UGC के जातीय भेदभाव नियमों पर फिर होगा विचार, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया
UGC के जातीय भेदभाव नियमों पर फिर होगा विचार, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया
केंद्र की मोदी सरकार UGC रेगुलेशंस 2026 की समीक्षा के लिए एक कमेटी बनाने पर विचार कर रही है.
Centre Mulls Panel to Revisit UGC Regulations on Caste Discrimination, Tells Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट (ANI)
author img
By Sumit Saxena
Published : November 5, 2026 at 5:31 PM IST
3 Min Read
Choose ETV Bharat
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के हाल ही में अधिसूचित किए गए नियमों की समीक्षा के लिए एक कमेटी बनाने पर विचार कर रहा है. इसका मकसद उच्च शिक्षण संस्थान में जातिगत भेदभाव को रोकना है.
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने की. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच के सामने केंद्र सरकार की तरफ से पैरवी की. बेंच यूजीपी नियमों के खिलाफ कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.
सुनवाई के दौरान मेहता ने बेंच को बताया कि सरकार इस मुद्दे की जांच कर रही है. बेंच ने कहा कि हर छात्र के हितों की रक्षा करना और यह पक्का करना जरूरी है कि युवा पीढ़ी का ध्यान रखा जाए.
मेहता ने जोर देकर कहा कि परीक्षा का मकसद यह पक्का करना है कि कोई भी वर्ग नाखुश या डरा हुआ महसूस न करे और छात्रों की चिंताओं को दूर किया जाए. सुनवाई के दौरान बेंच ने सरकार की पैरवी कर रहे मेहता से पूछा कि आप यूजीसी विनियम पर फिर से क्यों सोचते हैं.
इस पर मेहता ने बेंच से कहा कि सरकार ने यह फैसला लिया है कि हर छात्र का ध्यान रखा जाना चाहिए. किसी को कोई डर नहीं होना चाहिए. मेहता ने कहा कि सरकार युवा पीढ़ी के हितों पर विचार कर रही है और एक कमेटी बनाने पर विचार कर रही है. मेहता की बातों पर ध्यान देते हुए बेंच ने मामले की सुनवाई टाल दी.
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) नियम, 2026 (रेगुलेशंस) 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे और ये भारत के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों पर लागू होते हैं.
इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. वह इसलिए क्योंकि ‘जनरल कैटेगरी’ के छात्रों को इसके शिकायत निवारण प्रणाली के तहत शिकायत करने से बाहर रखा गया था. सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में इन नियमों पर रोक लगा दी थी. इसके बाद से ही मामले को लेकर सुनवाई चल रही है.
नियमों के मुताबिक उच्च शिक्षण संस्थानों को वंचित समूहों के लिए नीतियों और कार्यक्रम को असरदार तरीके से लागू करने और भेदभाव की शिकायतों की जांच करने के लिए समान अवसर केंद्र और समानता समितियां बनानी होंगी. याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि नियम बहिष्कार करने वाले थे. वह इसलिए क्योंकि इसमें वैसे लोग जो सामान्य वर्ग से है और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित नहीं हैं, वे शिकायत निवारण और संस्थागत सुरक्षा से वंचित हो जाएंगे.
uttarakhand assembly election 2027
देहरादून सड़क हादसा
indian stock market news
चक्रवाती तूफान मुरासु
❯
ETV Bharat Uttarakhand
उत्तराखंड
uttarakhand
Language Menu
English
हिंदी
उत्तर प्रदेश
उत्तराखंड
छत्तीसगढ़
झारखंड
दिल्ली
बिहार
मध्य प्रदेश
राजस्थान
हरियाणा
हिमाचल प्रदेश
অসমীয়া
বাংলা
ગુજરાતી
ಕನ್ನಡ
മലയാളം
मराठी
ଓଡିଆ
ਪੰਜਾਬੀ
தமிழ்
తెలుగు
ఆంధ్రప్రదేశ్
తెలంగాణ
اردو
ETV Bharat / opinion
यूजीसी गाइडलाइंस ने क्या सामान्य वर्ग का ‘ट्रिगर प्वाइंट’ दबा दिया है?
