उत्तराखंड में अब तेंदुओं का भय, 3 माह 10 मौतें
- उत्तराखंड के कई इलाकों में इंसान और जंगली जानवरों के बीच बढ़ते संघर्ष से दोनों तरफ जान जा रही. दहशत के चलते स्कूल किए जा रहे बंद और गांवों से पलायन हो रहा तेज
उत्तराखंड की बदलती वन्यजीव पारिस्थितिकी
29 अप्रैल 2026 शाम नैनीताल जिले के भीमताल-भवाली मार्ग पर खुटानी के पास एक तेंदुआ अचानक पहाड़ी से छलांग लगाकर सड़क पर आ गया और तेज रफ्तार बाइक से टकराकर उसके पहिए में जा फंसा.
बाइक सवार किसी तरह जान बचाकर भागे. घंटों तेंदुआ खुद को छुड़ाने की कोशिश करता रहा. आखिरकार वन विभाग की टीम ने उसे ट्रेंक्वलाइज कर रानीबाग रेस्क्यू सेंटर भेजा. यह इस तरह की कोई अकेली घटना नहीं थी.
यह उत्तराखंड की बदलती वन्यजीव पारिस्थितिकी की तस्वीर थी जहां जंगल और मानव बस्तियों के बीच सीमाएं तेजी से मिट रही हैं. पौड़ी गढ़वाल के कमांद गांव में 60 वर्षीय महेश चंद्र मलासी 15 मई को रोज की तरह मवेशियों का घास लेने खेतों की ओर गए थे. देर रात उनका क्षत-विक्षत शव झाड़ियों में मिला. ग्रामीणों का आरोप था कि इलाके में लंबे समय से गुलदार की गतिविधियां बढ़ रही थीं लेकिन वन विभाग ने समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया.
उत्तराखंड की विधानसभा में रखे गए सरकारी आंकड़े संकट की भयावहता और स्पष्ट करते हैं. राज्य गठन के बाद से जनवरी 2026 तक वन्यजीव हमलों में 1,296 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 6,624 लोग घायल हुए हैं. यानी औसतन हर सप्ताह एक व्यक्ति वन्यजीव संघर्ष में अपनी जान गंवा रहा है. सबसे ज्यादा 543 मौतें तेंदुओं के हमलों में हुईं. हाथियों के हमलों में करीब 230 लोग मारे गए जबकि बाघों ने 106 लोगों की जान ली.
सबसे चिंताजनक संकेत 2026 के शुरुआती महीनों के आंकड़े दे रहे हैं. जनवरी से मार्च 2026 के बीच राज्य में 118 से ज्यादा हमले अंकित हुए जिनमें 20 मौतें हुई. इनमें लगभग आधी मौतें अकेले बाघों के हमलों में हुईं. वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2026 में बाघों के हमलों का ‘स्ट्राइक रेट’ 100 प्रतिशत रहा. यानी जिस व्यक्ति पर हमला हुआ, वह जीवित नहीं बचा. कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, रामनगर और नैनीताल वन प्रभाग इस संघर्ष के सबसे बड़े केंद्र बनकर उभरे हैं. जुलाई 2022 में कॉर्बेट के ढिकाला मार्ग पर बाइक से लौट रहे दो युवकों पर बाघ ने हमला कर दिया था. पीछे बैठे युवक को बाघ जबड़ों में दबाकर जंगल की ओर ले गया जबकि उसका साथी सड़क पर चीखता-चिल्लाता रह गया.
अब हालात ये हैं कि गांवों में सामान्य जीवन तक प्रभावित होने लगा है. पौड़ी जिले के कमंद गांव में गुलदार के हमले के बाद 15 स्कूल बंद करने पड़े. प्रशासन ने आदमखोर घोषित गुलदार को देखते ही गोली मारने के आदेश जारी कर दिए. दिसंबर 2025 में भी पौड़ी के 55 स्कूल गुलदार के डर से बंद किए गए थे. बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूलों के समय तक बदलने पड़े. नैनीताल जिले में अप्रैल 2026 में भीमताल और हल्द्वानी के आसपास 100 से ज्यादा स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र बंद कर दिए गए. वजह थी वह आदमखोर तेंदुआ जिसने दो महीने में आठ लोगों को अपना शिकार बनाया था.
यह संघर्ष आखिर इतना भयावह क्यों होता जा रहा है? विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण गिनाते हैं. सबसे बड़ा कारण है जंगलों का सिकुड़ना और वन्यजीव गलियारों का खत्म होना. उत्तराखंड में पिछले दो दशकों में सड़क, होटल, रिजॉर्ट, रेल परियोजनाओं और शहरी विस्तार में तेजी आई है. जंगलों के भीतर तक इंसानी दखल बढ़ा है. वन्यजीवों के पारंपरिक रास्ते टूट गए हैं. परिणामस्वरूप जानवरों और इंसानों का आमना-सामना बढ़ता जा रहा है.
