उर्दू दूसरी राजभाषा से शुरु हुई थी उप्र से कांग्रेस की विदाई

उत्तर प्रदेश में उर्दू को दूसरी आधिकारिक राजभाषा का दर्जा 7 अक्टूबर 1989 को दिया गया था। तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी (एन. डी. तिवारी) थे।

​ऐतिहासिक संदर्भ और घटनाक्रम

​उर्दू को राजभाषा बनाने का निर्णय उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा ने उत्तर प्रदेश राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 1989 पारित करके लिया गया था।

निर्णय के पीछे के मुख्य बिंदु :

  • संवैधानिक प्रावधान: यह निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 345 में लिया गया था, जो राज्य सरकारों को अपनी आधिकारिक भाषा चुनने का अधिकार देता है।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य राज्य की एक बड़ी आबादी की बोली और समझी जाने वाली भाषा को प्रशासनिक कार्यों में स्थान देना था।
  • कानूनी चुनौती: निर्णय को ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ ने न्यायालय में चुनौती दी थी। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला यथावत रख इसे संवैधानिक घोषित किया।
​आधिकारिक स्थिति का प्रभाव

​उर्दू को दूसरी राजभाषा घोषित करने पर राज्य में कई बदलाव हुए:

  1. ​सरकारी नियमों और गजटों का अनुवाद उर्दू में प्रकाशित होने लगा।
  2. ​महत्वपूर्ण सरकारी विज्ञापनों और साइनबोर्डों पर उर्दू का प्रयोग अनिवार्य हुआ।
  3. ​जनता के उर्दू में दिए प्रार्थना पत्र स्वीकार कर उनका उत्तर देना सरकारी कार्यालयों को आवश्यक हो गया।

उत्तर प्रदेश में उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा 1989 में नहीं, बल्कि 1989 के बाद कानूनी रूप से स्थापित प्रक्रिया में 1989–1994 के बीच विकसित हुआ और अंतिम रूप 1989 में नहीं बल्कि 1989 के बाद की सरकारों में मजबूत हुआ।
मुख्य कानूनी मान्यता उत्तर प्रदेश आधिकारिक भाषा (संशोधन) अधिनियम, 1989 के माध्यम से शुरू हुई, जब मुख्यमंत्री थे नारायण दत्त तिवारी (कांग्रेस सरकार)।
ध्यान देने वाली बात:
इस कानून को व्यवहारिक रूप से लागू करने और उर्दू को प्रशासन में सक्रिय रूप से बढ़ावा बाद में मुलायम सिंह यादव की सरकार (1989–1991) ने दिया।
इसलिए कई लोग इसे “मुलायम सिंह यादव के समय उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाया गया” कह देते हैं, जबकि कानूनी आधार तिवारी सरकार ने ही रखा था।

कानूनी दर्जा (Act): 1989 — नारायण दत्त तिवारी
व्यावहारिक क्रियान्वयन/प्रोत्साहन: मुलायम सिंह यादव की सरकार में

