समय मानक: ग्रीनविच ऐतिहासिक राजनीतिक वर्चस्व और उज्जैन परंपरा का संतुलन
‘मैं समय हूं’… लेकिन क्या ग्रीनविच से उज्जैन वापस लाया जा सकता हूं?
मैकाले वाली मानसिकता को दूर करने का बीड़ा उठाए केंद्र सरकार ने समय चक्र का निर्धारण करने वाले केंद्र पर नई बहस छेड़ी है. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि वक्त आ गया है कि दुनिया को बताया जाए कि दुनिया का टाईम ग्रीनविच रेखा से तय न होकर उज्जैन से किया जाए. जहां महाकाल विराजमान है.
समय को लेकर खींचतान…
नई दिल्ली, 07 अप्रैल 2026,उज्जैन को लेकर एक पुरानी बहस फिर नए सिरे से उठ खड़ी हुई है. जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री डाॅक्टर मोहन यादव की उपस्थिति में कहा कि दुनिया का स्टैंडर्ड टाइम उज्जैन को केंद्र मानकर तय होना चाहिए, तो यह मात्र एक बयान नहीं, इतिहास, परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच खिंची एक रोचक रेखा बन गया. सवाल सीधा है, लेकिन जवाब उतना सरल नहीं.
धर्म और आध्यात्म के गूढ़ विषयों में दिलचस्पी रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर विवेक चौरसिया बताते हैं ‘उज्जैन को क्यों कहा जाता है काल गणना का केंद्र?’
प्राचीन काल से अवंतिका, उज्जयिनी अथवा आज का उज्जैन कालगणना का केंद्र रहा है. माना जाता है कि स्टैंडर्ड टाइम के संदर्भ में आज जो प्रतिष्ठा ग्रीनविच की है वह एक ज़माने में उज्जैन की थी. यह स्थान ही समय अर्थात काल का मानक था. कदाचित इसी कारण यहां के प्रधान देवता महाकाल हुए. महाकाल, अर्थात मानक समय के महान देवता. और काल अर्थात मृत्यु के भय से मुक्ति प्रदान करने वाले मृत्युंजय देवता भी महाकाल हैं. अनजाने काल से चला आ रहा यही लोकविश्वास कालयात्रा की असंख्य सदियों के बाद उत्तरोत्तर और अधिक दृढ़ होता गया ।
उज्जैन कालगणना का केंद्र रहा और है, इसके पीछे जो वैज्ञानिक तर्क गिनाए जाते हैं उनमें प्रमुख हैं पुराणों में बारम्बार उज्जैन को दी गई नाभिदेश की उपमा. वराह पुराण में तैत्तरीय श्रुति के प्रमाण से कहा गया है कि ‘नाभिदेशे महाकालस्तन्नाम्ना तत्र वै हर:.’ अर्थात नाभिदेश में महाकाल नाम से वे शिव यहां विराजमान हैं. सृष्टि का प्रारंभ महाकाल से ही हुआ. अतः महाकाल को कालचक्र का प्रवर्तक और प्रतापी भी कहा गया है. ‘कालचक्रप्रवर्तको महाकाल: प्रतापन:.’ इस तरह उज्जैन धरती का नाभिदेश अर्थात केंद्र है और यहां के देवता महाकाल इसके केंद्रबिंदु होकर कालगणना के आधार हैं. उज्जैन को नाभिदेश कहने का वैज्ञानिक आधार भी है.
ध्यान रहे उत्तरी ध्रुव की स्थिति पर 21 मार्च से प्रायः छह मास के दिनों के तीन मास बीत जाने पर सूर्य दक्षिण क्षितिज से अत्यंत दूर की ऊंचाई पर चला जाता है. आचार्य वराहमिहिर की मान्यता थी कि उस समय सूर्य उज्जैन के ठीक मस्तक पर आ जाता है. उज्जैन के अक्षांश और परमकांति दोनों ही 24 अंश माने गए हैं. सूर्य की ठीक मस्तक पर स्थिति उज्जैन के अतिरिक्त विश्व के किसी और अक्षांश पर प्राप्त नहीं होती. इसी प्राकृतिक और भौगोलिक विशेषता के कारण उज्जैन एकमात्र ऐसा स्थान है जहां से काल का ठीक-ठीक ज्ञान पाना सम्भव है. यह भी कि जिस प्रकार आकाश में सूर्य मस्तक पर ठीक उज्जैन में आता है वैसे ही खगोल में भी उज्जैन को ठीक मध्यवर्ती स्थान मिला हुआ है. आकाश और धरती का केंद्र होने से ही उज्जैन को नाभिदेश माना गया है.
