उत्तराखंड: दंगे-प्रदर्शन में मौत में दंगाइयों पर आठ लाख जुर्माना, संपत्ति हानि क्षतिपूर्ति होगी बाजार भाव पर 

Uttarakhand Cabinet Approves Bill If death occurs during riots or protest rioters will face fine of 8 lakh

देहरादून 26 मार्च 2026। उत्तराखंड मंत्रिमंडल की कल 25 मार्च की बैठक में अनुमोदित अधिनियम में व्यवस्था की गई है कि दंगा व प्रदर्शन के दौरान किसी की मृत्यु होने पर दोषी से आठ लाख रुपये व घायल होने पर दो लाख रुपये तक जुर्माने की वसूली की जाएगी। संपत्ति की नुकसान की भरपाई बाजार मूल्य से कम पर नहीं होगी।
राज्य में प्रदर्शन या दंगे के दौरान सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले दंगाइयों से अर्थ दंड की वसूली की जाएगी। उत्तराखंड लोक व निजी संपत्ति क्षति वसूली अधिनियम की नियमावली को मंत्रिमंडल  ने अनुमोदन दे दिया है। अधिनियम में अंकित  दावों का निपटारा अधिकरण (ट्रिब्यूनल)  से किया जाएगा। ट्रिब्यूनल के फैसले को किसी भी सिविल न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।

अधिनियम में दंगा व प्रदर्शन में किसी की मृत्यु होने पर आठ लाख रुपये व घायल होने पर दो लाख रुपये तक अर्थ दंड की वसूली की जाएगी। संपत्ति की नुकसान की भरपाई बाजार मूल्य से कम पर नहीं होगी। हड़ताल, बंद, दंगों, लोक उपद्रव या प्रतिवादों के कारण निजी संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए याची तीन वर्ष के भीतर निर्धारित न्यायालीय फीस के साथ याचिका दाखिल कर सकेगा।

लोक संपत्ति व सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के मामले में घटना के तीन माह के भीतर प्रतिकर के लिए दावा अधिकरण के सामने दावा याचिका दाखिल करनी होगी। इसके लिए घटना की प्रथम सूचना रिपोर्ट पर आधारित संबंधित पुलिस क्षेत्राधिकारी की रिपोर्ट जिला मजिस्ट्रेट या कार्यालय प्रमुख के माध्यम से दावा याचिका दाखिल होगी। कार्यालयाध्यक्ष, कार्यपालक, मुख्य कार्यपालक द्वारा प्राधिकृत कोई व्यक्ति दावा याचिका दाखिल कर सकेगा। इस कानून में उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकेगी, जिन्होंने हड़ताल, बंद, दंगों का नेतृत्व या उनका आह्वान किया।

नियमावली में हड़ताल, बंद, दंगों, लोक अशांति और सड़क जाम के दौरान होने वाली प्रत्येक चल और अचल संपत्ति की क्षति को शामिल किया गया। किसी भी जुलूस या सभा के लिए आवेदन करने पर जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस प्रशासन की शर्तें लागू की जाएगी। प्रदर्शन के दौरान किसी भी प्रकार के शस्त्र, लाठी, चाकू, ज्वलनशील पदार्थ या खतरनाक रसायनों का प्रयोग पूरी तरह से प्रतिबंध रहेगा। प्रत्येक थाने को स्थानीय वीडियो ऑपरेटरों का एक पैनल बनाए रखना होगा ताकि घटनाओं की तत्काल रिकॉर्डिंग की जा सके। साक्ष्य के प्रमाणीकरण के लिए प्रदर्शन समाप्त होते ही संबंधित पुलिस अधिकारी वीडियोग्राफर को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करेगा, जो वीडियो को प्रमाणित करेगा। वीडियो क्लिपों को वैध इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य माना जाएगा।
ट्रिब्यूनल में अपर आयुक्त राजस्व होंगे सदस्य
दावा ट्रिब्यूनल में सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश अध्यक्ष होंगें। जबकि अपर आयुक्त राजस्व सदस्य होंगें। अध्यक्ष का चयन एक सर्च-सह-चयन समिति के माध्यम से किया जाएगा, जिसमें मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव (गृह) और प्रमुख सचिव (न्याय) शामिल होंगे। राज्य प्रशासनिक सेवा के राजपत्रित अधिकारी को दावा आयुक्त नियुक्त किया जाएगा, जो साक्ष्यों के विश्लेषण और दावों के पंजीकरण हेतु उत्तरदायी होगा। क्षतिग्रस्त संपत्ति का आकलन निर्माण का वर्ष, क्षेत्रफल की प्रचलित दरों (सर्किल रेट) और दरवाजों, खिड़कियों में प्रयुक्त लकड़ी व धातु के आधार पर किया जाएगा। चल संपत्तियों का मूल्यांकन प्रचलित बाजार मूल्य के आधार पर किया जाएगा। अधिकरण के आदेश पर जिला कलेक्टर द्वारा क्षति की राशि को भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल किया जाएगा। यदि दोषी पक्ष वसूली से बचता है तो सार्वजनिक स्थानों पर उसकी फोटोयुक्त पोस्टर लगाए जाएंगें ।

