सोशल मीडिया: वें नरसंहार जिनके बाद बिहार में कभी नही आई कांग्रेस
वो नरसंहार जिसके बाद बिहार में कभी नहीं बनी कांग्रेस सरकार
54 राजपूतों को पेड़ से बांधकर कुल्हाड़ी से काट डाला
गैंगरेप कर महिलाओं को दफनाया
80-90 के दशक में बिहार में जंगलराज रहा ..इस दौरान यहां सिलसिलेवार नरसंहार हुए .इनमें कई इतने वीभत्स थे कि उनका नाम सुनते ही रूह कांप उठती है…आज हम एक ऐसे ही जनसंहार की बात कर रहे हैं जब यादव,कुर्मी,काछियों की गैंग ने 54 राजपूतों को पेड़ से बांधकर कुल्हाड़ी से काट डाला….महिलाओं,बच्चों को भी नहीं बख्शा… इस नरसंहार के बाद बिहार में कभी कांग्रेस सरकार नहीं बनी…
29 मई 1987 की रात… जगह- बिहार का औरंगाबाद जिला….. करीब 500 लोगों की भीड़ ‘एमसीसी जिंदाबाद’ नारा लगाते हुए बढ़ रही थी… हाथों में बंदूक, कुल्हाड़ी, गड़ासा और केरोसिन तेल के डिब्बे थे..थोड़ी देर बाद सभी एक जगह रुके.. कुछ बात की। फिर आधे बघौरा गांव की तरफ चल पड़े और आधे दलेलचक की ओर.. दोनों गांव एक किलोमीटर की दूरी पर हैं.. दोनों गांवों में राजपूतों का दबदबा था..बघौरा के गया सिंह वन विभाग में हेड क्लर्क थे.. गांव में इकलौता पक्का मकान उन्हीं का था…बड़े शौक से बनवाया था. हवेलीनुमा मकान रे सिंहद्वार पर दूर से ही आंखें ठहर जाती थीं.रात करीब 8 बजे अचानक कुछ शोर सुनाई पड़ा.. उन्होंने दरवाजा खोलकर देखा, तो सामने 200-300 लोगों की भीड़ खड़ी थी..गया सिंह ने हड़बड़ाकर दरवाजा बंद कर लिया .वो दो कदम भी नहीं बढ़े थे कि भीड़ ने धक्का देकर दरवाजा तोड़ दिया.. सबसे पहले घर के मर्दों को घसीटकर बाहर निकाला और लाइन में खड़ा कर दिया। इस बीच दो लड़कों ने नजर बचाकर भागना चाहा, लेकिन हमलावरों ने गोली चला दी.. दोनों वहीं गिर पड़े..एक हमलावर उनके नजदीक गया.. सांसें अभी पूरी तरह टूटी नहीं थीं। उसने गड़ासा गर्दन पर दे मारी.. फिर पसीना पोंछते हुए बोला- ‘अरे देख क्या रहे हो… जाओ इनकी औरतों को उठा लाओ..20-25 हमलावर अंदर घुसे और महिलाओं-बच्चों को उठा-उठाकर बाहर पटकने लगे.. हमलावर, महिलाओं और लड़कियों पर टूट पड़े उनके कपड़े फाड़ दिए.. बलात्कार करने लगे। कुछ देर बाद एक अधेड़ बोल पड़ा- बहुत हो गया अब सबको काट डालो..हमलावर, महिलाओं को घसीटते हुए बरामदे में ले गए उनकी गर्दन तखत पर रखकर जोर से दबा दी.. एक हमलावर ने कुल्हाड़ी उठाई और एक-एक करके पांच महिलाओं की गर्दन उतार दी। पूरे बरामदे में खून फैल गया..हमलावर बोला- ठिकाने लगा दो सबको..8-10 लोग फावड़ा लेकर घर के सामने ही गड्ढा खोदने लगे। कुछ ही देर में गड्ढा तैयार हो गया। हमलावरों ने महिलाओं की लाश गड्ढे में डालकर ऊपर से मिट्टी भर दिया..गैंग का मुखिया बोला-सबको बांधकर ले चलो बरगद के पास… गांव वाले भी तो देखें कि हमसे टकराने का अंजाम क्या होता है.. ये सुनते ही हमलावरों ने गया सिंह और उनके परिवार के लोगों के हाथ-पैर बांध दिए.. घसीटते हुए बरगद के पेड़ के पास ले गए गांव की शुरुआत में ही बड़ा सा बरगद का पेड़ था..अब तक गांव में चीख-पुकार मच चुकी थी.. हमलावर राजपूत परिवारों से चुन-चुनकर महिला, पुरुष और बच्चों को घसीटते हुए बरगद पेड़ के पास ला रहे थे..कई लोग छत से कूदकर खेतों की तरफ भाग रहे थे.. हमलावर लगातार फायरिंग कर रहे थे.. कुछ लोग तो मौके पर ही मारे गए..
