आजीवन कारावास भुगत रहा है आतंकी अब्दुल करीम टुंडा

अब्दुल करीम टुंडा

 

अब्दुल करीम उर्फ टुंडा (Syed Abdul Karim Tunda) एक कुख्यात भारतीय आतंकवादी है, जिस पर भारत में 40 से अधिक बम विस्फोटों को अंजाम देने का आरोप लगा है। वह लश्कर-ए-तैयबा (LeT) से जुड़ा हुआ माना जाता है और उसे पाकिस्तान समर्थित आतंकी गतिविधियों में शामिल बताया जाता रहा है।मुख्य जानकारी

  • जन्म: 1943, पुरानी दिल्ली (दारियागंज, छत्तालाल मियां क्षेत्र) में हुआ। वर्तमान में उनकी उम्र लगभग 82-83 वर्ष है।
  • उपनाम ‘टुंडा’ क्यों? 1985-86 के आसपास बम बनाने के दौरान विस्फोट में उनका बायां हाथ कट गया, जिसके बाद उन्हें ‘टुंडा’ (अर्थात अपंग या एक हाथ वाला) कहा जाने लगा।
  • प्रारंभिक जीवन: पिता लोहे की ढलाई का काम करते थे। परिवार बाद में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के पिलखुवा (हापुड़ के पास) चला गया। वहां उन्होंने बढ़ई (कारपेंटर) और स्क्रैप का काम किया। शुरू में सामान्य जीवन जीते थे, लेकिन बाद में संदिग्ध गतिविधियों में शामिल हो गए।
  • परिवार: कई पत्नियां (मुमताज सहित) और 7 बच्चे बताए जाते हैं।

आतंकी गतिविधियां और आरोपउन्हें भारत में कई सीरियल बम ब्लास्ट का मास्टरमाइंड या मुख्य बम-निर्माता (bomb expert/ ‘Dr Bomb’) माना गया। इनमें शामिल हैं:

  • 1993 के मुंबई ट्रेन सीरियल ब्लास्ट (बाबरी मस्जिद विध्वंस की पहली बरसी पर 5 ट्रेनों में धमाके, जिसमें 2 मौतें और कई घायल हुए)।
  • दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, सूरत, लखनऊ आदि शहरों में 1990 के दशक में हुए दर्जनों विस्फोट।
  • LeT के लिए काम करते हुए पाकिस्तान से ट्रेनिंग और समर्थन प्राप्त करने का आरोप।

गिरफ्तारी और कानूनी स्थिति

  • गिरफ्तारी: अगस्त 2013 में भारत-नेपाल सीमा के पास उत्तराखंड के बनबसा में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया।
  • सजाएं: 1996 के एक विस्फोट मामले में हरियाणा की अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
  • महत्वपूर्ण फैसला: 29 फरवरी 2024 को राजस्थान के अजमेर की विशेष TADA कोर्ट ने 1993 के सीरियल बम ब्लास्ट मामले में उन्हें सबूतों के अभाव में बरी (acquitted) कर दिया। CBI ने उन्हें इस मामले का मास्टरमाइंड बताया था, लेकिन कोर्ट ने पर्याप्त सबूत न होने पर फैसला दिया।

2025-2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनके खिलाफ कोई नया बड़ा विकास या खबर नहीं आई है। वह पहले से ही जेल में थे या कानूनी प्रक्रियाओं में उलझे हुए थे, लेकिन 2024 के फैसले के बाद उनकी स्थिति बदली हो सकती है।यह एक संवेदनशील और विवादास्पद मामला है, जहां आरोप गंभीर हैं लेकिन कुछ मामलों में अदालत ने सबूतों की कमी बताई है।

 