सामान्य वर्ग ने मान लिया है कि उसने अगर इस मामले को भी हल्के में लिया तो फिर उसके गले में फंदा कसता जाएगा.
Students
आरक्षण पर बहस की मांग करते सामान्य वर्ग के छात्र (ANI)
author img
By Sachin Sharma
Published : August 28, 2026 at 2:25 PM IST
13 Min Read
Choose ETV Bharat
विगत 21 अगस्त को हजारों की संख्या में सामान्य (अनारक्षित) वर्ग के लोग यूजीसी गाइडलाइंस के विरोध में जंतर-मंतर पर जमा थे. वो 22 और 23 अगस्त को भी वहां पहुंचे. ये सब उन्हीं यूजीसी गाइडलाइंस का विरोध कर रहे थे जिसे केन्द्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने 13 जनवरी 2026 को लागू कर दिया था. जिस दिन इन गाइडलांइस को लागू करने का नोटिफिकेशन जारी हुआ उसी दिन से यह केन्द्र सरकार के गले की फांस बना हुआ है. यूजीसी गाइडलाइंस का यह विरोध पिछले कुछ महीनों से लगातार व्यापक होता जा रहा है. सामान्य वर्ग ने इन गाइडलाइंस ही नहीं बल्कि इसी तरह के दूसरे कानूनों का भी तीव्रता से साथ विरोध करना शुरू कर दिया है. फिलहाल बहस एससी एसटी एक्ट, सरकारी नौकरियों में आरक्षण, प्रमोशन में आरक्षण, राज्य और केन्द्र सरकार के उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण तक पहुंच चुकी है. तो क्या यह माना जाए कि यूजीसी गाइडलाइंस ने काफी समय से चुप बैठे सामान्य वर्ग के ट्रिगर प्वाइंट को दबा दिया है? इसी पर बात करते हैं.
क्या हैं यूजीसी गाइडलाइंस और उसके विरोध का कारण
केन्द्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन आने वाले विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के नाम पर कुछ नियम बनाए. इन्हें 2012 में लागू किए गए नियमों का स्थान लेना था. इनमें प्रमुख था ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन्स’ नियम. इस नियम के आधार पर सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में एक समानता (इक्विटी) समिति बनाई जानी थी. इन नियमों में जाति आधारित-भेदभाव को बताते हुए एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग को पहले ही एक तरफ रख दिया गया. यह बताया गया कि इनके खिलाफ अन्य जातियां कुछ भी दुर्व्यहार करती हैं तो पीड़ित एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के विद्यार्थी अपनी शिकायत समानता समिति में कर सकेंगे. समिति को इस मामले में तुरंत ही कार्रवाई का अधिकार भी दिया गया था. रोचक बात यह है कि समिति में जो पदाधिकारी रहेंगे वो भी एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग (महिलाएं और दिव्यांग भी) से ही होंगे. बस इसी बात को लेकर सामान्य वर्ग भड़क गया. पूरे देश में इसकी भारी प्रतिक्रिया हुई. इन गाइडलाइंस से साफ दिख रहा था कि कुछ 4-5 सामान्य वर्ग की जातियों को पहले से ही उत्पीड़नकर्ता मान लिया गया है. न्याय के लिए बनाई गई समानता समिति में भी सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं होने से लोगों के मन में शंका पैदा हो गई. उन्हें लगा कि शिकायत झूठी होने के बावजूद उनके बच्चों की कोई सुनवाई नहीं होगी. एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग की पहले से ही हर साल हजारों शिकायतें सामने आती रहती हैं. ऐसे में सामान्य वर्ग को लगा कि अभी तक ऐसे कानूनों के वो ही भुगत भोगी हैं अब बात उनके बच्चों तक चली जाएगी. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को तुरंत ही इन गाइडलाइंस पर रोक लगा दी. कहा कि 2012 वाली ही गाइडलाइंस जारी रहेंगी. साथ ही यह भी कहा कि इन नियमों के प्रावधान अस्पष्ट हैं. इनका दुरुपयोग और उससे समाज में विभाजन पैदा हो सकता है. सरकार तभी से बैकफुट पर है. सुप्रीम कोर्ट कई सुनवाई में इस बारे में पूछ चुका है. सरकार का जवाब रहता है कि हम इस पर अभी काम कर रहे हैं.