उत्तराखंड में दंगा प्रदर्शन से संपत्ति नुकसान पर अब कड़ी कार्रवाई, नियमावली तैयार

उत्तराखंड में दंगा, प्रदर्शन और हड़ताल में सार्वजनिक व निजी संपत्ति को नुकसान की भरपाई को विस्तृत नियमावली तैयार है।

राज्य में हड़ताल, बंद, दंगा और उग्र विरोध-प्रदर्शनों में सार्वजनिक एवं निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ अब कड़ी आर्थिक कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है। गृह विभाग ने ऐसी घटनाओं में क्षतिपूर्ति वसूली को विस्तृत नियमावली तैयार की है। संपत्ति को नुकसान की भरपाई सीधे जिम्मेदार व्यक्तियों से की जाएगी, जिससे सरकारी और निजी संपत्तियों की तोडफ़ोड़ पर प्रभावी अंकुश लग सके।

प्रदेश सरकार ने दो वर्ष पहले गैरसैंण में उत्तराखंड लोक तथा निजी संपत्ति क्षति वसूली विधेयक पारित किया था। राजभवन से मंजूरी मिलने के बाद यह एक्ट बन चुका है। अब इसे लागू करने के लिए इसकी नियमावली भी तैयार हो चुकी है। स्पष्ट किया गया है कि जिस संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया है, उसकी गणना बाजार भाव से की जाएगी। यदि इस दौरान किसी की मृत्यु होती है तो दंगाइयों पर कानूनी धाराएं तो लगेंगी ही, उन्हें मृतक आश्रितों को सात लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देनी होगी। निशक्तता की स्थिति में यह राशि दो लाख रुपये रहेगी। यद्यपि, इसके लिए प्रभावितों को दावा अधिकरणों में जाना होगा।

नियमावली में स्पष्ट  है कि हर हड़ताल, दंगे अथवा प्रदर्शन की अनिवार्य रूप से वीडियो रिकार्डिंग होगी, जो साक्ष्य संग्रह करेगी। साथ ही इसमें दावा अधिकरणों में किस स्तर के अधिकारियों की तैनाती होगी, का विस्तृत उल्लेख है।

यह भी बताया गया कि संपत्ति के नुकसान की गणना प्रचलित बाजार मूल्य के आधार पर होगी। गणना को भी एक समिति गठित होगी। इसको अधिकृत अधिकारी या समिति घटनास्थल का निरीक्षण कर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी। रिपोर्ट के आधार पर संबंधित आरोपितों को नोटिस जारी होगा और निर्धारित समय सीमा में राशि जमा न करने पर राजस्व वसूली की कार्रवाई भी होगी।