यह प्रमाणित है कि कर्क रेखा उज्जैन से होकर गुजरती है. इसी तरह उत्तर-दक्षिण की भूमध्य रेखा कभी उज्जैन से होकर गुजरती थी. इन रेखाओं ने भी उज्जैन को कालगणना का केंद्र बनने में महती भूमिका निभाई. यह भी मान्यता है कि कालगणना में शंकु यंत्र का महत्व है. पृथ्वी के केंद्र उज्जैन में उस शंकु यंत्र का स्थान महाकाल ज्योतिर्लिंग है. उज्जैन की इन्हीं विशेषताओं के कारण आचार्य वराहमिहिर ने इसे अपनी कर्मस्थली बनाया और राजा जयसिंह ने देश के अन्य चार नगरों की भांति उज्जैन को वेधशाला के निर्माण के लिए चुना. जयसिंह की बनवाई वेधशाला के प्राचीन यंत्रों से आज भी सटीक कालगणना हो रही है.
सवाल – क्या ग्रीनविच लाइन के पास गया समय लौटेगा?
इस सवाल तक पहुंचने से पहले कि क्या वाकई उज्जैन को वैश्विक समय का केंद्र बनाया जा सकता है, यह जानना जरूरी है कि अगर उज्जैन इतना महत्वपूर्ण था, तो फिर ग्रीनविच कैसे दुनिया का समय केंद्र बन गया? इसका जवाब ऐतिहासिक राजनीति है. औद्योगिक क्रांति समय ब्रिटेन समुद्री व्यापार और वैश्विक ताकत का केंद्र था. शिपिंग को एक समान समय और देशांतर रेखा की जरूरत थी. 1884 में अंतरराष्ट्रीय मेरिडियन सम्मेलन में ग्रीनविच को शून्य देशांतर माना गया. यह फैसला वैज्ञानिक कम और राजनीतिक-आर्थिक ज्यादा था. क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से पर ग्रीनविच वाला अंग्रेजी राज था. आज भारत पूर्वी देश इसलिए कहलाता है, क्योंकि पॉलिटिकल ज्योग्राफी में दिशाएं भी अंग्रेजों ने तय कीं.
यहां से बहस का दूसरा पक्ष शुरू होता है. क्या आज, जब दुनिया तकनीकी रूप से कहीं आगे बढ़ चुकी है, हम फिर से समय के केंद्र को लेकर सोच सकते हैं? सैद्धांतिक रूप से यह संभव है, लेकिन व्यावहारिक रूप से मुश्किल. पूरी दुनिया की घड़ियां, जीपीएस, सैटेलाइट सिस्टम, एटामिक वॉच, एयर ट्रैफिक, इंटरनेट सर्वर- सब कुछ ग्रीनविच टाइम आधारित है. इसे बदलना पूरी दुनिया की भाषा बदलने की कोशिश जैसा होगा.
फिर भी, इस चर्चा का महत्व कम नहीं हो जाता. उज्जैन को कालगणना का केंद्र मानने का विचार हमें अपनी वैज्ञानिक विरासत की याद दिलाता है. प्राय: हम अपनी परंपरायें केवल धार्मिक दृष्टि से देखते हैं, जबकि उनमें गहरा वैज्ञानिक आधार छिपा होता है. उज्जैन इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जहां महाकाल का मंदिर और वेधशाला एक ही शहर में खड़े होकर बताते हैं कि आस्था और विज्ञान कभी विरोधी नहीं थे.
