“ढोली”बनी पहली राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली गढवाली फिल्म

ढोली फिल्म का पोस्टर।

देहरादून/ नई दिल्ली 18 जुलाई। इतिहास में पहली बार किसी गढ़वाली फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला है। 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड में फिल्म ‘ढोली’ को फीचर फिल्म कैटेगरी में बेस्ट गढ़वाली फिल्म चुना गया। फिल्म के निर्माता सुनील नायक और डायरेक्टर दिनेश भोंसले को रजत कमल के साथ दो-दो लाख रुपए की पुरस्कार राशि मिलेगी।

करीब 85 मिनट की यह फिल्म गढ़वाल के पारंपरिक ढोल वादक यानी ढोली और उसके परिवार के संघर्ष पर आधारित है। कहानी बताती है कि समाज ढोल की आवाज का सम्मान करता है, लेकिन उसे बजाने वाले कलाकार को बराबरी का सम्मान नहीं देता। फिल्म इसी सोच को चुनौती देती है।

फिल्म की शूटिंग सितंबर 2023 में उत्तरकाशी जिले की असीगंगा घाटी के नाल्ड गांव और आसपास के क्षेत्रों में हुई थी। इसमें उत्तराखंड के कई स्थानीय कलाकारों ने अभिनय किया है। फिल्म के गीतों को प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने अपनी आवाज दी है।

जानिए, आखिर ‘ढोली’ की कहानी क्या है

ढोल का सम्मान, लेकिन ढोली की अनदेखी

फिल्म का केंद्र एक ऐसे परिवार की कहानी है, जिसकी पीढ़ियां पारंपरिक ढोल बजाकर अपनी आजीविका चलाती हैं। गांव के धार्मिक आयोजन हों या शुभ अवसर, हर जगह ढोल की धुन जरूरी मानी जाती है। इसके बावजूद ढोल बजाने वाले कलाकार को समाज में वह सम्मान नहीं मिलता, जिसका वह हकदार है।

फिल्म इसी विरोधाभास को बेहद संवेदनशील तरीके से सामने लाती है। कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन सभी लोक कलाकारों की है जो अपनी कला से समाज की परंपराओं को जीवित रखते हैं, लेकिन अक्सर सम्मान से वंचित रह जाते हैं।

बेटे ने पिता का संघर्ष बनाया अपनी ताकत 

फिल्म में ढोली का बेटा बचपन से अपने पिता का संघर्ष और अपमान देखता है। वह तय करता है कि अपनी कला को सिर्फ गांव तक सीमित नहीं रखेगा। लगातार मेहनत और लगन से वह देश और विदेश तक अपनी पहचान बनाता है। जब वह सफलता हासिल कर गांव लौटता है तो वही समाज, जो कभी ढोली को नजरअंदाज करता था, उसके सम्मान में खड़ा दिखाई देता है। फिल्म का संदेश है कि कला और कलाकार, दोनों का सम्मान बराबर होना चाहिए।

गढ़वाल की संस्कृति को बड़े पर्दे पर उतारा

फिल्म में सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं दिखाई गई, बल्कि गढ़वाल की लोक संस्कृति, गांव का जीवन, पारंपरिक वाद्ययंत्र, रीति-रिवाज और सामाजिक सोच को भी प्रमुखता दी गई है।

स्थानीय बोली, पहनावा और प्राकृतिक परिवेश फिल्म को वास्तविकता के करीब ले जाते हैं। यही वजह है कि इसे उत्तराखंड की लोक संस्कृति को सिनेमा के माध्यम से प्रस्तुत करने वाली महत्वपूर्ण फिल्मों में माना जा रहा है।

ढोली फिल्म की शूटिंग की शुरुआत करते निर्देशन दिनेश पी. भोंसले ।

नेशनल अवॉर्ड से पहले भी मिल चुकी थी पहचान

‘ढोली’ को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने से पहले भी सराहना मिल चुकी थी। यह 2024 के कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित होने वाली उत्तराखंड की एकमात्र फिल्म थी। फिल्म की कहानी, अभिनय और लोक संस्कृति के चित्रण को वहां भी खूब सराहा गया। अब राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद यह उपलब्धि और बड़ी हो गई है।