अब्दुल करीम टुंडा लश्कर-ए-तैयबा का एक प्रमुख बम विशेषज्ञ और आतंकवादी है, जो भारत में कई विस्फोटों का मुख्य आरोपी रहा है।
​उसके बारे में कुछ मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
​पृष्ठभूमि
​नाम: अब्दुल करीम, जिसे ‘टुंडा’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि एक बम विस्फोट के दौरान उसका एक हाथ उड़ गया था।
​जन्म: उसका जन्म उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद (पिलखुवा) में हुआ था।
​भूमिका: वह लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के लिए काम करता था और युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें बम बनाने का प्रशिक्षण देने के लिए कुख्यात था।
​प्रमुख आरोप और गतिविधियाँ
​सीरियल ब्लास्ट (1993): टुंडा पर 1993 में मुंबई बम धमाकों के बाद दिल्ली, कानपुर, हैदराबाद और सूरत में ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार धमाकों का मास्टरमाइंड होने का आरोप था।
​आतंकी नेटवर्क: वह पाकिस्तान और बांग्लादेश में बैठकर भारत के खिलाफ आतंकी नेटवर्क चलाता था। वह दाऊद इब्राहिम और हाफिज सईद जैसे आतंकियों का करीबी माना जाता था।
​बम विशेषज्ञ: उसे पोटेशियम क्लोराइड और अन्य रसायनों का उपयोग करके कम लागत वाले बम बनाने में महारत हासिल थी।
​गिरफ्तारी और कानूनी स्थिति
​गिरफ्तारी: उसे अगस्त 2013 में भारत-नेपाल सीमा से दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था। वह कई दशकों तक फरार रहा था।
​अदालत का फैसला (2024): हाल ही में, फरवरी 2024 में राजस्थान की एक टाडा (TADA) अदालत ने उसे 1993 के ट्रेन विस्फोट मामले में बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले। हालांकि, वह अन्य मामलों के कारण अभी भी कानूनी प्रक्रियाओं का सामना कर रहा है।

हृदय संबंधी सर्जरी और स्वास्थ्य

  • पेसमेकर इम्प्लांट (2013): गिरफ्तारी के तुरंत बाद, अगस्त 2013 में टुंडा को सीने में दर्द की शिकायत के बाद दिल्ली के AIIMS में भर्ती कराया गया था। वहां डॉक्टरों ने पाया कि उसके हृदय की धमनियों में ब्लॉकेज है और उसकी धड़कनें अनियमित थीं। इसके बाद उसकी पेसमेकर सर्जरी की गई थी, न कि ओपन हार्ट सर्जरी।
  • अन्य सर्जरी (2019): जुलाई 2019 में, जब वह गाजियाबाद की डासना जेल में बंद था, उसे गाजियाबाद के जिला अस्पताल (MMG) ले जाया गया था। वहां उसकी मोतियाबिंद (Cataract) की सर्जरी की गई थी।

वह अभी कहां है?

​अब्दुल करीम टुंडा वर्तमान में जेल में ही है। हालांकि, उसकी कानूनी स्थिति अब इस प्रकार है:

  1. अजमेर टाडा कोर्ट का फैसला (2024): फरवरी 2024 में, राजस्थान की अजमेर टाडा कोर्ट ने उसे 1993 के सीरियल ट्रेन ब्लास्ट मामले में बरी कर दिया। कोर्ट ने माना कि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
  2. आजीवन कारावास: टाडा मामले में बरी होने के बावजूद वह रिहा नहीं हो सका है क्योंकि 1996 के सोनीपत बम धमाकों के मामले में उसे 2017 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
  3. वर्तमान स्थान: अपनी इस सजा के चलते वह वर्तमान में राजस्थान की अजमेर सेंट्रल जेल में बंद है। उस पर अभी भी कुछ अन्य राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ अन्य मामले) में कानूनी प्रक्रियाएं चल रही हैं।

​फरवरी 2024 का टाडा कोर्ट का फैसला भी काफी चर्चा में रहा था क्योंकि दशकों बाद आए इस निर्णय में उसे साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया, जबकि उसके साथियों (इरफान और हमीदुद्दीन) को दोषी ठहराया गया।

सोनीपत बम धमाकों का मामला अब्दुल करीम टुंडा के लिए सबसे निर्णायक साबित हुआ, क्योंकि इसी मामले में उसे आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा मिली है।

​इस मामले की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:

घटना और पृष्ठभूमि (1996)

  • तारीख: 28 दिसंबर, 1996।
  • घटना: हरियाणा के सोनीपत में दो बम धमाके हुए थे। पहला धमाका ‘बाबा सिनेमा’ के पास और दूसरा धमाका ‘गीता भवन’ के पास हुआ था।
  • प्रभाव: इन धमाकों में करीब 12 लोग घायल हुए थे, हालांकि कोई हताहत (मृत्यु) नहीं हुआ था।

अदालती कार्यवाही और सजा (2017)

  • दोषी करार: 9 अक्टूबर, 2017 को सोनीपत की एक विशेष अदालत ने टुंडा को इस मामले में दोषी पाया।
  • सजा: अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास) और धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) के साथ-साथ विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
  • जुर्माना: सजा के साथ उस पर ₹1,00,000 का जुर्माना भी लगाया गया था।

टुंडा के तर्क 

​मुकदमे के दौरान टुंडा ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा था कि धमाकों के वक्त वह भारत में था ही नहीं। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने पर्याप्त सबूत पेश किए जिनसे साबित हुआ कि वह इन षड्यंत्रों का मुख्य हिस्सा था।

वर्तमान स्थिति:

यही वह मुख्य मामला है जिसके कारण 2024 में अजमेर टाडा कोर्ट से बरी होने पर भी वह छूटा नहीं। कानूनी तौर पर, जब तक उसकी आजीवन कारावास की सजा को उच्च न्यायालय से निलंबित या निरस्त नहीं किया जाता,उसे जेल में ही रहना होगा।

अभी वह कहाँ है?