आवश्यकता यह है कि हम यह परंपरा नई दृष्टि से देखें. उज्जैन को दुनिया का टाइम सेंटर बनाना संभव न भी हो, लेकिन इसे ज्ञान और अनुसंधान का केंद्र जरूर बनाया जा सकता है. खगोलशास्त्र, इतिहास और गणित के क्षेत्र में उज्जैन को पुन: स्थापित करने की पहल हो सकती है. इससे न केवल हमारी परंपरा सम्मानित होगी, बल्कि नई पीढ़ी को भी यह समझ आएगा कि भारत का अतीत केवल गौरवगाथा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक उपलब्धियों की कहानी भी है.
ऐसे में इस पर समय नष्ट करने की आवश्यकता नही कि दुनिया का स्टैंडर्ड टाइम तय करने को ग्रीनविच के स्थान उज्जैन मानक मानें. विशेषत: सरकारी उपक्रम में तो ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए. जिसमें साइंस काउंसिल भी शामिल हो. हां, यह भारतीय ज्ञान पद्धति में अध्ययन का विषय अवश्य है. प्रधान जब इसे 1947 के ‘विकसित भारत’ मिशन से जोड़ते हैं, तो प्रश्न होगा कि क्या वाकई ऐसा होने से भारत विकसित कहा जाएगा? यह बहस किसी शहर को दूसरे के मुकाबले खड़ा करने की नहीं है. यह वह आत्मविश्वास है, जिसमें हम अपने अतीत को समझकर वर्तमान मजबूत करते हैं. उज्जैन को लेकर उठी यह चर्चा हमें याद दिलाती है कि समय सिर्फ घड़ी में नहीं, हमारी सोच और हमारी पहचान में भी बहता है।
ग्रीनविच प्रधान मध्याह्न रेखा

पत्थरों से बनी सड़क पर बाईं ओर मुड़ती हुई एक कतार में लोगों का एक समूह इंतज़ार कर रहा है। इसके पीछे एक अलंकृत ईंटों की इमारत है जिसके ऊपर एक लाल गेंद बनी है। कतार के अंत में, कैमरे के सबसे करीब खड़े लोग, दाईं ओर एक पेड़ के नीचे, एक चमकदार धातु के स्मारक के पास अन्य लोगों की तस्वीरें ले रहे हैं। पत्थरों से बनी एक रेखा उन्हें आपस में जोड़ती है।
ग्रीनविच स्थित रॉयल ऑब्जर्वेटरी में प्रधान मध्याह्न रेखा को चिह्नित करने वाली पीतल की रेखा पर तस्वीरें लेने के लिए पर्यटक कतार में खड़े हैं।
ग्रीनविच मध्याह्न रेखा एक प्रधान मध्याह्न रेखा है , जो इंग्लैंड के लंदन में स्थित रॉयल ऑब्जर्वेटरी , ग्रीनविच से होकर गुजरती है। 1884 से 1974 तक, ग्रीनविच मध्याह्न रेखा अंतर्राष्ट्रीय मानक प्रधान मध्याह्न रेखा थी, जिसका उपयोग विश्व स्तर पर समय निर्धारण और नौवहन के लिए किया जाता था। आधुनिक मानक, आईईआरएस संदर्भ मध्याह्न रेखा , ग्रीनविच मध्याह्न रेखा पर आधारित है, लेकिन इससे थोड़ा भिन्न है। यह प्रधान मध्याह्न रेखा (उस समय कई में से एक) सर्वप्रथम सर जॉर्ज एयरी द्वारा (1851 में) स्थापित की गई थी। 1883 में, अंतर्राष्ट्रीय भूगणितीय संघ ने औपचारिक रूप से सरकारों को ग्रीनविच से होकर गुजरने वाली मध्याह्न रेखा को अंतर्राष्ट्रीय मानक प्रधान मध्याह्न रेखा के रूप में अपनाने की सिफारिश की। अगले वर्ष अक्टूबर में, संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के निमंत्रण पर , 25 देशों के 41 प्रतिनिधि अंतर्राष्ट्रीय मध्याह्न रेखा सम्मेलन के लिए वाशिंगटन, डी.सी. , संयुक्त राज्य अमेरिका में एकत्रित हुए । इस अंतर-सरकारी सम्मेलन ने ग्रीनविच से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा को विश्व मानक प्रधान मध्याह्न रेखा के रूप में चुना। [ ए ] हालाँकि, फ्रांस ने मतदान से परहेज किया, और फ्रांसीसी मानचित्रों ने कई दशकों तक पेरिस मध्याह्न रेखा का उपयोग जारी रखा।