40 साल का एक शख्स ट्रैक्टर लेकर घर लौट रहा था.. हमलावरों को देखते ही चीख पड़ा- ‘अरे काका हम राजपूत नहीं हैं हम तो इनके घर काम करते हैं। हम हरिजन हैं हरिजन..एक अधेड़ ने उसकी पीठ पर कुल्हाड़ी मार दी..दो हमलावरों ने उसे ट्रैक्टर की सीट से बांध दिया.. फिर केरोसिन तेल का डिब्बा ट्रैक्टर पर उड़ेला और आग लगा दी.. कुछ ही मिनटों में ड्राइवर तड़प-तड़प कर मर गया..इधर, बगल के गांव दलेलचक में कमला कुंवर कुछ घंटे पहले ही ससुराल से लौटी थीं.. पिता भोज की तैयारी कर रहे थे.. मेहमान आ चुके थे..अचानक कुत्ते भौंकने लगे.. कमला अपनी बहन ललिता से बोली- जाओ देखो तो बाहर कौन है..ललिता ने झांककर देखा सैकड़ों हथियारबंद गांव की तरफ बढ़ रहे थे। वो चीख उठी- ‘पापा, मम्मी सब भागो, नक्सली आ गए हैं..दोनों बहनें, उनके मम्मी-पापा और बाकी रिश्तेदार खेतों की तरफ भागने लगे.. तभी बगल के लोगों ने रोक लिया। कहने लगे- ‘आप लोगों को कोई खतरा नहीं है.. घर में ही छिप जाओ..कुछ ही मिनटों में भीड़ ने गांव में धावा बोल दिया राजपूतों के घरों में घुस गए. मारकाट मचाने लगे. कमला और ललिता घर के पीछे भूसे के ढेर में छिप गईं. बाकी परिवार और रिश्तेदार पकड़े गए.. दो साल का बच्चा पलंग पर सो रहा था… वो भीड़ देखकर रोने लगा..एक हमलावर ने चीखते हुए कहा- इस कमीने को सबसे पहले मारो..एक अधेड़ ने बच्चे को उठाकर चौखट पर पटक दिया उसका सिर फट गया.. हमलावर ने बाल पकड़कर बच्चे को उठा लिया.. दूसरे ने बच्चे की गर्दन पर कुल्हाड़ी दे मारी.. बच्चे का सिर हमलावर के हाथ में रह गया और बॉडी नीचे गिर गई.एक ने औरतों की तरफ इशारा करते हुए बोला- ‘इनकी इज्जत लूट लो और काम तमाम कर दो.. हमलावरों ने वैसा ही किया.. बलात्कार करके महिलाओं और लड़कियों की गर्दन उतार दी..कमला के पिता से यह देखा नहीं गया.. वो गाली देते हुए हमलावरों पर झपटे, पर उन लोगों ने दबोच लिया.. दो हमलावरों ने उनका पैर पकड़ा और दो ने हाथ। 20 साल के एक लड़के ने उनके पेट में कुल्हाड़ी मार दी.. वो चीख उठे। तभी हमलावर ने उनके मुंह में बंदूक का बट ठूंस दिया.. चंद मिनटों में वे तड़प-तड़पकर शांत हो गए..एक हमलावर बोला- ‘टाइम खराब मत करो सारे मर्दों को बांध दो और ले चलो बरगद के पेड़ के पास..हमलावरों ने रस्सी से सभी मर्दों के हाथ पैर बांध दिए और घसीटते हुए उसी बरगद के पेड़ के पास ले जाने लगे.. दलेलचक के बाकी घरों में भी ऐसे ही कोहराम मचा था… हमलावरों ने महिलाएं और लड़कियों को बलात्कार के बाद घर में ही मार दिया.. जबकि मर्दों के हाथ-पैर बांधकर बरगद के पेड़ के पास बैठा दिया..कुछ देर में हमलावरों ने सबको बरगद के पेड़ से बांध दिया.. ये लोग जोर जोर से चीख रहे थे- बचाओ, बचाओ.. पर कोई सुनने वाला नहीं था.. गांव के गैर राजपूतों ने अपने-अपने दरवाजे बंद कर लिए थे..हमलावरों के मुखिया ने कहा- सबके टुकड़े-टुकड़े कर दो..भीड़ कुल्हाड़ी और गड़ासा लेकर टूट पड़ी। कुछ ही मिनटों में बरगद के पेड़ से दर्जनों अधकटी लाशें लटक गईं.तभी हवा में फायरिंग करते हुए एक हमलावर बोला- जाओ इनके घरों में आग लगा दो जो छुपे होंगे वो भी जल मरेंगे..भीड़ ने चुन-चुनकर दोनों गांवों के राजपूतों के घरों में आग लगा दी फिर ‘एमसीसी जिंदाबाद। छेछानी का बदला ले लिया बदला पूरा हुआ’ का नारा लगाते हुए हमलावर निकल गए..