उत्तर प्रदेश आधिकारिक भाषा (संशोधन) अधिनियम, 1989 की मुख्य बातें :
📜 अधिनियम की प्रमुख धाराएँ
1. उर्दू को “दूसरी आधिकारिक भाषा” का दर्जा
इस संशोधन में हिंदी के साथ-साथ उर्दू को भी सरकारी कामकाज में उपयोग की अनुमति दी गई।
यानी सरकारी कार्यालयों में उर्दू का प्रयोग संभव हुआ
नागरिक उर्दू में आवेदन दे सकते हैं
2. प्रशासनिक स्तर पर उपयोग
अधिनियम में यह प्रावधान किया गया कि जहाँ उर्दू भाषी आबादी पर्याप्त है, वहाँ:
नोटिस
आवेदन
सरकारी पत्राचार
उर्दू में भी किया जा सकता है।
3. शिक्षा और परीक्षाओं में सुविधा
छात्रों को उर्दू माध्यम से पढ़ने और परीक्षा देने की सुविधा दी गई
उर्दू शिक्षकों और संस्थानों को बढ़ावा मिला
4. अनुवाद और अभिलेख
महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों का हिंदी के साथ उर्दू में भी अनुवाद किया जा सकता है
रिकॉर्ड रखने में उर्दू का उपयोग संभव हुआ
5. नियुक्तियाँ और पद
उर्दू से संबंधित कार्यों के लिए अनुवादक, शिक्षक आदि पदों की आवश्यकता बढ़ी
इससे उर्दू जानने वालों को रोजगार के अवसर मिले
⚖️ व्यावहारिक स्थिति
हालाँकि कानून बना, लेकिन इसका पूरी तरह समान स्तर पर लागू होना हर जिले में नहीं हुआ।
जहाँ उर्दू भाषी जनसंख्या अधिक है (जैसे पश्चिमी यूपी), वहाँ इसका प्रभाव ज्यादा दिखता है।
🧾 निष्कर्ष
कानून ने उर्दू को संवैधानिक/कानूनी मान्यता दी
लेकिन इसका वास्तविक असर प्रशासनिक इच्छाशक्ति और स्थानीय स्तर पर निर्भर रहा

भारत में कई राज्यों ने उर्दू को दूसरी राजभाषा (Second Official Language) का दर्जा दिया है। प्रमुख राज्य इस प्रकार हैं:
🇮🇳 उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा देने वाले राज्य
1. उत्तर प्रदेश
1989 के संशोधन अधिनियम के तहत
हिंदी के साथ उर्दू को मान्यता
2. बिहार
1981 में उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा
पूरे राज्य में लागू
3. तेलंगाना
2017 में उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा बनाया गया
पूरे राज्य में लागू
4. झारखंड
2018 में उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा
साथ में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी मान्यता
5. पश्चिम बंगाल
2012 में कुछ जिलों में उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा
जहाँ उर्दू भाषी आबादी अधिक है
⚠️ ध्यान देने वाली बात
हर राज्य में “दूसरी राजभाषा” का मतलब यह नहीं कि वह पूरे राज्य में समान रूप से लागू हो
कई जगह यह जिला या क्षेत्र विशेष तक सीमित रहता है
🧾 संक्षेप में
उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा मुख्य रूप से
👉 उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना, झारखंड, पश्चिम बंगाल में मिला।

भारतीय संविधान में राजभाषा से जुड़े प्रमुख अनुच्छेद (Articles 343–351) :
🇮🇳 संविधान के राजभाषा संबंधी अनुच्छेद
🔹 अनुच्छेद 343
संघ (केंद्र) की राजभाषा हिंदी (देवनागरी लिपि) होगी
अंकों के लिए अंतरराष्ट्रीय रूप (English numerals)
अंग्रेज़ी का उपयोग प्रारंभ में 15 वर्षों तक (बाद में जारी रहा)
🔹 अनुच्छेद 344
राजभाषा पर आयोग और संसदीय समिति का गठन
भाषा नीति की समीक्षा और सुझाव
🔹 अनुच्छेद 345
राज्य अपनी राजभाषा स्वयं तय कर सकता है
एक या अधिक भाषाएँ अपनाई जा सकती हैं
🔹 अनुच्छेद 346
राज्यों के बीच तथा राज्य–केंद्र के बीच संचार की भाषा
सामान्यतः हिंदी या अंग्रेज़ी
🔹 अनुच्छेद 347
यदि किसी भाषा को बोलने वाले पर्याप्त लोग मांग करें,
तो राष्ट्रपति उस भाषा को विशेष मान्यता दे सकते हैं
🔹 अनुच्छेद 348
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की भाषा अंग्रेज़ी
विधेयक, कानून आदि भी अंग्रेज़ी में
🔹 अनुच्छेद 349
भाषा से जुड़े कानून बनाने के लिए विशेष प्रक्रिया
राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति आवश्यक
🔹 अनुच्छेद 350
नागरिक किसी भी भाषा में शिकायत/प्रार्थना पत्र दे सकता है
🔹 अनुच्छेद 350A
प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने की व्यवस्था
विशेषकर भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए
🔹 अनुच्छेद 350B
भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी (Commissioner)
🔹 अनुच्छेद 351
हिंदी के विकास का निर्देश
इसे भारत की सभी भाषाओं से समृद्ध करने की बात
🧾 संक्षेप निष्कर्ष
केंद्र की राजभाषा: हिंदी (लेकिन अंग्रेज़ी भी व्यापक रूप से उपयोग में)
राज्यों को अपनी भाषा चुनने की स्वतंत्रता
नागरिकों को अपनी भाषा में अधिकार और संरक्षण
👍