दूसरा बड़ा कारण है पलायन. पहाड़ों से लाखों लोग शहरों की ओर जा चुके हैं. खाली पड़े घर और वीरान गांव अब जंगली जानवरों की शरणस्थली बनते जा रहे हैं. मई 2023 में पिथौरागढ़ के सिलपाटा गांव में एक खंडहर मकान के भीतर तेंदुए के तीन शावक मिले थे. यह घटना बताती है कि जंगली जानवर अब इंसानी बस्तियों को भी सुरक्षित आश्रय समझने लगे हैं. ग्रामीण विकास एवं पलायन निवारण आयोग ने भी स्वीकार किया है कि जंगली जानवरों का आतंक पलायन की बड़ी वजह बन रहा है. आयोग के अध्यक्ष एस.एस. नेगी ने माना कि आबादी वाले इलाकों में वन्यजीवों की बढ़ती मौजूदगी से लोगों का पलायन बढ़ा है.
लेकिन सबसे दिलचस्प वजह जॉय हुकिल बताते हैं. अब तक 49 नरभक्षी तेंदुओं को ढेर करने वाले हुकिल ने तेंदुओं के बदलते आचरण पर बारीकी से गौर किया है. वे बताते हैं, ”पिछले कुछ सालों में तेंदुओं ने बस्तियों के आसपास की झाड़ियों में ही बच्चे देने शुरू कर दिए. उन बच्चों ने असली जंगल कभी देखा ही नहीं. वे बड़े होकर बस्ती में होने वाले सामूहिक नाच-गानों से मनोरंजन करने लगे हैं.”
उत्तराखंड के कई गांवों की ज्यादातर जनसंख्या रोजगार की तलाश में पलायन कर गई है और गांव वीरान हैं।
तीसरा कारण है वन्यजीवों की बदलती संख्या और जंगल का आंतरिक संघर्ष. 2022 की गणना के अनुसार उत्तराखंड में 560 बाघ हैं. भारतीय वन्यजीव संस्थान की 2024 की रिपोर्ट में राज्य में 652 तेंदुए कम मिले. वैसे, हुकिल का कहना है, ”सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें मगर तेंदुओं की संख्या 5,000 से कम नहीं है.”
विशेषज्ञों का कहना है कि जहां बाघों की संख्या बढ़ती है वहां तेंदुए अपना क्षेत्र छोड़कर मानव बस्तियों की तरफ खिसकने लगते हैं क्योंकि बाघ अपने क्षेत्र में दूसरा शिकारी सहन नहीं करते. यानी जंगल के भीतर का शक्ति संतुलन बिगड़ने का असर सीधे गांवों पर पड़ रहा है.
संघर्ष का असर सिर्फ इंसानी जान पर नहीं, बल्कि खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है. जंगली सूअर, बंदर और लंगूर फसल बर्बाद कर रहे हैं. तेंदुए मवेशियों को उठा ले जाते हैं. लोग खेतों में काम करने से डरने लगे हैं. परिणामस्वरूप खेती की जमीनें बंजर होती जा रही हैं.
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, संघर्ष में सबसे ज्यादा शामिल 3 से 7 वर्ष के युवा बाघ और तेंदुए होते हैं जो अधिक आक्रामक होते हैं. 2010 के बाद से जंगली जानवरों का आतंक तीन-चार गुना बढ़ा है. यही वजह है कि पिछले 12-14 वर्षों में 7 से 10 प्रतिशत तक पलायन बढ़ने की बात कही जा रही है.
लेकिन यह संघर्ष सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, वन्यजीवों के अस्तित्व को भी खतरनाक होता जा रहा है. उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित राजाजी से लगे क्षेत्र में 18 और 19 मई को एक के बाद एक कर मिले दो बाघ बाघिनों के शव भी इसी संघर्ष का परिणाम माने जा रहे. गुर्जरों ने इन दोनों बाघों से उनकी भैंस मारने का बदला लेने को भैंस के शव पर जहर छिड़ककर उन्हें मारने की योजना बनाकर लेना चाहा. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2000 से 2020 के बीच संघर्ष में 1,396 तेंदुओं की भी मौत हुई. कई मामलों में जानवरों को जहर देकर मारा गया या फंसाकर खत्म कर दिया गया.
नैनीताल जिले में बाइक के पहिए में फंसा तेंदुआ, जिसे वन विभाग के कर्मचारियों ने किया रेस्क्यू
गढ़वाल के सांसद अनिल बलूनी ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से मिलकर इस संघर्ष के कारणों पर विस्तृत अध्ययन कराने की मांग की है. राज्य का 65 प्रतिशत हिस्सा जंगलों से ढका है. राज्य में 12 राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य हैं जो 13,800 वर्ग किलोमीटर में फैले हैं. लाखों ग्रामीण आज भी लकड़ी, घास और चारे को जंगलों पर निर्भर हैं. यानी इंसान और जंगल का रिश्ता यहां खत्म नहीं हो सकता. असल चुनौती संतुलन बनाने की है. एक तरफ बाघों और तेंदुओं का संरक्षण राष्ट्रीय प्राथमिकता है. दूसरी तरफ गांवों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा और आजीविका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. अगर ग्रामीणों को लगेगा कि वन्यजीव संरक्षण उनकी जान पर भारी पड़ रहा है तो संरक्षण के खिलाफ सामाजिक गुस्सा बढ़ेगा.