सोनीपत मामले में मिले आजीवन कारावास के कारण वह अभी भी अजमेर सेंट्रल जेल में अपनी सजा काट रहा है।

मुझ से गलती हो गई पापा’,संजय की दशा देख पीले पड़ गए थे सुनील दत्त,मारिया ने बताई ‘बाबा’ की पिटाई 

सिनेमा की दुनिया में तहलका मच गया था, जब 12 मार्च 1993 को मुंबई में सीरियल ब्लास्ट्स हुए और इस केस में बॉलीवुड के सुनील दत्त और नरगिस के बेटे संजय दत्त का नाम आया था.  उन्हें कैसे गिरफ्तार किया गया. कैसे पुलिस ने उनसे ये कबूल कराया और कैसे पूरा बॉलीवुड संजू बाबा के सपोर्ट में आया? पुलिस पिटाई ने संजय को तोड़ दिया, उसने अपराध स्वीकारा और जब पिता से सामना हुआ तो बच्चों की तरह रोने लगे. ये कहानी इस केस की जांच में मुख्य भूमिका में रहे IPS अधिकारी राकेश मारिया ने बताई.

परिवार ने संजय दत्त की यह गलती मानी और एक्टर ने भी कानून की दी सजा काटी.
12 मार्च 1993 को मुंबई में सीरियल ब्लास्ट्स ने पूरी दुनिया हिला दी थी. 257 लोगों की मौत, 700 से ज्यादा घायल और अर्थव्यवस्था को 27 करोड़ डॉलर का नुकसान . दाऊद इब्राहिम और उसके गिरोह ने शहर खून से लाल कर दिया. केस जांच में IPS अधिकारी राकेश मारिया की भूमिका ऐतिहासिक रही. जांच का एक ऐसा चैप्टर था, जो न सिर्फ अपराधिक दुनिया से जुड़ा, बल्कि बॉलीवुड के एक सुपरस्टार की जिंदगी हमेशा को बदल गया वो थे संजय दत्त… हाल ही में देसी स्टूडियोज से एक इंटरव्यू में राकेश मारिया ने 32 साल पुरानी घटना याद की.  कैसे संजय दत्त का नाम केस में आया और कैसे उन्होंने माना कि वो इस साजिश का हिस्सा बन बैठे थे.
राकेश मारिया ने बताया कैसे गिरफ्तारी बाद पहली बार जब संजय ने अपने पिता, दिग्गज एक्टर और राजनेता सुनील दत्त को देखा तो वह बच्चे जैसे रोने लगे. तब सुनील दत्त का चेहरा पीला पड़ गया था.
रेस्तरां मालिकों ने खोला था संजू बाबा का नाम
1993 के ब्लास्ट्स की जांच मुंबई क्राइम ब्रांच ने संभाली. राकेश मारिया तब एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस थे, उनकी जांच में पता चला कि ब्लास्ट्स में इस्तेमाल हथियार और विस्फोटक मुंबई में ही छिपाये गये थै. मारिया के मुताबिक, संजय दत्त का नाम सबसे पहले हनीफ कादावाला और समीर हिंगोरा ने बताया. हनीफ बांद्रा के फेमस रेस्टोरेंट के मालिक थे, जबकि समीर तब इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IMPPA) प्रेसिडेंट थे. दोनों पर अवैध हथियार रखने का आरोप लगा. पूछताछ में उन्होंने आरोपों से इनकार किया, लेकिन मारिया से मिलने की जिद की. मारिया ने बताया, ‘उन्होंने कहा, ‘बड़े लोगों को क्यों नहीं पकड़ते?’ मैंने पूछा, ‘किन बड़े लोगों को मैंने नहीं पकड़ा?’ उन्होंने संजय दत्त का नाम लिया. मैं हैरान रह गया. संजू बाबा का इससे क्या लेना-देना?’