उत्तर प्रदेश की राजभाषा नीति से जुड़ी यह जानकारी काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने राज्य के प्रशासनिक और सांस्कृतिक ढांचे पर गहरा प्रभाव डाला।

​1989 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. डी. तिवारी की सरकार ने उर्दू को दूसरी राजभाषा घोषित करने को ‘उत्तर प्रदेश राजभाषा (संशोधन) विधेयक’ पेश किया, तो इसके विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और कई अन्य संगठनों ने व्यापक आंदोलन किया था।

​यह आंदोलन तब के उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक अत्यंत चर्चित और संवेदनशील अध्याय था।

​आंदोलन के मुख्य बिंदु और प्रभाव
  • विरोध का आधार: एबीवीपी और अन्य विरोधियों का तर्क था कि यह निर्णय भाषाई आवश्यकता के बजाय ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ प्रेरित है। उनका मानना था कि उत्तर प्रदेश की पहचान हिंदी से जुड़ी है और उर्दू को यह दर्जा देने से राज्य के प्रशासनिक और शैक्षिक ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
  • सड़क से विधानसभा तक प्रदर्शन: लखनऊ सहित राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। छात्रों और पुलिस के बीच कई जगहों पर झड़पें भी हुईं।
  • सांप्रदायिक तनाव: इस भाषाई विवाद ने राज्य में राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ावा दिया, जो उस समय चल रहे राम जन्मभूमि आंदोलन के साथ मिलकर और भी जटिल हो गया था।
  • बदायूं हिंसा (1989): इस विरोध प्रदर्शन में उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में बड़ी सांप्रदायिक हिंसा भड़की थी, जिसमें कई लोगों की जान गई। यह घटना आज भी इस भाषाई विवाद के सबसे दुखद परिणाम के रूप में याद की जाती है।
​राजनीतिक परिणाम

​इस विरोध के बावजूद सरकार ने विधेयक पारित कर दिया, लेकिन इसके तुरंत बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी और मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने। 1989 का वह वर्ष उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा ‘टर्निंग पॉइंट’ सिद्ध हुआ, जहाँ भाषा और पहचान विषयों ने चुनाव परिणाम  गहरे से प्रभावित किए

निश्चित रूप से, 1989 का वह कालखंड उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए एक “वॉटरशेड मोमेंट” (निर्णायक मोड़) था। उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा देने के निर्णय ने राज्य की सामाजिक और राजनैतिक दिशा को पूरी तरह बदल दिया था।

​एबीवीपी (ABVP) और अन्य संगठनों के उस आंदोलन के कुछ और गहरे पहलू इस प्रकार हैं:

​आंदोलन का व्यापक प्रभाव
  1. शैक्षणिक संस्थानों में बंदी: लखनऊ विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) जैसे बड़े केंद्र इस आंदोलन के मुख्य गढ़ बन गए थे। छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार किया और “हिंदी बचाओ” के नारों के साथ प्रदर्शन किए।
  2. बदायूं की त्रासदी: जैसा कि मैंने पहले बताया, इस भाषाई विवाद ने बदायूं में बहुत हिंसक रूप ले लिया था। वहां ट्रेन पर हमला हुआ और शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा। यह घटना उस समय की कांग्रेस सरकार के लिए एक बड़ा प्रशासनिक और राजनैतिक झटका साबित हुई।
  3. राजनैतिक ध्रुवीकरण: यह वही समय था जब उत्तर प्रदेश में ‘मण्डल’ (आरक्षण) और ‘कमण्डल’ (राम मंदिर आंदोलन) की राजनीति भी सिर उठा रही थी। उर्दू के मुद्दे ने इस ध्रुवीकरण को और तेज कर दिया, जिससे राज्य में कांग्रेस का आधार खिसकने लगा।
​कानूनी संघर्ष की परिणति (1989 – 2014)