• इंसान-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति उत्तराखंड में कितनी गंभीर है?
हमारा राज्य बाघ संरक्षण से लेकर वन्यजीवों के बड़े स्केल पर संरक्षण से जुड़ा है. उत्तराखंड देश में दूसरी सबसे ज्यादा बाघों की संख्या वाला राज्य है. यह हमारे लिए सुखद तो है मगर इसके नतीजे इंसान-वन्यजीव संघर्ष के रूप में भी सामने आते हैं. इसको लेकर राज्य में ‘ह्यूमन वाइल्डलाइफ कन्फ्लिक्ट मिटिगेशन सेल’ गठित किया गया है, जो वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर संवेदनशील क्षेत्र पहचानता है. राज्य में 13800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के 12 राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य हैं. इसके अलावा, वन्यजीव गलियारों से संरक्षित क्षेत्रों को आपस में जोड़ना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है.
• इस बढ़ते संघर्ष का मुख्य कारण क्या है?
जंगली जानवर भोजन, शिकार और पानी की तलाश में मानव बस्तियों और ग्रामीण इलाकों की ओर भटक रहे हैं.
• सरकार इस संघर्ष घटाने को क्या कर रही?
सरकार और वन विभाग सोलर फेंसिंग, सेंसर-आधारित अलर्ट सिस्टम, और नसबंदी केंद्रों (बंदरों को) जैसी आधुनिक तकनीकें उपयोग कर रही है. साथ ही, भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से मानव-वन्यजीव संघर्ष की गहन समझ को बाघों और दूसरे वन्यजीवों की गणना और कर्मचारियों की ट्रेनिंग करवा रही है. हॉटस्पॉट मैपिंग, त्वरित प्रतिक्रिया टीमों की तैनाती और वन्यजीव गलियारों के संरक्षण पर काम जारी है. गुलदार प्रभावित क्षेत्रों में ‘लिविंग विद लेपर्ड’ जैसे व्यवहार परिवर्तन कार्यक्रमों से जागरूकता फैलाई जा रही है.
• इस समस्या को कम करने को लेकर आपके क्या सुझाव हैं?
बस्तियों और गांवों के बाहर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर अधिक ध्यान रखने की जरूरत है. अमूमन कचरे के ढेरों के आसपास भी भालू या अन्य जानवरों का आना-जाना देखा गया है.
• कुछ अध्ययन बता रहे कि बाघों और हिंसक तेंदुओं की प्रकृति बदल रही है.
वन्यजीवों के स्वभाव में परिवर्तन आ रहा है. सावधानी बरतते हुए इस स्थिति के बीच रहना सीखना होगा. इसके लिए प्रे-बेस को बढ़ावा देने के लिए सावधानी बरती जा रही है. बाघों और तेंदुओं को उनका प्रे-बेस मिलता रहे तो वे बस्तियों की ओर नहीं आएंगे. इकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच में सामंजस्य बनाना जरूरी है.
उत्तराखंड में मानव वन्यजीव संघर्ष
उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक गंभीर और लगातार बढ़ती समस्या है। जंगलों के निकटवर्ती क्षेत्रों में गुलदार (तेंदुए), बाघ, हाथियों और भालुओं के हमले आम हो गए हैं, जिससे जान-माल का भारी नुकसान होता है और कई ग्रामीण अपने घर छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं।
📌 प्रमुख कारण और मुख्य बिंदु
जनसंख्या और विस्तार: उत्तराखंड के जंगलों में गुलदारों (2,000 से अधिक), हाथियों (लगभग 234) और बाघों (लगभग 560) की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे उनका प्राकृतिक आवास कम पड़ रहा है।
प्रमुख प्रभावित क्षेत्र: पौड़ी, टिहरी, कॉर्बेट नेशनल पार्क के आसपास के गांव और तराई-भाबर के इलाके इस संघर्ष का सबसे ज्यादा दंश झेल रहे हैं।
आंकड़े: सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2000 से अब तक (2026) राज्य में 900 से अधिक लोग मानव-वन्यजीव संघर्ष में जान गंवा चुके हैं। इनमें अकेले गुलदार के हमले में 500 से अधिक लोगों की मौत हुई है।
फसलों का नुकसान: केवल बड़े जानवर ही नहीं, बल्कि जंगली सूअर और बंदर भी किसानों की आजीविका और फसलों को बड़े पैमाने पर नष्ट कर रहे हैं।
🛡️ सरकार और प्रशासन द्वारा उठाए गए कदम
विशेष सेल का गठन: बढ़ते हमलों से निपटने के लिए वन विभाग ने मुख्यालय स्तर पर एक विशेष ‘सेल’ का गठन किया है।
मुआवजा नीति: राज्य सरकार द्वारा मृतकों के परिजनों को ₹10 लाख का मुआवजा और घायलों के इलाज का सारा खर्च उठाने की सुविधा दी गई है।
शमन कक्ष (Mitigation Cell): भारत का पहला मानव-वन्यजीव संघर्ष शमन कक्ष उत्तराखंड में ही स्थापित किया गया है, ताकि त्वरित बचाव और राहत कार्य सुनिश्चित हो सकें।
हेल्पलाइन: संघर्ष की घटनाओं की रिपोर्ट करने और मदद मांगने के लिए वन विभाग द्वारा विशेष हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए गए हैं।
मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने के लिए उत्तराखंड वन विभाग ने वर्ष 2011 से दो गैर-सरकारी संस्था तितली ट्रस्ट और वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी– इंडिया (डब्ल्यूसीएस-इंडिया) के सहयोग से काम शुरू किया।
आठ साल पहले
उत्तराखंड का तेंदुआ-मानव संघर्ष इतना ख़तरनाक क्यों हुआ है ?