प्रधान मध्याह्न रेखा का तल ग्रीनविच वेधशाला के एयरी ट्रांजिट सर्कल उपकरण ( 51°28′40.1″N 0°0′5.3″W ) पर स्थानीय गुरुत्वाकर्षण वेक्टर को समाहित करता है। इसलिए प्रधान मध्याह्न रेखा लंबे समय से प्रांगण में एक पीतल की पट्टी से दर्शायी जाती थी, जिसे अब स्टेनलेस स्टील से बदल दिया गया है, और 16 दिसंबर 1999 से, इसे लंदन के रात्रि आकाश में उत्तर की ओर चमकने वाले एक शक्तिशाली हरे लेजर से चिह्नित किया गया है।
ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) रिसीवर दिखाते हैं कि ग्रीनविच में प्रधान मध्याह्न रेखा की मार्किंग स्ट्रिप ठीक शून्य देशांतर (शून्य डिग्री, शून्य मिनट और शून्य सेकंड) पर नहीं है, बल्कि मध्याह्न रेखा के पश्चिम में लगभग 5.3 सेकंड के चाप पर है, जिसका अर्थ है कि मध्याह्न रेखा 102 मीटर पूर्व में दिखाई देती है। अतीत में, इस अंतर का कारण अंतरिक्ष-आधारित स्थान प्रणालियों जैसे डब्ल्यूजीएस-84 (जिस पर जीपीएस निर्भर है) के लिए संदर्भ मध्याह्न रेखाओं की स्थापना या अंतर्राष्ट्रीय समय ब्यूरो की समय-निर्धारण प्रक्रिया में धीरे-धीरे आने वाली त्रुटियों को माना जाता था। इस विसंगति का वास्तविक कारण यह है कि भू-माप निर्देशांक और खगोलीय रूप से निर्धारित निर्देशांक के बीच का अंतर हर जगह ऊर्ध्वाधर विक्षेपण के कारण एक स्थानीयकृत गुरुत्वाकर्षण प्रभाव बना रहता है ; इस प्रकार, पूर्व खगोलीय प्रणाली और वर्तमान भू-माप प्रणाली के बीच वैश्विक देशांतरों का कोई व्यवस्थित घूर्णन नहीं हुआ।
इतिहास
1911 के इस मानचित्र के मध्य में खींची गई रेखा प्रधान मध्याह्न रेखा है, जो ग्रीनविच से होकर गुजरती हुई दिखाई गई है । मानचित्र के ऊपरी भाग में स्थित सैक्सावॉर्ड और बाल्टा , स्कॉटलैंड और यूनाइटेड किंगडम के सबसे उत्तरी भाग, शेटलैंड द्वीप समूह में स्थित हैं । शेटलैंड प्रधान मध्याह्न रेखा से 1° पश्चिम में स्थित है।
एक सामान्य अंतर्राष्ट्रीय प्रधान मध्याह्न रेखा की स्थापना से पहले, अधिकांश समुद्री देशों ने अपनी-अपनी प्रधान मध्याह्न रेखाएँ स्थापित कीं , जो आमतौर पर संबंधित देश में राष्ट्रीय वेधशाला या अन्य महत्वपूर्ण स्थलचिह्न से होकर गुजरती थीं। जनवरी 1851 में, ग्रीनविच स्थित रॉयल वेधशाला ने ग्रेट ब्रिटेन के लिए प्रधान मध्याह्न रेखा स्थापित की।
