कम्युनिस्ट जिहादियों से ऐसे लड़ें,
बरेली में एक प्रसिद्ध डॉक्टर हैं, सेकुलरिज़्म से प्रभावित हैं… बरेली शहर के लिए उन्होंने एक शानदार नाट्य थियेटर दिया है,जिसका नाम #विंडरमेयर है… वर्ष में दो तीन-बार नाट्य समागम होते हैं,जिसमे ओमपुरी, रोहणी हतंगड़ी, मोहन गोखले, डॉक्टर श्रीराम लागू जैसे शानदार देश के नाट्यकलारत्न आते रहे हैं… यहीं पुस्तक मेले भी होते हैं…शहर के प्रति डॉक्टर साहब का सेकुलर होने के वाबजूद यह काफी बढ़िया योगदान है…
5-9 नवम्बर तक किताब उत्सव चल रहा है, एक किताब का विमोचन था (पहला ,दूसरा चित्र) जिसकी लेखिका है बलवंत कौर ! श्रीमती बलवंत कौर मिरांडा कालेज में प्रोफेसर है, अनेक किताबों की लेखिका है… विमोचन के बाद उन्होंने अपनी किताब का जो विस्तृत परिचय दिया तो मैं आसमान से नीचे गिर पड़ा… रोष चरम सीमा पर पहुंच गया…
लेखिका ने बताया कि विभाजन के समय सिक्ख ‘शरणार्थियों को विशेष वायदे करके भारत ‘लाया’ गया था, उन्हें सम्माजनक व्यवहार नहीं मिला ! सिक्खों को ठीक से बसाया नहीं गया ! भारत मे दलित शरणार्थियों के लिए छुआछूत के चलते अलग शिविर लगाए गए, पाकिस्तान से आये पंजाबी शरणार्थियों को ‘खरुंदी’ ( notorious) कहा गया….
लेखिका बलवंत कौर ने कहा कि पार्टीशन के दौरान ‘ औरतें ‘ सबसे ज़्यादा प्रभावित हुईं, औरतों से पूछा नहीं गया कि उन्हें पाकिस्तान में रहना है या भारत मे… विभाजन के दौरान हुए हत्याकांडों का ज़िक्र करते हुए लेखिका ने सिर्फ मुस्लिम मृतकों के उल्लेख किया,हिंदुओं का नहीं ! जबकि भारत-पाक विभाजन में मरने वाले 98 % लोग हिन्दू थे !! हिन्दू स्त्रियों पर बलात्कारों, मंन्दिरों और घरों को जलाना, लोगों को ज़िंदा फूक देने का तो लेखिका ने ज़िक्र ही नहीं किया…विश्वास मानिये कि अब्दुल सआदत मंटो का ज़िक्र हुआ… एक ऐसे बलात्कार का ज़िक्र हुआ,जिस कथा में दोषी हिन्दू बताया गया था…. मुसलमानों को शिकार दिखाया गया और सताए हुए हिंदुओं को शिकारी !
अंततः #आपके_मित्र के सब्र का बांध टूट गया… लेखक ने अनुमति ली.. और तीव्र स्वर में पूर्ण विश्वास के साथ लेखिका और उपस्थित जनसमुदाय के सामने निम्न प्रश्न रखें और लेखिका के असत्य लेखन को पूर्णतया एक्सपोज़ कर दिया !…मेरे लेखिका से प्रश्न इस प्रकार थे 👇
1.भारत-पाक विभाजन इतिहास को छात्रों की इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में स्थान क्यों नहीं दिया गया ? क्योकि इससे हिंदुओं के ऊपर अत्याचारों का इतिहास हिंदुओं तक न पहुँच जाता…
2.आपके मित्र ने मय प्रूफ बताया कि विभाजन के दौरान पाकिस्तान से पलायित होकर आये दलित हिंदुओं के लिए कोई अलग शिविर नहीं लगाया गया, यह कहकर हिंदुओं को आपस मे तोड़ने की कोशिश की जा रही है
3.1947 में भारत मे आये शरणार्थियों का जितनी बढ़िया तरीके से rehabilitation किया गया,विश्व मे उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती है, पंजाबी शरणार्थियों को सर्वश्रेष्ठ स्थानों पर घर,खेती योग्य ज़मीनें और दुकानें तक आबंटित की गईं.. इसके विपरीत भारत से पाकिस्तान गए मुहाजिर आज भी मुहाजिर कहलाते हैं… भारत मे शरणार्थी देश के PM तक बन चुके हैं,हर क्षेत्र में आगे हैं
4.सिंध और बंगाल के शरणार्थियों पर लेखिका इसलिए खामोश हैं क्योंकि वहां मरने वाले और पलायित शरणार्थी 100%-हिन्दू थे..
5.लेखिका ने 1984 के दंगों का ज़िक्र किया था,जिसका जवाब मैंने यह कहकर दिया कि आपने कश्मीर में हुए हत्याकांडों और पलायन का ज़िक्र क्यों नहीं किया ? 1984 से पहले और बाद में खालिस्तानी आतंक का ज़िक्र आपकी किताब में क्यों नहीं है ?
6. आज भी संपूर्ण भारत में हिंदुओं के ऊपर अप्रतिम अत्याचार हो रहे हैं… उसका ज़िक्र लेखिका ने क्यों नहीं किया ?..
अच्छी बात यह रही कि लेखिका श्रीमती बलवंत कौर ने अपने लेखन की त्रुटियों और सीमाओं को स्वीकार किया… जन समुदाय, जो बड़ी खामोशी से बैठा था,अनेक लोग उठकर मेरे पास आये और उन्होंने कहा कि ” यही बात हम भी कहना चाह रहे थे,मगर हिम्मत नहीं पड़ रही थी”… एक सज्जन ने तो वाकायदा गले लगा लिया…
साथियों, सच को बगैर झिझक के सही समय पर कहना सीखिये… लेखिका द्वारा गढ़ा गया नैरेटिव…ध्वस्त हो गया…
जय श्रीराम…