Stundetns
यूजीसी गाइडलाइंस का विरोध करते छात्र (ANI)
इस बार इतना उद्वेलित क्यों है सामान्य वर्ग
इसके लिए आपको 15 अगस्त 1947 को आजाद हुए भारत के बाद के घटनाक्रमों को देखना होगा. भारतीय संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर आरक्षण को सामाजिक न्याय का साधन मानते थे. उनके अनुसार कई सदियों से जो जातियां समाज की मुख्यधारा में आने से पीछे रह गई थीं, आरक्षण उन्हें इसमें शामिल होने में मदद करेगा. 26 जनवरी 1950 को भारत में संविधान लागू हो गया. उसके साथ ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सरकारी नौकरियों में यह आरक्षण भी लागू हो गया. 1990 में इसे अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए भी लागू कर दिया गया. यह काम बी.पी मंडल कमीशन की सिफारिश पर हुआ था. हालांकि मंडल कमीशन ने अपनी सिफारिशें 1980 में दी थीं लेकिन इसे लागू करने में दस साल लग गए. कोई भी इस जिन्न को बोतल से बाहर नहीं निकालना चाहता था. 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी सिंह ने इसे लागू करने का जोखिम उठाया. अन्य पिछड़ा वर्ग में सैंकड़ों जातियां शामिल हैं. उन्हें सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण दे दिया गया. सामान्य वर्ग समझ गया था कि एससी-एसटी आरक्षण के बाद पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण मिलने के बाद सरकारी नौकरियों में जाने के उसके मौके सीमित हो जाएंगे. सामान्य वर्ग की ज्यादातर जातियां नौकरी पेशा ही हैं. इसी आरक्षण के खिलाफ देश भर में भीषण विरोध प्रदर्शन हुए. रैलियां निकाली गईं. कई छात्रों ने आत्मदाह कर लिया. सरकार अपने फैसले पर टिकी रही. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. कोर्ट ने आरक्षण को वैध मान लिया लेकिन इसकी सीमा 50 फीसदी तय कर दी. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1990 में ही एक काम और किया था. वो था 30 जनवरी को लागू किया गया एससी-एसटी एक्ट. इसे संसद ने 11 सितंबर 1989 को ही पारित कर दिया था, जनवरी 1990 में इसने कानून का रूप ले लिया. इस एक्ट का उद्देश्य एससी और एसटी समुदायों को किसी भी प्रकार के भेदभाव से बचाना था लेकिन एक अन्य सामाजिक घटक पिछड़ा वर्ग पर ही इस एक्ट के तहत सबसे अधिक मुकदमे दर्ज हुए.
Students
आरक्षण को लेकर हो रहे भेदभाव को उठाते छात्रगण (ANI)
1990 के बाद भारत की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने में बदलाव
एससी-एसटी एक्ट और सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह का अगले कुछ सालों में राजनीतिक कैरियर खत्म हो गया लेकिन इसके बाद भारत के समाज और राजनीति में जबरदस्त बदलाव आया. जाति आधारित तमाम राजनीतिक दल सामने आए. उन्होंने भारतीय राजनीति में अपना स्थान भी बनाया. उसके बाद से सरकारी नौकरियों में आरक्षण 50 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ाने की मांग लगातार होती रही. इसके बाद प्रमोशन में आरक्षण आ गया. 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि आरक्षण केवल शुरुआती नियुक्ति के लिए है पदोन्नति के लिए नहीं परन्तु 1995 में संविधान में 77वां संशोधन करके सरकारी नौकरियों में फिर से प्रमोशन में आरक्षण को हरी झंडी दिखा दी गई. साल 2000 में 81वां और 2002 में 85वां संशोधन किया गया और वरिष्ठता और रिक्तियों को भी कैरी फॉरवर्ड की सुविधा जोड़ दी गई. 2006-07 में केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों में भी ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू कर दिया गया. इसी कड़ी में तमाम दुरुपयोग के मामले सामने आने के बाद भी एससी-एसटी एक्ट को भी लगातार कठोर किया जाता रहा. पिछले 12 साल के दौरान मोदी सरकार की ही बात करें तो 2015 में एससी-एसटी एक्ट में संशोधन करके इसमें 25 अन्य अपराध जोड़ दिए गए. पहले ये 22 थे. मतलब इस एक्ट के तहत इस वक्त 47 अपराधों की ऐसी लंबी सूची है जिसमें सामान्य वर्ग और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के खिलाफ बिना सुनवाई तत्काल गिरफ्तारी की कार्रवाई होगी. यह काम सरकारों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए किए फिर भले ही इससे समाज में विभेद और गहरा ही क्यों ना हो जाए.
