उत्तराखंड के युवक की किडनी बिकी 90 लाख में,मिले साढे नौ लाख, तब खोली पोल
‘डॉक्टर साहब और डॉक्टराइन को ले गई पुलिस…’, गार्ड ने बता दी कानपुर किडनी कांड वाले आहूजा अस्पताल की सच्चाई
कानपुर के आहूजा अस्पताल में अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का खुलासा होने के बाद पूरा अस्पताल खाली मिला. पुलिस ने डॉक्टर दंपति को गिरफ्तार किया, जिसके बाद स्टाफ और मरीज सब फरार हो गए. गार्ड ने बताया डॉक्टर साहब और डॉक्टराइन को यही से पुलिस उठाकर ले गई.जांच में दलालों के जरिए डोनर-रिसीवर सौदे और करोड़ों के खेल के संकेत मिले हैं. पुलिस अब पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है.
डॉक्टर प्रीति आहूजा और सुरजीत सिंह आहूजा को पकड़ा है
कानपुर ,01 अप्रैल 2026, कानपुर के रावतपुर में चार मंजिला अस्पताल जहां हमेशा मरीजों और डॉक्टरों की भीड़ लगी रहती थी, वहां कदम रखते ही एक अजीब सन्नाटा घेर लेता है. न मरीज, न डॉक्टर, न स्टाफ. बस खाली कमरे, बिखरी फाइलें और अधूरी छूटी जिंदगी के निशान. यही वह जगह है, जहां अवैध किडनी ट्रांसप्लांट का खेल चल रहा था. और इसी जगह से एक सिक्योरिटी गार्ड की जुबान से निकली एक लाइन ने पूरा मामला साफ कर दिया. ‘डॉक्टर साहब और डॉक्टराइन को तो कल ही पुलिस ले गई… उसके बाद सब भाग गए’.
अस्पताल के भीतर का दृश्य किसी फिल्म के अचानक रुक गए सीन जैसा लगता है. रिसेप्शन पर रखी कुर्सियां अपनी जगह पर हैं, लेकिन उन पर बैठने वाला कोई नहीं. काउंटर पर रजिस्टर खुले पड़े हैं, जैसे किसी ने जल्दबाजी में पन्ना पलटा हो और फिर लौटकर न आया हो. डॉक्टर के केबिन में दीवारों पर टंगे सम्मान पत्र और तस्वीरें अब भी मौजूद हैं. मेज पर फाइलें बिखरी हैं, कुछ दवाइयों के डिब्बे खुले पड़े हैं. ऐसा लगता है जैसे यहां काम चल रहा था और अचानक सब कुछ छोड़कर लोग गायब हो गए. इमरजेंसी रूम में टंगी ड्रिप, आधी इस्तेमाल हुई दवाइयां और बेड पर पड़े सिलवटों वाले चादर इस बात की गवाही देते हैं कि यहां हाल ही में मरीज थे. लेकिन अब वहां सिर्फ सन्नाटा है.
गार्ड की गवाही: एक लाइन में पूरा सच
अस्पताल के बाहर तैनात सिक्योरिटी गार्ड से बात की तो उसने बेहद सरल शब्दों में पूरी कहानी कह दी कि वह खुद एक दिन पहले ही ड्यूटी पर आया था. उसी दिन पुलिस आई और अस्पताल के मालिक डॉक्टर दंपति साथ ले गई. गार्ड के मुताबिक, जैसे ही पकड हुई, अस्पताल का पूरा स्टाफ धीरे-धीरे गायब हो गया. किसी ने कुछ नहीं बताया, बस लोग अपने-अपने रास्ते चले गए.
डॉक्टर दंपति की गिरफ्तारी
पुलिस ने मामले में अस्पताल संचालक डॉक्टर दंपति प्रीति आहूजा और सुरजीत सिंह आहूजा पकडे है. इन्हीं के अस्पताल में अवैध ट्रांसप्लांट होने की आशंका है. जांच में शुरुआती तथ्य बेहद चौंकाने वाले हैं. बताते है कि ऑपरेशन थिएटर में बिना जरूरी अनुमति के किडनी ट्रांसप्लांट होते थे जिसके लिए मोटी रकम वसूली जाती थी. एक सर्जरी को रोजाना साढ़े तीन से चार लाख रुपये तक मांगे जाते थे. यह रकम सिर्फ ऑपरेशन की थी इसके अलावा डोनर और रिसीवर के बीच अलग से सौदे होते थे.
कैसे चलता था पूरा नेटवर्क?