उत्तर प्रदेश में दंगों में हुई संपत्ति की क्षतिपूर्ति (compensation) एक तय कानूनी प्रक्रिया में होती है, जिसे मुख्य रूप से Uttar Pradesh Recovery of Damage to Public and Private Property Act, 2020 के माध्यम से लागू किया गया है।
🔹 कैसे होती है क्षतिपूर्ति?
1. पहचान (Identification)
दंगे/हिंसा में शामिल लोगों की पहचान पुलिस, CCTV, वीडियो और गवाहों के आधार पर की जाती है।
2. दावा तय करना (Assessment of Damage)
सरकारी और निजी संपत्ति को हुए नुकसान का आकलन प्रशासन द्वारा किया जाता है।
नुकसान की कीमत बाजार मूल्य (market value) के आधार पर तय होती है।
3. क्लेम ट्रिब्यूनल (Claims Tribunal)
हर मामले के लिए विशेष ट्रिब्यूनल बनता है।
यही ट्रिब्यूनल तय करता है कि किस व्यक्ति से कितनी वसूली होगी।
4. नोटिस और सुनवाई
आरोपियों को नोटिस दिया जाता है और उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका मिलता है।
5. वसूली (Recovery)
दोषी पाए जाने पर उनसे जुर्माना/क्षतिपूर्ति वसूली जाती है।
भुगतान न करने पर उनकी संपत्ति कुर्क (attach) की जा सकती है।
6. सार्वजनिक नाम उजागर करना (Naming & Shaming)
कई मामलों में आरोपियों के नाम और फोटो सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए हैं (हालांकि इस पर कानूनी बहस भी हुई है)।
🔹 खास बातें
यह कानून सार्वजनिक और निजी दोनों संपत्ति के नुकसान पर लागू होता है।
क्षतिपूर्ति सीधे पीड़ित (या सरकार) को दी जाती है।
दंगा/प्रदर्शन के दौरान हुई मौत या गंभीर चोट के मामलों में अलग से मुआवजा (ex-gratia) भी दिया जा सकता है।

एक वास्तविक उदाहरण से समझते हैं —
🔹 CAA विरोध प्रदर्शन (2019–20) – उत्तर प्रदेश
जब Citizenship Amendment Act, 2019 के खिलाफ उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर प्रदर्शन हुए, तो कुछ स्थानों पर हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएँ भी हुईं।
👉 सरकार ने क्या किया?
राज्य सरकार ने Uttar Pradesh Recovery of Damage to Public and Private Property Act, 2020 (और उससे पहले अध्यादेश) लागू किया।
जिन लोगों पर दंगों में शामिल होने का आरोप था, उन्हें नोटिस भेजे गए।
👉 नुकसान का आकलन
पुलिस और प्रशासन ने सरकारी बसों, थानों, निजी दुकानों आदि को हुए नुकसान का मूल्यांकन (assessment) किया।
यह मूल्य बाजार दर (market value) के आधार पर तय किया गया।
👉 आरोपियों पर कार्रवाई
सैकड़ों लोगों को नोटिस जारी किए गए।
कई मामलों में आरोपियों के पोस्टर (नाम, फोटो, पता) सार्वजनिक जगहों पर लगाए गए, ताकि उनसे वसूली की जा सके।
👉 वसूली कैसे हुई?
जिन लोगों को दोषी माना गया, उनसे लाखों रुपये तक की वसूली तय हुई।
भुगतान न करने पर:
उनकी संपत्ति कुर्क (attach) की गई
कुछ मामलों में नीलामी (auction) भी की गई
👉 कोर्ट की भूमिका
इस “पोस्टर लगाने” की प्रक्रिया पर सवाल उठे और मामला Allahabad High Court तक गया।
कोर्ट ने कहा कि बिना स्पष्ट कानून के इस तरह सार्वजनिक रूप से नाम/फोटो लगाना उचित नहीं है।
बाद में सरकार ने कानून बनाकर प्रक्रिया को औपचारिक रूप दिया।
🔹 निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश में अब दंगा/हिंसा के मामलों में “जो नुकसान करेगा, वही भरेगा” सिद्धांत लागू किया जाता है।
क्षतिपूर्ति ट्रिब्यूनल के जरिए तय होती है और बाजार मूल्य पर वसूली की जाती है।