19वीं शताब्दी में, खगोलविद और भूमापविज्ञानी देशांतर और समय के प्रश्नों से चिंतित थे, क्योंकि वे वैज्ञानिक रूप से इनका निर्धारण करने के लिए उत्तरदायी थे और अपने अध्ययनों में इनका निरंतर उपयोग करते थे। अंतर्राष्ट्रीय भूमाप संघ , जिसने मूलभूत देशांतरों के एक नेटवर्क के साथ यूरोप को कवर किया था, ने 1883 में रोम में अपने सातवें आम सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत प्रधान मध्याह्न रेखा के प्रश्न में रुचि दिखाई। वास्तव में, संघ पहले से ही प्रशासनों को स्थलाकृतिक सर्वेक्षणों के लिए आधार और इंजीनियरों को उनके समतलीकरण के लिए मूलभूत मानदंड प्रदान कर रहा था। यह स्वाभाविक प्रतीत होता था कि यह नौवहन, मानचित्रकला और भूगोल के साथ-साथ प्रमुख संचार संस्थानों, रेलवे और टेलीग्राफ की सेवा में महत्वपूर्ण प्रगति प्राप्त करने में योगदान दे। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, अंतर्राष्ट्रीय प्रधान मध्याह्न रेखा का दर्जा प्राप्त करने के लिए, प्रस्तावक को तीन महत्वपूर्ण मानदंडों को पूरा करना आवश्यक था। कार्लोस इबानेज़ और इबानेज़ डी इबेरो की रिपोर्ट के अनुसार , इसमें एक उत्कृष्ट खगोलीय वेधशाला होनी चाहिए, खगोलीय प्रेक्षणों द्वारा अन्य निकटवर्ती वेधशालाओं से सीधा जुड़ा होना चाहिए, और आसपास के देश में उत्कृष्ट त्रिभुजों के नेटवर्क से जुड़ा होना चाहिए। चार प्रमुख वेधशालाएँ इन आवश्यकताओं को पूरा कर सकती थीं: ग्रीनविच, पेरिस , बर्लिन और वाशिंगटन। सम्मेलन ने निष्कर्ष निकाला कि ग्रीनविच वेधशाला भौगोलिक, समुद्री, खगोलीय और मानचित्र संबंधी स्थितियों के लिए सबसे उपयुक्त थी, जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय प्रधान मध्याह्न रेखा के चयन का मार्गदर्शन किया, और सरकारों को इसे विश्व मानक के रूप में अपनाने की सिफारिश की। सम्मेलन ने आगे आशा व्यक्त की कि यदि पूरी दुनिया ग्रीनविच मध्याह्न रेखा को चुनकर देशांतरों और समय के एकीकरण पर सहमत हो जाती है, तो ग्रेट ब्रिटेन मीटर कन्वेंशन का पालन करके भार और माप के एकीकरण के पक्ष में प्रतिक्रिया दे सकता है ।
1884 में, अंतर्राष्ट्रीय मध्याह्न रेखा सम्मेलन (सरकारी प्रतिनिधियों का) वाशिंगटन, डी.सी. में आयोजित किया गया था ताकि एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त एकल मध्याह्न रेखा स्थापित की जा सके। चुनी गई मध्याह्न रेखा वह थी जो ग्रीनविच में एयरी ट्रांजिट सर्कल से होकर गुजरती थी, और यह एक सदी तक विश्व की प्रधान मध्याह्न रेखा बनी रही। 1984 में, इस अक्षांश पर, आईईआरएस संदर्भ मध्याह्न रेखा द्वारा इसे प्रतिस्थापित कर दिया गया , जो ग्रीनविच मध्याह्न रेखा के लगभग 102 मीटर पूर्व में स्थित है। : 1263–1264
सन् 1884 के सम्मेलन के समय के आसपास, वैज्ञानिक बड़े पैमाने पर ऊर्ध्वाधर के विक्षेपण का निर्धारण करने के लिए माप कर रहे थे। कोई उम्मीद कर सकता है कि विभिन्न स्थानों पर स्थापित साहुल रेखाओं को यदि नीचे की ओर बढ़ाया जाए, तो वे सभी एक ही बिंदु, पृथ्वी के केंद्र से होकर गुजरेंगी, लेकिन ऐसा नहीं है, मुख्य रूप से पृथ्वी के एक दीर्घवृत्ताकार होने के कारण , न कि एक गोले के रूप में। नीचे की ओर विस्तारित साहुल रेखाएँ पृथ्वी के घूर्णन अक्ष को भी प्रतिच्छेद नहीं करती हैं; यह बहुत कम प्रभाव पृथ्वी के द्रव्यमान के असमान वितरण के कारण है। गणनाओं को संभव बनाने के लिए, वैज्ञानिकों ने परिक्रमण के दीर्घवृत्ताकारों को परिभाषित किया, जो पृथ्वी के आकार की अधिक बारीकी से नकल करते थे, एक विशेष क्षेत्र के लिए संशोधित; एक प्रकाशित दीर्घवृत्ताकार माप के लिए एक अच्छी आधार रेखा होगी। एक विशेष वेधशाला में साहुल रेखा या ऊर्ध्वाधर की दिशा और परिक्रमण के दीर्घवृत्ताकार की सतह पर लंबवत रेखा – उक्त दीर्घवृत्ताकार का अभिलंब – के बीच का अंतर ऊर्ध्वाधर का विक्षेपण है।
