सपा
हिन्दू राष्ट्रवादी देशभक्तों …… नमस्कार … यह पोस्ट मैं इसलिए दे रहा हूं कि आप सब लोग नेताओं के कुकृत्यों को भूल नहीं जाएं … भगवान कृष्ण भी यदुवंशी थे … दूसरी ओर ये नेता भी अपने को यदुवंशी कहते नहीं थकते हैं …
यह घटना 19 मार्च 2013 की है उत्तर प्रदेश में सपा सरकार थी और टोंटी चोर के विशेष उपमा से सुशोभित अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री था |
इटावा जिले का संतोषपुर गांव और गांव के सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति शिव कुमार बाजपेई
वे सपाई ब्राह्मण थे
शिव कुमार बाजपेई की पत्नी उर्मिला बाजपेई अपने घर में बैठी थीं
एकाएक 20 -25 आदमी उनके घर में प्रवेश करते हैं और उर्मिला बाजपेयी को लातों से मारना शुरू कर देते हैं
वे गिर जाती हैं उनका बाल और पैर पकड़ कर खींचते हुए घर से बाहर लाते हैं
उनके मुख पर कालिख पोतते हैं
उनके गले में जूतों और चप्पलों की माला पहनाते हैं और उन्हें गांव में घुमाते हैं
और जब वे दर्द और अपमान से रोते हुए अपना मुंह हथेलियों से छुपाना चाहती हैं तो उनका हाथ पीछे बांध देते हैं
आपको यह घटना अविश्वसनीय लगती होगी लेकिन इसमें एकएक शब्द उत्तर प्रदेश और देश के अन्य समाचार पत्रों का का है तारीख 20 मार्च 2013
उर्मिला बाजपेई का क्या दोष था ?
उनका कोई दोष नहीं था
घटना कुछ इस तरह थी कि उनके पति शिव कुमार बाजपेई के पड़ोस मेँ रहने वाले प्रदीप त्रिपाठी के पुत्र के साथ राज बहादुर यादव की बेटी फरार हो गई
प्रदेश में यादव शासन था और एक यादव की लड़की भागी थी
तो पुलिस को तो सक्रिय होना अनिवार्य ही था
बेटा नही मिला तो बाप ही सही
पुलिस ने प्रदीप त्रिपाठी को पकड़ मंगाया और कुछ दिन तो थाने में उन्हें बैठाकर बहुत प्रताड़ित किया और उसके बेटे का पता पूछती रही और जब वह नहीं बता पाए तो उन्हें जेल भेज दिया गया
उर्मिला बाजपेई के पति शिवकुमार का दोष बस इतना ही था कि वे प्रदीप त्रिपाठी की जमानत के लिए भागदौड़ कर रहे थे
शिव कुमार बाजपेई के सिर्फ इस गुनाह के कारण ही उनकी पत्नी उर्मिला बाजपेई के मुंह पर कालिख पोत कर चप्पलों की माला पहनाकर और हाथ पीछे बांधकर पूरे गांव में घुमाया गया और उसके बाद यादवों का झुंड पूरे गांव में घूमा और उर्मिला बाजपेयी क़ो अपमानित करता रहा
जो भी ब्राह्मण उन यादवों की भीड़ के सामने मिलता था उसे पीट-पीटकर गिरा देते थे और बेहद फूहड़ गालियां बकते हुए तथा ब्राह्मण औरतों को घर से निकालकर पूरे गांव में नंगी घुमाने की धमकी देते हुए कहते थे
गांव के प्राय: सभी ब्राह्मण परिवार घर के अंदर बंद थे भय से कांप रहे थे और बाहर यादवों का चीखचीख कर गालियां देने का क्रम चालू था
गांव के कुछ युवक हिम्मत करके पुलिस स्टेशन पहुंचे लेकिन वहां कोई सुनवाई नहीं हुई पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीँ की
यह सूचना कुछ ही देर में पूरे जिले में फैल गई और करीब आठ घंटे बाद पुलिस आईजी के आदेश पर गांव में पी.ए.सी तैनात हुई और यादवों का अत्याचार रुका
लेकिन अभी सपा छाप पुलिस का परिचय बाकी है
इतने शर्मनाक कांड के बाद ग्रामप्रधान सुशील यादव सहित कई पर नाम सहित की गई रिपोर्ट पर भी पुलिस ने एक भी गिरफ्तारी नहीं की
लेकिन पीड़ित परिवारों को सांत्वना देने गए लोगों में जिसमें ब्राह्मण सभा और परशुराम सेना के पदाधिकारी भी शामिल थे उनमें से एक दर्जन से अधिक लोगों को जेल भेज दिया गया कि इनसे शांति भंग का अंदेशा है
और आप जानते हैं शासन स्तर पर क्या हुआ ?
