मुस्लिम नेताओं का कथन:ईद की नमाज केवल मस्जिदों में

सड़क पर नमाज वाले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बयान पर सामने आईं मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रिया-सदभाव को नियम

देहरादून 24 मई 2026 : उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सड़क पर नमाज नहीं पढ़ने देने वाले कथन के बाद प्रदेश में राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं. इस विषय पर जहां राजनीतिक दल अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं, वहीं अब मुस्लिम और उससे जुड़े संगठनों की राय भी खुलकर सामने आने लगी है.

मुख्यमंत्री धामी ने हाल ही में सार्वजनिक स्थानों और सड़कों पर नमाज पढ़े जाने को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा था कि किसी भी धार्मिक गतिविधि से सामान्य जन को परेशानी नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा था कि, सड़कें सामान्य लोगों के आवागमन को होती हैं और वहां यातायात बाधित होने से कई तरह की कठिनाईयां हैं. मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद प्रदेश में राजनीतिक बहस तेज हो गई थी.

सड़क पर नमाज वाले मुख्यमंत्री धामी के बयान पर सामने आईं मुस्लिम नेताओं की सकारात्मक प्रतिक्रिया
हालांकि, अब इस पूरे मामले में मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं, जिनमें व्यवस्था और सामाजिक संतुलन पर जोर दिया जा रहा है. खास बात ये है कि अलग-अलग मुस्लिम नेताओं ने भी सड़क पर नमाज को अनुचित मानते हुए मस्जिदों और ईदगाहों के अंदर ही नमाज अदा करने की बात कही है. उन्होंने यह भी साफ किया है कि मजहबियत के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी और सामान्य जनता की सुविधा का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है.

उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने मुख्यमंत्री धामी के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि, इस विषय को केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं बल्कि मजहबी और सामाजिक दृष्टिकोण से भी समझने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि इस्लाम मजहब में इबादत के भी कुछ नियम और सभ्याचार बताए गए हैं, जिन्हें ‘हक उल इबाद’ कहा जाता है. इसका मतलब यह है कि इंसान की इबादत से दूसरे लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए.

शादाब शम्स ने कहा कि, सड़क कोई स्वच्छ स्थान नहीं होता. वहां धूल, मिट्टी, गाड़ियों की आवाजाही और कई तरह की गंदगी रहती है. ऐसे स्थान पर इबादत करना इस्लाम की भावना के अनुरूप नहीं माना जाता. उन्होंने कहा कि, नमाज ऐसी जगह पढ़ी जानी चाहिए जहां साफ-सफाई और अनुशासन हो. उन्होंने आगे कहा कि, इस पूरे मामले में जबरदस्ती या टकराव की कोई जरूरत नहीं है. क्योंकि जरूरत पड़ने पर नमाज अलग-अलग पालियों में भी पढ़ी जा सकती है. उन्होंने बताया कि उलेमाओं की ओर से भी इस संबंध में पहले फतवा जारी किया जा चुका है कि ईद की नमाज दो बार में भी अदा की जा सकती है, ताकि भीड़ और अव्यवस्था से बचा जा सके.

वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड में जमीअत उलेमा ए हिंद के प्रदेश मीडिया प्रभारी मोहम्मद शाह नजर ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, उनके संगठन द्वारा पहले ही साफ तौर पर यह बात कही जा चुकी है कि नमाज केवल मस्जिदों और ईदगाहों के अंदर ही पढ़ी जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि

बकरीद को लेकर अपील: ईद-उल-अजहा (बकरीद) को लेकर जमीयत उलेमा जिला देहरादून ने मुस्लिम समाज से कानून, सफाई और सामाजिक सौहार्द का विशेष ध्यान रखने की अपील की है. संस्था ने कहा कि कुर्बानी इस्लाम का एक महत्वपूर्ण इबादती अमल है, लेकिन इसे पूरी जिम्मेदारी, शरई हिदायतों और प्रशासनिक नियमों में ही किया जाना चाहिए. वहीं बैठक में गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिलाने के समर्थन में उत्तराखंड से भी अभियान चलाने का फैसला लिया गया.

देहरादून के आजाद कॉलोनी स्थित मदरसा दार-ए-अरकम में आयोजित बैठक के बाद जमीयत उलेमा ने यह अपील जारी की . संस्था के पदाधिकारियों ने कहा कि, मौजूदा समय में देश और प्रदेश का वातावरण देखते हुए मुस्लिमों की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है. ऐसे में हर किसी को  ध्यान रखना चाहिए कि उसकी किसी भी गतिविधि से सामाजिक तनाव या विवाद न हो.

जमीयत उलेमा ने साफ कहा कि, कुर्बानी केवल निर्धारित और वैध स्थानों पर ही की जाए. सड़क, गली, चौराहे या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर कुर्बानी से बचा जाए, ताकि सामान्य लोगों को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े. इस्लाम जानवरों के साथ भी बेहतर व्यवहार की शिक्षा देता है, इसलिए कुर्बानी में किसी भी तरह की क्रूरता या लापरवाही नहीं होनी चाहिए.

जमीयत उलेमा ने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए लोगों से कुर्बानी की फोटो और वीडियो इंटरनेट पर साझा न करने की अपील भी की. संस्था का कहना है कि इस तरह की तस्वीरें कई बार समाज में गलत संदेश देती हैं और विवाद का कारण बन जाती हैं.

जमीयत उलेमा ने लोगों से अफवाहों और भड़काऊ बातों से दूर रहने की अपील करते हुए कहा कि यदि कहीं कोई विवाद होता है तो तुरंत प्रशासन और पुलिस को सूचना दी जाए. बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किए जाने की मांग को लेकर उत्तराखंड में भी जागरूकता अभियान चलाया जाएगा. पदाधिकारियों ने कहा कि समाज में शांति, सद्भाव और आपसी सम्मान बनाए रखना सभी नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है.

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