आईईआरएस संदर्भ मध्याह्न

रॉयल ऑब्जर्वेटरी के सामने ग्रीनविच मेरिडियन की मार्किंग स्ट्रिप पर एक जीपीएस रिसीवर । संकेतित देशांतर ठीक शून्य नहीं है क्योंकि भूकेंद्रीय संदर्भ दीर्घवृत्त पर भूगणितीय शून्य मेरिडियन (जो कि आईईआरएस संदर्भ मेरिडियन का उपयोग करके जीपीएस स्थिति निर्धारण से प्राप्त होता है ) इस पट्टी से 102 मीटर पूर्व में है।
जब ऐरी ट्रांजिट सर्कल का निर्माण हुआ था, तब दूरबीन को लंबवत संरेखित करने को एक पारा बेसिन का उपयोग हुआ था। इस प्रकार सर्कल स्थानीय ऊर्ध्वाधर या साहुल रेखा से संरेखित किया गया था, जो सामान्य या लंबवत रेखा से थोड़ा विचलित होती है। उसका उपयोग अंतर्राष्ट्रीय स्थलीय संदर्भ फ्रेम (जो लगभग जीपीएस से प्रयुक्त WGS84 सिस्टम समान है ) में भू-भौतिक अक्षांश और देशांतर परिभाषित करने को प्रयुक्त संदर्भ दीर्घवृत्त को किया जाता है जबकि पृथ्वी के आभासी गुरुत्वाकर्षण केंद्र निर्धारित ऐरी का स्थानीय ऊर्ध्वाधर अभी भी आधुनिक खगोलीय मध्याह्न रेखा (प्रधान मध्याह्न रेखा तल और खगोलीय गोले का प्रतिच्छेदन) से संरेखित होता है), यह पृथ्वी के घूर्णन अक्ष से होकर नहीं गुजरता। इसके परिणामस्वरूप, पृथ्वी के घूर्णन अक्ष से होकर गुजरने वाले तल से परिभाषित आईटीआरएफ शून्य मध्याह्न रेखा, प्रधान मध्याह्न रेखा के 102.478 मीटर पूर्व में है। मालिस एट अल के 2015 के एक विश्लेषण से पता चलता है कि पूर्व और बाद वाले के बीच के अंतर को केवल ऊर्ध्वाधर के इस विचलन से समझाया जा सकता है; अतीत में प्रस्तावित ऑफसेट के अन्य संभावित स्रोत स्थानीय रूप से ऊर्ध्वाधर के विक्षेपण में वर्तमान अनिश्चितता से छोटे हैं। ग्रीनविच प्राइम मेरिडियन का खगोलीय देशांतर 0.19″ ± 0.47″ E पाया गया, अर्थात् ग्रीनविच प्राइम मेरिडियन पर स्थानीय ऊर्ध्वाधर से परिभाषित तल और ITRF शून्य मेरिडियन पर पृथ्वी के घूर्णन अक्ष से गुजरने वाला तल प्रभावी रूप से समानांतर हैं। बीबीसी वेबसाइट के दावे, कि खगोलीय और भू-भौतिकीय निर्देशांकों के बीच का अंतर दर्शाता है कि IRTF शून्य मेरिडियन के पार पारगमन समय का कोई भी माप “इच्छित मेरिडियन” के पार पारगमन से ठीक 0.352 सेकंड (या 0.353 नक्षत्र सेकंड) पहले होगा, समझ की कमी पर आधारित हैं। दूसरी ओर, मैलिस एट अल की व्याख्या अधिक अध्ययनपूर्ण और सही है।
आज मेरिडियन
ग्रीनविच मध्याह्न रेखा और पृथ्वी
ग्रीनविच मध्याह्न रेखा उत्तर से दक्षिण की ओर यूरोप और अफ्रीका के आठ देशों से होकर गुजरती है:
यूनाइटेड किंगडम (विशेष रूप से, केवल इंग्लैंड )
फ्रांस
स्पेन
एलजीरिया
माली
बुर्किना फासो
चल देना
घाना
