उत्तराखंड लोकायुक्त अध्यक्ष एवं सदस्य चयन को सर्च समिति गठित
*लोकायुक्त अध्यक्ष एवं सदस्यों के चयन हेतु खोजबीन समिति का गठन*
देहरादून 13 जून 2026। उत्तराखण्ड में लोकायुक्त के अध्यक्ष एवं सदस्यों के चयन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए खोजबीन समिति (Search Committee) का गठन किया गया है। सचिव कार्मिक एवं सतर्कता श्री शैलेश बगौली ने इस संबंध में जानकारी दी।
उत्तराखण्ड लोकायुक्त अधिनियम, 2014 के अंतर्गत गठित 5 सदस्यों की चयन समिति की 04 जून 2026 को आयोजित बैठक में हुए विचार-विमर्श तथा अधिनियम की धारा 4(3) के अंतर्गत प्रदत्त संस्तुति के आधार पर यह निर्णय लिया गया है। खोजबीन समिति का दायित्व लोकायुक्त के अध्यक्ष एवं सदस्य पदों पर नियुक्ति के लिये उपयुक्त नामों का पैनल तैयार कर चयन समिति को उपलब्ध कराना होगा।
गठित खोजबीन समिति में
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) श्री आलोक वर्मा, पूर्व न्यायाधीश, उच्च न्यायालय नैनीताल — अध्यक्ष,
श्री इन्दु कुमार पाण्डेय, सेवानिवृत्त मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड — सदस्य,
श्री सुभाष कुमार, सेवानिवृत्त मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड — सदस्य,
श्रीमती राधा रतूड़ी, सेवानिवृत्त मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड — सदस्य,
एवं प्रो. सुरेखा डंगवाल, कुलपति, दून विश्वविद्यालय, देहरादून — सदस्य के रूप में शामिल हैं।

खोजबीन समिति उत्तराखण्ड लोकायुक्त अधिनियम, 2014 की धारा 4(4) के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप लोकायुक्त के अध्यक्ष एवं सदस्य पदों के लिए उपयुक्त व्यक्तियों के नामों का पैनल तैयार कर चयन समिति के अध्यक्ष को उपलब्ध कराएगी।
उत्तराखंड लोकायुक्त की अर्हताएं
उत्तराखंड लोकायुक्त के अध्यक्ष और सदस्यों के लिए ‘उत्तराखंड लोकायुक्त अधिनियम’ के तहत पात्रता और अर्हताएं निर्धारित की गई हैं। लोकायुक्त में कुल ५ से ७ सदस्य होते हैं, जिनमें आधे (५०%) सदस्यों का संबंध न्यायिक पृष्ठभूमि (Legal Background) से होना अनिवार्य है।
न्यायिक पृष्ठभूमि वाले सदस्यों/अध्यक्ष के लिए अर्हताएं:
वे सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय (High Court) के मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश रहे हों।
या उन्होंने कम से कम २० वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता (Advocate) के रूप में कार्य किया हो।
गैर-न्यायिक सदस्यों के लिए अर्हताएं:
व्यक्ति उत्कृष्ट योग्यता, उच्च क्षमता और निर्दोष सत्यनिष्ठा (Impeccable Integrity) का धनी होना चाहिए।
उन्हें भ्रष्टाचार-रोधी मामलों, लोक प्रशासन, वित्त, बीमा, बैंकिंग, कानून या प्रबंधन के क्षेत्र में न्यूनतम २० वर्षों का विशिष्ट अनुभव प्राप्त हो।
सामान्य अयोग्यताएं (कौन पात्र नहीं है?):
लोकायुक्त के पद पर नियुक्ति के समय व्यक्ति की आयु ४५ वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए।
जो व्यक्ति संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य हो या किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हो।
कोई भी व्यक्ति जो किसी लाभ के पद पर हो या कोई व्यापार/पेशे में संलग्न हो।
