अब तलाक-ए-हसन की बारी,सुप्रीम कोर्ट में कल से नियमित सुनवाई
तीन तलाक के बाद अब तलाक-ए-हसन की बारी? सुप्रीम कोर्ट में कल से महासुनवाई, जानें क्या है यह पूरा विवाद
Talak-e-Hasan Supreme Court Hearing: मुस्लिम समाज में प्रचलित तलाक-ए-हसन प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट कल यानी 19 मई से सुनवाई शुरू करेगा. इस व्यवस्था में पति एक-एक महीने के अंतराल पर तीन बार तलाक बोलकर निकाह खत्म कर सकता है. पीड़ित महिलाओं ने इसे एकतरफा और असंवैधानिक बताते हुए निरस्त करने की मांग की है. इससे पहले अदालत तीन तलाक जैसी सामाजिक बुराई को भी गैरकानूनी घोषित कर चुकी है.
सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई करने जा रहा है.
नई दिल्ली 18 मई 2026 : मुस्लिम समाज में एकतरफा तलाक की प्रथाओं को लेकर फिर देश की सर्वोच्च अदालत में बड़ी कानूनी लड़ाई शुरू हो रही है. सुप्रीम कोर्ट कल मंगलवार 19 मई से तलाक-ए-हसन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर महत्वपूर्ण सुनवाई करेगा. इस प्रथा से पीड़ित कई मुस्लिम महिलाओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाकर इसे पूरी तरह असंवैधानिक और लैंगिक न्याय के खिलाफ घोषित करने की मांग की है.
क्या होता है तलाक-ए-हसन?
मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक-ए-हसन को तलाक का एक प्रामाणिक या न्यायसंगत तरीका माना गया है, लेकिन इसके दुरुपयोग और एकतरफा स्वरूप पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. इस सिस्टम में पति अपनी पत्नी को एक-एक महीने के अंतराल पर यानी कुल तीन महीने की अवधि में तीन बार तलाक बोलकर, लिखकर या डिजिटल माध्यम से संदेश भेजकर शादी को पूरी तरह खत्म कर सकता है.
इस प्रक्रिया में हर एक तलाक के बाद एक महीने का समय (इद्दत की अवधि) दिया जाता है ताकि यदि दोनों पक्षों में समझौता हो सके तो शादी बच जाए. इस बीच अगर दोनों में शारीरिक संबंध बन जाते हैं या वे सुलह कर लेते हैं तो तलाक अपने आप निरस्त हो जाता है. लेकिन अगर लगातार तीन महीनों तक हर महीने एक बार तलाक कहा जाता है और कोई सुलह नहीं होती तो तीसरे महीने के बाद निकाह पूरी तरह टूट जाता है.अगर पहले या दूसरे महीने में शारीरिक संबंध बनते हैं, तो तलाक की प्रक्रिया निरस्त मानी जाती है।
पीड़ित महिलाओं का तर्क है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह एकतरफा है और इसमें महिलाओं की सहमति या उनके अधिकारों का कोई सम्मान नहीं होता.
सुप्रीम कोर्ट पिछले साल से मुस्लिमों में तलाक-ए-हसन की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। सुप्रीम ने इस प्रथा की निंदा की। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या आधुनिक और सभ्य समाज में ऐसी परंपरायें स्वीकार की जा सकती है। इस भेदभावपूर्ण प्रथा का आविष्कार कैसे करते हैं?
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जवल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच वकील या किसी अन्य व्यक्ति से तलाक का नोटिस भेजवाने पर भी नाराज है। कोर्ट ने कहा- यह वैध कैसे हो सकता है? तलाक और तलाकनामा के नोटिस पर पति के साइन होने चाहिए।
कोर्ट ने कहा- कोई तीसरा पक्ष महिला को उसके पति की ओर से तलाक कैसे सुना सकता है? क्या यह कानूनी है? क्या पति में इतना अहंकार है कि अपनी पत्नी को सीधे तलाक देने का प्रस्ताव भी नहीं रख सकता? समुदाय इस तरह की प्रथाओं को बढ़ावा कैसे दे रहा है? अगर समाज में ऐसी भेदभावपूर्ण प्रथाएं हैं, तो कोर्ट को दखल देना होगा।
क्या है तलाक-ए-हसन?
तलाक-ए-हसन में तलाक-ए-बिद्दत (तत्काल तीन तलाक) की तरह एकसाथ तलाक नहीं कहा जाता। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में तलाक-ए-बिद्दत की प्रथा को असंवैधानिक करार देते हुए इसे रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह परंपरा मनमानी है और मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
सुप्रीम कोर्ट में तलाक-ए-हसन का मामला कैसे पहुंचा?
पेशे से पत्रकार बेनजीर हिना सहित कई मुस्लिम महिलाओं ने अपने पतियों की तरफ से दिए गए तलाक-ए-हसन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है। इनका आरोप है कि मुसलमानों में प्रचलित तलाक के ऐसे भेदभावपूर्ण हैं। सुप्रीम कोर्ट 19 नवंबर 2025 को इन याचिकाओं पर सुनवाई के लिए राजी हो गया।
सुनवाई में बेनजीर ने आरोप लगाया कि उनके पति ने खुद तलाक देने के बजाय, अपने वकील से नोटिस भिजवाकर उन्हें तलाक देने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि यह तरीका इस्लामी रीति-रिवाजों और उनके अधिकारों का उल्लंघन करता है।
वकील ने कहा- पति ने दूसरी शादी कर ली, पत्नी संघर्ष कर रही
बेनजीर के वकील रिजवान अहमद ने बताया कि 11 पन्नों के तलाकनामे में पति के साइन नहीं थे। ऐसे में यह कैसे माना जाए कि तलाकनामा पति ने ही भेजा है?