तेंदुआ-मानव संघर्ष
“वो 4 अक्टूबर, 2015 की शाम थी. मैं अपने 9 साल के बच्चे को लेकर घर से निकली ही थी कि तभी एक तेंदुए ने अचानक मेरे बच्चे पर झपट्टा मारा और उसे लेकर झाड़ियों में घुस गया. मैं तेंदुए के पीछे-पीछे भागी लेकिन तब तक तेंदुआ मेरे बच्चे को लेकर बहुत दूर निकल गया.”
उत्तराखंड के पहाड़ों में बसे श्रीनगर ज़िले के फरासू गांव में रहने वाली प्रमिला देवी आज भी इस घटना को याद करके सहम जाती हैं.
कांपती हुई आवाज़ में बताती हैं, “मैंने पूरी ताकत लगा दी, लेकिन मैं अपने बाबू को नहीं बचा सकी.”
उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों की ऊंची-नीची पगडंडियों पर चलते-चलते आपको ऐसी तमाम दर्दभरी दास्तान सुनने को मिलेंगी जो तेंदुओं के हमले से जुड़ी होती हैं.
तेंदुआ-मानव संघर्ष
तस्वीर में अपन बेटा खो चुकी प्रमिला देवी ठीक उसी जगह खड़ी हैं जहां से तेंदुआ उनका बच्चा लेकर नदी की तरफ चला गया था.
ये एक ऐसी समस्या है जो उत्तराखंड के जीवन, जीविका और समाज को सीधे तौर पर प्रभावित करती है.
उत्तराखंड के गांवों में रहने वाले लोग तेंदुओं के आतंक की वजह से अपने गांव छोड़कर शहरी इलाकों में बसने लगे हैं.
इससे तेंदुओं के उत्तराखंड के शहरों तक पहुंच बेहद आसान हो गई है और ये संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है.
उत्तराखंड सरकार और केंद्रीय संस्थाएं इसके समाधान के लिए अच्छा ख़ासा धन खर्च कर चुकी हैं.
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समाप्त
लेकिन इसके बावजूद समस्या का समाधान नहीं मिला बल्कि ये अपने विकराल रूप में पहुंचती हुई दिख रही है.
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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में दम तोड़ती खेती
उत्तराखंड के जंगलों में किन वजहों से फैली आग?
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मानव-तेंदुआ संघर्ष शुरू कैसे हुआ?
उत्तराखंड वन विभाग से लेकर वन्य जीवन पर शोध करने वाले विशेषज्ञों के पास इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब नहीं है.
हालांकि, मशहूर लेखक और शिकारी जिम कॉर्बेट ने अपनी किताब ‘द मैन ईटर ऑफ़ रुद्रप्रयाग’ में लिखा है कि 20वीं सदी में उत्तर भारत में हैज़ा और वॉर फीवर नाम की बीमारी फैलने की वजह से कई लोग मारे गए.
संक्रामक रोग की वजह से मरने के कारण ऐसी लाशों का अंतिम संस्कार पारंपरिक रीति से नहीं होता था.
जिम कॉर्बेट अपने शिकार के साथइमेज स्रोत,bristol.ac.uk
ऐसी लाशों के मुंह में एक जलता कोयला डालकर (शव को जलाने प्रक्रिया के प्रतीक के स्वरूप) उन्हें पहाड़ी से नीचे फेंक दिया जाता था.
इसके बाद जब ये शव खाई या जंगल में गिरते तो तेंदुए इनका मांस खा लेते, इस तरह इस जानवर के आदमखोर बनने की प्रक्रिया शुरू हो गई.
कार्बेट लिखते हैं असल समस्या तब शुरू हुई जब संक्रामक बीमारी का असर कम होने लगा और जंगलों में पहुंचने वाले शवों की संख्या भी कम होने लगी.
तब तक आदमखोर बन चुके तेंदुओं ने जंगलों को छोड़कर पहाड़ी गांवों का रुख शुरू किया.