पीड़ित परिवारों का एक दल जीप में लदकर इटावा से लखनऊ पहुंचा और ब्राम्हण प्रतिनिधि तथा मुख्यमंत्री का विश्वासपात्र समझकर राज्य सरकार के मंत्री अभिषेक मिश्र से मिला
उस दिन 20 मार्च 2013 मेँ उत्तर प्रदेश और भारत के प्रायः सभी समाचार पत्रों में यह घटना बहुत विस्तार से छपी थी
अतःश्री अभिषेक मिश्र जी भी इससे पूरी तरह अवगत थे लेकिन मंत्री ज़ी ने यह कह कर प्रतिनिधिमंडल को लौटा दिया कि यह मुख्यमंत्री के जिले का मामला है
मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता हूँ
वही ब्राह्मण द्रोही अभिषेक मिश्र सपा में आज भी हैं
माता प्रसाद पाण्डेय भी सपा का मोहरा बना हुआ है
अयोध्या का पवन पाण्डेय सदैव अखिलेश यादव की चापलूसी में रहता है और उस क्षेत्र के सारे ब्राम्हण वोट उसी के कारण सपा को मिलते हैँ
लम्भुआ क्षेत्र का संतोष पाण्डेय भगवान परशुराम की दुहाई देकर ब्राह्मणों से वोट मांगता है
यह एक बानगी है उस जंगलराज की जब एक यादव सिपाही अपने अधिकारी दारोगा को उसका बिल्ला उतरवा लेने की धमकी देता था
आप सब को याद होगा जब हजरतगंज लखनऊ के सी.ओ अतर सिंह यादव की जिसने अपने एसएसपी को कभी सैल्यूट नहीं किया बल्कि हमेशा एसएसपी से हाथ मिलाया था
एसएसपी की भी बर्दाश्त करने की मजबूरी थी क्योंकि अतर सिंह के नाम के साथ ‘यादव’ शब्द जुड़ा हुआ था
याद कीजिये यादवी सेना ने लखनऊ के हजरतगंज में जीप की बोनट पर एक पुलिस अधिकारी को घुमाया था
वह अगर बोनट पर नही बैठ जाता तो सरेआम उसे कुचल दिया जाता
पीसीएस परीक्षाओं में आधे से ज्यादा एसडीएम यादव चुने जाते थे
सब छोड़िए
क्या आपको झांसी की घटना याद है ?