यह उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर जाते समय अंटार्कटिका से भी होकर गुजरता है, और रास्ते में केवल नॉर्वे के क्षेत्रीय दावे वाले क्वीन मौड लैंड को ही छूता है ।
यह निम्नलिखित समुद्री विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों से होकर गुजरता है:
ग्रीनलैंड ( डेनमार्क )
नॉर्वे ( उत्तरी अटलांटिक में स्वालबार्ड , जान मायेन द्वीप और नॉर्वे की मुख्य भूमि तथा दक्षिणी अटलांटिक में बोवेट द्वीप से निकटता के कारण)
उज्जैन से ग्रीनविच तक: प्रधान मध्याह्न रेखाओं (Prime Meridians) का संक्षिप्त इतिहास
28 जुलाई, 2024
एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक में एक भारतीय प्रधान मध्याह्न रेखा (Prime Meridian) का उल्लेख है, जो ग्रीनविच रेखा से भी पुरानी है। ‘पृथ्वी पर स्थानों का निर्धारण’ (Locating Places on the Earth) नामक अध्याय में कहा गया है कि ग्रीनविच मध्याह्न रेखा “पहली प्रधान मध्याह्न रेखा नहीं है” और “यूरोप से कई शताब्दियों पहले, भारत की अपनी एक प्रधान मध्याह्न रेखा थी” जो मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर से होकर गुजरती थी। पाठ्यपुस्तक के अनुसार, यह मध्याह्न रेखा “सभी भारतीय खगोलीय ग्रंथों में गणना के लिए एक संदर्भ” बन गई थी।
उज्जैन प्रधान मध्याह्न रेखा का पहला उल्लेख चौथी और आठवीं शताब्दी ईस्वी के बीच रचित प्राचीन संस्कृत ग्रंथ सूर्य सिद्धांत में मिलता है। अपने 14 अध्यायों और 500 श्लोकों में, इस ग्रंथ में खगोल विज्ञान, भूगोल और गणित के क्षेत्रों से संबंधित जटिल विचार शामिल हैं—आकाशीय पिंडों की गति से लेकर ‘ज्या’ (sine) मानों की गणना करने की विधि तक।
सूर्य सिद्धांत और समय का विज्ञान
सूर्य सिद्धांत की अपनी पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह ग्रंथ सूर्य देव द्वारा असुर ‘मय’ को दिया गया एक रहस्योद्घाटन था। सूर्य ने मय से कहा, “तुम्हारा उद्देश्य मुझे ज्ञात है; मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ; मैं तुम्हें वह विज्ञान प्रदान करूँगा जिस पर समय आधारित है, ग्रहों की महान प्रणाली।”
प्रधान मध्याह्न रेखा (जिसे सूर्य सिद्धांत में केवल ‘रेखा’ कहा गया है) की अवधारणा ग्रंथ के पहले अध्याय में ग्रहों की स्थिति की गणना करने की विधि के संदर्भ में पेश की गई है। सूर्य सिद्धांत के श्लोक 60 और 61 कहते हैं: “किसी ग्रह की दैनिक गति को किसी भी स्थान की देशांतर दूरी से गुणा करें, और उसकी संशोधित परिधि से विभाजित करें। प्राप्त भागफल को ग्रह की औसत स्थिति से घटाएं यदि स्थान ‘रेखा’ के पूर्व में हो, और जोड़ें यदि वह पश्चिम में हो।”
श्लोक 62 आगे उस भौगोलिक स्थिति का विवरण देता है जहाँ यह रेखा स्थित है: “वह रेखा जो राक्षसों के निवास (सांकेतिक लंका) और देवताओं के निवास पर्वत (मेरु पर्वत, जिसे खगोलशास्त्री उत्तरी ध्रुव मानते हैं) से होकर गुजरती है, उसी पर रोहितक (संभवतः रोहतक) और अवंती (वर्तमान उज्जैन) स्थित हैं।”
उज्जैन ही क्यों?