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छह सप्ताह के आतंक के बाद आदमखोर बाघिन ढेर
उत्तराखंड के हज़ारों गांवों में वोटर्स ही नहीं
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तेंदुआ-मानव संघर्ष शुरू क्यों होता है?
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें मांसाहारी जानवरों के इंसानों के साथ संघर्ष के इतिहास को समझना होगा.
जिम कॉर्बेट ने अपनी किताबों में उत्तर भारत में तेंदुए और मानव के बीच संघर्ष को विस्तार से बयां किया है.
म्यांमारइमेज स्रोत,KEYSTONE
ये संघर्ष बिग कैट की श्रेणी में आने वाले मांसाहारी जानवरों को एक सूत्र में पिरोता है.
दरअसल, इन सभी जानवरों में आदमखोर होने की प्रक्रिया एक समान है.
जर्मन बायोलॉजिस्ट मेनफ्रेड वाल्ट अपने लेख ‘थ्रो वुंड्स एंड ओल्ड ऐज़’ (पेज़ नंबर 168) में द्वितीय विश्वयुद्ध की घटना का ज़िक्र करते हैं.
वो लिखते हैं कि इन जीवों के आहार से जुड़ी आदतों पर नज़र डाली जाए तो पता चलता है कि बाढ़, तूफ़ान और युद्ध के दौरान मिली मानव लाशों के मिलने पर ये उन्हें खा लेते हैं.
उत्तराखंड बाढ़
इमेज कैप्शन,साल 2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ से हज़ारों लोगों की जान गई थी.
आदमखोर बने जानवर जानबूझकर इंसानों पर हमला करने लगते हैं.
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर की घटना का उल्लेख करते हुए वो समझाते हैं, “द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1942 के जनवरी महीने में लगभग एक लाख भारतीयों को बर्मा से भारत लाया जा रहा था तो करीब चार हज़ार भारतीय जंगल और दुर्गम पहाड़ी रास्तों की वजह से तौंगुप दर्रे में ही मर गए.”
“इस इलाके के बाघ इन लोगों की लाशें खाकर आदमखोर हो गए. इस बात का पता तब चला जब फ़रवरी 1946 में अमरीकी सेना की पश्चिमी अफ़्रीकी सैनिकों वाली 14 सैन्य टुकड़ियों ने तौंगुप पास से होकर ही बर्मा में प्रवेश किया. जंगल में मौजूद बाघों ने सैनिकों पर हमला बोल दिया.”
बर्मा केंपेनइमेज स्रोत,Keystone
“ये घटना कोई अपवाद नहीं है. ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मानव और बिग कैट के बीच संघर्ष के ऐसे मामले देखने को मिले. समस्या का मॉडल वही है जो कॉर्बेट ने बताया था, बस घटनाओं के साल और जगह के नाम बदल जाते हैं.”
कॉर्बेट और वाल्ट जैसे कई विशेषज्ञ इस विषय पर शोध करने के बाद इस नतीज़े पर पहुंचे कि इन मांसाहारी जानवरों के लिए बड़ी संख्या में इंसानी लाशों की उपलब्धता इनके आदमख़ोर होने की बड़ी वजह के रूप में सामने आती है.
तेंदुआ-मानव संघर्षइमेज स्रोत,Getty Images
लेकिन वन्यजीवों के हितों की बात करने वाले लोग इसके उलट वजह बताते हैं. वे कहते हैं कि जब मानव ने जानवरों के प्राकृतिक आवास में अतिक्रमण शुरू किया तब मानव और जानवरों के बीच संघर्ष शुरू हुआ.
वैसे, टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट में वाइल्डलाइफ़ एक्टिविस्ट एजी अंसारी कहते हैं कि उत्तराखंड में आदमखोर जानवरों की संख्या बढ़ने की वजह शिकार की कमी और जंगलों का दोहन भी है.
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आदमखोर बाघिन का कैसे किया गया शिकार?
बकरी के लिए बाघ से भिड़ी लड़की, फिर ली सेल्फ़ी
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शिकार की कमी आदमखोर बनाती है?
इन सब बातों के बीच वरिष्ठ पत्रकार और मानव-तेंदुआ संघर्ष पर कई सालों से रिपोर्टिंग कर रहे अरविंद मुद्गल एक और वजह की तरफ हमारा ध्यान ले जाते हैं.
वो कहते हैं, “कुछ लोग ये कहते हैं कि उत्तराखंड से जंगल ख़त्म हो रहे हैं. ये बात ग़लत है. बीते कई सालों से उत्तराखंड में पलायन का दौर जारी है. इसकी वजह से पहाड़ों में खेती करने वाले लोग अपने खेत छोड़कर शहरों की ओर बढ़ रहे हैं.”
“पहाड़ी खेतों के खाली होने की वजह से वहां नया जंगल बन रहा है जिसे सैकेंडरी जंगल कहते हैं. ऐसे में तेंदुओं के आदमखोर होने के लिए जंगलों के दोहन को दोष कैसे दिया जा सकता है. इसके साथ ही शिकार किए जाने वाले जानवरों की संख्या में भी कमी नहीं हुई है. फिर, इस बात का क्या मतलब है.”