Students
आरक्षण पर बहस की मांग करते छात्रगण (ANI)
2018 में एससी-एसटी एक्ट को लेकर केन्द्र सरकार बैकफुट पर क्यों आ गई थी
सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2018 में अपने एक फैसले में एससी-एसटी एक्ट को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया. लगातार दुरुपयोग के मामले सामने आने पर शीर्ष कोर्ट ने इस एक्ट के तहत तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. अग्रिम जमानत का प्रावधान भी कर दिया था. जांच के लिए डीएसपी स्तर के एक अधिकारी को नामित किया जाना आवश्यक कर दिया था. इस निर्णय से सरकार को काटो तो खून नहीं वाली स्थिति में ला दिया. मोदी सरकार ने अगस्त 2018 में संसद के दोनों सदनों में संविधान संशोधन विधेयक पारित करवा लिया और एक्ट को पहले जैसा ही कर दिया. इसकी त्वरित प्रतिक्रिया हुई. इसके विरोध में सामान्य वर्ग ने 6 सितंबर को भारत बंद का आव्हान कर दिया. कई राज्यों से हिंसा, हत्या और आगजनी की खबरें आईं. सामान्य वर्ग ने केन्द्र सरकार को 2019 में होने वाले संसदीय चुनावों में सबक सिखाने की धमकी दी. केन्द्र ने एक्ट का तो कुछ नहीं किया लेकिन इस मामले को ठंडा करने के लिए वो सामान्य वर्ग के ईडब्ल्यूएस (EWS-Economic Weaker Section) के लिए 10 फीसदी आरक्षण लेकर आ गई. इसकी मुख्य शर्त सालाना आय 8 लाख रुपए से कम होना थी. यह आरक्षण सरकारी नौकरियों और सभी शिक्षण संस्थानों में 14 जनवरी 2019 से लागू कर दिया गया. इससे सामान्य वर्ग को तात्कालिक राहत तो जरूर मिली लेकिन भारत की राजनीति में जाति विभेद और आरक्षण के लगातार बढ़ाए जाते रहने की मांग बिल्कुल भी कम नहीं हुई.
SC
सुप्रीम कोर्ट (IANS)
यूजीसी गाइडलाइंस ने छिड़का जले पर नमक
1990 के बाद पिछले 36 साल की बात करें तो सरकारी नौकरियों में सामान्य वर्ग का प्रतिशत जबरदस्त तरीके से गिरा है. सभी जगह आरक्षण व्याप्त है. भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के डेटा अनुसार 1990 से पहले सरकारी नौकरियों में सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व 70 फीसदी से ज्यादा था. वहीं वर्तमान में यह घटकर 28 फीसदी रह गया है. भाजपा सामान्य वर्ग को अपना वोटर मानती है लेकिन आरक्षण की वजह से पहले से ही चोट खाए सामान्य वर्ग को यूजीसी की प्रस्तावित गाइडलाइंस ने जले पर नमक छिड़कने वाला अनुभव दे दिया. पहले तो सामान्य वर्ग उच्च शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहा था लेकिन सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही. हालांकि बाद में धर्मेन्द्र प्रधान की विदाई नीट-यूजी परीक्षा के पेपर लीक प्रकरण और कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के चलते हो गई लेकिन सामान्य वर्ग चुप फिर भी नहीं बैठा. अब वो इन गाइडलाइंस को वापस लेने पर अड़ा है. भले ही फिलहाल इन गाइडलाइंस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखी है लेकिन ऊंट कब किस करवट बैठ जाएगा यह किसे पता है.