अखिलेश यादव के ही कार्यकाल का है 20 जनवरी 2014 को क्षेत्र के जाने-माने भाजपा नेता बृजेश तिवारी अपनी पत्नी अपने बेटे और भतीजे के साथ जा रहे थे
एक स्थानीय सपा नेता तेजपाल यादव के नेतृत्व में करीब एक दर्जन सपाइयों ने उन्हें घेर लिया और बृजेश तिवारी सहित उनके पूरे परिवार को भून डाला था
पूरे शहर में मातम छा गया
हत्या की रिपोर्ट लिखी गई
तत्कालीन पुलिस एसपी अपर्णा गांगुली के नेतृत्व में पुलिस ने तेज कार्यवाही की और पुलिस ने शीघ्र ही हत्या में प्रयुक्त हथियार सहित मुख्य अभियुक्त तेजपाल यादव को गिरफ्तार कर लिया
एसपी अपर्णा गांगुली ने प्रेस को बताया कि साक्ष्य तो यही मिल रहे हैं कि हत्या राजनीतिक कारणों से की गई है
11 हमलावरों में से 8 को पहचान लिया गया और एक तेजपाल यादव को गिरफ्तार कर लिया गया है लेकिन अभी तो सरकार का जातिवादी रूप आना शेष था
पुलिस डीजीपी को ऊपर से निर्देश दिया गया और लखनऊ में डीजीपी रिजवान अहमद ने बयान दिया कि “बृजेश तिवारी और उनके परिवारजनों की हत्या में समाजवादी पार्टी के किसी भी नेता या कार्यकर्ता का हाथ नहीं था”
इस बयान पर हालांकि तमाम अखबार और राजनैतिक दल डीजीपी रिजवान अहमद पर टूट पड़े
तमाम अखबारों ने लिखा कि झांसी की पुलिस अधीक्षक ने जब जांच कर सपा नेता और मुख्य अपराधी तेजपाल यादव को हथियार सहित गिरफ्तार कर लिया है और 11 में से 8 सपा कार्यकर्ताओं की पहचान भी कर ली है तो लखनऊ में बैठकर डीजीपी कैसे कह सकते हैं कि वारदात में समाजवादी पार्टी के लोग शामिल नहीं हैं ?
टाइम्स ऑफ इंडिया ने तो यहां तक लिखा था कि श्री रिजवान अहमद खान एक पुलिस अधिकारी की तरह नहीं बल्कि राजनीतिक निष्ठा के अनुसार कार्य कर रहे हैं
लेकिन डीजीपी रिजवान अहमद खान का बयान ही उस का एक तरह से आदेश था और बृजेश तिवारी और उनके पूरे परिवार की हत्या के सभी आरोपी छोड़ दिए गए
और समाजवादी पार्टी को इसका नतीजा भी मिला
याद होगा कि एकबार सपा. ज़िलों जिलों में हर जिले मेँ ब्राह्मण सम्मेलन करवा रही थी
ऐसा ही एक सम्मेलन झांसी में भी आयोजित किया गया
लेकिन बृजेश तिवारी हत्याकांड और उसमें हुए जातीय पक्षपात से आहत झांसी के ब्राह्मणों ने सपाके उस आयोजन के बहिष्कार का निर्णय लिया
और उस आयोजन में जिले के स्वाभिमानी ब्राह्मणों में से एक भी ब्राह्मण नहीं पहुंचा इसलिए उन्हें यह आयोजन रद्द करना पड़ा था
कहीं भी कोई भी मुख्यमंत्री होगा उसकी कोई जाति भी होगी
यादव जाति के लोगों द्वारा इटावा के संतोषपुर जैसी घटना का कोई दूसरा उदाहरण देश में नहीँ मिलेगा ?
जहां एक निर्दोष सम्भ्रांत महिला को बिना किसी दोष के मुंह काला करके जूतों की माला पहना कर गांव में घुमाया गया हो और पुलिस ने कोई कार्यवाही नही की हो यह अखिलेश यादव के राज में ही संभव है
निर्णय आपका है
आप क़ो सपाई ब्राह्मण बनकर अपने घरो की महिलाओं को सरेआम बीच बाजार नंगा कालिख पुतवाना है या सपरिवार गोलियों से भुनवा डालना है
या
उत्तर प्रदेश के हित मे निष्ठा के साथ वोट करना है जिससे ऐसे आतताइयों को सत्ता का राजसिंहासन कभी नसीब ना हो
ये दोनों घटनाएं इस देश के लोकतंत्र पर कलंक हैं … क्या हम सभी मिलकर ऐसे अपराधिक मानसिकता के नेताओं को स्थाई रूप से सत्ता से बाहर कर सकते हैं ? क्या चुनाव आयोग एवं सुप्रीम कोर्ट ऐसे नेताओं से देश को मुक्ति दिलाने में सक्षम हैं ? डॉक्टर साहब के वॉल से साभार