पीड़ित व्यक्ति को पैसा कैसे मिलता है, यही सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे आसान भाषा में समझिए:
🔹 1. नुकसान की रिपोर्ट (FIR/शिकायत)
दंगा या हिंसा में जिसकी दुकान, घर या वाहन टूटता है, वह पुलिस में शिकायत दर्ज करता है।
कई बार प्रशासन खुद भी नुकसान का रिकॉर्ड बनाता है।
🔹 2. नुकसान का आकलन (Assessment)
प्रशासन/इंजीनियर/राजस्व अधिकारी मौके पर जाकर नुकसान की जांच करते हैं।
संपत्ति की कीमत मौजूदा बाजार दर के अनुसार तय की जाती है।
🔹 3. क्लेम ट्रिब्यूनल में मामला
मामला Uttar Pradesh Recovery of Damage to Public and Private Property Act, 2020 के तहत बने ट्रिब्यूनल में जाता है।
ट्रिब्यूनल तय करता है:
कुल नुकसान कितना हुआ
कौन लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं
🔹 4. दोषियों से वसूली
दोषी पाए गए लोगों को पैसा जमा करने का आदेश दिया जाता है।
अगर वे नहीं देते:
उनकी संपत्ति कुर्क की जाती है
ज़रूरत पड़ने पर नीलामी करके पैसा वसूला जाता है
🔹 5. पीड़ित को भुगतान कैसे मिलता है?
यहाँ दो तरीके हो सकते हैं:
✔️ (A) सीधे भुगतान
जब दोषियों से पैसा वसूल हो जाता है, तो वह रकम पीड़ित व्यक्ति को दी जाती है (जैसे दुकान मालिक, वाहन मालिक)।
✔️ (B) पहले सरकार देती है (कुछ मामलों में)
अगर नुकसान ज्यादा है या तुरंत मदद जरूरी है:
सरकार पहले मुआवजा (ex-gratia) दे सकती है
बाद में वही पैसा दोषियों से वसूल लिया जाता है
🔹 6. अगर दोषी पहचान में न आएं?
ऐसे मामलों में पीड़ित को:
सरकारी राहत योजनाओं से आर्थिक सहायता मिल सकती है
लेकिन पूरी भरपाई हमेशा सुनिश्चित नहीं होती
🔹 आसान उदाहरण
मान लीजिए:
आपकी दुकान में दंगे में ₹5 लाख का नुकसान हुआ
ट्रिब्यूनल ने दोषियों पर ₹5 लाख वसूली तय की
👉 तो:
उनसे पैसा वसूला जाएगा
और वही रकम आपको दी जाएगी
🔹 निष्कर्ष
प्रक्रिया कानूनी और ट्रिब्यूनल आधारित है
लक्ष्य है: पीड़ित को वास्तविक (market value) के हिसाब से नुकसान की भरपाई मिलना
लेकिन समय इस बात पर निर्भर करता है कि वसूली कितनी जल्दी हो पाती है

 