तेंदुआ-मानव संघर्षइमेज स्रोत,Getty Images
ऐसे में सवाल उठता है कि शिकार में कमी नहीं होने की स्थिति में भी तेंदुआ इंसान को अपना शिकार क्यों बनाता है.
भारतीय वन्य जीव संस्थान से जुड़े शोधार्थी डॉ. दीपांजन नाहा इसकी एक दिलचस्प वजह बताते हैं.
वो कहते हैं, “तेंदुआ एक स्केवेंजर प्राणी है जो मांस के ऊपर निर्भर रहता है. वो जानवरों का शिकार करता है. अगर उसे आसानी से शिकार मिले तो वह उसे ही तरजीह देता है.”
विशेषज्ञ ये भी बताते हैं कि मांसाहारी जानवरों में इंसानों का मांस खाने की आदत पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार बढ़ती जाती है.
तेंदुआ-मानव संघर्ष
इस बात को आसान शब्दों में कुछ यूं समझा जा सकता है.
अगर एक आदमखोर मादा तेंदुआ इंसान का शिकार करती है तो उसके बच्चे भी उस शिकार का सेवन करते हैं.
ऐसे में इन बच्चों की ज़ुबान को शुरुआत में ही इंसानी ख़ून का स्वाद मिल जाता है.
तेंदुआ-मानव संघर्षइमेज स्रोत,Getty Images
इसके बाद जब ये बच्चे बड़े होते हैं तो ये इंसान के मांस को ही तरजीह देते हैं. इंसान का शिकार किसी जानवर के शिकार की अपेक्षा ज्यादा आसान होता है तो मानव और तेंदुए का संघर्ष बढ़ता जाता है.
तेंदुओं के इस व्यवहार पर डॉ. नाहा बताते हैं, “अगर एक मादा तेंदुआ इंसान का शिकार करती है तो आसान शिकार हासिल करने की ये तरकीब उसके बच्चों में भी जाएगी. अंग्रेजी में इसे लर्नेड बिहेवियर कहते हैं. और ये सिर्फ तेंदुओं ही नहीं दूसरे मांसाहारी जानवरों में भी पाया जाता है.”
समस्या गंभीर कैसे हुई?
बीते कई सालों के आंकड़े देखें तो उत्तराखंड में तेंदुओं और इंसानों के बीच संघर्ष कम होने की जगह एक बड़ा रूप लेता दिखता है.
राजाजी नेशनल पार्क के रेंज ऑफ़िसर विकास रावत के मुताबिक़, राजाजी नेशनल पार्क की मोतीचूर-रायवाला रेंज में शिकार की कोई कमी नहीं है, सांभर और जंगली सुअर जैसे जंगली जानवर यहां अच्छी ख़ासी संख्या में मौजूद हैं.
लेकिन इसके बावजूद बीते चार सालों में इस रेंज में लगभग 22 लोग आदमखोर तेंदुए के शिकार हुए हैं.
तेंदुआ-मानव संघर्ष
मध्य भारत में तेंदुओं के ईटिंग बिहेवियर पर शोध करने वाले विशेषज्ञ अद्वेत एदगांवकर इसे एक चौंकाने वाला आंकड़ा बताते हैं.
वो कहते हैं, “ये सोचने वाली बात है कि मानव संघर्ष का आंकड़ा इतना ज़्यादा है. आमतौर पर अगर कभी टाइगर या तेंदुए का इंसानों के साथ साबका पड़ जाता है तो वह मार ज़रूर देता है लेकिन उसे खाता नहीं है.”
विकास रावत इस संघर्ष को विस्तार से समझाते हैं, “राजाजी नेशनल पार्क की रायवाला रेंज में साल 2014 के बाद से लगातार इंसानों पर तेंदुओं के हमले की घटनाएं सामने आ रही हैं. आधिकारिक रूप से ये आंकड़ा 19 लोगों की मौत का है. हमारी रेंज में ही 19 किलिंग हैं, साथ की चीला रेंज में भी एक किलिंग हुई है.”
तेंदुआ-मानव संघर्ष
“पिछले तीन महीनों में पांच किलिंग हुई हैं. ख़ास बात ये है कि जिन जगहों पर ये घटनाएं हुई हैं वो एक दूसरे से ज़्यादा दूर नहीं हैं. 2014 में ही हमने लगभग 50 कैमरे लगाकर तेंदुओं की मूवमेंट को समझना शुरू किया.”
उत्तराखंड में तेंदुओं के खतरनाक होने के पीछे एक वजह साल 2013 में आई बाढ़ भी मानी जाती है.
इस बाढ़ से राजाजी नेशनल पार्क का बहुत बड़ा हिस्सा प्रभावित हुआ था.
