केजरीवाल-सिसोदिया को छोड़ेगी नहीं CBI, दिल्ली HC में गिनाई ट्रायल कोर्ट की गलतियां
दिल्ली आबकारी नीति मामले में सीबीआई ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपितों को छोडने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है. एजेंसी ने आरोप लगाया कि जज ने ‘मिनी ट्रायल’ चला प्रमाण त्रुटिपूर्ण ढंग से परखे. सुनवाई 9 मार्च को होगी।
नई दिल्ली 05 मार्च 2026। दिल्ली की चर्चित आबकारी नीति मामले में नया मोड़ आ गया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने दिल्ली आबकारी नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपित छोडने के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दे राउज एवेन्यू कोर्ट के फैसले में गंभीर कमियां बताई .
सीबीआई ने अपनी अपील में कहा कि विशेष न्यायाधीश जीतेंद्र सिंह ने मामले में ‘मिनी ट्रायल’ चला दिया और एजेंसी के प्रमाण पूरी तरह समझे बिना आदेश कर दिया. एजेंसी ने यह भी कहा कि जज ने अभियोजन पक्ष के मामले को विशेष ढंग से पढ़ पूरा षड्यंत्र समग्र रूप से नहीं देखा.
मामला 2021-22 की दिल्ली की नई आबकारी (शराब) नीति से जुड़ा है, जो बाद में वापस ले ली गयी थी. सीबीआई का आरोप है कि नीति बनाते समय जानबूझकर ऐसे बदलाव किए गए, जिनसे कुछ निजी कंपनियों को फायदा पहुंचे और बदले में आर्थिक लाभ लिया गया.
ट्रायल कोर्ट ने क्या कहा था?
राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश जीतेंद्र सिंह ने 27 फरवरी के अपने आदेश में कहा था कि सीबीआई के प्रस्तुत प्रपत्रों और साक्ष्यों से पहली नजर में भी कोई ठोस मामला नहीं बनता. उन्होंने स्पष्ट कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री किसी भी आरोपित पर गंभीर संदेह तक पैदा नहीं करती.
जज ने कहा कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई प्रमाण नहीं दे पाया, जिससे आरोपितों पर मुकदमा चलाया जा सके. उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि बड़े षड्यंत्र की प्रस्तुत थ्योरी उपलब्ध साक्ष्यों की जांच में टिक नहीं पाती. इसी आधार पर सभी 23 आरोपित आरोपों से मुक्त कर दिये गये.
सीबीआई की अपील में क्या कहा गया?
सीबीआई ने फैसले के खिलाफ 974 पन्नों की विस्तृत अपील की है. एजेंसी का कहना है कि विशेष न्यायाधीश ने आरोप तय करने के शुरुआती चरण में ही ‘मिनी ट्रायल’ चला दिया और मामले के हर हिस्से का विस्तृत विश्लेषण कर दिया, जबकि इस स्तर पर केवल यह देखना था कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं.
सीबीआई के अनुसार, जज ने अभियोजन का पूरा मामला एक साथ देखने के बजाय अलग-अलग हिस्सों में बांटकर देखा. एजेंसी का आरोप है कि फैसले में अभियोजन के प्रमाण विशेष ढंग से पढ़ उन तथ्यों से आंख बंद कर ली गयी, जो आरोपितों की भूमिका दर्शाते थे.
सीबीआई ने यह भी कहा कि जज ने जांच एजेंसी और जांच अधिकारी पर अनुचित और समझ से परे प्रतिकूल टिप्पणियां कीं हैं।
शराब नीति में बदलाव को लेकर गंभीर आरोप
सीबीआई के अनुसार 2021-22 की आबकारी नीति में बदलाव सामान्य प्रशासनिक फैसले नहीं थे. नीति में थोक व्यापार निजी हाथों में सौंपने का फैसला कर मुनाफे का मार्जिन 5% से बढ़ाकर 12% किया गया. साथ ही टर्नओवर की शर्तों में भी ढील दी गई, जबकि विशेषज्ञों ने पहले की व्यवस्था बनाए रखने की सलाह दी थी.
सीबीआई के अनुसार यह सब पहले से तय ‘क्विड प्रो क्वो’ यानी लेन-देन योजना का हिस्सा था. उसके पास वरिष्ठ नौकरशाहों के बयान और डिजिटल साक्ष्य हैं, जो संकेत देते हैं कि नीति खास तरीके से तैयार की गयी.
अपील में कहा गया है कि नीति तैयार करने से लेकर रिश्वत की रकम के इस्तेमाल तक एक सतत आपराधिक षडयंत्र चला. सीबीआई का दावा है कि अवैध धन का इस्तेमाल गोवा विधानसभा चुनाव में किया गया.
जज जितेंद्र सिंह ने आदेश में कहा था कि गोवा चुनाव से जुड़े आरोप अधिकतर अनुमान और धारणाओं पर आधारित हैं, न कि ठोस कानूनी साक्ष्यों पर.
जज पर उठाए गए सवाल
सीबीआई ने अपनी अपील में कहा है कि विशेष न्यायाधीश ने षड्यंत्र के मूल आधार से आंखें बंद कर छोटे-छोटे विरोधाभासों पर अधिक ध्यान दिया. जज ने आरोपितों की भूमिका अपनी अलग समझ के आधार पर परिभाषित की, जो अभियोजन के प्रस्तुत मामले से अलग थी.
सीबीआई ने यह भी कहा कि आरोप तय करने के चरण में कानून की जो सीमाएं और सिद्धांत लागू होते हैं, उनका सही से पालन नहीं किया गया. एजेंसी का दावा है कि फैसला ‘स्पष्ट रूप से गलत, विधि विरूद्ध और तथ्यों की गलत व्याख्या पर आधारित’ है.
अपील में सीबीआई ने यह भी कहा कि षड्यंत्र उच्च राजनीतिक स्तर पर रचा गया था. नीतिगत ढांचे में जानबूझकर बदलाव किए गए, ताकि निजी होलसेल व्यवस्था लागू हो और कुछ कंपनियों को फायदा मिले.
सीबीआई का कहना है कि नीतिगत बदलाव सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं थे, बल्कि पहले से तय लेन-देन आगे बढ़ाने को मौलिक कदम थे, जिनमें दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेताओं की भूमिका थी.
अब आगे क्या?
सीबीआई ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने उसी दिन दिल्ली हाईकोर्ट गई. हाईकोर्ट अपील 9 मार्च को सुनेगा.
हाईकोर्ट को लगता है कि ट्रायल कोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या कर पर्याप्त आधार होते हुए भी आरोप तय नहीं किए गए, तो मामला दोबारा ट्रायल को भेजा जा सकता है. वहीं, यदि हाईकोर्ट ट्रायल कोर्ट का फैसला सही मानता है, तो आरोपितों को मिली राहत बनी रहेगी.

