राय:आगे बढ़ते भारत के शत्रु भी बढेंगें,मित्र भी बनेंगें शत्रु
Indias Growing Economic Power Why World Uncomfortable Top Economist Sanjeev Sanyal Reveals The Secret
Indian Economy: दोस्त देश भी क्यों नहीं चाहते भारत को जगह देना? शीर्ष अर्थशास्त्री सान्याल ने बताया मानव मनोविज्ञान का खेल
शीर्ष अर्थशास्त्री संजीव सान्याल के अनुसार, भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति दुनिया को असहज कर रही है। भारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और दशक के अंत तक तीसरे स्थान पर होगा। सान्याल ने कहा कि भारत को अपनी रफ्तार धीमी नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपनी मुखरता को मापा हुआ लेकिन दृढ़ रखना चाहिए।
नई दिल्ली 23 अक्टूबर 2025 : दिग्गज अर्थशास्त्री संजीव सान्याल मानते हैं कि भारत की बढ़ती ताकत ने दुनिया की महाशक्तियों को बेचैन कर दिया है। हालांकि, भारत को अपनी बढ़ती ताकत पर लज्जित होने या अपराध बोध पालने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य के मुताबिक, भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। दशक के अंत तक दोनों पैमानों पर तीसरे स्थान पर होगा। उसका आर्थिक प्रभाव अब दुनिया के कई तय मापदंडों को बदलने की क्षमता रखता है। यह बढ़ती ताकत स्वाभाविक रूप से दूसरों को असहज करेगी। इसमें पारंपरिक सहयोगी भी शामिल हैं। जैसे एक व्यक्ति के सफल होने पर उसके दोस्त और परिवार भी असहज हो जाते हैं। वैसे ही देशों के साथ भी होता है। सान्याल ने वैश्विक असहजता के कारण अपनी गति धीमी करने के खिलाफ चेतावनी दी। इसे हार का मनोविज्ञान बताया। उन्होंने कहा कि भारत ने लंबे समय तक अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन किया। अब अपनी क्षमता के अनुसार प्रदर्शन करने पर दूसरों की असहजता सहन करनी होगी।
सान्याल ने अमेरिका के साथ हाल के टैरिफ तनाव का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि यह भारत के बढ़ते प्रभाव का स्पष्ट उदाहरण है। यह विषय भारत ने नहीं उठाया है। न ही भारत इसे बढ़ाना चाहता है। भारत का दृष्टिकोण शांत और दृढ़ रहा है। भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सलाहकार भारत के खिलाफ अपमानजनक और कभी-कभी नस्लवादी टिप्पणियां करते रहे हैं।
आ गया है व्यवहार परिवर्तन का समय
सान्याल के अनुसार, भारत के संयम का मतलब पीछे हटना नहीं है। यह अन्य बड़े देशों के व्यवहार से अलग है। उन्होंने कहा कि भारत की वर्तमान रणनीति यह है कि वह मामलों को बढ़ाए नहीं। लेकिन, साथ ही अगर उसकी मांगें उचित हैं तो वह पीछे न हटे। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर भारत हर कदम पर पीछे हटने की छवि बना लेता है तो उसे कई अन्य विषय पर भी पीछे हटना पड़ेगा।
सान्याल ने मानसिकता परिवर्तन की वकालत करते हुए कहा कि 78 सालों के स्वतंत्र जीवन में भारत कई चीजों को लेकर बहुत ज्यादा क्षमाप्रार्थी रहा है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि यह व्यवहार बदला जाए। उन्होंने जोर दिया कि भारत की मुखरता मापी हुई लेकिन दृढ़ होनी चाहिए। इसका मतलब आग में घी डालना नहीं है। अपने हित और दुनिया की एक-छठे हिस्से की जनसंख्या के हितों के लिए खड़ा होना है। उन्होंने कहा कि जो भारत के लिए अच्छा है, वह पूरी मानवता के लिए अच्छा है।
इतिहास का दिया संदर्भ
ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए सान्याल ने कहा कि हर उभरती हुई शक्ति को अपना स्थान खुद बनाना पड़ता है। जैसे ब्रिटेन को नेपोलियन से दशकों युद्ध करना पड़ा। रूसियों को अलास्का तक जीतना पड़ा। क्रीमिया में तत्कालीन महान शक्तियों का सामना करना पड़ा। जर्मन को फ्रेंको-रूसी युद्ध जीतना पड़ा। जापानियों ने 1905 में रूस हराया। अमेरिकियों को दो विश्व युद्ध जीतने पड़े। चीन ने कोरिया और वियतनाम में अमेरिका का सामना किया। सान्याल ने कहा कि भारत को भी अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का सामना करना पड़ रहा है।
शीर्ष अर्थशास्त्री ने निष्कर्ष निकाला कि भारत का लक्ष्य बिना अनावश्यक टकराव अपने सर्वोत्तम हितों में काम करना है। उन्होंने दोहराया कि भारत का अनावश्यक बात बढ़ाने या बिगाड़ने में कोई हित नहीं है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत अपने हित नहीं समझता या उनके लिए खड़ा न हो। उन्होंने कहा कि यदि उचित व्यापारिक समझौते की आवश्यकता होगी तो वे किए जाएंगे। लेकिन, वे उचित होने चाहिए और देश के लिए शुद्ध लाभ स्पष्ट रूप से सकारात्मक होना चाहिए।
दुनिया के कई तय मानक बदलेगा भारत
सान्याल ने जोर दिया कि भारत की आर्थिक स्थिति अब इतनी मजबूत हो चुकी कि वह दुनिया के कई तय मापदंड प्रभावित कर सकता है। भारत की जनसंख्या बहुत बड़ी है। इसी से वह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (नॉमिनल मामले में) और क्रय शक्ति समता (पीपीपी मामले में) के आधार पर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना है। उन्होंने भविष्यवाणी की कि दशक के अंत तक भारत दोनों पैमानों पर तीसरे स्थान पर होगा। यह आर्थिक शक्ति भारत को वैश्विक मंच पर अधिक प्रभावशाली बनाती है।
उन्होंने कहा कि यह बढ़ती शक्ति स्वाभाविक रूप से दूसरों को चौकायेगी। यहां तक कि भारत के मित्रवत देश भी भारत के बढ़ते प्रभाव से थोड़ा असहज महसूस करेंगें। सान्याल ने इसकी तुलना व्यक्तिगत संबंधों से की,जहां किसी व्यक्ति की असाधारण सफलता पर उसके अपने दोस्त और परिवार भी थोड़ा असहज हो जाते हैं। यही बात देशों में भी लागू होती है।
सान्याल ने जोर दिया कि भारत को वैश्विक असहजता से अपनी प्रगति धीमी नहीं करनी चाहिए। उन्होंने इसे ‘हार वाली दृष्टि’ कहा। उनका मानना था कि भारत ने लंबे समय तक अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन किया है। अब जब भारत अपनी क्षमतानुसार प्रदर्शन कर रहा है तो दूसरों की असहजता सहन करनी होगी। उन्हें यह नई वास्तविकता स्वीकार करने को प्रेरित करना होगा। उन्होंने कहा कि भारत को यह सब देखने को तैयार रहना होगा।