दो घंटे बाद थाने से निकली पुलिस
गांव से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर मदनपुर थाना है… भीड़ की धमक, लोगों की चीखें और गोलियों की गूंज थाने तक पहुंच चुकी थीं, पर पुलिस निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई.करीब 2 घंटे बाद पांच पुलिस वाले गांव के लिए निकले.. बगल के दूसरे थाने से पुलिस की एक और टीम दलेलचक पहुंची.. कुछ ही देर में औरंगाबाद के एसपी सतीष झा भी पहुंच गए.. दोनों गांवों में घरों से अब भी आग की ऊंची-ऊंची लपटें दिख रही थीं..एसपी और बाकी पुलिस वाले आग बुझाने में जुट गए।..वे घर-घर जाकर पानी मांग रहे थे, लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खोला..पूरी रात पुलिस आग बुझाने में जुटी रही, पर आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी…सुबह एक-एक करके लाशें गिनी जाने लगीं.. बरगद के पेड़ के पास 29 कटी -फटी लाशें मिलीं.. सिर जमीन पर बिखरे पड़े थे और बाकी हिस्सा बरगद के पेड़ से बंधा हुआ था.. पूरी जमीन खून से सन गई थी.. ऐसा लग रहा था जैसे कोई बूचड़खाना हो.. पुलिस ने दोनों गांवों में एक-एक घर की तलाशी ली.. 26 लाशें मिलीं। इनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे..कुल 55 लोग मारे गए थे 54 राजपूत और एक हरिजन. 7 राजपूत परिवार ऐसे थे, जिनके घरों में कोई जिंदा नहीं बचा.
भयावह मंजर देख रो पड़े मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे
31 मई को ही मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे भी दलेलचक बघौरा पहुंचे अब भी कई घरों में आग बुझी नहीं थी.. फायर मुख्यमंत्री घर-घर जा रहे थे लेकिन गांव के ज्यादातर लोग भाग चुके थे..एक बुजुर्ग, मुख्यमंत्री को देखकर बिलखने लगा। उसकी गोद में दो छोटे-छोटे बच्चे थे.. कहने लगा- ‘साहब ये दोनों मेरे पोते-पोती हैं। इनके मां-बाप को मार डाला है परिवार में बस ये ही बचे हैं मैं अकेला इनकी देखभाल कैसे करूंगा। यह देखकर मुख्यमंत्री भी रोने लगे.