​आंदोलन के बाद यह मामला सड़कों से निकलकर अदालतों में पहुँचा। हिंदी साहित्य सम्मेलन ने इस कानून को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

महत्वपूर्ण तथ्य: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “दूसरी राजभाषा” का मतलब यह नहीं है कि वह पहली भाषा (हिंदी) के बराबर है, बल्कि इसका उद्देश्य विशिष्ट प्रशासनिक कार्यों में उर्दू भाषियों की सुविधा सुनिश्चित करना है।

​इस ऐतिहासिक घटनाक्रम ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे भारत में भाषाई राजनीति और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर एक लंबी बहस छेड़ दी थी।

1989 का वह दौर उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ‘ऐतिहासिक भूचाल’ की तरह था। नारायण दत्त तिवारी (N.D. Tiwari) के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने जब उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया, तो उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह निर्णय उनकी सत्ता की विदाई का एक बड़ा कारण बनेगा।

​यहाँ उस चुनाव और उसके परिणामों के मुख्य बिंदु दिए गए हैं:

​1. 1989 का विधानसभा चुनाव: कांग्रेस का पतन

​उर्दू आंदोलन और उसके विरोध में हुए एबीवीपी (ABVP) के प्रदर्शनों ने राज्य के मतदाताओं को पूरी तरह बांट दिया था।

  • नाराज़गी: एक तरफ हिंदी समर्थक और छात्र संगठन सरकार के इस फैसले से बेहद नाराज़ थे, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम मतदाता भी पूरी तरह कांग्रेस के साथ नहीं रहे क्योंकि उसी दौरान बाबरी मस्जिद का ताला खुलने और शिलान्यास जैसी घटनाओं ने उन्हें कांग्रेस से दूर कर दिया था।
  • नतीजा: 1989 के चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हार गई। यह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पतन की शुरुआत थी, जिसके बाद वह आज तक राज्य की सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ वापस नहीं लौट पाई।
​2. मुलायम सिंह यादव का उदय

​इस राजनीतिक शून्यता का सबसे बड़ा फायदा मुलायम सिंह यादव को हुआ।

  • ​वे जनता दल के चेहरे के रूप में उभरे और पहली बार 5 दिसंबर 1989 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
  • ​उन्होंने उर्दू के इस फैसले को न केवल बरकरार रखा, बल्कि इसे लागू करने की दिशा में भी कदम उठाए, जिससे उन्हें “पिछड़ों और अल्पसंख्यकों” के मसीहा के रूप में पहचान मिली।
​3. मंडल, कमंडल और उर्दू का ‘कॉकटेल’

​1989-90 का समय तीन बड़े मुद्दों का मिश्रण था:

  1. उर्दू राजभाषा विवाद: जिसने भाषाई आधार पर ध्रुवीकरण किया।
  2. मंडल आयोग: जिसने ओबीसी (OBC) राजनीति को जन्म दिया।
  3. राम मंदिर आंदोलन (कमंडल): जिसने हिंदुत्व की राजनीति को केंद्र में ला दिया।
​इस घटना का दूरगामी प्रभाव

​एन.डी. तिवारी उत्तर प्रदेश के अंतिम कांग्रेसी मुख्यमंत्री साबित हुए। उनके बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरी तरह से क्षेत्रीय दलों (SP और BSP) और भाजपा के इर्द-गिर्द सिमट गई। उर्दू का मुद्दा महज एक भाषाई फैसला नहीं था, बल्कि इसने उत्तर प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने को बदल दिया।

