ईसाई बनने पर आरक्षण समाप्त: इलाहाबाद हाई कोर्ट
ईसाई बने हिंदुओं का अनुजा-अजजा व अन्य पिछड़ा वर्ग का लाभ लेना संविधान से धोखा, इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
प्रयागराज 02 दिसंबर 2025। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि ईसाई बनने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति (एससी) का लाभ नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं है। कोर्ट ने इसे संविधान से धोखाधड़ी बताया और जिलाधिकारियों को ऐसे मामलों में कार्रवाई करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने महाराजगंज निवासी जितेंद्र साहनी की याचिका निरस्त कर दी, जिन्होंने हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ आपत्तिजनक बातें की थीं। न्यायालय ने कहा कि अनुजा/अजजा अधिनियम का लाभ धर्म परिवर्तन बाद नहीं मिलता।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाई कोर्ट ने महराजगंज निवासी व्यक्ति की याचिका खारिज करते हुआ महत्वपूर्ण फैसला दिया है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया सभी जिलाधिकारियों को चार महीने में कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश
कहा-हिंदू से ईसाई बने और स्वयं को हिंदू लिख रहे याची की जांच कर करें कार्रवाई
‘अनुजा/अजजा (अत्याचार निवारण) अधिनियम का उद्देश्य उन समुदायों की रक्षा करना है जो ऐतिहासिक रूप से जाति-आधारित भेदभाव का सामना किये हैं। परिणामत:, इसके सुरक्षात्मक प्रावधान उन लोगों तक नहीं बढ़ाए जा सकते जिन्होंने किसी अन्य उस धर्म को अपना लिया है जिसमें जाति व्यवस्था मान्य नहीं है।’
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि प्रदेश में हिंदू धर्म छोड़ कर ईसाई या अन्य धर्म अपनाना वाला कोई भी व्यक्ति अनुसूचित जाति (एससी), जनजाति (एसटी) तथा पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी में मिलने वाली सुविधायें पाने का अधिकारी नहीं है। इस श्रेणी में लाभ पाने का अधिकार केवल हिंदू को ही है। कोर्ट ने कहा, ‘ईसाई बने पूर्व हिंदू का अनुसूचित जातीय लाभ लेना संविधान के साथ फ्राड है। इस पर कार्रवाई की जानी चाहिए।’
कोर्ट ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को दिया निर्देश
अदालत ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को धर्म बदल चुके हिंदुओं के आरक्षण का लाभ लेने के मामले में चार महीने में जांच कर कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। साथ ही जिलाधिकारी महाराजगंज को निर्देश दिया है कि वह हिंदू से ईसाई बनने के बावजूद स्वयं को हिंदू लिखने वाले याची की जांच तीन माह में पूरी कर कानूनी कार्रवाई करें।
एकल पीठ ने निरस्त की याचिका

यह आदेश न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकल पीठ ने जितेंद्र साहनी की याचिका निरस्त करते हुए दिया है। याची ने धर्म परिवर्तन के आरोप में एसीजेएम अदालत महराजगंज में चल रही आपराधिक केस कार्रवाई निरस्त किए जाने की मांग की थी। कोर्ट ने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रमुख/अपर मुख्य सचिव अल्पसंख्यक कल्याण विभाग,अपर मुख्य सचिव समाज कल्याण विभाग को इस मामले में कानूनी कार्रवाई करने का आदेश दिया है।
एकलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का संदर्भ दिया
कोर्ट की राय में ईसाई धर्म अपनाने वाले अनुसूचित जाति के व्यक्तियों का अनुजा का लाभ लेना जारी रखना ‘संविधान से धोखा’ है। एकल पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के सी.सेल्वेरानी (C. Selvarani) मामले में दिए गए निर्णय का भी संदर्भ दिया है। इसमें मतांतरण (धर्मांतरण) को केवल लाभ के लिए ‘संविधान के साथ धोखा’ बताया गया है।
थाना सिंदूरिया अंतर्गत ग्राम मथानिया लक्ष्मीपुर एकडंगा निवासी याची पर आरोप है कि उसने गरीबों का धर्म परिवर्तन कराया है। हिंदू देवी-देवताओं का अपमान और शत्रुता भड़काने के भी आरोप लगाए गए है। गांव के लक्ष्मण विश्वकर्मा व बुद्धि राम यादव ने इस बात की पुष्टि की है कि जितेंद्र साहनी हिंदू धर्म के देवी देवताओं के लिए आपत्तिजनक बातें करता है।

सरकारी अधिवक्ता ने कहा
कोर्ट को सरकारी अधिवक्ता ने बताया कि याची इसाई पादरी है लेकिन हाई कोर्ट में दिये शपथपत्र में उसने खुद को हिंदू बताया है। हिंदू कौन है? इस संबंध में उच्च न्यायालय ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम सहित अन्य कानूनों के संदर्भ से कहा-‘हिंदू, सिख बौद्ध जैन ,आर्य समाजी आदि माने गए हैं। यह भी स्पष्ट है कि जो व्यक्ति मुस्लिम ईसाई पारसी व यहूदी नहीं हैं, वह हिंदू हैं। अनुसूचित जाति की सुविधा केवल हिंदुओं को दी गई है। धर्म बदलने के बाद व्यक्ति इस सुविधा का लाभ नहीं पा सकेगा। वैसे कोर्ट ने कहा है कि याची अधीनस्थ अदालत में डिस्चार्ज अर्जी दे सकता है।