उत्तराखंड राज्य में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त या त्यागपत्र देने वाले अधिकारी, जिन्होंने नियुक्ति की तारीख से पिछले दो वर्षों के भीतर पद छोड़ा हो, इस पद के पात्र नहीं होते।
उत्तराखंड में लोकायुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा एक उच्च-स्तरीय चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है।
उत्तराखंड लोकायुक्त अधिनियम में संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया, शक्तियां और क्षेत्राधिकार (दायरा) अत्यंत व्यापक और सुदृढ़ बनाए गए हैं। इसकी पूरी कार्यप्रणाली का विवरण निम्नलिखित है:
🗳️ १. नियुक्ति प्रक्रिया (Appointment Process)
लोकायुक्त के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा एक उच्च-स्तरीय चयन समिति (Selection Committee) की सिफारिश पर की जाती है।
चयन समिति की संरचना:
अध्यक्ष: राज्य के मुख्यमंत्री।
सदस्य:
उत्तराखंड विधानसभा के अध्यक्ष (Speaker)।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition)।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) या उनके द्वारा नामित कोई न्यायाधीश।
राज्यपाल द्वारा नामित एक प्रतिष्ठित कानूनविद् (Eminent Jurist)।
यह समिति योग्य नामों की छंटनी के लिए एक सर्च कमेटी (खोज समिति) का भी गठन करती है।
🔍 २. लोकायुक्त का दायरा (Jurisdiction / Purview)
उत्तराखंड देश के उन चुनिंदा राज्यों में से एक है जिसने भ्रष्टाचार-रोधी कानून में अत्यधिक व्यापक क्षेत्राधिकार तय किया है। इसके दायरे में निम्नलिखित शामिल हैं:
मुख्यमंत्री (Chief Minister): वर्तमान और पूर्व मुख्यमंत्री दोनों इसके जांच दायरे में आते हैं।
मंत्री और विधायक: राज्य मंत्रिपरिषद के सभी सदस्य और विधानसभा के सदस्य (MLAs)।
सरकारी अधिकारी: राज्य सरकार के सभी राजपत्रित (Gazetted) और अराजपत्रित अधिकारी (जैसे IAS, IPS और अन्य राज्य लोक सेवक)।
स्थानीय निकाय और निगम: राज्य सरकार के अनुदान या नियंत्रण में चलने वाले सभी बोर्ड, निगम, स्वायत्त निकाय और स्थानीय अधिकारी।
(नोट: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है)।
⚡ ३. लोकायुक्त की शक्तियां (Powers)
भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए लोकायुक्त को व्यापक न्यायिक और प्रशासनिक शक्तियां प्राप्त हैं:
दीवानी न्यायालय की शक्तियां: लोकायुक्त को किसी भी गवाह को समन जारी करने, शपथ पर गवाही लेने और किसी भी सरकारी दस्तावेज को मंगवाने की शक्ति (Civil Court Powers) प्राप्त है।
स्वतंत्र जांच विंग: लोकायुक्त के पास अपनी स्वयं की एक जांच शाखा (Investigation Wing) होती है। इसके अलावा, वह राज्य की किसी भी जांच एजेंसी (जैसे सतर्कता विभाग) को जांच सौंप सकता है।
अधिकारियों के तबादले पर रोक: लोकायुक्त द्वारा जांच किए जा रहे मामले से जुड़े किसी भी अधिकारी का तबादला (Transfer) उसकी अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता।
संपत्ति जब्त करने का अधिकार: भ्रष्टाचार से अर्जित की गई अवैध संपत्ति को कुर्क (Freeze) या जब्त करने की सिफारिश करने की शक्ति शामिल है।
📅 कार्यकाल (Tenure)
लोकायुक्त के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल ५ वर्ष या ७० वर्ष की आयु (जो भी पहले पूरा हो) तक होता है।इन्हें पद से हटाना आसान नहीं होता; दुराचार या अक्षमता के आधार पर इन्हें केवल विधानसभा में विशेष प्रक्रिया (महाभियोग की तरह) द्वारा ही हटाया जा सकता है।