विद्वानों का मानना है कि प्राचीन व्यापार मार्गों के सापेक्ष उज्जैन की स्थिति का इसकी प्रधान मध्याह्न रेखा होने से गहरा संबंध था। रेवरेंड एबेनेज़र बर्गेस ने लिखा है कि उज्जैन हिंदू संस्कृति के सभी केंद्रों में से उस महान समुद्री मार्ग के सबसे करीब था जिसके माध्यम से रोम के बाजार अलेक्जेंड्रिया और भारत के बीच व्यापार होता था। इस शहर से प्रधान मध्याह्न रेखा का गुजरना यह साबित करता है कि यह भारतीय खगोल विज्ञान का पालना या प्रमुख केंद्र था।
यही कारण है कि महाराजा जयसिंह द्वितीय ने 1725 में उज्जैन में अपनी पांच खगोलीय वेधशालाओं (जंतर-मंतर) में से एक का निर्माण किया था।
समय का मानकीकरण और औद्योगिक क्रांति
इतिहास में खगोलविदों ने सुविधा या प्रतीकात्मक कारणों से प्रधान मध्याह्न रेखाओं को चुना है। उदाहरण को, दूसरी शताब्दी ईस्वी में टॉलेमी ने अपनी ‘जियोग्राफिया’ में अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित ‘फॉर्च्यूनेट आइल्स’ (कैनरी द्वीप) से रेखा खींची थी।
हालाँकि, 18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के साथ ही घड़ी के समय का महत्व बढ़ गया। कारखानों के आगमन ने न केवल समय का हिसाब रखना महत्वपूर्ण बना दिया, बल्कि उसका अधिकतम उपयोग करना भी अनिवार्य कर दिया। ब्रिटिश इतिहासकार ई.पी. थॉम्पसन के अनुसार, 1780 और 1830 के बीच औसत अंग्रेज मजदूर अधिक अनुशासित और “घड़ी की गति” के अधीन हो गया।
ग्रीनविच का उदय
19वीं शताब्दी में रेलवे, स्टीमशिप और टेलीग्राफ जैसे नवाचारों ने दुनिया को एक-दूसरे से जोड़ा, जिससे ‘सार्वभौमिक और एकसमान समय’ की आवश्यकता महसूस हुई। शुरुआत में राष्ट्रों ने अपनी राष्ट्रीय मध्याह्न रेखाएं बनाईं (जैसे फ्रांस की पेरिस रेखा, जर्मनी की बर्लिन रेखा)। प्रत्येक औपनिवेशिक शक्ति ने अपनी प्रधान मध्याह्न रेखा दुनिया को संदर्भ बिंदु बनायी—प्रतीकात्मक रूप से खुद को ग्रह के केंद्र में रखा।
एक एकल, वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रधान मध्याह्न रेखा बनाने का प्रयास 1870 के दशक में शुरू हुआ। 1884 में वाशिंगटन डीसी में ‘इंटरनेशनल मेरिडियन कॉन्फ्रेंस’ आयोजित हुई, जिसमें 26 देशों के प्रतिनिधियों ने “सभी राष्ट्रों के लिए एक ही प्रधान मध्याह्न रेखा अपनाने” पर सहमति व्यक्त की। अंततः, ब्रिटिश मध्याह्न रेखा, जो ग्रीनविच में रॉयल ऑब्जर्वेटरी से होकर गुजरती थी, अपनायी गयी। यह उस समय की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को दर्शाता था।
हालाँकि, इसे अपनाना तत्काल या सार्वभौमिक नहीं था। भारत में ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) अपनाने का महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी विरोध हुआ था। 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में हुए दो विश्व युद्धों ने अंततः ग्रीनविच मध्याह्न रेखा वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य बनाने का मार्ग प्रशस्त किया।

