हो गई है। जब भी किसी विकास परियोजना के लिए वन भूमि का उपयोग किया जाता है, तो कानूनन उसकी भरपाई करना अनिवार्य होता है। ​इस पूरी प्रक्रिया को CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority) के माध्यम से संचालित किया जाता है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं: ​1. प्रतिपूरक वनीकरण का सिद्धांत ​जमीन का प्रावधान: यदि वन भूमि का उपयोग किया जाता है, तो उतनी ही गैर-वन भूमि (Non-forest land) पर जंगल लगाना पड़ता है। यदि गैर-वन भूमि उपलब्ध नहीं है, तो खराब हो चुके वन क्षेत्र (Degraded Forest) की दोगुनी भूमि पर वनीकरण करना होता है। ​लागत का भुगतान: परियोजना का लाभ उठाने वाली एजेंसी (चाहे सरकारी हो या निजी) को वनीकरण की पूरी लागत सरकार को देनी होती है। ​2. शुद्ध वर्तमान मूल्य (Net Present Value – NPV) ​यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक मानक है। केवल पेड़ लगाना ही काफी नहीं है, क्योंकि एक पुराना जंगल जो पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) सेवाएँ प्रदान करता है, उसकी कीमत बहुत अधिक होती है। ​परियोजना एजेंसी को उस जंगल के NPV का भुगतान करना पड़ता है। ​यह दर जंगल के घनत्व और प्रकार के आधार पर निर्धारित की जाती है। ​3. CAMPA फंड का ढांचा ​एजेंसी द्वारा जमा किया गया पैसा सीधे सरकारी खजाने में नहीं जाता, बल्कि इसे कैम्पा फंड में रखा जाता है: ​90% हिस्सा: राज्यों को दिया जाता है ताकि वे अपने क्षेत्र में वृक्षारोपण और संरक्षण के कार्य कर सकें। ​10% हिस्सा: केंद्र सरकार के पास रहता है जिसका उपयोग निगरानी और अनुसंधान के लिए किया जाता है। ​4. हालिया चुनौतियां और बदलाव ​गुणवत्ता पर सवाल: अक्सर यह देखा गया है कि प्राकृतिक घने जंगलों के बदले लगाए गए नए पेड़ (Monoculture) वैसे पारिस्थितिकी तंत्र की जगह नहीं ले पाते। ​भूमि की उपलब्धता: उत्तर भारत और पहाड़ी राज्यों में वनीकरण के लिए बड़ी मात्रा में गैर-वन भूमि मिलना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ​इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत का ग्रीन कवर (Green Cover) कम न हो, भले ही विकास के लिए कुछ वन भूमि का उपयोग किया जाए। ​

 

वनीकरण और कैम्पा (CAMPA) फंड की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए सरकार अब तकनीक का भी सहारा ले रही है। यहाँ कुछ मुख्य बिंदु हैं कि यह व्यावहारिक रूप से कैसे काम करता है:
​वनीकरण की प्रक्रिया (Practical Steps)
​साइट का चयन: वनीकरण के लिए चुनी गई भूमि को e-Green Watch पोर्टल पर दर्ज किया जाता है। इसकी सैटेलाइट इमेजिंग की जाती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वहां पहले से जंगल नहीं था।
​निगरानी: लगाए गए पौधों की जीवित रहने की दर (Survival Rate) की जांच समय-समय पर की जाती है। यदि पौधे सूख जाते हैं, तो संबंधित विभाग को उन्हें दोबारा लगाना पड़ता है।
​फंड का उपयोग: कैम्पा फंड का उपयोग केवल पेड़ लगाने के लिए ही नहीं, बल्कि जंगलों में आग बुझाने के उपकरण, वन्यजीवों के लिए पानी की व्यवस्था और मृदा संरक्षण (Soil Conservation) के लिए भी किया जाता है।
​स्थानीय प्रभाव
​चूँकि आप हिमालयी और उत्तर भारतीय क्षेत्रों की प्रशासनिक संरचनाओं और भौगोलिक विकास में रुचि रखते हैं, तो यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि इन क्षेत्रों में सड़क या अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए वन निकासी (Forest Clearance) प्राप्त करना सबसे कठिन और लंबी प्रक्रियाओं में से एक होता है।
​यहाँ NPV (Net Present Value) की गणना बहुत बारीकी से की जाती है क्योंकि पहाड़ी जंगलों का पारिस्थितिक मूल्य बहुत अधिक होता है।
​अक्सर इन परियोजनाओं में वनीकरण के लिए भूमि उसी राज्य के मैदानी इलाकों में या किसी अन्य राज्य में भी खोजी जा सकती है, यदि स्थानीय स्तर पर भूमि उपलब्ध न हो।
​एक रोचक तथ्य: भारत के नए नियमों के अनुसार, अब ‘ग्रीन क्रेडिट’ (Green Credit) का कॉन्सेप्ट भी पेश किया गया है, जहाँ निजी कंपनियाँ या व्यक्ति पहले से वनीकरण करके क्रेडिट जमा कर सकते हैं, जिसे बाद में वन निकासी की भरपाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

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