आरक्षण को लेकर सामान्य वर्ग और राजनीतिक दलों का क्या है स्टैंड
आरक्षण पर बात करना राजनीतिक दलों के लिए बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा है. 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों से कुछ ही महीने पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ के मुखपत्र को दिए एक इंटरव्यू में आरक्षण की समीक्षा करने की बात कह दी थी. उन्होंने इसके लिए एक निष्पक्ष और स्वायत्त समिति बनाने की बात भी कही थी. उन्होंने उन जातियों को चिन्हित करने की भी सलाह दी थी जिन्हें अब वाकई आरक्षण की जरूरत है. उनकी इस बात को आरक्षण खत्म करने की उनकी मंशा के रूप में प्रचारित किया गया. नतीजे के तौर पर 2015 के अंत में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा बुरी तरह हार गई. इसी प्रकार 2024 के हुए संसदीय चुनाव में भाजपा के नारे ‘अबकी बार 400 पार’ को भी विपक्षी दलों द्वारा यही कहकर प्रचारित किया गया कि अगर इतनी सीटें भाजपा ने हासिल कर लीं तो वो संविधान संशोधन करके आरक्षण खत्म कर देगी. नतीजा भाजपा चुनावों में पूर्ण बहुमत तक हासिल नहीं कर पाई और 240 सीटों पर सिमट गई. ऐसे ही नतीजों से डरकर राजनीतिक दल आरक्षण पर बात भी नहीं करना चाहते, अपने वोटरों को खुश करने के लिए सिर्फ उसे बढ़ाते रहना चाहते हैं. वहीं दूसरी तरफ आरक्षण को लेकर लाभार्थी जातियां जिस प्रकार से लामबंद हो जाती हैं उस प्रकार से अभी तक सामान्य वर्ग की जातियां लामबंद नहीं हुई हैं. वो आरक्षण को खत्म करना नहीं चाहतीं लेकिन उस पर स्वस्थ बहस चाहती हैं. सामान्य वर्ग की तरफ से लगातार यह कहा जाता है कि गरीब और कम आय वर्ग के लोग उनके यहां भी हैं. उन्हें योग्यता और समान अवसर मिलना चाहिए. सामान्य वर्ग यह भी आरोप लगाता है कि एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण का सबसे ज्यादा लाभ कुछ चुनिंदा जातियों को ही मिला है. एक-एक घर में कई लोगों को सरकारी नौकरियां इसी आरक्षण के चलते मिली हैं. जो लोग आरक्षण लेकर आईएएस-आईपीएस बन गए हैं वो भी अपने बच्चों को आरक्षण दिलवाते हैं. इसकी बजाए जरूरतमंदो को मौका मिलना चाहिए. यहां उल्लेखनीय है कि सभी प्रकार की परीक्षाओं में सामान्य वर्ग के मुकाबले काफी कम नंबरों पर आरक्षित वर्ग को मौका मिल जाता है. उनकी सीटों पर भी सामान्य वर्ग आवेदन नहीं कर सकता जबकि सामान्य वर्ग की सीटों पर आरक्षित वर्ग आवेदन कर सकता है. इस प्रकार के नीतिगत सुधारों की मांग सामान्य वर्ग लंबे समय से कर रहा है लेकिन उस पर कोई भी सरकार या राजनीतिक दल अपने वोट बैंक के कारण ध्यान नहीं दे रहे थे. अब यूजीसी गाइडलाइंस के खिलाफ चल रहे इस आंदोलन ने सामान्य वर्ग को फिर से अपनी मांगों को लेकर एकजुट कर दिया है. अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि यह आंदोलन कितना लंबा चलेगा या कितना प्रभावी होगा लेकिन सामान्य वर्ग इस बार इन जाति और आरक्षण संबंधी सभी प्रावधानों और कानूनों को लेकर मुखर है और इसे किसी नतीजे तक पहुंचाने की इच्छा दिखा रहा है.