उत्तर प्रदेश में दंगा क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया सिद्धांत रूप से तेज रखने की कोशिश की गई है, लेकिन व्यवहार में इसमें समय लग सकता है। आइए साफ़ तौर पर समझते हैं:
⏱️ कितना समय लगता है?
आदर्श स्थिति (Ideal case):
पहचान + नुकसान का आकलन: 2–4 हफ्ते
ट्रिब्यूनल में सुनवाई: 1–3 महीने
वसूली और भुगतान: 1–2 महीने
👉 यानी कुल मिलाकर: 2 से 6 महीने
वास्तविक स्थिति (Ground reality):
कई मामलों में यह प्रक्रिया 6 महीने से 1 साल या उससे ज्यादा भी चल सकती है।
⚠️ मुख्य अड़चनें (Challenges)
🔹 1. दोषियों की पहचान
CCTV, वीडियो या गवाह साफ़ न हों तो सही लोगों की पहचान मुश्किल होती है
गलत पहचान पर विवाद भी हो जाता है
🔹 2. कानूनी चुनौतियाँ
आरोपी ट्रिब्यूनल के फैसले को कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं
जैसे मामलों में Allahabad High Court या सुप्रीम कोर्ट तक केस चला जाता है
👉 इससे प्रक्रिया लंबी हो जाती है
🔹 3. नुकसान का सही आकलन
“मार्केट वैल्यू” तय करना आसान नहीं होता
पीड़ित और प्रशासन के बीच रकम को लेकर विवाद हो सकता है
🔹 4. पैसे की वसूली (सबसे बड़ी समस्या)
कई आरोपी आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं
उनके पास वसूली के लिए पर्याप्त संपत्ति नहीं होती
👉 ऐसे में पूरा पैसा वसूलना मुश्किल हो जाता है
🔹 5. संपत्ति कुर्की और नीलामी में देरी
कानूनी प्रक्रिया (नोटिस, अपील, कागजी कार्रवाई) लंबी होती है
नीलामी में खरीदार न मिलना भी देरी का कारण बनता है
🔹 6. कई आरोपियों वाले मामले
जब दंगे में बहुत लोग शामिल हों, तो जिम्मेदारी तय करना जटिल हो जाता है
किससे कितना पैसा लिया जाए—यह तय करने में समय लगता है
🔹 7. प्रशासनिक क्षमता
एक साथ कई मामलों में ट्रिब्यूनल और अधिकारियों पर बोझ बढ़ जाता है
इससे फाइलें लंबित (pending) हो जाती हैं
🧾 निष्कर्ष
कागज़ पर प्रक्रिया कुछ महीनों में पूरी हो सकती है,
लेकिन असलियत में यह अक्सर लंबी और जटिल हो जाती है
सबसे बड़ी रुकावटें हैं: 👉 पहचान
👉 कानूनी लड़ाई
👉 और वसूली

अब सबसे अहम सवाल—कौन-सा मॉडल ज़्यादा प्रभावी है और क्यों?
आइए इसे सीधे और संतुलित तरीके से समझते हैं:
⚖️ 1. उत्तर प्रदेश मॉडल (दोषी से वसूली)
कानून: Uttar Pradesh Recovery of Damage to Public and Private Property Act, 2020
✔️ फायदे (Pros)
जवाबदेही (Accountability):
जिसने नुकसान किया, वही भुगतान करता है
डर/निवारण (Deterrence):
भविष्य में दंगे करने से पहले लोग सोचते हैं
टैक्सपेयर्स पर बोझ कम:
सरकार को अपने पैसे से भरपाई नहीं करनी पड़ती
❌ नुकसान (Cons)
समय ज्यादा लगता है (पहचान + कोर्ट + वसूली)
गरीब आरोपियों से पूरी वसूली मुश्किल
कई बार कानूनी विवाद बढ़ जाते हैं
⚖️ 2. सरकार पहले मुआवजा दे (अन्य राज्य/UK मॉडल)
उदाहरण: Riot Compensation Act 2016 (UK)
✔️ फायदे
पीड़ित को तुरंत राहत
आर्थिक नुकसान से जल्दी उबरने में मदद
प्रक्रिया सरल और कम विवादित
❌ नुकसान
दोषियों पर सीधा दबाव कम
सरकार/टैक्सपेयर्स पर बोझ
कभी-कभी “accountability” कमजोर हो जाती है
⚖️ 3. बीमा आधारित मॉडल (USA)
✔️ फायदे
जल्दी भुगतान (अगर बीमा है)
सरकार पर कम बोझ
❌ नुकसान
गरीब/बिना बीमा वाले लोग असुरक्षित
हर नुकसान कवर नहीं होता
🧠 तो सबसे प्रभावी कौन?
👉 वास्तविकता: कोई एक मॉडल परफेक्ट नहीं है
🔹 सबसे संतुलित (Best Practical Approach)
दुनिया में सबसे बेहतर माना जाता है “Hybrid Model”:
✔️ पहले सरकार तुरंत मुआवजा दे (पीड़ित को राहत)
✔️ बाद में दोषियों से वसूली करे (जवाबदेही भी रहे)
👉 यही मॉडल UK, फ्रांस जैसे देशों में काफी हद तक अपनाया जाता है
🧾 अंतिम निष्कर्ष
UP मॉडल 👉 सख्त और जवाबदेह, लेकिन धीमा
सरकारी राहत मॉडल 👉 तेज, लेकिन कम सख्त
Hybrid मॉडल 👉 सबसे संतुलित (speed + accountability)