संजय को सीधे एयरपोर्ट से उठाया

हनीफ और समीर ने माना कि आतंकियों को हथियार कार की कैविटी से निकालने को शांत जगह चाहिए थी. उन्होंने संजय दत्त का बंगला सुझाया. मारिया के अनुसार, ‘आतंकी संजय के घर पहुंचे. संजय को पहले ही कॉल आ चुकी थी. उन्होंने कार पार्क करने और सामान उतारने को कहा.’ जांच में पता चला कि संजय ने कुछ हथियार खुद रख ज्यादातर आतंकियों को लौटा दिए, जो ब्लास्ट्स में इस्तेमाल हुए. मारिया ने कहा, ‘संजय ने गलती की, लेकिन वो आतंकी नहीं था. वो डर गया था.’ जब जांच टीम को संजय के इन्वॉल्वमेंट का पता चला, तो उन्हें पूछताछ को बुलाना जरूरी था. लेकिन संजय तब मॉरीशस में एक फिल्म शूट कर रहे थे. मारिया ने उनके भारत लौटने का इंतजार करने का फैसला किया. कुछ दिनों बाद संजय मुंबई एयरपोर्ट पर उतरे, तो मारिया की टीम ने उन्हें सीधे पकड लिया. मारिया ने याद करते हुए बताया कि हमने एयरपोर्ट से ही उन्हें उठाया. कोई ड्रामा नहीं, सीधा क्राइम ब्रांच ले गए.
थप्पड़ मारा,बाल खींचे,कोई सुविधा नही दी,अपराध स्वीकृति कराई.

पूछताछ का वो सीन आज भी मारिया को याद है. संजय को मुंबई क्राइम ब्रांच के कमरे में रखा गया, जिसमें अटैच्ड बाथरूम था, लेकिन दरवाजा हटा दिया गया था. दो कांस्टेबल कमरे में थे. मारिया ने बताया कि उनके कठोर निर्देश थै, ‘संजय को सिगरेट नही, फोन नही.’ रात 2:30 बजे संजय कमरे में बैठे और सुबह 8 बजे मारिया अंदर घुसे और पूछा, ‘तुम अपनी स्टोरी बताओगे या मैं तुम्हारा रोल बता दूं?’ संजय ने कहा, ‘मैं बेकसूर हूं.’ मारिया का आखिरकार गुस्सा फूट पड़ा. पिछले दिनों का स्ट्रेस, इमोशंस सब बाहर आ गए. संजय कुर्सी पर बैठा था, उसके बाल लंबे थे. मैं पहुंचा, एक थप्पड़ मारा. वो पीछे गिरा, मैंने बाल पकड़कर खींचा और उठाया. बोला, ‘जेंटलमैन की तरह बात करोगे या…?’ फिर संजय ने अकेले में बात करने की बात की.

संजय दत्त को TADA कोर्ट ने दोषी ठहराया.
सुनील दत्त को देख जब रोने लगे संजय, बोले- पापा, गलती हो गई मेरे से
राकेश मारिया ने बताया कि संजय ने पूरी कहानी कबूली. उसने कहा, ‘गलती हो गई, पापा को मत बताना.’ मैंने कहा, ‘कैसे न बताऊं?’ शाम तक सुनील दत्त क्राइम ब्रांच पहुंचे. उनके साथ राजेंद्र कुमार, महेश भट्ट, यश जौहर और पॉलिटिशियन बलदेव खोसा थे. ‘सबने कहा, संजय बेकसूर है, ये नहीं कर सकता.’ सबसे इमोशनल मोमेंट तब आया, जब संजय कमरे में लाया गया. मारिया ने वर्णन किया, ‘संजय पिता को देख बच्चे की तरह बिलख-बिलखकर रोया. वो अपने पिता सुनील दत्त के पैरों पर गिर पड़ा और बोला, ‘पापा, गलती हो गई मेरे से.’ सुनील दत्त का चेहरा पीला पड़ गया. मैंने सोचा, किसी भी बाप के लिए ये असहनीय है.’ सुनील दत्त, जो खुद एक दिग्गज एक्टर और कांग्रेस नेता थे, उन्होंने बेटे की गलती मानी, लेकिन कानूनी लड़ाई लडी।

Mumbai Bomb Blast: 1993 में सिलसिलेवार 13 बम धमाकों से देश की आर्थिक राजधानी मुंबई दहल उठी थी. हमले में दाउद इब्राहिम, टाइगर मेमन और संजय दत्त का नाम सामने आया था.