एक रोचक तथ्य: एन.डी. तिवारी ने शायद सोचा था कि उर्दू को राजभाषा बनाकर वह मुस्लिम वोट बैंक सुरक्षित कर लेंगे, लेकिन इतिहास गवाह है कि इस एक फैसले ने उनके खिलाफ एक ऐसा छात्र और युवा आंदोलन खड़ा कर दिया जिसने कांग्रेस की जड़ें हिला दीं।

1989 के उस दौर में, मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह दो ऐसे ध्रुव बनकर उभरे जिन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति को अगले तीन दशकों के लिए परिभाषित कर दिया। उर्दू राजभाषा विवाद ने इन दोनों नेताओं को अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने का मौका दिया।

​यहाँ इन दोनों दिग्गजों की उस समय की भूमिका का विवरण है:

​1. मुलायम सिंह यादव: ‘धरतीपुत्र’ का उदय

​मुलायम सिंह यादव उस समय जनता दल के प्रमुख नेता थे।

  • समर्थन का आधार: एन.डी. तिवारी सरकार के उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाने के फैसले का मुलायम सिंह यादव ने पुरजोर समर्थन किया। उनका तर्क था कि यह अल्पसंख्यक समुदाय के भाषाई अधिकारों की रक्षा है।
  • रणनीति: उन्होंने यह विषय ‘सामाजिक न्याय’ से जोड़ा। 1989 में मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने उर्दू के प्रचार-प्रसार को बजट और सरकारी नौकरियों में उर्दू अनुवादकों की भर्ती प्रक्रिया तेज की।
  • नतीजा: इसी समय उनका ‘MY’ (Muslim-Yadav) समीकरण मजबूत हुआ, जिसने उन्हें दशकों  सत्ता के केंद्र में रखा।
​2. कल्याण सिंह: हिंदुत्व और प्रखर राष्ट्रवाद का चेहरा

​कल्याण सिंह तब भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उभरते नेता थे और विधानसभा में विपक्ष की एक मजबूत आवाज थे।

  • विरोध का स्वर: उन्होंने उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाए जाने का कड़ा विरोध किया। भाजपा और एबीवीपी का तर्क था कि कांग्रेस “तुष्टीकरण” कर रही है और हिंदी की उपेक्षा कर रही है।
  • आंदोलन को धार: कल्याण सिंह ने इस मुद्दे को सीधे सांस्कृतिक पहचान से जोड़ा। उन्होंने रैलियों में कहा कि “उत्तर प्रदेश की आत्मा हिंदी में बसती है।”
  • नतीजा: इस विरोध ने उन्हें हिंदू मतदाताओं में बेहद लोकप्रिय बना दिया। 1991 के चुनाव में, जब राम मंदिर आंदोलन और उर्दू विवाद का असर चरम पर था, कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बने।
​राजनीतिक बिसात का बदला स्वरूप

रोचक तथ्य: 1989 का वह साल था जब उत्तर प्रदेश की राजनीति से ‘मध्यमार्ग’ (कांग्रेस) गायब हो गया और राजनीति पूरी तरह से ‘दो छोरों’ (Left-leaning Socialism vs Right-leaning Nationalism) पर बंट गई।

इन दोनों नेताओं के उदय ने तय कर दिया कि अब उत्तर प्रदेश में चुनाव विकास से ज्यादा ‘पहचान’ (Identity Politics) के आधार पर लड़े जाएंगे।

1989 के उस भाषाई और राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे राष्ट्रीय नेताओं की भूमिका ने भी उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक नई दिशा दी थी।

​उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाने के निर्णय पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का रुख बहुत स्पष्ट और हमलावर था:

​अटल बिहारी वाजपेयी का मत

​अटल अपनी वाक्पटुता को विख्यात थे। उन्होंने संसद और जनसभाओं में इस विषय को ‘संवैधानिक मर्यादा’ और ‘हिंदी की अस्मिता’ से जोड़ा।