उत्तराखंड बाढ़
बाढ़ में मरने वालों की लाशें केदारनाथ से बहते हुए ऋषिकेश और रुड़की तक पहुंच गई थीं. कई लाशों के जंगल में फंसने और उन्हें तेंदुओं के खाने की आशंका भी जताई गई.
अब हमारे सामने सवाल है कि इस समस्या का समाधान कैसे निकाला जाता है. हम जब इसकी पड़ताल करने लगे तो हमने पाया कि असल में समाधान के भीतर ही समस्याएं छिपी बैठी हैं.
उत्तराखंड में तेंदुए के मानव बस्ती में आने पर वन विभाग कुछ इस तरह काम करता है.
स्टेप 1 – वन विभाग को तेंदुए के हमले की सूचना मिलती है.
स्टेप 2 – वन विभाग आदमखोर तेंदुए की तलाश करना शुरू करता है.
स्टेप 3 – वन विभाग कैमरा ट्रैप की मदद से ये तय करता है कि उनके क्षेत्र का कौन सा तेंदुआ सक्रिय रूप से इंसानों को अपना शिकार बना रहा है.
लेकिन इन तीन चुनौतीपूर्ण चरणों के बाद ही वन विभाग के सामने असली चुनौती आती है।
उत्तराखंड के जंगलों में तेंदुओं की मूवमेंट को समझने के लिए कैमरा ट्रैप लगाते हुए डॉ. दीपांजन नाहा (चश्मे में)
आदमखोर तेंदुए की पहचान करने के बाद वन विभाग तेंदुओं को बेहोश करके पिंजड़े में कैद करने की कोशिश करते हैं. ताकि तेंदुओं को रेस्क्यू सेंटर पहुंचाया जा सके.
उत्तराखंड के तीन रेस्क्यू सेंटर में क्षमता से ज़्यादा तेंदुए मौजूद हैं.
उत्तराखंड बाढ़
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मुद्गल कहते हैं, “वन विभाग बड़े परिश्रम से तेंदुयें पकड़कर पिंजड़ों में बंद करता है. लेकिन इसके बाद उस तेंदुए को संघर्ष की जगह से दूर ले जाने की कोशिश होती है.”
“उत्तराखंड में आदमखोर तेंदुओं के लिए रेस्क्यू सेंटर्स बनाए गए हैं जिनमें से चिड़ियापुर सेंटर को साल 2010 में शुरू किया गया था. लेकिन इन सेंटर में तेंदुओं की आबादी सीमा से ज़्यादा होने की वजह से वन विभाग को उन्हें रिलोकेट करने पर मजबूर होना पड़ता है.”
संदिग्ध आदमखोर तेंदुओं को रिलोकेट करने पर ये समस्या एक नए रूप में हमारे सामने आती है.
स्वभाव में बदलाव क्यों और कैसे आया?
तेंदुआ-मानव संघर्ष
किसी भी तेंदुए को आदमखोर होने के शक़ के आधार पर रिलोकेट करने के बाद वो तेंदुआ एक ऐसी जगह पहुंच जाता है जिसके बारे में उसे बिलकुल भी जानकारी नहीं होती.
ऐसे में इस स्थानांतरित किए गए तेंदुए को अपना पेट भरने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है जिसकी परिणति उसके आदमखोर बनने के रूप में होती है.
तेंदुआ-मानव संघर्ष
रेंज ऑफिसर विकास रावत बताते हैं, ” तेंदुओं के बारे में एक ख़ास बात ये है कि वो अपने शिक़ार को एक बार में पूरा नहीं खाते हैं, बल्कि उसे पेड़ों पर ले जाकर तीन चार दिनों के अंतराल में खाते हैं.”
तेंदुए के पीछे वाले पैर मजबूत होते हैं जिससे वो अपने शिकार को पेड़ पर आसानी से चढ़ा लेता है. लेकिन हम जो देख रहे हैं वो अपने आप में आश्चर्यजनक है.
रावत बताते हैं, “हम यहां तेंदुओं का बदलता हुआ व्यवहार देख रहे हैं. वे अब अपने शिकार को सिर्फ एक बार में ही खाकर छोड़ देते हैं. यही नहीं, अक्सर ये देखा गया है कि किसी किलिंग के बाद मृत शरीर से एक रात में 25 से 30 किलोग्राम मांस खाया जा चुका होता है. किसी एक तेंदुए का एक सिटिंग यानी एक बार में 25 किलोग्राम मांस खाना संभव नहीं है.”
“हमारे पास सूचना है कि एक ही किलिंग को कई तेंदुए खा रहे हैं. ऐसे में किसी एक तेंदुए को आदमखोर सिद्ध करना एक बड़ा चुनौतीपूर्ण काम है. क्योंकि अगर इंसानों का मांस खाना एक साझा और सहज व्यवहार हो जाता है तो अब तक की सारी रिसर्च फिज़ूल साबित हो जाएगी. हमारे पास इस समस्या का सामना करने के लिए कोई विचार तक नहीं है.”