GC
सामान्य वर्ग के छात्रों का मुद्दा उठाने के लिए एकत्रित हुए स्टूडेंट लीडर्स (ANI)
(डिस्क्लेमर: इस लेख में साझा किए गए विचार और तथ्य लेखक के अपने हैं.)
ये भी पढ़ें : सीजेपी आंदोलन से सरकार को क्या मिला सबक, अब आगे का रास्ता कैसा होगा
ये भी पढ़ें : भाजपा के लिए बिहार और मप्र के उपचुनावों में मिली पटखनी हार से ज्यादा बेइज्जती है
For All Latest Updates
Follow Us
TAGGED:
UGC GUIDELINES GENERAL CATEGORY
यूजीसी गाइडलाइंस सामान्य वर्ग
SC ST ACT UGC
JANTAR MANTAR PROTEST RESERVATION
RESERVATION DEBATE
संबंधित ख़बरें
eluru-underground-coal-gasification-project-deserves-a-debate-grounded-in-science-not-speculation
एलुरु का भूमिगत कोयला गैसीकरण परियोजना अटकलों पर नहीं, बल्कि विज्ञान पर आधारित बहस का है हकदार
November 4, 2026 at 5:49 PM IST
strait of Hormuz
युद्ध की वजह से क्लाइमेट का बुरा हाल, ईरान संघर्ष की वजह से तेल से दूर जाने की प्रक्रिया हुई तेज
November 1, 2026 at 9:08 AM IST
SC
मुकदमों की बढ़ती संख्या से निपटने का बेहतर उपाय है मध्यस्थता और पंचाट को अपनाएं
October 30, 2026 at 7:29 PM IST
Lula Brazil President
लूला और ट्रंप, लेफ्ट-राइट का पॉलिटिकल थियेटर…’जंग’ अब भी जारी
October 29, 2026 at 5:40 PM IST
लेटेस्ट
उत्तराखंड केदारताल ट्रेक हादसा, अब तक 6 सदस्यों के शव बरामद, 4 की हुई पहचान
पौड़ी वन विभाग के कर्मचारियों ने किया कार्य बहिष्कार, अफसरों के साथ अभद्रता का विरोध
अमेरिकी चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार, वेंस ने ईरान युद्ध से दूरी बनाने की कोशिश की
Student Protest: सुप्रीम कोर्ट ने HPEC को पीड़ितों के वीडियो की जांच करने की इजाजत दी
जोमैटो के संस्थापक दीपिंदर गोयल बोले, ‘ब्लिंकिट की एम्बुलेंस सर्विस के लिए देने होंगे इतने पैसे’
Quick Links / Policies
CONTACT US
ABOUT US
AUTHORS
CSR POLICY
PRIVACY POLICY
CODE OF ETHICS
TERMS & CONDITIONS
AWARDS
संपादक की पसंद
स्टडी रिपोर्ट: उत्तरकाशी के 9 फीसदी हिस्से में 73 प्रतिशत लैंडस्लाइड, गंगोत्री-यमुनोत्री हाईवे पर भी बड़ा खतरा
उत्तराखंड में थर्ड फ्रंट की तैयारी तेज, UKD ने भाजपा-कांग्रेस से पहले खेला बड़ा दांव, जानें किसको होगा नुकसान
सर्दी की दस्तक के साथ उत्तराखंड में बढ़े वन्य जीवों के हमले, कहीं हाथियों का उत्पात तो कहीं भालू-गुलदार ले रहे जान
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट: 125 KM की रेल लाइन में 213 KM का सुरंग नेटवर्क, जानें कब पूरा होगा देश का सबसे चैलेंजिंग मेगा प्रोजेक्ट
ETV Bharat Logo
Copyright © 2026
Ushodaya Enterprises Pvt. Ltd.,
All Rights Reserved.
टशह।जनञठञञञनञनञ भपय
TAGGED:
UGC REGULATIONS
CASTE DISCRIMINATION
यूजीसी के नियमों की समीक्षा
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया
यूजीसी के जातीय भेदभाव नियम