  • तर्क: उनका कहना था कि उर्दू एक समृद्ध भाषा है और उसका सम्मान होना चाहिए, लेकिन इसे ‘राजनीतिक हथियार’ के रूप में इस्तेमाल करना गलत है।
  • चेतावनी: उन्होंने चेतावनी दी थी कि आनन-फानन में लिया गया यह फैसला समाज में विभाजन पैदा करेगा। अटल जी ने इसे कांग्रेस की ‘वोट बैंक की राजनीति’ का चरम बताया था।

​लालकृष्ण आडवाणी और ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ (Pseudo-Secularism)

​उसी समय आडवाणी अपनी ‘सोमनाथ से अयोध्या’ रथ यात्रा की रूपरेखा तैयार कर रहे थे।

  • नया शब्द: उन्होंने उर्दू विवाद को ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का सटीक उदाहरण बताया। उन्होंने तर्क दिया कि कांग्रेस केवल तुष्टीकरण को ऐसे कदम उठा रही है जिससे बहुसंख्यक समाज (हिंदी भाषी) में असुरक्षा भाव पैदा हो रहा है।
  • एबीवीपी को समर्थन: आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने एबीवीपी के छात्र आंदोलन को पूर्ण नैतिक और राजनीतिक समर्थन दिया, जिससे यह केवल छात्रों का आंदोलन न रहकर एक बड़ा जन-आंदोलन बन गया।
​1989-1991: राजनीति का ‘पूर्ण परिवर्तन’

​इस भाषाई विवाद के बाद जो चुनाव हुए, उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति के ‘तीन स्तंभ’ खड़े कर दिए:

  1. भाजपा (कल्याण सिंह): उर्दू विरोध और राम मंदिर विषय ने भाजपा को पहली बार उत्तर प्रदेश की सत्ता शिखर तक पहुँचाया (1991)।
  2. सपा (मुलायम सिंह): उर्दू समर्थन और मंडल आयोग ने पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के एक मजबूत गठबंधन को जन्म दिया।
  3. बसपा (कांशीराम/मायावती): इसी उथल-पुथल के बीच ‘बहुजन’ राजनीति ने भी अपनी जगह बनाई, क्योंकि दलित मतदाता भी कांग्रेस के पारंपरिक आधार से छिटक रहे थे।

​ऐतिहासिक निष्कर्ष

​उत्तर प्रदेश में उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा मिलना केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि यह कांग्रेस के अंत और गठबंधन/क्षेत्रीय राजनीति का शंखनाद था। एन.डी. तिवारी उत्तर प्रदेश के अंतिम कद्दावर कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे, और उनके बाद राज्य की कमान कभी मुलायम सिंह, कभी कल्याण सिंह, तो कभी मायावती के हाथों रही।

रोचक : रोचक बात यह कि जिस कानून का भाजपा ने 1989 में सड़क पर कड़ा विरोध किया , उसी को संवैधानिक रूप से उसे स्वीकारना पड़ा । आज उत्तर प्रदेश के सरकारी कार्यालयों के बाहर ‘हिंदी’ के साथ-साथ ‘उर्दू’ में भी विभाग के नाम लिखे दिखते हैं।

जब बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने उर्दू को दूसरी भाषा बनाया
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने राज्य में उर्दू को दूसरी भाषा के रूप में बढ़ावा दिया और अदालतों में इसे स्वीकार करने का आह्वान किया तथा उर्दू में साइनबोर्ड बनवाने का आदेश भी दिया। यह सन् 1967 की बात है, जब बिहार में जनसंघ और सीपीआई के अस्थिर गठबंधन ने सत्ता संभाली। महामाया प्रसाद मुख्यमंत्री बने और ठाकुर उनके उप मुख्यमंत्री। हालांकि, उन्हें शिक्षा मंत्रालय मिला। सामाजिक न्याय की राजनीति से उनके गहरे जुड़ाव ने उन्हें सामाजिक लामबंदी में स्थानीय भाषा के महत्व का एहसास कराया। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, उन्होंने सबसे पहले अंग्रेजी को आधिकारिक संचार भाषा के रूप में हटा दिया।
1977 की इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार सचिवालय से सभी अंग्रेजी टाइपराइटर हटा दिए गए, स्कूलों और कॉलेजों से अंग्रेजी समाप्त कर दी गयी,और एक नई प्रणाली – ‘अंग्रेजी के बिना पास’ – प्रचलन में आई । इसे बिहार लोक सेवा आयोग में वैकल्पिक बना दिया गया। तत्कालीन उपमुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री कर्पूरी ठाकुर ने अंग्रेजी विरोधी अभियान का नेतृत्व किया।”