जांच में आया है कि यह कोई छोटा-मोटा खेल नहीं बल्कि संगठित नेटवर्क से संचालित था. इसमें दलाल, डॉक्टर, अस्पताल प्रबंधन और बाहरी लोग चेन की तरह जुड़े थे. इस नेटवर्क की महत्वपूर्ण कड़ी शिवम अअग्रवालहै जो बिचौलिये की भूमिका में था. वह जरूरतमंद लोग ढूंढता, उन्हें पैसों का लालच देता और फिर उन्हें इस सिस्टम में जोड़ देता. पूरे मामले में सबसे दर्दनाक पक्ष उन लोगों की कहानी है, जो मजबूरी में इस जाल में फंस गए. उत्तराखंड के एक युवक को 10 लाख रुपये का लालच देकर किडनी देने को तैयार किया गया. उसे बताया गया कि उसकी किडनी किसी जरूरतमंद रिश्तेदार के लिए ली जा रही है. आर्थिक तंगी से जूझ रहा युवक मान गया. लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी. आरोप है कि उसकी किडनी निकालकर उसे 6 लाख रुपये नकद और 3.5 लाख रुपये का चेक मिला, जबकि वही किडनी एक महिला के परिजनों को 90 लाख रुपये से ज्यादा में बेचा गया.
ऑपरेशन बाद ‘गायब’ हो जाते थे लोग
ऑपरेशन बाद डोनर और रिसीवर दोनों को कुछ समय अस्पताल में रखा जाता, लेकिन फिर उन्हें अलग-अलग जगह भेज दिया जाता था. मकसद साफ था दोनों पक्ष अनजान रहें. जांच हो भी, तो एक ही जगह से पूरा नेटवर्क पकड़ में न आए. सूत्रों के अनुसार, डोनर को दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी पहचान भी बदल दी गई. वहीं रिसीवर को किसी और जगह भेजा गया. पूरे रैकेट का पता तब चला, जब डोनर को तय रकम से कम पैसे मिले. उसे बार-बार टाला गया, जिससे परेशान होकर उसने पुलिस का दरवाजा खटखटाया. यहीं से कहानी पलटी. पुलिस ने मामला गंभीरता से ले जांच शुरू की. शुरुआती जांच में ही इतने संकेत मिले कि मामला बड़ा है, तब कार्रवाई तेज हुई.
छापेमारी और गिरफ्तारी
क्राइम ब्रांच ने देर रात कई अस्पतालों में एक साथ छापेमारी की. इसमें प्रिया हॉस्पिटल एंड ट्रामा सेंटर, आहूजा हॉस्पिटल और मेडलाइफ हॉस्पिटल थे. जांच में कई संदिग्ध प्रपत्र, रोगियों की जानकारी और अन्य सबूत जुटाए गए. अस्पताल संचालक डॉक्टर दंपति और दलाल शिवम पकड़ गए. इसके अलावा, उस अस्पताल में भी पुलिस पहुंची जहां किडनी पाने वाली महिला भेजी गई थी. वहां से भी कई लोगों को पूछताछ को पकड़ा गया.जांच में यह भी सामने आया कि इस नेटवर्क का जाल छात्रों तक फैला था.डोनर‘आयुष’ने खुद को MBA का छात्र बताया.सूत्रों के अनुसार,एक अन्य मामले में एक छात्रा से 4 लाख रुपये में किडनी डोनेट करवाई गई और बाद में उसे 45 से 50 लाख रुपये में बेचा गया.
Kanpur Kidney Racket Seven Illegal Transplants Conducted at Ahuja Hospital So Far Dr Preeti Ahuja
आहूजा हॉस्पिटल था ‘किडनी मंडी’, आरोपित डॉक्टर प्रीति का पावरफुल प्रोफाइल, रसूख के दम पर काला खेल
कानपुर के आहूजा हॉस्पिटल में बिना अनुमति के किडनी ट्रांसप्लांट का खेल चल रहा था। इसमें एक साउथ अफ्रीकी महिला का भी अवैध ऑपरेशन तीन मार्च को हुआ था हुआ। मुख्य चिकित्साधिकारी डॉक्टर हरिदत्त नेमी ने बताया कि आहूजा अस्पताल में किडनी प्रत्यारोपण की सुविधा नहीं है।
आहूजा हॉस्पिटल और डॉ. प्रीति आहूजा
कानपुर में केशवपुरम स्थित आहूजा हॉस्पिटल में करीब दो साल से अनधिकृत तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट का खेल चल रहा है। यहां दिल्ली, मेरठ, नोएडा और एनसीआर क्षेत्र से मरीजों व डोनरों काे लाकर किडनी प्रत्यारोपित की जा रही थी। इसकी जानकारी पुलिस और सीएमओ कार्यालय की टीम को प्रारंभिक जांच में हुई है। इस वर्ष तीन मार्च को साउथ अफ्रीका की महिला अरेबिका की किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था।