छोटकी छेछानी हत्याकांड का बदला था दलेलचक बघौरा नरसंहार
अब आपको ये बता देते हैं कि इस नरसंहार की वजह क्या थी. ? दरअसल, बघौरा गांव के बगल से कोयल नहर निकलने वाली थीं.. इससे वहां की जमीनों की कीमतें अचानक बढ़ गई ..इन जमीनों पर राजपूतों का दावा था वहीं यादव अपना कब्जा चाहते थे.. नक्सली संगठन एमसीसी यादवों की मदद कर रहा था..दलेलचक गांव में बोध गया के महंत की सैकड़ों एकड़ जमीनें थीं.. एमसीसी वालों ने उनकी कुछ जमीनों पर कब्जा कर लिया.. बटाईदारों के जरिए वो खेती करवा रहे थे.. गांव के ही एक दबंग राजपूत रामनरेश सिंह ने महंत से 46 एकड़ जमीनें खरीद लीं और बटाईदारों को भगा दिया.. रामनरेश सिंह तब केंद्रीय मंत्री रहे और बाद में पीएम बने चंद्रशेखर का करीबी थे..कुछ ही दिनों बाद रामनरेश के सहयोगी कृष्णा कहार का मर्डर हो गया.. सितंबर 1986 में राम नरेश के एक और सहयोगी की हत्या हो गई.दोनों हत्याओं का आरोप एमसीसी पर लगा.. 10 दिनों के भीतर ही राजपूतों ने 5-6 एमसीसी कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी.. यहां से बदले की आग और धधकती गई.. 20 दिन बाद पास के ही दरमिया गांव में 11 राजपूतों की हत्या हो गई.. इसके बाद सरकार ने स्पेशल ऑपरेशन चलाया। पुलिस बढ़ा दी गई सेंट्रल फोर्सेज की तैनाती की कर दी गई.. कुछ महीने मामला काबू में रहा फिर प्रशासन ने ढील दे दी.. सेंट्रल फोर्सेज को पंजाब भेज दिया गया.. फोर्स हटने पर 19 अप्रैल 1987 को राजपूत जमींदार केदार सिंह की हत्या हो गई.. इस हत्या के दो घंटे बाद ही मुसाफिर यादव और राधे यादव परिवार के सात लोगों का कत्ल हो गया.. मुसाफिर और राधे यादव एमसीसी के सपोर्टर माने जाते थे..इसके बादनक्सलियों ने पर्चा बंटवाया… जिसमें लिखा था- ‘सात का बदला सत्तर से लेंगे.. अगले ही महीने दलेलचक बघौरा में नरसंहार हो गया..
,फिर कभी कांग्रेस का सीएम नहीं बना
इस नरसंहार को लेकर विपक्ष तो हमलावर था ही, सरकार के अंदर भी अलग-अलग खेमे बंट गए थे.. पूर्व सीएम जगन्नाथ मिश्रा अपने ही सीएम पर लापरवाही का ठीकरा फोड़ रहे थे..13 फरवरी 1988 को मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे ने इस्तीफा दे दिया.भागवत झा आजाद मुख्यमंत्री बने, लेकिन एक साल बाद उन्हें भी हटा दिया गया.. इसके बाद सत्येंद्र नारायण सिंह सीएम बने.. पर 7 महीने बाद दिसंबर 1989 में उनका भी इस्तीफा हो गया. चुनाव में दो-तीन महीने ही बचे थे ऐसे में राज्य की कमान एक बार फिर से जगन्नाथ मिश्रा को मिली.1990 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 324 सीटों में से महज 71 सीटें मिलीं. पिछले चुनाव से 125 कम.. मगध संभाग, जहां ये नरसंहार हुआ था, वहां की 26 सीटों में से सिर्फ 10 सीटें ही कांग्रेस बचा सकी..122 सीटें जीतकर जनता दल ने लेफ्ट और निर्दलीयों की मदद से सरकार बनाई और लालू यादव मुख्यमंत्री बने और इसके बाद बिहार में कभी कांग्रेस का सीएम नहीं बना
हमलावर 500, आरोपी 177, 8 उम्रकैद काटकर जेल से छूट गए
दलेलचक बघौरा गांव में 500 लोगों की भीड़ ने हमला किया था इनमें से कुल 177 आरोपी बनाए गए.. इनमें ज्यादातर यादव थे दिसंबर 1992 में औरंगाबाद सेशन कोर्ट ने 8 को फांसी की सजा सुनाई गई और बाकी सबूतों के अभाव में बरी हो गए.. इस फैसले के बाद नक्सलियों ने गया के बारा गांव के पास एक थाने को घेरकर 5 पुलिस वालों की हत्या कर दी.2011 में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया इसी साल आठों आरोपी अपनी-अपनी सजा काटकर जेल से छूट गए.नरसंहार के बाद ज्यादातर राजपूत गांव छोड़कर चले गए. दोनों गांवों को भूतहा गांव कहा जाने लगा..आज भी इन गांवों में राजपूतों के गिने-चुने ही घर हैं. कई परिवार तो नरसंहार के बाद लौटे ही नहीं