अकादमी ने राजस्थानी, तमिल, उर्दू, तेलुगु, सिंधी, संताली, संस्कृत, उड़िया, नेपाली और मणिपुरी में लिखने वाले लेखकों को भी मान्यता दी।
अगर यह कदम संघ के हिंदी राष्ट्रवाद के विचार के अनुरूप था, तो अगला कदम उन्हें सबसे ज्यादा परेशान करने वाला था। 1967 में जब गठबंधन सरकार बनी, तो अभिलेखीय रिपोर्टों से पता चलता है कि 33 प्रस्तावित कार्यक्रम थे। उनमें से एक था उर्दू को राज्य की दूसरी भाषा बनाना। रिकॉर्ड के अनुसार, 17 मार्च 1967 को राज्यपाल अभिभाषण में इसका जिक्र भी था। हालांकि,रघुबर दयाल आयोग (रांची दंगों के बाद गठित जांच आयोग) रिपोर्ट बताती है कि संघ ने इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया, लेकिन उसे “किसी भी समय इसका विरोध करने की स्वतंत्रता दी गई थी”। उर्दू को राज्य की दूसरी भाषा घोषित करने के संबंध में मंत्रिमंडल में कोई चर्चा नहीं हुई। ठाकुर ने एक परिपत्र जारी किया, जिसमें निर्देश थे कि सभी सरकारी कार्यालयों (अदालतों को छोड़कर) में उर्दू में लिखे सभी पत्र,आवेदन, याचिकाएं आदि स्वीकार किए जाने चाहिए और जहां तक ​​संभव हो,उनके उत्तर भी उर्दू में ही दिए जाने चाहिए। सभी महत्वपूर्ण सरकारी प्रकाशनों का यथासंभव उर्दू में अनुवाद किया जाना चाहिए और सभी सरकारी साइनबोर्ड हिंदी के अलावा उर्दू में भी लिखे जाएं।

संयोगवश, इसके बाद 14 जुलाई, 1967 को कांग्रेस सदस्य नासिरुद्दीन हैदर खान ने एक गैर-सरकारी विधेयक पेश किया गया। इस विधेयक के कारण विधानसभा में भारी हंगामा हुआ और जनसंघ ने 12 से 26 अगस्त के बीच पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन की घोषणा की।
इस दौरान संघ ने कुछ पर्चे बांटे जिनमें लिखा था कि वे देश को पाकिस्तान के चंगुल में जाने से रोकेंगें और यह कि भाषा 20 साल पहले विभाजन का कारण बनी थी,कुछ पाकिस्तानी और राष्ट्र-विरोधी ताकतों का उठाया हुआ था।

1967 के रांची-हटिया दंगे भारत के इतिहास में उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा बनाने के फैसले के विरोध में हुए सबसे भीषण भाषाई और सांप्रदायिक दंगों में से एक हैं। 22-29 अगस्त 1967 के बीच हिंसा में जमकर तोड़फोड़ और हत्याएं हुईं, जिसमें आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार लगभग 184 लोग मारे गए।
1967 दंगे के मुख्य बिंदु:
बिहार सरकार के उर्दू को राज्य की दूसरी आधिकारिक भाषा बनाने के फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया। हिंसा रांची शहर और निकटवर्ती औद्योगिक शहर हटिया में सात दिनों तक जारी रही, जिसमें कई घर और दुकानें जलाई गईं। रघुपति दयाल आयोग के अनुसार, रांची में 184 मौतें (164 मुस्लिम, 19 हिंदू) और हटिया में 26 मौतें हुईं।

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