12 मार्च, 1993 शुक्रवार का दिन. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में रोज जैसी हलचल थी, दोपहर के 1.30 बजे एक्सचेंज की 28 मंजिला इमारत का बेसमेंट जोरदार धमाके से दहल उठा.  हमले में 50 लोग मारे गए, लेकिन ये सिर्फ शुरुआत थी. आधे घंटे बाद दूसरा धमाका  कार में और फिर एक के बाद एक धमाकों का सिलसिला शुरू.दो घंटे में पूरे मुंबई में 12 जगहों पर 13 धमाके .

इन धमाकों में 257 लोग मारे गएऔर 713 घायल हुए थे. ये धमाके मुंबई शिवसेना भवन,एयर इंडिया बिल्डिंग,प्लाजा सिनेमा,सहारा हवाई अड्डा जैसी प्रमुख जगहों पर हुए थे.पहले 12 धमाकों की खबर आई. बाद में शरद पवार ने झूठ पेला कि 12 नहीं 13 धमाके हुए और एक धमाका मुस्लिम इलाके में भी हुआ.

आज तक नहीं पकड़ा गया मुख्य आरोपित 
ये धमाके मुंबई दंगों के कुछ समय बाद हुए थे और इसे दंगों का बदला कहा गया. हमले से मुंबई हिल गई थी. पुलिस के अनुसार ये हमले भारत से बाहर रहते आतंकी दाउद इब्राहिम ने करवाए थे. ब्लास्ट षड्यंत्र टाइगर मेमन ने रचा था. दोनों को कभी नहीं पकड़ा जा सका. मामले में 12 आरोपियों को निचली अदालत ने फांसी की सजा सुनाई. इसमें याकूब मेमन को 2015 में फांसी पर लटकाया गया था. वह मुख्य आरोपित टाइगर का भाई था.

धमाकों में बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त का नाम सामने आया तो लोगों को भरोसा नहीं हुआ. संजय दत्त को 2006 में मुंबई की टाडा अदालत ने एके-56 रखने का दोषी पाया, लेकिन अन्य आरोपों से छोड दिया था.

जांच को 150 टीमें
धमाकों की जांच पुलिस को कठिन थी. जिम्मेदारी मुंबई पुलिस के तेज-तर्रार अफसर राकेश मारिया को सौंपी गई. तब मारिया डीसीपी ट्रैफिक थे. जांच को 150 से ज्यादा टीमें बनी जिन्होंने अलग-अलग शहरों में सबूत जुटाए. 4 नवम्बर, 1993 को 10000 पन्ने की प्राथमिक चार्जशीट दायर हुई। 19 नवंबर, 1993 को सीबीआई के हाथ केस गया.

जांच में पुलिस को इसमें बॉलीवुड के भी शामिल होने की जानकारी मिली. पुलिस ने संजय दत्त को पकड़ा. संजय मॉरीशस में ‘आतिश’ की शूटिंग कर रहे थे. वहां से लौटे तो पकड़े गए। वे 18 महीने जेल में रहे. पूछताछ में संजय दत्त ने एके-56 रखना माना.

सुप्रीम कोर्ट ने भी संजय दत्त को पाया दोषी
नवम्बर 2006 में मुंबई की टाडा अदालत ने फैसला सुनाया. 600 लोगों की गवाही और प्रमाणों के आधार पर याकूब मेमन, संजय दत्त समेत 100 लोग दोषी ठहराये गये. 23 लोग छोड दिये गये. संजय दत्त को सुप्रीम कोर्ट ने भी अवैध हथियार रखने का दोषी मान 5 साल की सजा सुनाई.

चार दोषी एक ही परिवार के
मुंबई की टाडा अदालत से दोषी ठहराये गये याकूब मेमन, यूसुफ मेमन, ईसा मेमन और रुबीना मेमन परिजन थे. इनका भाई टाइगर कभी पकड़ में नहीं आया. टाइगर, याकूब, यूसुफ और ईसा पूर्वक्रिकेटर अब्दुल रज्जाक मेमन के बेटे थे.याकूब मेमन को 30 नवम्बर, 2015 को मुंबई की यरवदा जेल में फांसी हुई.

अप्रैल में थी धमाकों की प्लानिंग
मुंबई पुलिस को पहले ही ब्लास्ट की प्लानिंग की जानकारी मिली जिसे गंभीरता से नहीं लिया. बाबरी ढांचा गिराए जाने के बाद दंगों के आरोपित गुल मोहम्मद ने पुलिस को इसकी जानकारी दी थी कि वह पाकिस्तान में बम बनाने की ट्रेनिंग ले आया है. गुल मोहम्मद पकड़ा  गया तो टाइगर मेमन ने तय वक्त से पहले ही धमाके कर दिए। .

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