तेंदुआ-मानव संघर्ष
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अक्सर लोग मारे गए जानवर जैसे कि गाय-भैंस में कीटनाशक डाल देते हैं जिसे खाकर तेंदुए शिकार से थोड़ी दूर चलकर मर जाते हैं.
ये संभव है कि लगातार कई बार इसका सामना करने के बाद तेंदुओं के व्यवहार में परिवर्तन हुआ हो लेकिन इसके पुख़्ता प्रमाण मौजूद नहीं हैं.
तेंदुओं के बदलते व्यवहार को समझाते हुए रावत कहते हैं, “कैमरा ट्रैप करके किसी तेंदुए को पकड़ना भी एक चुनौतीपूर्ण काम है. क्योंकि अब हम ये देख रहे हैं कि तेंदुए अपनी टैरिटरी में लगे हुए कैमरों के सामने से नहीं गुज़रते हैं. वे पेड़ के पीछे से गुज़र जाते हैं. लेकिन कैमरे के सामने नहीं आते हैं.”
समस्या का असली ज़िम्मेदार कौन?
अद्वेत एदगांवकर मानते हैं, “इस समस्या की जड़ में नीतियों का पालन नहीं किया जाना शामिल है. केंद्र सरकार की गाइडलाइन है कि किसी भी संदिग्ध आदमखोर तेंदुए को उसकी टैरिटरी से उठाकर कहीं और न छोड़ा जाए.”
तेंदुआ-मानव संघर्ष
“क्योंकि ऐसा होने पर तेंदुए वापस अपनी टैरिटरी में पहुंच जाते हैं. लेकिन राज्य इस नियम को मानने को तैयार नहीं हैं. लेकिन इसके लिए वन विभाग को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि ये स्थिति बहुत ग्रे शेड वाली है.”
अब सवाल है कि दिन प्रतिदिन अपना रूप बदलती हुई समस्या के लिए ज़िम्मेदार कौन है.
डॉक्टर दीपांजन नाहा इसके लिए नीति निर्माताओं को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
वो कहते हैं, “तेंदुआ-मानव संघर्ष के मुद्दे पर जब समस्या खड़ी हो जाती है तब उसका समाधान खोजा जाता है, यानी सिर्फ पैचवर्क किया जाता है. वन्य जीव संरक्षण के तहत किसी तेंदुए को रिलोकेट नहीं किया जाना चाहिए.”
तेंदुआ-मानव संघर्ष
”लेकिन उत्तराखंड ही नहीं देश भर में कई जगह किसी जानवर के आदमखोर होने के बाद उसे उसके क्षेत्र से उठाकर दूसरी जगह रिलोकेट किया जाता है. जो कि एक ख़तरनाक प्रक्रिया है. तेंदुआ एक क्षेत्रीय जानवर है और एक क्षेत्र से किसी जानवर को उठाने पर दूसरा जानवर उसका क्षेत्र हथिया लेता है. इससे समस्या पहले से ज़्यादा बड़ी हो जाती है.”
अब समाधान क्या है?
उत्तराखंड के जंगलों में पूरे पांच दिन बिताने और तेंदुए-मानव संघर्ष से जुड़े हर एक पहलू को टटोलने के बाद भी इस समस्या के समाधान का ठीक ठाक जवाब हमें नहीं मिल सका.
एक तरफ वन्य जीव संरक्षक इसके लिए वन विभाग को दोषी ठहराते हैं.
तेंदुआ-मानव संघर्ष
वहीं वन विभाग के मुताबिक़, ऐसी स्थिति पैदा होने पर उन्हें मीडिया से लेकर, सिविल सोसाइटी और स्थानीय नागरिकों के गुस्से का सामना करना पड़ता है.
इसमें आदमखोर जानवरों को शिकारियों की मदद लेकर मार दिया जाना शामिल है.
हालांकि, डॉक्टर नाहा बताते हैं कि भारतीय वन्य जीव संस्थान अपने स्तर पर गांववालों के बीच तेंदुओं को लेकर समझ विकसित करने की कोशिशों के साथ-साथ तकनीकी मदद मुहैया कराकर इस समस्या के समाधान की दिशा में काम कर रहा है
तेंदुआ-मानव संघर्ष
लेकिन समस्या के बदलते स्वरूप पर अब तक किसी तरह की पुख़्ता जानकारी, तेंदुओं की संख्या को लेकर आंकड़ों और सभी पक्षों के बीच समन्वय की कमी है.
ऐसे में इस समस्या के समाधान के लिए एक मॉडल की तलाश ज़रूरी है जिसमें जानवर और इंसान के एक ही वातावरण में समन्वय के साथ एक साथ रह सकें.
उत्तराखंड के पहाड़ों से मैदान की ओर लौटते हुए हमारी आंखों के सामने प्रमिला देवी और उनकी जैसी तमाम दूसरी महिलाओं के आंसू और बातें जहन में आ रही थीं जिसमें वो हमारी ओर एक उम्मीद भरी नज़र से देख रही थी कि इस समस्या का समाधान किसी दिन तो निकलेगा.