पुलिस आरोपियों को पकड़ने के लिए जाल बिछाए रही, जबकि मरीज व उनके रिश्तेदार शहर से कहीं और चले गए। नए केस के लिए पुलिस अधिकारियों ने स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टरों के साथ फिर से प्लानिंग की और आरोपियों को दबोच लिया। पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि पुलिस के पास अवैध तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट की सूचना आ रही थी। क्राइम ब्रांच, एलआईयू और खुफिया की टीमों को सक्रिय किया गया।
अस्पताल के रिकार्ड में भी ब्योरा नहीं मिला
स्वास्थ्य विभाग को भी चौकन्ना किया गया था। अनधिकृत तरीके से अंग प्रत्यारोपण का खेल किस नर्सिंगहोम में हो रहा है, इसकी सटीक जानकारी नहीं आई। इसी साल तीन मार्च को साउथ अफ्रीका की महिला अरेबिका का अंग प्रत्यारोपण हुआ था। एलआईयू और क्राइम ब्रांच ने स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से जानकारी जुटाई, लेकिन महिला व उनके परिजनों का पता नहीं चल सका था। अस्पताल के रिकार्ड में भी किसी तरह की सर्जरी का ब्योरा नहीं मिला।
आहूजा हॉस्पिटल में सात किडनी प्रत्यारोपण की जानकारी
आरोपियों ने अरेबिका को कुछ दिन कल्याणपुर के नर्सिंगहोम के आईसीयू में रखा फिर दिल्ली ले गए। दिल्ली के नर्सिंगहोम के बाद नोएडा के निजी अस्पताल में डेढ़ से दो माह के लिए उनका इलाज चला। अब तक आहूजा हॉस्पिटल में सात किडनी प्रत्यारोपण की जानकारी हुई है। इस अस्पताल के कुछ स्टाफ कई अधिकृत और अनधिकृत तरीके से संचालित हो रहे कल्याणपुर, काकादेव और पनकी क्षेत्र के नर्सिंगहोम से जुड़े हुए थे। वहां से मरीजों को एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर करने का खेल चल रहा था।
यूरोलॉजी के लिए अधिकृत नहीं
मुख्य चिकित्साधिकारी डॉक्टर हरिदत्त नेमी ने बताया कि आहूजा अस्पताल में किडनी प्रत्यारोपण की सुविधा नहीं है। नर्सिंगहोम और आईसीयू जरूर बने हैं लेकिन अस्पताल यूरोलॉजी को अधिकृत नहीं हैं। ऐसे में गुर्दे और उससे जुड़ी सर्जरी होने का सवाल ही नहीं है। किडनी ट्रांसप्लांट करने वाली टीम अपने साथ कई औजार लेकर आती थी जबकि ऑपरेशन थियेटर के दो टेबलों का उपयोग किया जाता था।
एसबीआई में मेडिकल अफसर भी है डॉ. प्रीति आहूजा
अनधिकृत तरीके से गुर्दा प्रत्यारोपण मामले की आरोपित डॉक्टर प्रीति आहूजा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की मेडिकल ऑफिसर भी है। साथ ही वह डॉक्टरों के विभिन्न संगठनों से जुड़ी है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की नगर शाखा की उपाध्यक्ष है। आईएमए के अलावा वह शहर के मधुमेह रोग विशेषज्ञों के संगठन कानपुर डायबिटीज एसोसिएशन (केडीए) की सचिव है। विशेषज्ञ डॉक्टरों के संगठन फिजिशियन फोरम की सदस्य है। डॉक्टर कम्युनिटी के विभिन्न सामाजिक और मेडिकल कार्यक्रमों में उसकी सहभागिता रहती है।
शहर के सर्जनों से होगी पूछताछ
आहूजा अस्पताल में अपनी सेवाएं देने वाले शहर के सर्जनों से भी पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम पूछताछ करेगी। इन सर्जन पर किडनी ट्रांसप्लांट होने के बाद रोगियों के इलाज करने और इस बात को छुपाने का आरोप है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार आहूजा अस्पताल के पास किडनी ट्रांसप्लांट करने और ट्रांसप्लांट के रोगी का इलाज करने की अनुमति नहीं होने के बावजूद इन डॉक्टरों ने उन दोनों रोगियों का इलाज किया। ऐसे में ये सभी डॉक्टर पूछताछ के दायरे में आएंगे। सीएमओ डॉ. हरिदत्त नेमी ने बताया कि अस्पताल में आने वाले अन्य डॉक्टरों से भी बातचीत की जाएगी। उन्होंने बाद में रोगियों का इलाज किया है और जानकारी भी नहीं दी। ये डॉक्टर अस्पताल में ऑन कॉल आते थे। इसके अलावा अस्पताल में कोई भी नेफ्रोलॉजिस्ट या यूरोलॉजिस्ट नहीं आता था।