उत्तरकाशी की असीगंगा घाटी बनी फिल्म का सबसे बड़ा चरित्र 

फिल्म ‘ढोली’ की शूटिंग सितंबर 2023 में उत्तरकाशी जिले की असीगंगा घाटी के नाल्ड गांव और आसपास के इलाकों में हुई। फिल्म की कहानी गांव और लोक जीवन से जुड़ी थी इसलिए निर्माताओं ने वास्तविक लोकेशन को चुना। पहाड़, खेत, पारंपरिक घर और गांव का प्राकृतिक माहौल फिल्म का अहम हिस्सा बने।

स्थानीय लोगों ने भी शूटिंग के दौरान सहयोग किया। फिल्म में उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता सिर्फ बैकग्राउंड नहीं, बल्कि कहानी का हिस्सा बनकर सामने आती है। यही वजह है कि दर्शकों को फिल्म में गढ़वाल का असली रंग दिखाई देता है।

नरेंद्र सिंह नेगी की आवाज ने बढ़ाया फिल्म का असर,डॉक्टर नंदकिशोर हटवाई का परिश्रम 

गढ़वाली लोकसंगीत की बात हो और नरेंद्र सिंह नेगी का नाम न आए, ऐसा कम ही होता है। फिल्म ‘ढोली’ के संगीत को भी उनकी आवाज ने खास पहचान दी। फिल्म की कहानी लोक कलाकारों के सम्मान और परंपरा से जुड़ी है, इसलिए इसमें लोकसंगीत की अहम भूमिका रखी गई। नेगी के गीतों ने कहानी की भावनाओं को और मजबूत बनाया। उत्तराखंड के दर्शकों के लिए उनकी आवाज पहले से ही अपनापन रखती है, जिसका फायदा फिल्म को भी मिला। यही कारण है कि फिल्म का संगीत भी इसकी बड़ी ताकत माना जा रहा है।

मुंबई से उत्तराखंड तक, कई लोगों की मेहनत से बनी ‘ढोली’

फिल्म के निर्माता सुनील नायक हैं, जबकि निर्देशन दिनेश भोंसले ने किया है। कहानी के विस्तार, हिंदी संवाद और कार्यकारी निर्माता की जिम्मेदारी शिशिर कृष्ण शर्मा ने निभाई। मूल कहानी और गढ़वाली संवादों का अनुवाद डॉक्टर नंदकिशोर हटवाल ने किया। कैमरे की जिम्मेदारी अभिनव गंधर्व और शेख काइजर ने संभाली। संगीत में नरेंद्र सिंह नेगी का योगदान रहा। एडिटिंग और सह-निर्देशन वीरेन्द्र घरसे ने किया। आर्ट डायरेक्टर अतुल विश्नोई, कॉस्ट्यूम गायत्री टम्टा, मेकअप पूजा भंडारी और प्रोडक्शन मैनेजमेंट राजेश कारेकर ने संभाला। अलग-अलग क्षेत्रों के इन लोगों की टीम ने मिलकर इस फिल्म को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

स्थानीय कलाकारों को मिला बड़ा मंच

फिल्म में मुख्य भूमिका मोहित घिल्डियाल ने निभाई है। उनके साथ दीपा देऊपा, रमेश नौडियाल, सतीश धौलाखंडी, सोनिया गैरोला, नीरज नेगी, अतुल रावत, सुशील पुरोहित, धीरज रावत, जसपाल राणा, आनंद राणा, संजय बडोनी, सुनील सिंह, तन्मय लोहानी, मास्टर ऋषभ, अनिल जखमोला, तनुज शर्मा, प्रेम हिंदवाल और पंकज डंगवाल समेत उत्तरकाशी के कई स्थानीय कलाकार फिल्म का हिस्सा बने। स्थानीय कलाकारों को मौका देने से फिल्म में गढ़वाल की बोली, हावभाव और संस्कृति स्वाभाविक रूप से उभरकर सामने आई। यही बात ‘ढोली’ को दूसरी फिल्मों से अलग बनाती है।

 

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