 

अब देखते हैं कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में दंगा क्षतिपूर्ति प्रणाली  व्यवहारिक रूप से और बेहतर कैसे बनायी जा सकती है:
🔧 संभावित सुधार (Reforms)
🔹 1. Hybrid मॉडल अपनाना (सबसे महत्वपूर्ण)
मौजूदा कानून: Uttar Pradesh Recovery of Damage to Public and Private Property Act, 2020
सुधार:
पहले सरकार तुरंत आंशिक मुआवजा दे (जैसे 50–70%)
बाद में दोषियों से पूरी वसूली करे
👉 फायदा:
पीड़ित को तुरंत राहत + दोषियों पर सख्ती दोनों मिलेंगे
🔹 2. Fast-track ट्रिब्यूनल
विशेष तेज ट्रिब्यूनल (Fast-track courts) बनाए जाएँ
हर केस के लिए समय सीमा तय हो (जैसे 3–6 महीने)
👉 इससे लंबित मामलों (pending cases) में कमी आएगी
🔹 3. डिजिटल साक्ष्य सिस्टम (Tech Use)
CCTV, ड्रोन, AI आधारित पहचान
एक केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल जहाँ:
वीडियो/फोटो अपलोड हों
केस ट्रैकिंग हो
👉 फायदा:
✔️ सही पहचान
✔️ कम विवाद
🔹 4. पारदर्शी नुकसान आकलन (Transparent Assessment)
“मार्केट वैल्यू” तय करने के लिए:
मानकीकृत रेट लिस्ट (standard rate cards)
थर्ड-पार्टी वैल्यूएशन (independent experts)
👉 इससे पीड़ित और प्रशासन के बीच विवाद कम होंगे
🔹 5. वसूली तंत्र मजबूत करना
संपत्ति कुर्की की प्रक्रिया को तेज करना
बैंक खातों/आय स्रोत से सीधे रिकवरी की व्यवस्था
👉 फायदा:
वास्तविक वसूली दर (recovery rate) बढ़ेगी
🔹 6. गरीब पीड़ितों के लिए विशेष सहायता
छोटे दुकानदार, रेहड़ी-पटरी वाले, मजदूर
इनके लिए:
तुरंत राहत फंड
ब्याज मुक्त लोन (interest-free loan)
👉 ताकि वे जल्दी दोबारा खड़े हो सकें
🔹 7. कानूनी प्रक्रिया सरल बनाना
नोटिस, अपील, सुनवाई को सरल और समयबद्ध बनाना
बेवजह की देरी रोकने के लिए सख्त नियम
👉 इससे कोर्ट में लंबित केस कम होंगे
🔹 8. जवाबदेही और निगरानी (Accountability)
हर केस की पब्लिक रिपोर्टिंग (progress tracking)
अधिकारियों की जिम्मेदारी तय
👉 पारदर्शिता और भरोसा बढ़ेगा
🧾 अंतिम निष्कर्ष
अगर इन सुधारों को लागू किया जाए, तो:
*पीड़ित को जल्दी पैसा मिलेगा
*दोषियों से वास्तविक वसूली भी होगी
*और पूरी प्रणाली तेज, पारदर्शी और प्रभावी बन सकती है।

 

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