स्टाफ को छुट्टी देकर देर रात होता था ट्रांसप्लांट
मसवानपुर चौराहा स्थित आहूजा हॉस्पिटल में किडनी ट्रांसप्लांट देर रात या सुबह के तीन से चार बजे के बीच होता था। यह वह समय था जब अधिकतर मरीज व तीमारदार नींद में होते थे। सर्जरी के बाद किडनी रोगी व डोनर को शिफ्ट करना आसान रहता था। किडनी प्रत्यारोपण वाले दिन पूरे स्टाफ को छुट्टी दे दी जाती थी। यह जानकारी पुलिस और सीएमओ कार्यालय के अधिकारियों को जांच में मिली है। पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि आहूजा हॉस्पिटल में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए देर रात का समय निर्धारित किया जाता था।
टीम को आरोपितों की वीडियो फुटेज नहीं मिली
इस दौरान सभी स्टाफ की छुट्टी कर दी जाती थी। केवल मेरठ और नोएडा के डॉक्टरों व पैरामेडिकल टीम रहती थी। सर्जरी के बाद किडनी रोगी और डोनर को अलग-अलग अस्पताल में भर्ती करा दिया जाता था। इस बीच अस्पताल के सीसीटीवी कैमरे भी बंद कर दिए जाते थे। पुलिस और सीएमओ कार्यालय की टीम को आरोपियों की वीडियो फुटेज नहीं मिली है। आहूजा हॉस्पिटल, मेडलाइफ और प्रिया नर्सिंगहोम में भी फुटेज नहीं मिले हैं। हालांकि आसपास लगे अन्य सीसीटीवी कैमरों ने एंबुलेंस व मरीज को शिफ्ट कराने की फुटेज मिले हैं। पुलिस ने साक्ष्य बरामद किए हैं।
अनाधिकृत पैरामेडिकल स्टाफ कर रहा था इलाज
मुख्य चिकित्साधिकारी की जांच में सामने आया है कि मेडलाइफ और प्रिया नर्सिंगहोम में अनाधिकृत पैरामेडिकल स्टाफ इलाज कर रहा था। उनको सादे कागज में सिर्फ पांच दिन दवाएं, इंजेक्शन, ग्लूकोज आदि की डिटेल लिखी गई थी। यह प्रक्रिया अन्य गुर्द रोगियों और डोनर में अपनाई जाती थी। अगर कोई भी केस बिगड़ता तो सिर्फ लखनऊ के एक नर्सिंगहोम में रेफर कर दिया जाता था।
सरकारी डॉक्टर कर रहे प्रैक्टिस
कल्याणपुर, पनकी, रावतपुर और काकादेव के नर्सिंगहोम की जांच में पुलिस के पास जानकारी आई है कि कई सरकारी डॉक्टर यहां प्रैक्टिस कर रहे हैं। उनके दलाल और जूनियर डॉक्टर सर्जरी को मरीजों और डिलीवरी को प्रसूताओं को प्रलोभन देते हैं। उनके लिए अच्छे खासे पैकेज तैयार किए गए हैं। मंगलवार को मुख्य चिकित्साधिकारी टीम ने कई नर्सिंगहोम और निजी अस्पतालों में जांच की। वहां के ऑपरेशन थियेटर व अन्य सुविधाओं का जायजा लिया।
डायलिसिस कराने वाले मरीजों की पता करते थे हैसियत
कानपुर किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट से जुड़े आरोपित हमेशा उन लोगों की तलाश करते जिन्हें या तो रुपयों की सख्त जरूरत हो या फिर किडनी की। रुपये के जरूरतमंदों की जानकारी को नौकरीपेशा लोग या छात्र निशाना बनाये जाते। किडनी किसकी खराब है और कितनी खराब है इसके बारे में उन अस्पतालों से जानकारी जुटाई जाती, जहां लोग डायलिसिस कराने जाते हैं। वहीं से मरीजों का पता लेकर आरोपित उनके बारे में पूरी जानकारी जुटाते थे। उनकी हैसियत देखकर उनसे किडनी को संपर्क करते थे।
सिंडिकेट ऑर्गनाइज तरीके से काम करता था
मामले के अनावरण में पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि पूरा सिंडिकेट ऑर्गनाइज्ड था। मेरठ का डॉक्टर अफजल डायलिसिस करने वाले अस्पतालों के संपर्क में था। वहां से मरीजों की जानकारी लेकर उनसे किडनी ट्रांसप्लांट कराने को संपर्क करता था। फिर आरोपित टेलीग्राम ग्रुप में मरीज की जानकारी दे किडनी की डिमांड करते थे। इसी डॉक्टर अफजाल ने मेरठ के बड़े स्कूल संचालक की पत्नी पारुल तोमर से संपर्क किया था।

